उर्द प्रदेश की एक मुख्य दलहनी फसल है। इसकी खेती मुख्य रूप से खरीफ में की जाती है लेकिन जायद में समय से बुवाई सघन पद्धतियों को अपनाकर करने से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। विगत 5 वर्षो का उर्द आच्छादन उत्पादन एवं उत्पादकताका विवरण निम्नवत् है। वर्ष क्षेत्रफल (हे.) उत्पादन (मी. टन) उत्पादकता कु./हे. 2008 51000 29000 5.61 2009 50520 30525 6.04 2010 61321 38202 6.23 2011 48149 31944 6.64 2012 45000 32000 7.04 2013 42663 24671 5.78 2014 43663 23591 5.4 भूमि एंव उसकी तैयारी जायद में उर्द की खेती के लिये दोमट तथा मटियार भूमि उपयुक्त रहती है। पलेवा करके एक दो जुताई देशी हल अथवा कल्टीवेटर से करके खेत तैयार हो जाता है। हर जुताई के बाद पाटा लगाना आवश्यक है जिससे नमी बनी रहे। पावर टिलर या ट्रैक्टर से खेत की तैयारी जल्दी हो जाती है। प्रजातियॉ अच्छी उपज लेने के लिये जल्दी पकने वाली निम्न प्रजातियां की बुवाई करे। क्र.सं. प्रजाति पकने की अवधि (दिन में) उपज कु./हे. कीट रोग ग्राहिता उपयुक्त क्षेत्र 1 टा.–9 75-80 6-8 पीला मौजेक सहिष्णु सम्पूर्ण उ.प्र. 2 नरेन्द्र उर्द–1 75-80 8-10 पीला मौजेक अवरोधी सम्पूर्ण उ.प्र. 3 आजाद उर्द–1 70-75 8-10 पीला मौजेक अवरोधी सम्पूर्ण उ.प्र. 4 उत्तरा 80-85 8-11 पीला मौजेक अवरोधी सम्पूर्ण उ.प्र. 5 आजाद उर्द–2 70-75 10-12 पीला मौजेक अवरोधी सम्पूर्ण उ.प्र. 6 शेखर–2 75-80 10-12 पीला मौजेक अवरोधी सम्पूर्ण उ.प्र. 7 आई.पी.यू.2-43 70-75 10-12 पीला मौजेक अवरोधी सम्पूर्ण उ.प्र. 8 सुजाता 70-75 10-12 पीला मौजेक अवरोधी सम्पूर्ण उ.प्र. 9 माश-479 70-75 11-12 पीला मौजेक अवरोधी सम्पूर्ण उ.प्र. नरेन्द्र उर्द-1 प्रजाति की बुवाई फरवरी के अन्दर अवश्य करें। बीजोपचार एवं बीज शोधन मूंग की तरह करें। बीज की मात्रा उर्द का पौधा जायद में कम बढ़ता है अतः 25-30 किग्रा. बीज प्रति हे. बुवाई हेतु प्रयोग करें। बुवाई की विधि उर्द की बुवाई कूंडो में करना चाहियें। कूंड से कूंड की दूरी 20-25 सेमी. कूंड रखना चाहिये। बुवाई के तुंरन्त बाद पाटा लगा देना चाहियें। बुवाई का समय बुवाई क उपयुक्त समय 15 फरवरी से 15 मार्च। उर्वरकों का प्रयोग सामान्यतः उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के अनुसार किया जाना चाहिये अथवा उर्वरक की मात्रा निन्नानुसार निर्धारित की जायें। 15-20 किलो नत्रजन, 40 किलो फास्फोरस 20 किग्रा. पोटाश एवं 20 किग्रा. गन्धक प्रति हेक्टर प्रयोग करें। फास्फोरस प्रयोग से दाने की उपज मे विशेष वृद्धि होती हे। उर्वरकों की सम्पूर्ण मात्रा बुवाई के समय कूडो में बीज से 2-3 सेमी. नीचे देनी चाहियें। यदि सुपरफास्फेट उपलब्ध न हो तो 1 कुन्तल डी.ए.पी. तथा 2 कुन्तल जिप्सम का प्रयोग बुवाई के समय किया जाये। सिंचाई पहली सिंचाई 30-35 दिन बाद करनी चाहिए। पहली सिंचाई बहुत जल्दी करने से जड़ों तथा ग्रन्थियों का विकास ठीक प्रकार नहीं होता है। बाद में आवश्यकतानुसार 10-15 दिन बाद हल्की सिंचाई करते रहें। स्प्रिकलर से सिंचाई अत्यधिक लाभप्रद रहता है। खरपतवार नियंत्रण मूंग की भाति करे। फसल सुरक्षा उर्द में प्रायः पीले चित्रवर्ण (मोजैक) रोग का प्रकोप होता है। इस रोग के विषाणु सफेद मक्खी द्वारा फैलते है। नियंत्रण समय से बुवाई करनी चाहियें। पीला चित्र वर्ण (मौजेक) अवरोधी प्रजातियोकी बुवाई करनी चाहियें। चित्रवर्ण (मोजैक) प्रकोप पौधे दिखते ही सावधानी पूर्वक उखाड़ कर नष्ट कर जला देना चाहिए या गड्ढ़े में गाढ़ दें। 5 से 10 प्रौढ़ मक्खी प्रति पौध की दर से दिखाई पड़ने पर मिथाइल पड़ने पर मिथाइल ओ-डिमेटान 25 ई.सी. या डाईमेथोएट 30 ई.सी. 1 लीटर प्रति हे. की दर से 600-800 ली. पानी में मिलाकर छिडकाव करना चाहियें। थिप्स इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ दोनों पत्तियों एवं फूलों से रस चूसते है। भारी प्रकोप होने पर पत्तियों से रस चूसने के कारण वे मुड़ जाती हैं तथा फूल गिर जाते हैं जिससे उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। नियंन्त्रण मिथाइल-ओ-डिमेटान 25% ई.सी. 1 लीटर या डायमिथोएट 30% ई.सी.1 लीटर प्रति हे. की दर से 600-800 ली.पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए। हरे फुदके इस कीट के प्रौढ़ एवं शिशु दोनो पत्तियों से रस चूस कर उपज पर प्रतिकूल प्रभाव डालते है। नियंन्त्रण थिप्स के लिये बतायें गये कीटनाशकों के प्रयोग से हरे फुदके का नियन्त्रण किया जा सकता है। फलीवेधक किन्ही-2 वर्षों में फली वेधकों से फसल को काफी हानि होती है। इनके नियंत्रण के लिए फेन्थ्रएट 50% ई.सी. 2.00 लीटर अथवा क्यूनालफास 25% ई.सी. 1.25 लीटर प्रति हे. की दर से 600-800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। कटाई एवं भण्डारण फसल पूरी तरह पक जाने पर जब फलियॉ काली हो जाये तो कटाई करना चाहियें। उर्द की फलियां एक साथ ही पक जाती है। तथा चिटकती नही। अतः फसल की कटाई एक साथ ही की जा सकती है। भण्डारण मूंग की भाति करे। नीम की पत्तियों का भी प्रयोग करना चाहिये। प्रमुख बिन्दु उर्द की बुवाई 15 फरवरी से 15 मार्च तक। सुपर फास्फेट का प्रयोग बेसल ड्रेसिंग में अधिक लाभदायक रहता है। पहली सिचाई बुवाई के 30-35 दिन बाद करे बीजोपचार राइजोबियम कल्चर एवं पी.एस.बी. से अवश्य करें। यदि आलू के बाद उर्द की फसल ली जाती है तो नत्रजन के प्रयोग की आवश्यकता नहीं है। थ्रिप्स के लिए निगरानी रखें। प्रथम सिचाई के पहले नियंत्रण हेतु सुरक्षात्मक छिड़काव करें। स्त्राेत : पारदर्शी किसाना सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश।