खरीफ में मूंग की बुवाई सामान्यतः प्रदेश के सभी जनपदों में की जाती है किन्तु इसका सबसे अधिक क्षेत्र झांसी, फतेहपुर, वाराणसी, उन्नाव, रायबरेली तथा प्रतापगढ़ जनपदों में हैं। मूंग में खरीफ के मौसम में पीली मोजैक रोग का अधिक प्रकोप होने के कारण इसकी औसत उपज बहुत कम प्राप्त होती है। इसी बात को ध्यान में रखकर मूंग की खेती को जायद में करने पर बल दिया गया है। खरीफ में इसकी अच्छी उपज प्राप्त करने हेतु निम्न सघन पद्धतियां अपनाई जायें। भूमि की तैयारी दोमट तथा हल्की दोमट भूमि जिसमें पानी का समुचित निकास हो, इस फसल के लिए उत्तम है। बुवाई की समय मूंग की कम समय में पकने वाली प्रजातियों की बुवाई जुलाई के अन्तिम सप्ताह से अगस्त के तीसरे सप्ताह तक करनी चाहिए। बुवाई की विधि बुवाई कूंड में हल के पीछे करें। कूंड से कूंड की दूरी 30-35 से.मी. होनी चाहिए। संस्तुत प्रजातियां प्रमुख प्रजातियों का विवरण निम्न है क्र.सं. प्रजाति विशेषता उपयुक्त समय बोने का अवधि (दिन) पकने की कु./हे. अवरोधिता उपज ग्रहिता कीट रोग क्षेत्र उपयुक्त 1 पन्त मूंग-1 धूमिल हरा दाना 25 जुलाई से 10 अगस्त तक 70-75 8-10 पीला मोजैक सहिष्णु पूर्वी उ.प्र.तथा मैदानी क्षेत्र 2 पन्त मूंग 3 धूमिल हरा दान तदैव 75-85 10-15 तदैव समस्त उ.प्र. 3 नरेन्द्र मूंग 1 तदैव तदैव 65-70 12-15 तदैव तदैव 4 पी.डी.एम. 54 हरा चमकदार तदैव 70-75 10-12 तदैव पूर्वी उ.प्र. 5 पन्त मूंग 4 धूमिल हरा दाना तदैव 65-70 12-15 पीला मोजैक अवरोधी समस्त उ.प्र. 6 पी.डी.एम. 11 तदैव 65-70 10-12 सहिष्णु समस्त उ.प्र. 7 मालवीय ज्योति हरा चमकदार तदैव 65-70 12-15 तदैव समस्त उ.प्र. 8 सम्राट दाना हरा 25 जुलाई 10 अगस्त तक 60-65 8-10 तदैव समस्त उ.प्र. 9 मालवीय जनचेतना हरा एवं मध्यम बड़ा दाना तदैव 60-65 12-15 तदैव समस्त उ.प्र. 10 मालवीय जनप्रिया हरा दाना तदैव 65-70 12-15 तदैव समस्त उ.प्र. 11 मालवीय जागृति हरा दाना तदैव 65-70 12-15 तदैव समस्त उ.प्र. 12 आशा हरा दाना तदैव 65-70 12-15 तदैव समस्त उ.प्र. 13 मेहा 99-125 हरा चमकदार दाना जुलाई 60-75 14-16 तदैव समस्त उ.प्र. 14 टी.एम. 9937 हरा बड़ा दाना जुलाई 60-75 12-15 तदैव समस्त उ.प्र. 15 मालवीय जन कल्याणी हरा बड़ा दाना 25 जुलाई से 10 अगस्त 55-60 12-15 तदैव समस्त उ.प्र. 16 एम.एच. 2.15 हरा चमकदार 25 जुलाई से 10 अगस्त 60-70 12-15 तदैव समस्त उ.प्र. 17 आई.पी. एम 2.3 हरा चमकदार दाना 25 जुलाई से 10 अगस्त 65-70 10-11 तदैव पश्चिमी उ.प्र. 18 श्वेता (के.एम.-2241) तदैव तदैव 60-65 10-12 तदैव सम्पूर्ण उ.प्र. बीज की मात्रा तथा उपचार बीज दर 12-15 किग्रा. प्रति हे.। उपचार प्रति किलो बीज को 2.0 ग्राम थीरम तथा 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम से शोधित करने के बाद मूंग को राइजोबियम कल्चर के एक पैकेट से 10 कि.ग्रा. बीज का उपचार करना चहिए। अरहर की खेती के अन्तर्गत दिये उपचार के अनुरूप करें। उर्वरक 15 कि.ग्रा. नत्रजन तथा 40 कि.ग्रा. फास्फोरस 20 किग्रा. गंधक प्रति हे. तत्व के रूप में बोते समय कूंड़ों में डालना चहिए। फली बनने के समय 2 प्रतिशत यूरिया घोल के छिड़काव से उपज अधिक मिलती है। 25 किग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर डाला जाय। निराई-गुड़ाई क्र. स . शाकनाशी का नाम मात्रा प्रति हे. (व्यापारिक पदार्थ) मात्रा प्रति एकड़ (व्यापारिक पदार्थ) 1 फ्लूक्लोरेलिन 45 ई.सी. वेसालिन (बुवाई के पूर्व) 2.25 लीटर 900 से 1000 मिली. 2 मेटोलाक्लोर 50 ई.सी. डयूअल (बुवाई के दो दिनों में) 2.00 लीटर 800 मिली. 3 एलाक्लोर 50 डब्लू.पी. लासा (बुवाई के दो दिनों में) 4 लीटर 1600 मिली. 4 क्लोरीम्यूरान 25 ई.सी. क्लोवेन/ट्रान्ज / क्यूरिन (बुवाई के दो दिनों में) (घासकुल चौड़ी पत्ती एवं मेथी कुल के खरपतवार का प्रभावी नियन्त्रण) 30-40 मिली. 12-15 मिली. 5 फिनाक्साप्रोन 10 ई.सी. व्हिप सुपर (बुवाई के 20-25 दिनों बाद) 800-1000 मिली. 325-400 मिली. 6 क्विजैलोफोप -9- टरफ्लूराइल 4.4 ई.सी. पेन्टरा (बुवाई के 20-25 दिनों बाद) (केवल घास कुल के खरपतवारों का नियंत्रण) 750-1000 मिली. 300-400 मिली. 7 इमैजाथापर 10 ई.सी. पानी में मिलाकर 10-20 दिनों बाद छिड़काव करें 750-1000 मिली. 500-600 मिली. फसल सुरक्षा बिहार की बालदार सॅूडी पहचान एवं हानि की प्रकृति प्रौढ़ कीट हल्के पीले रंग का होता है तथा इसके ऊपरी तथा निचले पंखों पर काले रंग के धब्बे होते हैं। इसकी ऑखे तथा भ्रृगिकायें काले रंग की होती है। पूर्ण विकसित सूंडी 40-45 मिमी. लम्बी दोनों किनारों पर काले तथा बीच में गन्दे पीले रंग के शरीर वाली होती हैं। इनका पूरा शरीर घने बालों से ढका होता है। कीट की सूडियों प्रारम्भ में झॅुड में पौधों की पत्तियों को खुरचकर खाती हैं। अधिक प्रकोप की दशा में पौधो के तने को छोड़कर सारी पत्तियॉ खा ली जाती है। सूड़ियॉ बड़ी होने पर पूरे क्षेत्र में फैल कर फसल को हानि करती है। लाल बालदार सॅूड़ी पहचान एवं हानि की प्रकृति प्रौढ़ कीट काले धब्बेयुक्त सफेद पंख वाला होता है इसका ऊपरी पंख का किनारा तथा पूरा उदर लाल होता है। सूंडी 25 मिमी. लम्बी लाल रंग की घने बालों वाली होती है। यह सूड़ियॉ प्रारम्भ में झॅुड में पौधों की पत्तियों को खुरचकर खाती हैं। अधिक प्रकोप की दशा में इनके द्वारा पौधे के तने को छोड़कर सारी पत्तियां खा ली जाती है। सूड़ियॉ बड़ी होने पर पूरे क्षेत्र में फैल कर फसल को हानि करती है। फली बेधक कीट (हेलीकोवार्पा आर्मीजेरा) आर्थिक क्षति स्तर -5 से 6 पतंगे प्रति गन्धपास प्रति रात्रि लगातार तीन रात्रि तक या 5 प्रतिशत प्रकोपित फली। पहचान एवं हानि की प्रकृति प्रौढ़ पतंगा पीले बादामी रंग का होता है। अगली जोड़ी पंख पीले भूरे रंग के होते हैं तथा पंख के मध्य में एक काला निशान होता है। पिछले पंख कुछ मटमैले सफेद से हल्के रंग के हाते हैं तथा किनारे पर काली पट्टी होती है। सूड़ियॉ हरे, पीले या भूरे रंग की होती है तथा पार्श्व में दोनों तरफ मटमैले सफेद रंग की धारी पायी जाती है। इसकी गिडारें फलियों के अन्दर घुसकर दानों का खाती है। क्षतिग्रस्त फलियों में छिद्र दिखार्इ देते हैं। सफेद मक्खी पहचान एवं हानि की प्रकृति ये कीट आकार में छोटे लगभग एक से डेढ मिमी. लम्बे पीले रंग के शरीर वाले होते हैं इनका पूरा शरीर सफेद चूर्ण से ढका होता है इनके पंख सफेद होते है। शिशु तथा प्रौढ़ दोनों पत्तियों, कोमल टहनियों से रस चूसकर नुकसान पहुचाते है। यह मक्खी उदर में पीला चित्रवर्ण रोग का विषाणु फैलाती है। अतिरिक्त अधिक रस चूसने के कारण यह मधुस्राव करती है जिस पर काले कवक का आक्रमण हो जाता है तथा प्रकाश संश्लेषण क्रिया बाधित होती है। फली से रस चूसने वाला कीट (क्लैवीग्रेला जिबोसा) पहचान एवं हानि की प्रकृति प्रौढ़ बग लगभग दो सेन्टीमीटर लम्बा कुछ-कुछ हरे भूरे रंग का होता है। इसके शीर्ष पर एक शूल युक्त प्रवक्ष पृष्ठक पाया जाता है। उदर प्रोथ पर मजबूत कॉटे होते है। इसके शिशु एवं प्रौढ़ अरहर के तने, पत्तियों एवं पुष्पों एवं फलियों से रस चूसकर हानि पहुचाते हैं प्रकोपित फलियों पर हल्के पीले रंग के धब्बे बन जाते है तथा अत्यधिक प्रकोप होने पर फलियॉ सिकुड़ जाती है एवं दाने छोटे रह जाते है। फलीबेधक कीट (नीली तितली) पहचान एवं हानि की प्रकृति पूर्ण विकसित सूंड़ी पीली हरी, पीली लाल अथवा हल्के रंग की होती है तथा इनके शरीर की निचली सतह छोटे-छोटे बालों से ढकी होती है। प्रौढ़ तितली आसमानी नीले रंग की होती है। इसकी सूड़ियॉ फलियों को छेद कर उनके दानों को नुकसान पहॅुचाती है। माहू(एफिस क्रेक्सीवोरा) पहचान एवं हानि की प्रकृतियह एफिड गहरे कत्थई अथवा काले रंग की बिना पंख अथवा पंख वाली होती है। एक मादा 8-30 बच्चों जंम देती है तथा इनका जीवनकाल 10-12 दिन का होता है इसके शिशु एवं प्रौढ़ पौधे के विभिन्न भागों विशेषकर फूलों एवं फलियों से रस चूसकर हानि करते हैं। एकीकृत प्रबन्धन बुवाई के लिए पीली पत्ती मोजैक सहिष्णु प्रजातियों जैसे पन्त मूंग-2, पंत मूंग-3, पीडीएम-54 (मोती), पीडीएम-84-139 (सम्राट), पीडीएम-11, एमएल-337, नरेन्द्र मूँग-1 का चयन करना चाहिए। फसल पर कीटों के प्रकोप का सप्ताह अन्तराल पर निरीक्षण करते रहना चाहिए। पीली पत्ती प्रकोपित पौधों को देखते ही सावधानीपूर्वक उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए। बालदार सूँड़ी के पतंगों को प्रकाश प्रपंच के द्वारा इक्ट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए। तम्बाकू की सूंड़ी के अण्डों एवं झुन्ड में खा रही सूँड़ियों को इक्ठ्ठा कर सप्ताह में दो बार नष्ट कर देना चाहिए। तम्बाकू की सूंड़ी की एन.पी.वी. 250 लार्वी समतुल्य प्रति हे. की दर से सप्ताह के अन्तराल पर दो तीन बार सांयकाल छिड़काव करना चाहिए। सफेद मक्खी के आर्थिक क्षति स्तर पहुँचने पर दैहिक रसायन जैसे डाइमेथोएट 30 ई.सी.1 ली. या इमिडाक्लोप्रिड 250 मिली./ हे. की दर से छिड़काव करना चाहिए। अन्य फलीबेधकों से 5 प्रतिशत प्रकोपित फली पाये जाने पर बी.टी.5 प्रतिशत डब्लू.पी. 1.5 किग्रा. इन्डाक्साकार्ब 14.5 एससी 400 मिली. क्यूनालफास 25 ई.सी. 1.50 ली. फेनवेलरेट 20 ई.सी. 750 मिली. साइपरमेथ्रिन 10 ई.सी. 750 मिली. या डेकामेथ्रिन 2.8 ई.सी. 450 मिली. का प्रति हे. की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। रोग बिहार हेयरी कैटरपिलर (बालदार सूँडी) के रासायनिक नियंत्रण हेतु फेन्थोयेट 50% ई.सी. 1 ली. प्रति हे. 500-1000 ली. पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। पीला चित्रवर्ण रोग पहचानपत्तियों पर पीले सुनहरे चकत्ते पाये जाते हैं। उग्र अवस्था में सम्पूर्ण पत्ती पीली पड़ जाती है। यह रोग सफेद मक्खी से फैलता है। उपचारसफेद मक्खी को मारने के लिए निम्न में से किसी एक कीटनाशक का 2-3 छिड़काव करना चाहिए। डायमिथोएट (30 ई.सी.) 1 लीटर प्रति हेक्टर या मिथाइल-ओ-डिमेटान (25 ई.सी.) 1 लीटर प्रति हेक्टर। रोग ग्रसित पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें। रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का प्रयोग किया जाय। पत्तियों का धब्बा पहचानपत्तियों पर गोलाई लिये हुए कोणीय धब्बे बनते हैं, जिसमें बीच का भाग हल्के राख के रंग का या हल्का या भूरा तथा किनारा लाल बैंगनी रंग का होता है। उपचारइसकी रोकथाम के लिए 3 किग्रा. कापर आक्सीक्लोराइड को 800 ली.पानी में घोलकर प्रति हेक्टर, 10 दिन के अन्तर पर 2-3 छिड़काव करना चाहिए। कार्बेन्डाजिम अथवा थायोफिनेट मिथाइल थायोकिनटे का एक छिड़काव 500 ग्राम प्रति हेक्टर पर्याप्त दर से मात्र एक छिड़काव संस्तुत है। मुख्य बिन्दु रोगरोधी प्रजातियों की बुवाई की जाये। गर्मी में गहरी जुताई करें। पंक्तियों में बुवाई करें। विरलीकरण किया जाये। बीजोपचार एवं बीज शोधन अवश्य करें। सल्फर एवं फास्फोरस का प्रयोग करें। स्त्राेत : पारदर्शी किसाना सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश।