तोरिया ‘कैच क्राप’ के रूप में खरीफ एवं रबी के मध्य में बोयी जाती है। इसकी खेती करके अतिरिक्त लाभ अर्जित किया जा सकता है। खेत की तैयारी पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताइयाँ देशी हल, कल्टीवेटर/हैरो से करके पाटा देकर मिट्टी भुरभुरी बना लेना चाहिए। उन्नतिशील प्रजातियाँ क्र.सं. प्रजातियाँ विमोचन की तिथि नोटीफिकेशन की तिथि पकने की अवधि (दिनों में) उत्पादन क्षमता (कु०/हे) विशेष विवरण 1 टी. 9 1961 21.08.75 90-95 12-15 सम्पूर्ण उ. प्र. हेतु। 2 भवानी 1985 14.05.86 75-80 10-12 - तदैव- 3 पी.टी.-303 1985 18.11.85 90-95 15-18 तदैव - 4 पी.टी.-30 1985 06.03.87 90-95 14-16 तराई क्षेत्र हेतु। 5 तपेश्वरी 2014 16.02.2014 90-91 14-15 सम्पूर्णउ. प्र. हेतु। बीज की मात्रा तोरिया/लाही का बीज 4 किग्रा०0प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। बीज शोधन बीज जनित रोगों से सुरक्षा के लिए उपचारित एवं प्रमाणित बीज ही बोना चाहिए। इसके लिए 2.5 ग्राम थीरम प्रति किग्रा०0बीज की दर से बीज को उपचारित करके ही बोयें। यदि थीरम उपलब्ध न हो तो मैंकोजेब 3 ग्राम प्रति किग्रा०0बीज की दर से उपचारित किया जा सकता है। मैटालेक्सिल 1.5 ग्राम प्रति किग्रा०0बीज की दर से शोधन करने पर प्रारम्भिक अवस्था में सफेद गेरूई एवं तुलासिता रोग की रोकथाम हो जाती है। बुआई का समय तोरिया की बुआई सितम्बर में की जानी चाहिए। गेहूँ की अच्छी फसल लेने के लिए तोरिया की बुआई सितम्बर के पहले पखवारे में समय मिलते ही की जानी चाहिए। भवानी प्रजाति की बुआई सितम्बर के दूसरे पखवारे में ही करें। उर्वरक की मात्रा उर्वरक का प्रयोग मिट्टी परीक्षण के बाद करना चाहिए यदि मिट्टी परीक्षण न हो सके तो असिंचित दशा में 50 किग्रा० नाइट्रोजन, 30 किग्रा०0फास्फेट तथा 30 किग्रा० पोटाश प्रति हे0 की दर से प्रयोग करना चाहिए सिंचित क्षेत्रों में 80-100 किग्रा०0नाइट्रोजन,50किग्रा०0फास्फेट एवं 50 किग्रा० पोटाश प्रति हे0 देना चाहिए। फास्फेट का प्रयोग एस.एस.पी. के रूप में अधिक लाभदायक होता है। क्योंकि इससे 12 प्रतिशत गंधक की पूर्ति हो जाती है। फास्फेट एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा अंतिम जुताई के समय नाई या चोंगे द्वारा बीज से 2-3 सेमी० नीचे प्रयोग करनी चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा पहली सिंचाई (बुआई के 25 दिन से 30 दिन बाद) टाप ड्रेसिंग के रूप में देना चाहिए। गंधक की पूर्ति हेतु 200 किग्रा०0जिप्सम का प्रयोग अवश्य करे तथा 40 कुन्तल प्रति हे0 की दर से सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए। बुआई की विधि बुआई देशी हल से करना लाभदायक होता है एवं बुआई 30 सेमी० की दूरी पर 3 से 4 सेमी० की गहराई पर कतारों में करना चाहिए एवं पाटा लगाकर बीज को ढक देना चाहिए। निराई-गुड़ाई घने पौधों को बुआई के 15 दिन के अन्दर निकालकर पौधों की आपसी दूरी 10-15 सेमी० कर देना चाहिए तथा खरपतवार नष्ट करने के लिए एक निराई-गुड़ाई भी साथ में कर देनी चाहिए। यदि खरपतवार ज्यादा हो तो पैन्डीमेथलीन 30 ई. सी. का 3.3 लीटर प्रति हे0 की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोल बनाकर बुआई के बाद तथा जमाव से पहले छिड़काव करना चाहिए। सिंचाई फूल निकलने से पूर्व की अवस्था पर जल की कमी के प्रति तोरिया (लाही) विशेष संवेदनशील है अतः अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए इस अवस्था पर सिंचाई करना आवश्यक है। उचित जल निकास की व्यवस्था रखें। फसल सुरक्षा (क) प्रमुख कीट आरा मक्खी: इस कीट की सूड़ियां काले स्लेटी रंग की होती है जो पत्तियों को किनारों से अथवा पत्तियों में छेद कर तेजी से खाती है। तीव्र प्रकोप की दशा में पूरा पौधा पत्ती विहीन हो जाता है। चित्रित बगः इस कीट के शिशु एंव प्रौढ़ चमकीले काले, नारंगी एवं लाल रंग के चकत्ते युक्त होते है। शिशु एवं प्रौढ़ पत्तियों, शाखाओं, तना फूलों एवं फलियों का रस चूसते है। जिससे प्रभावित पत्तियाँ किनारों से सूख कर गिर जाती है प्रभावित फलियों में दाने कम बनते है। बालदार सूँड़ी: सूंड़ी काले एवं नारंगी रंग की होती है तथा पूरा शरीर बालों से ढका रहता है। सूड़ियाँ प्रारम्भ में झुण्ड में रह कर पत्तियों को खाती है तथा बाद में पूरे खेत में फैल कर पत्तियों खाती है। तीव्र प्रकोप की दशा में पूरा पौधा पत्ती विहीन हो जाता है। माहूँ: इस कीट की शिशु एवं प्रौढ़ पीलापन लिये हुए हरे रंग के होते है। जो पौधों के कोमल तनों, पत्तियों, फूलों एवं नये फलियों के रस चूसकर कमजोर कर देते है। माहूँ मधुस्राव करते है जिस पर काली फफूँद उग आती है जिससे प्रकाश संश्लेषण में बाधा उत्पन्न होती है। पत्ती सुरंगक कीट: इस कीट की सूँड़ी पत्तियों में सुरंग बनाकर हरे भाग को खाती है जिसके फलस्वरूप पत्तियों में अनियमित आकार की सफेद रंग की रेखायें बन जाती है। आर्थिक क्षति स्तर क्र.सं. कीट का नाम फसल की अवस्था आर्थिक क्षति स्तर 1 आरा मक्खी वानस्पतिक अवस्था एक सूँड़ी प्रति पौधा 2 पत्ती सुरंगक कीट वानस्पतिक अवस्था 2 से 5 सूँड़ी प्रति पौधा 3 बालदार सूँड़ी वानस्पतिक अवस्था 10-15 प्रतिशत प्रकोपित पत्तियाँ 4 माहूँ वानस्पतिक अवस्था से फूल व फली आने तक 30-50 माहूँ प्रति 10 सेमी० मध्य ऊपरी शाखा पर या 30 प्रतिशत माहूँ से ग्रसित पौधे। नियंत्रण के उपाय गर्मी में गहरी जुताई करनी चाहिए। संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। आरा मक्खी की सूड़ियों को प्रातः काल इकठ्ठा कर नष्ट कर देना चाहिए। प्रारम्भिक अवस्था में झुण्ड में पायी जाने वाली बालदार सूड़ियों को पकड़कर नष्ट कर देना चाहिए। प्रारम्भिक अवस्था में माहूँ से प्रभवित फूलों, फलियों एवं शाखाओं को तोड़कर माहूँ सहित नष्ट कर देना चाहिए। यदि कीट का प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर पार कर गया हो तो निम्नलिखित कीटनाशों का प्रयोग करना चाहिए। आरा मक्खी एवं बालदार सूँड़ी के नियंत्रण के लिए मैलाथियान 5 प्रतिशत डी.पी. की 20-25 किग्रा०0प्रति हेक्टेयर बुरकाव अथवा मैलाथियान 50 प्रतिशत ई.सी. की 1.50 लीटर अथवा डाई क्लोरोवास 76 प्रतिशत ई.सी. की 500 मिली० मात्रा अथवा क्यूनालफास 25 प्रतिशत ई.सी. की 1.25 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से लगभग 600-750 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। माहूँ, चित्रित बग, एवं पत्ती सुरंगक कीट के नियंत्रण हेतु डाईमेथेएट 30 प्रतिशत ई.सी. अथवा मिथाइल-ओ-डेमेटान 25 प्रतिशत ई.सी. अथवा क्लोरोपाइरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. की 1.0 लीटर अथवा मोनोक्रोटोफास 36 प्रतिशत एस.एल. की 500 मिली प्रति हेक्टेयर की दर से लगभग 600-750 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। एजाडिरेक्टिन (नीम आयल) 0.15 प्रतिशत ई.सी. 2.5 ली० प्रति हेक्टेयर की दर से भी प्रयोग किया जा सकता है। (ख) प्रमुख रोग अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा: इस रोग में पत्तियों तथा फलियों पर गहरे कत्थई रंग के धब्बे बनते है जो गोल छल्ले के रूप में पत्तियों पर स्पष्ट दिखाई देते हैं। तीव्र प्रकोप की दशा में धब्बे आपस में मिल जाते हैं जिससे पूरी पत्ती झुलस जाती है। सफेद गेरूई: इस रोग में पत्तियों की निचली सतह पर सफेद फफोले बनते है जिससे पत्तियाँ पीली होकर सूखने लगती है। फूल आने की अवस्था में पुष्पक्रम विकृत हो जाता है। जिससे कोई भी फली नहीं बनती है। तुलासिता: इस रोग में पुरानी पत्तियों की ऊपरी सतह पर छोटे-छोटे धब्बे तथा पत्तियों की निचली सतह पर इन धब्बों की नीचे सफेद रोयेदार फफूंदी उग आती है। धीरे-धीरे पूरी पत्ती पीली होकर सूख जाती है। नियंत्रण के उपाय बीज उपचार सफेद गेरूई एवं तुलासिता रोग के नियंत्रण हेतु मैटालैक्सिल 35 प्रतिशत डब्लू.एस. की 2.0 ग्राम प्रति किग्रा०0बीज की दर से बीजाशोधन कर बुआई करना चाहिए। अल्टरनेरिया पत्ती, धब्बा रोग के नियंत्रण हेतु थीरम 75 प्रतिशत डब्लू.एस. की 2.5 ग्राम प्रति किग्रा०0बीज की दर से बीजशोधन कर बुआई करना चाहिए। भूमि उपचार भूमि जनित एवं बीज जनित रोगों के नियंत्रण हेतु बायोपेस्टीसाइड (जैव कवक नाशी) ट्राइकोडरमा विरिड़ी 1 प्रतिशत डब्लू.पी.अथवा ट्राइकोडरमा हारजिएनम 2 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.5 किग्रा.प्रति हे0 60-75 किग्रा.सड़ी हुए गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुआई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से राई/सरसो के बीज/भूमि जनित आदि रोगों के प्रबन्धन में सहायक होता है। पर्णीय उपचार अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा, सफेद गेरूई एवं तुलासिता रोग के नियंत्रण हेतु मैकोजेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.0 किग्रा.अथवा जिनेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.0 किग्रा.अथवा जिरम 80 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.0 किग्रा.अथवा कापर आक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्लू.पी. की 3.0 किग्रा०0मात्रा प्रति हेक्टेयर लगभग 600-750 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए। (ग) प्रमुख खरपतवार बथुआ, सेन्जी, कृष्णनील, हिरनखुरी, चटरी-मटरी, अकरा-अकरी, जंगली गाजर, गजरी, प्याजी, खरतुआ, सत्यानाशी आदि। नियंत्रण के उपाय खरपतवारनाशी रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण करने के लिए फ्लूक्लोरैलीन 45 प्रतिशत ई.सी. की 2.2 ली. मात्रा प्रति हेक्टेयर लगभग 800-1000 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरन्त पहले मिट्टी में मिलाना चाहिए। अथवा पेण्डीमेथलीन 30 प्रतिशत ई.सी. की 3.30 लीटर प्रति हेक्टेयर उपरोक्तानुसार पानी में घोलकर फ्लैट फैन नाजिल से बुआई के 2-3 दिन के अन्दर समान रूप से छिड़काव करें। यदि खरपतवारनाशी रसायन का प्रयोग न किया गया हो तो खुरपी से निराई कर खरपतवारों का नियंत्रण करना चाहिए। कटाई-मड़ाई जब फलियां 75 प्रतिशत सुनहरे रंग की हो जाय तो फसल को काटकर सुखा लेना चाहिए तत्पश्चात मड़ाई करके बीज को अलग कर लें देर से कटाई करने से बीजों के झड़ने की आशंका रहती है बीज को अच्छी तरह सुखा कर ही भण्डारण करे जिससे इसका कुप्रभाव दानों पर न पड़ें। स्त्राेत : पारदर्शी किसाना सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश।