परिचय असिंचित क्षेत्रों में बोयी जाने वाली मोटे अनाजों में साँवा का महत्वपूर्ण स्थान है। यह भारत की एक प्रचीन फसल है। यह सामान्यतया असिंचित क्षेत्र में बोयी जाने वाली सूखा प्रतिरोधी फसल है। इसमें पानी की आवश्यकता अन्य फसलों से कम है। हल्की नम व ऊष्ण जलवायु इसके लिए सर्वोत्तम है। सामान्यतया साँवा का उपयोग चावल की तरह किया जाता है। उत्तर भारत में साँवा की “खीर” बड़े चाव से खायी जाती है। पशुओं के लिए इसका बहुत उपयोग है। इसका हरा चारा पशुओं को बहुत पसन्द है। इसमें चावल की तुलना में अधिक पोषण तत्व पाये जाते हैं और इसमें पायी जाने वाली प्रोटीन की पाचन योग्यता सबसे अधिक (40 प्रतिशत तक) है। पोषक तत्व की मात्रा (प्रत्येक 100 ग्राम में) फसल प्रोटीन (ग्राम) कार्बोहाइड्रेट(ग्राम) वसा (ग्राम) कूड फाइवर (ग्राम) लौह तत्व कैल्शियम (मिग्रा.) फास्फोरस (मिग्रा.) चावल 6.8 78.2 0.5 0.2 0.6 10.0 60.0 साँवा 11.6 74.3 5.8 14.7 4.7 14.0 121.0 मिट्टी सामान्यता यह फसल कम उपजाऊ वाली मिट्टी में बोयी जाती है। इसे आंशिक रूप से जलाक्रांत मिट्टी जैसे नदी के किनारे की निचली भूमि में भी उगाया जा सकता है। परन्तु इसके लिए बलुई दोमट व दोमट मिट्टी जिसमें पर्याप्त मात्रा में पोष्ण तत्व हो, सर्वाधिक उपयुक्त है। खेत की तैयारी मानसून के प्रारम्भ होने से पूर्व खेत की जुताई आवश्यक है जिससे खेत में नमी की मात्रा संरक्षित हो सके। मानसून के प्रारम्भ होने के साथ ही मिट्टी पलटने वाले हल से पहली जुताई तथा दो – तीन जुताईयां हल से करके खेत को भली – भॉति तैयार कर लेना अधिक पैदावार के लिए उपयुक्त होता है। जुताई का समय साँवा की बुवाई की उत्तम समय 15 जून से 15 जुलाई तक है। मानसून के प्रारम्भ होने के साथ ही इसकी बुवाई कर देनी चाहिए। इसके बुवाई छिटकावाँ विधि से या कूड़ों में 3-4 सेमी. की गहराई में की जाती है। कुछ क्षेत्रों में इसकी रोपाई करते हैं। परन्तु पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25 सेमी. रखते है लाइन में बुवाई लाभप्रद होती है। पानी के लगाव वाले स्थान पर मानसून के प्रारम्भ होते ही छिटकवाँ विधि से बुवाई कर देना चाहिए तथा बाढ़ आने के सम्भवना से पूर्व फसल काट लेना श्रेयस्कर होता है। बीज दर प्रति हेक्टेयर 8 से 10 किग्रा. गुणवत्तायुक्त बीज पर्याप्त होता है। प्रजातियॉ प्रजाति पकने की अवधि (दिवस में) पौधे की लम्बाई (सेमी.) बाली की लम्बाई (सेमी.) पौधों का रंग उपज (कु.⁄हे.) क्षेत्र टी.-46 - - - - 10-12 उ.प्र. में विशेष रूप से प्रचलित आई.पी.-149 80-90 145 26-26- हल्का भूरा रंग 12-13 यू.पी.टी-18 74-80 126-130 हल्का भूरा रंग 12 1 2 3 4 5 6 7 आई.पी.एम.-97 83-8 140-150 12-14 हल्का भूरा रंग 10 आई.पी.एम.-100 65-67 130-140 - हल्का भूरा रंग 10-12 आई.पी.एम.-148 77-86 150-162 - हल्का भूरा रंग 11-12 आई.पी.एम.-151 80-88 135-162 14-17 हल्का भूरा रंग 12-13 मदिरा-21, मदिरा -29 व चन्दन अन्य नई उन्नतशील प्रजाति है। प्रदेश में शुद्ध अथवा कपास, अरहर व अन्य अल्प अवधि के दलहनी फसलों के साथ मिश्रण के रूप में बोयी जाती है। खाद एवं उर्वरक का प्रयोग जैविक खाद का उपयोग हमेशा लाभकारी होता है क्योंकि मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों को प्रदान करने के साथ-साथ जल धारण क्षमता को भी बढ़ाता है। 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से कम्पोस्ट खाद खेत में मानसून के बाद पहली जुताई के समय मिलाना लाभकारी होता है। नत्रजन, फास्फोरस व पोटाश की मात्रा 40:20:20: किग्रा. प्रति हेक्टेयर के अनुपात में प्रयोग करने से उत्पादन परिणाम बेहतर प्राप्त होता है। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने की स्थिति में नत्रजन की आधी मात्रा टापड्रेसिंग के रूप में बुवाई के 25-30 दिन बाद फसल में छिड़काव करना चाहिए। पानी का प्रबन्धन सामन्य तथा साँवा की खेती में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती। परन्तु जब वर्षा लम्बे समय तक रूक गयी हो, तो पुष्प आने की स्थिति में एक सिंचाई आवश्यक हो जाती है। जल भराव की स्थिति में पानी के निकासी की व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रण बुआई के 30 से 35 दिन तक खेत खरपतवार रहित होना चाहिए। निराई-गुड़ाई द्वारा खरपतवार नियंत्रण के साथ ही पौधों की जड़ो में आक्सीजन का संचार होता है जिससे वह दूर तक फैलकर भोज्य पदार्थ एकत्र कर पौधों की देती हैं। सामान्यतया दो निराई-गुड़ाई 15-15 दिवस के अन्तराल पर पर्याप्त है। पंक्तियों में बाये गये पौधों की निराई-गुड़ाई हैण्ड हो अथवा हवील हो से किया जा सकता है। फसल सुरक्षा बीमारी तुलासिता यह एक कवकजनिक रोग है। इसके आक्रमण के प्रारम्भ में पत्तियों पर पीली धारियॉ उभरती हैं, जो बाद में सफेद हो जाती हैं और पत्तियॉ सूख जाती हैं। अधिक भयानक प्रकोप होने पर बालियॉ भूसीदार हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में यथासंभव रोग ग्रसित पौधे को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए तथा ध्यान रखना चाहिए कि बीजोपचार के उपरान्त ही बोवाई की जाय जिससे कवक जनित रोगों से फसल सुरक्षा की जा सके। रोकथाम इसके रोकथाम के लिए मैंकोजेब 75 डब्लू.पी. को 2 किग्रा. प्रति हे. की दर से खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिए। कण्डुवा यह एक कवकजनित रोग है जिसमें पूरी बाल एक काले चूर्ण जैसे पदार्थ से ढ़क जाती हैं। इसके बीजाणु एक सफेद झिल्ली से ढके रहते हैं। रोगग्रस्त पौधा अन्य पौधों से ऊंचा होता है। रोकथाम बीजोपचार ही इसकी रोकथाम है। बुवाई से पूर्व थिरम 75 प्रतिशत डी.सी.⁄डब्लू.पी. अथवा कार्बेण्डाजिम 50 प्रतिशत डब्लू.पी. 2.5 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से बीज को उपचारित करने के उपरान्त बोने चाहिए। रोग ग्रसित पुष्प गुच्छों का सावधानी पूर्वक तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए। रतुआ / गेरूई यह फफूँदी जनित रोग है। पत्तियों पर लाइन में काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं। इसके कारण उपज अत्यधिक प्रभावित होता है। रोकथाम रोग के रोकथाम हेतु मैंकोजेब 75 डब्लू.पी. अथवा जिनेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी.के 2 किग्रा. प्रति हे. की दर से खड़ी फसल पर छिड़काव करना चाहिए। कीट दीमक व तना बेधक प्रमुख कीट है जो इसको प्रभावित करते हैं। दीमक दीमक कीट के रोकथाम के हेतु निम्न उपाय करना चाहिए खेत में कच्चे गोबर का प्रयोग नहीं करना चाहिए। बुवाई के पूर्व दीमक के नियंत्रण हेतु क्लोरोपाइरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. की 3 मिली. प्रति किग्रा. की दर से बीज को शोधित करना चाहिए। ब्यूबेरिया बैसियाना 1.15 प्रतिशत बायोपेस्टीसाइड (जैव कीटनाशी) की 2.5 किग्रा. प्रति हे. 60-75 किग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से दीमक सहित अन्य भूमिजनित कीटों का नियंत्रण हो जाता है। खड़ी फसल में क्लोरोपाइरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. 2.5 प्रति हे. की दर से सिंचाई के पानी के साथ प्रयोग करना चाहिए। तनाछेदक के प्रकोप पर उपचार फोरेट 10 प्रतिशत सी.जी. 10 किग्रा. प्रति.हे. की दर से करना चाहिए। कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत ग्रेन्यूल 20 किग्रा. प्रति हे. की दर से प्रयोग करना चाहिए अथवा क्यूनालफास 25 ई.सी. 2 लीटर दर से छिड़काव करना चाहिए। कटाई व मड़ाई पकने की स्थिति में कटाई पौधे के जड़ से हॅसिये की सहायता से की जानी चाहिए। इसका गठ्ठर बनाकर खेतों में एक सप्ताह के लिए सूखने हेतु रखने के उपरान्त मड़ाई की जानी चाहिए। उपज दाना-12-15 कुन्तल/हेक्टेयरभूसा-20-25 कुन्तल/हेक्टेयर भण्डारण भण्डारण के पूर्व बीज को भली प्रकार से सुखा लेना चाहिए, ताकि उनमें नमी की मात्रा 10-12 प्रतिशत तक घट जाय। सुखाने के बाद बीज को थैलों में भरकर ऐसी जगह रखना चाहिए। जहां वर्षा का पानी न जा सके तथा चूहों आदि का प्रकोप भी न हो। मुख्य बिन्दु गर्मी की जुताई अवश्य करें। शोधित बीज का प्रयोग करें। जैविक खाद एवं उर्वरक का प्रयोग संस्तुति के अनुसार करे। पानी के निकासी की व्यवस्था करें। खरपतवार नियंत्रण पर ध्यान दें। फसल सुरक्षा पर विशेष ध्यान दें। स्त्राेत : पारदर्शी किसान सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश ।