भूमि दोमट से भारी भूमि इसकी खेती के लिए अधिक उपयुक्त है। धान के बाद खाली खेती में मसूर विशेषकर बोयी जाती है। भूमि की तैयारी पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताइयां देशी हल से करके पाटा लगाना चाहिये। संस्तुत प्रजातियॉ क्रं.सं. प्रजातियाँ उत्पादकता (कु./हे.) पकने की अवधि (दिन) उपयुक्त क्षेत्र विशेषतायें 1 आई.पी.एल.-81 18-20 120-125 बुन्देलखण्ड छोटा दाना, रतुवा रोग सहिष्णु 2 डी.पी.एल.-62 18-20 130-135 सम्पूर्ण.० प्र. दाना मध्यम बड़ा 3 नरेन्द्र मसूर-1 20-22 135-140 सम्पूर्णउ. प्र रतुआ अवरोधी, मध्यम दाना 4 पन्त मसूर-5 18-20 130-135 सम्पूर्णउ. प्र. मध्यम दाना रतुवा अवरोधी 5 पन्त मसूर-4 18-20 135-140 मैदानी क्षेत्र दाने छोटे रतुवा अवरोधी 6 डी.पी.एल.-15 18-20 130-135 मैदानी क्षेत्र दाना मध्यम, बड़ा रतुआ सहिष्णु। 7 एल-4076 18-20 135-140 सम्पूर्णउ. प्र. पौधे गहरे हरे रंग के‚ कम फैलने वाले 8 पूसा वैभव 18-22 135-140 मैदानी क्षेत्र तदैव 9 के.-75 14-16 120-125 सम्पूर्णउ.प्र. पौधे मध्यम‚ दाने बड़े‚ रतुआ ग्रसित 10 एच.यूएल.-57 (मालवीय विश्वनाथ) 18-22 125-135 सम्पूर्णउ. प्र. छोटा दाना तथा रतुआ अवरोधी 11 के.एल.एस.-218 18-20 125-130 पूर्वीउ. प्र. छोटा दाना तथा रतुआ अवरोधी 12 आई.पी.एल.-406 15-18 125-130 पश्चिमीउ. प्र. बड़ा दाना तथा रतुआ अवरोधी 13 शेखर-3 20-22 125-130 सम्पूर्णउ. प्र. रतुआ अवरोधी एवं उकठा अवरोधी 14 शेखर-2 20-22 125-130 सम्पूर्णउ. प्र. रतुआ अवरोधी एवं उकठा अवरोधी 15 आई.पी.एल.-316 18-22 115-120 बुन्देलखण्ड उकठा अवरोधी बुवाई का समय समय से बुवाई अक्टूबर के मध्य से नवम्बर के मध्य तक तथा विलम्ब की दशा में दिसम्बर से प्रथम सप्ताह तक इसकी बुवाई करना उपयुक्त है। पन्तनगर जीरो टिल सीड ड्रिल द्वारा मसूर की बुवाई अधिक लाभप्रद है। बीज दर समय से बुवाई हेतु 30-40 किलोग्राम तथा पिछेती एवं उत्तेरा बुवाई के लिए 40-50 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त हैं। बीजोपचार 10 किग्रा. बीज को मसूर के एक पैकेट 200 ग्राम राइजोबियम लेग्यूमिनोसेरम कल्चर से उपचारित करके बोना चाहिए। विशेषकर उन खेतों में जिनमें पहले मसूर न बोई गयी हो। बीजोपचार एवं रासायनिक उपचार के बाद बीजोपचार किया जाय। पी0 एस0 बी0 का अवश्य प्रयोग करें। उर्वरक समान्य बुवाई में 20 किग्रा. नत्रजन, 60 किग्रा. फास्फोरस, 20 किग्रा. पोटाश तथा 20 किग्रा. गंधक/हे. प्रयोग करें। उतेरा विधि से बुवाई के लिए 20 किग्रा. नत्रजन धान की कटाई के बाद टापड्रेसिंग करे तथा फास्फोरस 30 किग्रा. को दो बार फूल आने तथा फलिया बनते समय पर्णीय छिड़काव करें। सिंचाई एक सिंचाई फूल आने के पूर्व करनी चाहिए। धान के खेतों में बोई गई मसूर की फसल में यदि वर्षा न हो तो एक सिंचाई फली बनने के समय करनी चाहिए। फसल सुरक्षा प्रमुख कीट माहूँ कीट इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ पत्तियों, तनों एवं फलियों का रस चूस कर कमजोर कर देते है। माहूँ मधुस्राव करते है जिस पर काली फफूँद उग आती है जिससे प्रकाश संश्लेषण में बाधा उत्पन्न होती है। अर्द्धकुण्डलीकार कीट (सेमीलूपर) इस कीट की सूडियाँ हरे रंग की होती है जो लूप बनाकर चलती है। सूडियाँ पत्तियों, कोमल टहनियों, कलियों, फूलों एवं फलियों को खाकर क्षति पहुँचाती है। फली बेधक कीट इस कीट की सूड़ियॉ फलियों में छेद बनाकर अन्दर घुस जाती है तथा अन्दर ही अन्दर दानों को खाती रहती है। तीव्र प्रकोप की दशा में फलियाँ खोखली हो जाती है तथा उत्पादन में गिरावट आ जाती है। नियंत्रण के उपाय समय से बुवाई करनी चाहिए। यदि कीट का प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर पार कर गया हो तो निम्नलिखित कीटनाशों का प्रयोग करना चाहिए। माहूँ कीट खड़ी फसल में कीट नियंत्रण हेतु डाईमेथोएट 30 प्रतिशत ई.सी. अथवा मिथाइल-ओ-डेमेटान 25 प्रतिशत ई.सी. की 1.0 लीटर अथवा मोनोक्रोटोफास 36 प्रतिशत एस.एल. 750 मिली0 प्रति हेक्टेयर की दर से लगभग 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। एजाडिरेक्टिन (नीम आयल) 0.15 प्रतिशत ई.सी., 2.5 ली0 प्रति हेक्टेयर की दर से भी प्रयोग किया जा सकता है। फली बेधक कीट एवं अर्द्धकुण्डलीकार कीट की नियंत्रण हेतु निम्नलिखित जैविक/रसायनिक कीटनाशकों में से किसी एक रसायन का बुरकाव अथवा 500-600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए। बैसिलस थूरिनजिएन्सिस (बी.टी.) की कर्स्ट की प्रजाति 1.0 किग्रा.। बैसिलस थूरिनजिएन्सिस (बी.टी.) की कर्स्ट की प्रजाति 1.0 किग्रा.। क्यूनालफास 25 प्रतिशत ई.सी. 2.0 लीटर। मोनोक्रोटोफास 36 प्रतिशत एस.एल. 1.0 लीटर। खेत की निगरानी करते रहे। आवश्यकतानुसार ही दूसरा बुरकाव/छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर करें एक कीटनाशी को लगातार दो बार प्रयोग न करें। प्रमुख रोग जड़ सड़न बुवाई के 15-20 दिन बाद पौधा सूखने लगता है। पौधे को उखाड कर देखने पर तने पर रूई के समान फफूँद लिपटी हुए दिखाई देती है। उकठा इस रोग में पौधा धीरे-धीरे मुरझाकर सूख जाता है। छिलका भूरे रंग का हो जाता है तथा जड़ का चीर कर देखे तो उसके अन्दर भूरे रंग की धारियाँ दिखाई देती है। उकठा का प्रकोप पौधे के किसी भी अवस्था में हो सकता है। गेरूई इस रोग में पत्तियों तथा तने पर नारंगी रंग के फफोले बनते है जिससे पत्तियाँ पीली होकर सूखने लगती है। नियंत्रण के उपाय शस्य क्रियायें गार्मियों में मिट्टी पलट हल से जुताई करने से भूमि जनित रोगों के नियंत्रण में सहायता मिलती है। जिस खेत में प्रायः उकठा लगता हो तो यथा सम्भव उस खेत में 3-4 वर्ष तक मसूर की फसल नहीं लेनी चाहिए। उकठा से बचाव हेतु नरेन्द्र मसूर-1, पन्त मसूर-4, मसूर-5, प्रिया, वैभव आदि प्रतिरोधी प्रजातियों की बुवाई करना चाहिए। बीज उचार बीज जनित रोगों के नियंत्रण हेतु थीरम 75 प्रतिशत+कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत (2:1) 3.0 ग्राम, अथवा ट्राइकोडरमा 4.0 ग्राम प्रति किग्रा० बीज की दर से शोधित कर बुवाई करना चाहिए। भूमि उपचार भूमि जनित एवं बीज जनित रोगों के नियंत्रण हेतु बायोपेस्टीसाइड (जैव कवक नाशी) ट्राइकोरमा बिरडी 1 प्रतिशत डब्लू.पी. अथवा ट्राइकोडरमा हारजिएनम 2 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.5 किग्रा. प्रति हे0 60-75 किग्रा. सड़ी हुए गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से मसूर के बीज/भूमि जनित रोगों का नियंत्रण हो जाता है। पर्णीय उपचार गेरूई रोग के नियंत्रण हेतु मैंकोजेब 75 डब्लू.पी. की 2.0 किग्रा० अथवा प्रोपीकोनाजोब 25 प्रतिशत ई.सी. की 500 मिली0 मात्रा प्रति हेक्टेयर लगभग 500-600 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए। प्रमुख खरपतवार बथुआ, सेन्जी, कृष्णनील, हिरनखुरी, चटरी-मटरी, अकरा-अकरी, जंगली गाजर, गजरी, प्याजी, खरतुआ, सत्यानाशी आदि। नियंत्रण के उपाय खरपतवारनाशी रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण करने हेतु फ्लूक्लोरैलीन 45 प्रतिशत ई.सी. की 2.2 ली0 मात्रा प्रति हेक्टेयर लगभग 800-1000 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के तुरन्त पहले मिट्टी में मिलाना चाहिए। अथवा पेण्डीमेथलीन 30 प्रतिशत ई.सी. की 3.30 लीटर अथवा एलाक्लोर 50 प्रतिशत ई.सी. की 4.0 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर उपरोक्तानुसार पानी में घोलकर फ्लैट फैन नाजिल से बुवाई के 2-3 दिन के अन्दर समान रूप से छिड़काव करें। यदि खरपतवारनाशी रसायन का प्रयोग न किया गया हो तो बुवाई के 20-25 दिन बाद खुरपी से निराई कर खरपतवारों को नियंत्रण करना चाहिए। कटाई तथा भण्डारण फसल पूर्ण पकने पर कटाई करें। मड़ाई के पश्चात् अन्न को भण्डारण में कीटों से सुरक्षा के लिए अल्यूमिनियम फास्फाइड की दो गोली प्रति मैट्रिक टन की दर से प्रयोग में लायें। प्रभावी बिन्दु क्षेत्र विशेष हेतु संस्तुत प्रजाति के प्रमाणित बीज की बुवाई समय से करें। बीज शोधन अवश्य करें। फास्फोरस एवं गन्धक हेतु सिंगिल सुपर फास्फेट का प्रयोग करें। बीज की मात्रा/हे. दाने के आकार एवं बुवाई के समय को ध्यान में रखते हुये निर्धारित करें। रोग का नियंत्रण समय से करें। अंकुरित बीज को धान की कटाई से 15 दिन पूर्व बुवाई करने पर उपज में 30%वृद्धि सम्भव है। स्त्राेत : पारदर्शी किसाना सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश।