दलहनी फसलों में चना का प्रमुख स्थान है। अधिक पैदावार प्राप्त करने हेतु निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है: भूमि: चने के लिए दोमट या भारी दोमट, मार एवं पडुआ भूमि जहाँ पानी के निकास का उचित प्रबन्ध हो, उपयुक्त होती है। भूमि की तैयारी पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से 6 इंच गहरी व दो जुताइयां देशी हल अथवा कल्टीवेटर से करके पाटा लगाकर खेत को तैयार कर लेना चाहिए। संस्तुत प्रजातियाँ: चने की प्रजातियों का विवरण क्र.सं. प्रजाति उत्पादन क्षमता (कु./हे.) पकने की अवधि उपयुक्त क्षेत्र विशेषताएं विशेषताएं देशी प्रजातियाँ: समय से बुवाई 1 गुजरात चना-4 20-25 120-130 पूर्वी उ. प्र. पौधा मध्यम बड़ा उकठा अवरोधी सिंचित एवं असिंचित दशा के लिये उपयुक्त 2 अवरोधी 25-30 145-150 सम्पूर्ण उ. प्र. पौधे मध्यम ऊँचाई (सेमी० इरेक्ट) भूरे रंग के दाने व उकठा अवरोधी 3 पूसा-256 25-30 25-30 सम्पूर्ण उ. प्र. पौधे की ऊँचाई मध्यम, पत्ती चैाड़ी, दाने का रंग भूरा एवं एस्कोकाइटा ब्लाइट बीमारियों के प्रति सहिष्णु। 4 के.डब्लू. आर.-108 25-30 130-135 सम्पूर्ण उ.प्र. दाने का रंग भूरा, पौधे मध्यम ऊँचाई, उकठा अवरोधी 5 राधे 25-30 140-150 बुन्देलखण्ड हेतु दाना बड़ा। 6 जे.जी-16 20-22 135-140 बुन्देलखण्ड हेतु उकठा अवरोधी बुन्देलखण्ड हेतु 7 के.-850 25-30 145-150 सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र दाना बड़ा, उकठा ग्रसित 8 डी.सी.पी. 92-3 20-22 140-145 सम्पूर्ण उ. प्र. उकठा अवरोधी, छोटा पीला दाना 9 आधार (आर.एस.जी.-963) 19-20 125-130 पश्चिमी उ.प्र.पश्चिमी उ. प्र. उकठा, अवरोधी 10 डब्लू.सी.जी.-1 25-30 135-145 पश्चिमी उ० प्र. दाना बड़ा। 11 डब्लू.सी.जी-2 20-25 130-135 पश्चिमी उ.प्र. छोटे दाने वाली उकठा प्रतिरोधी 12 के.जी.डी.-1168 (आलोक) 25-30 150-155 सम्पूर्ण उ. प्र० उकठा अवरोधी देर से बुवाई 1 पूसा-372 25-30 130-140 सम्पूर्ण उ. प्र. उकठा, ब्लाइट एवं जड़ गलन के प्रति सहिष्णु 2 उदय 20-25 130-140 सम्पूर्ण उ. प्र. दाने का रंग भूरा, मध्यम ऊँचाई उकठा सहिष्णु 3 पन्त जी.-186 20-25 120-130 सम्पूर्ण उ. प्र. पौधे मध्यम ऊँचाई, उकठा सहिष्णु काबुली 1 पूसा-1003 20-22 135-145 पूर्वी उ. प्र. दाना मध्यम बड़ा उकठा सहिष्णु 2 एच.के.-94-134 25-30 140-145 सम्पूर्ण उ. प्र. दाना बड़ा उकठा, सहिष्णु 3 चमत्कार (वी.जी.-1053) 15-16 135-145 पश्चिमी उ.प्र. बड़ा दाना। 4 जे.जी.के.-1 17-18 17-18 बुन्देलखण्ड क्षेत्र, उ.प्र. बड़ा दाना, उकठा सहिष्णु। 5 शुभ्रा 18-20 125 बुन्देलखण्ड के लिए उकठा अवरोधी 6 उज्जवल 18-20 125 बुन्देलखण्ड के लिए उकठा अवरोधी बीज दर छोटे दाने का 75-80 किग्रा० प्रति हेक्टर तथा बड़े दाने की प्रजाति का 90-100 किग्रा०/हेक्टर। बीजोपचार राइजोबियम कल्चर से बीजोपचार अलग-अलग दलहनी फसलों का अलग-अलग राइजोबियम कल्चर होता है चने हेतु मीजोराइजोबियम साइसेरी कल्चर का प्रयोग होता है। एक पैकेट 200 ग्राम कल्चर 10 किग्रा. बीज उपचार के लिए पर्याप्त होता है। बाल्टी में 10 किग्रा. बीज डालकर अच्छी प्रकार मिला दिया जाता है ताकि सभी बीजों पर कल्चर लग जायें। इस प्रकार राइजोबियम कल्चर से सने हुए बीजों को कुछ देर बाद छाया में सुखा लेना चाहिए पी.एस.बी. कल्चर का प्रयोग अवश्य करें। सावधानी राइजोबियम कल्चर से बीज को उपचारित करने के बाद धूप में नहीं सुखाना चाहिए ओर जहाँ तक सम्भव हो सके, बीज उपचार दोपहर के बाद करना चाहिए ताकि बीज शाम को ही अथवा दूसरे दिन प्रातः बोया जा सके। बीज शोधन बीज जनित रोग से बचाव के लिए थीरम 2 ग्राम या मैकोंजेब 3 ग्राम या 4 ग्राम ट्राइकोडरमा अथवा थीरम 2 ग्राम + कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज को बोने से पूर्व शोधित करना चाहिए। बीजशोधन कल्चर द्वारा उपचारित करने के पूर्व करना चाहिए। बुआई असिंचित दशा में चने की बुआई अक्टूबर के द्वितीय अथवा तृतीय सप्ताह तक अवश्यक कर देनी चाहिए। सिंचित दशा में बुआई नवम्बर के द्वितीय सप्ताह तक तथा पछैती बुआई दिसम्बर के प्रथम सप्ताह तक की जा सकी है। बुआई हल के पीछें कूंड़ों में 6-8 सेमी. की गहराई पर करनी चाहिए। कूंड से कूड़ की दूरी असिंचित तथा पछैती दशा में बुआई में 30 सेमी० तथा सिंचित एवं काबर या मार भूमि में 45 सेमी. रखनी चाहिए। उर्वरक सभी प्रजातियों के लिए 20 किग्रा. नत्रजन, 60 किग्रा. फास्फोरस, 20 किग्रा. पोटाश एवं 20 किग्रा. गन्धक का प्रयोग प्रति हेक्टेयर की दर से कूड़ों में करना चाहिए। संस्तुति के आधार पर उर्वरक प्रयोग अधिक लाभकारी पाया गया है। असिंचित अथवा देर से बुआई की दशा में 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का फूल आने के समय छिड़काव करें। सिंचाई प्रथम सिंचाई आवश्यकतानुसार बुआई के 45-60 दिन बाद (फूल आने के पहले) तथा दूसरी फलियों में दाना बनते समय की जानी चाहिए। यदि जाड़े की वर्षा हो जाये तो दूसरी सिंचाई की आवश्यकता नहीं होगी। फूल आते समय सिंचाई न करें अन्यथा लाभ के बजाए हानि हो जाती है। फसल सुरक्षा प्रमुख कीट कटुआ कीट इस कीट की भूरे रंग की सूड़ियां रात में निकल कर नये पौधों की जमीन की सतह से काट कर गिरा देती है। अर्द्धकुण्डलीकार कीट सेमीलूपर इस कीट की सूड़ियाँ हरे रंग की होती है जो लूप बनाकर चलती है। सूड़ियॉ पत्तियों, कोमल टहानियों, कलियों, फूलों एवं फलियों को खाकर क्षति पहुँचाती है। फली बेधक कीट इस कीट की सूड़ियाँ हरे अथवा भूरे रंग की होती है। सामान्यतयाः पीठ पर लम्बी धारी तथा किनारे दोनों तरफ पतली लम्बी धारियाँ पायी जाती है। नवजात सूड़ियॉ प्रारम्भ में कोमल पत्तियों को खुरच कर खाती है तथा बाद में बड़ी होने पर फलियों में छेद बनाकर सिंर को अन्दर कर दानों को खाती रहती है। एक सूड़ी अपने जीवन काल में 30-40 फलियों को प्रभावित कर सकती है। तीव्र प्रकोप की दशा में फलियॉ खोखली हो जाती है तथा उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित होता है। आर्थिक क्षति स्तर क्र.सं. कीट का नाम फसल की अवस्था आर्थिक क्षति स्तर 1 कटुआ कीट वानस्पतिक अवस्था एक सूँडी प्रति मीटर 2 अर्द्धकुण्डलीकार कीट फूल एवं फलियाँ बनते समय 2 सूँडी प्रति 10 पौधे 3 फलीबेधक कीट फूल एवं फलियाँ बनते समय 2 छोटी अथवा 1 बड़ी सूड़ी प्रति 10 पौधा अथवा 4-5 नर पतंगें प्रति गंधपाश लगातार 2-3 दिन तक मिलने पर नियंत्रण के उपाय गर्मी मे गहरी जुताई करनी चाहिए। समय से बुआई करनी चाहिए। खेत में जगह-जगह सूखी घास के छोटे-छोटे ढेर को रख देने से दिन में कटुआ कीट की सूड़ियॉ छिप जाती है जिसे प्रातः काल इकठ्ठा कर नष्ट कर देना चाहिए। चने के साथ अलसी, सरसों, धनियॉ की सहफसली खेती करने से फली बेधक कीट से होने वाली क्षति कम हो जाती है। खेत के चारो ओर गेंदे के फूल को ट्रैप क्राप के रूप में प्रयोग करना चाहिए एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में 50-60 बर्ड पर्चर लगाना चाहिए, जिस पर चिडियॉ बैठकर सूडियों को खा सके फसल की निगरानी करते रहना चाहिए। फूल एवं फलियॉ बनते समय फली बेधक कीट के लिए 5 गंधपाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में लगाना चाहिए यदि कीट का प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर पार कर गया हो तो निम्नलिखित कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए कटुआ कीट के नियंत्रण हेतु क्लोरोपाइरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. की 2.5 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर बुआई से पूर्व मिट्टी में मिलाना चाहिए। फलीबेधक कीट के नियंत्रण हेतु एन.पी.वी. (एच) 250 एल. ई. प्रति हेक्टेयर लगभग 250-300 लीटर पानी में घोलकर सांयकाल छिड़काव करें। फलीबेधक कीट एवं अर्द्धकुण्डलीकार कीट के नियंत्रण हेतु निम्नलिखित जैविक/रसायनिक कीटनाशकों में से किसी एक रसायन का बुरकाव अथवा 500-600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए। बेसिलस थूरिजजिएन्सिस (बी.टी) की कस्र्टकी प्रजाति 1.0 किग्रा.।एजाडिरैक्टिन 0.03 प्रतिशत डब्लू.एस.पी. 2.5-3.00 किलोग्राम।एन.पी.वी. आफ हेल्को वरपा आर्मीजेरा 2 प्रतिशत ए.एस. 250-300 मिली.। एन.पी.वी. आफ हेल्को वरपा आर्मीजेरा 2 प्रतिशत ए.एस. 250-300 मिली.।फेनवेलरेट 0.4 प्रतिशत डी.पी. 20-25 किग्रा.।फेनवेलरेट 20 प्रतिशत ई.सी. 1.0 लीटर।क्यूनालफास 25 प्रतिशत ई.सी. 2.0 लीटर।मैलाथियान 50 प्रतिशत ई.सी. की 2.0 लीटर नोवाल्यूरॉन 10 प्रतिशत ई.सी. 750 एम.एल.।खेत की निगरानी करते रहे। आवश्यकतानुसार ही दूसरा बुरकाव/छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर करे। एक कीटनाशी को दो बार प्रयोग न करे। प्रमुख रोग जड़ सड़न बुआई के 15-20 दिन बाद पौधा सूखने लगता है। पौधे को उखाड़ कर देखने पर तने पर रूई के समान फफूँदी लिपटी हुए दिखाई देती है। इसे अगेती जड़ सडन कहते हैं। इस रोग का प्रकोप अकटूबर से नवम्बर तक होता है। पछेती जड सडन में पोधे का तना काला होकर सड जाता है तथा तोड़ने पर आसानी से टूट जाता है। इस रोग का प्रकोप फरवरी एवं मार्च में अधिक हेाता है। उकठा इसरोग में पौधे धीरे-धीरे मुरझाकर सूख जाते है। पौधे को उखाड़ कर देखने पर उसकी मुख्य जड़ एवं उसकी शाखायें सही सलामत होती है। छिलका भूरा रंग का हो जाता हैं तथा जड़ को चीर कर देखें तो उसके अन्दर भूरे रंग की धरियॉ दिखाई देती है। उकठा का प्रकोप पौधे के किसी भी अवस्था में हो सकता है। एस्कोकाइटा पत्ती धब्बा रोग इस रोग में पत्तियों एवं फलियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते है। अनुकूल परिस्थिति में धब्बे आपस में मिल जाते है जिससे पूरी पत्ती झुलस जाती है। नियंत्रण के उपाय शस्य क्रियायें गर्मियों में मिट्टी पलट हल से जुताई करने से भूमि जनित रोगों के नियंत्रण में सहायता मिलती है।जिस खेत में प्रायः उकठा लगता हो तो यथा सम्भव उस खेत में 3-4 वर्ष तक चले की फसल नहीं लेनी चाहिए।अगेती जड़ सड़न से बचाव हेतु नवम्बर के द्वितीय सप्ताह में बुआई करनी चाहिए।उकठा से बचाव हेतु अवरोधी एवं के.डब्लू.आर. 108 प्रजाति की बुआई करना चाहिए। बीज उपचार बीज जनित रोगों के नियंत्रण हेतु थीरम 75 प्रतिशत+कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत (2:1) 3.0 ग्राम अथवा ट्राइकोडरमा 4.0 ग्राम प्रति किग्रा०बीज की दर से शोधित कर बुआई करना चाहिए। भूमि उपचार भूमि जनित एवं बीज जनित रोगों के नियंत्रण हेतु बायोपेस्टीसाइड (जैवकवक नाशी) ट्राइकोडरमा बिरडी 1 प्रतिशत डब्लू.पी. अथवा ट्राइकोडरमा हारजिएनम 2 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.5 किग्रा. प्रति हे. 60-75 किग्रा. सड़ी हुए गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुआई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से चना के बीज/भूमि जनित रोगों का नियंत्रण हो जाता है। पर्णीय उपचार एस्कोकाइटा पत्ती धब्बा रोग के नियंत्रण हेतु मैकोजेब 75 डब्लू.पी. की 2.0 किग्रा. अथवा कापर आक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्लू.पी.की 3.0 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर लगभग 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। प्रमुख खरपतवार बथुआ, सेन्जी, कृष्णनील, हिरनखुरी, चटरी-मटरी, अकरा-अकरी, जंगली गाजर, गजरी, प्याजी, खरतुआ, सत्यानाशी आदि। नियंत्रण के उपाय खरपतवारनाशी रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण करने हेतु फ्लूक्लोरैलीन 45 प्रतिशत इ.सी. की 2.2 ली. मात्रा प्रति हेक्टेयर लगभग 800-1000 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरन्त पहले मिट्टी में मिलाना चाहिए। अथवा पेण्डीमेथलीन 30 प्रतिशत ई.सी. की 3.30 लीटर अथवा एलोक्लोर 50 प्रतिशत ई.सी. की 4.0 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर उपरोक्तानुसार पानी में घोलकर फ्लैट फैन /नाजिल से बुआई के 2-3 दिन के अन्दर समान रूप से छिड़काव करें। यदि खरपतवारनाशी रसायन का प्रयोग न किया गया हो तो खुरपी से निराई कर खरपतवारों का नियंत्रण करना चाहिए। कटाई तथा भण्डारण जब फलियां पक जायें तो कटाई कर मड़ाई कर लेना चाहिए। चूंकि दालों में ढोरा अधिक लगता है और इसका भण्डारण दालों को भलीभंति सुखने के बाद करना चाहिए। भण्डारण में कीटों से सुरक्षा हेतु एल्यूमिनियम फास्फाइड की दो गोलियां प्रति में. टन की दर से प्रयोग करें। मुख्य बिन्दु क्षेत्रीय अनुकूलतानुसार प्रजाति का चयन कर प्रमाणित एवं शुद्ध बीज का प्रयोग करें। बेसल ड्रेसिंग में फास्फोरस धारी उर्वरकों का कूंड़ों में संस्तुति अनुसार अवश्य प्रयोग करें। रोगों एवं फलीछेदक कीड़ों की सामयिक जानकारी कर उनका उचित नियंत्रण/उपचार किया जाय। पाइराइट जिप्सम/सिंगिल सुपर फास्फेट के रूप में सल्फर की प्रतिपूर्ति करें। बीज शोधन अवश्य करें। चने में फूल आते समय सिंचाई न करें देर से बुआई हेतु शीघ्र पकने वाली प्रजाति का प्रयोग करें काबुली चने में 2 प्रतिशत बोरेक्स का छिड़काव करें। कीट एवं रोग का समय से नियंत्रण करें। चने की बुआई उत्तर-दक्षिण से नियंत्रण करें। असिंचित दशा में 2 प्रतिशत यूरिया का छिड़काव फूल आते समय करना लाभप्रद है। स्त्राेत : पारदर्शी किसाना सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश।