सोयाबीन की खेती मैदानी क्षेत्र इसकी खेती अभी हाल के वर्षो में शुरू हुई है। इसमें 40-45 प्रतिशत प्रोटीन तथा 20-22 प्रतिशत तक तेल की मात्रा उपलब्ध है। इसके प्रयोग से शरीर को प्रचुर मात्रा में प्रोटीन मिलती है। प्रदेश में बुन्देलखण्ड के सभी जनपदों एवं बदायूँ, शाहजहांपुर, रामपुर, बरेली, मेरठ आदि में की जाती है। निम्न सघन पद्धतियाँ अपनाकर सोयाबीन की खेती अधिक लाभप्रद हो सकती है। 1. उन्नतशील प्रजातियां सोयाबीन की प्रजातियों का विवरण निम्नवत् है। प्रजाति दाने का रंग आकार पकने की अवधि (दिनों में) उपज ( कु./हे.) कीट/रोग ग्राही अवरोधी उपयुक्त क्षेत्र पी.के. 472 पीला, गोल बड़ा 120-125 30-35 पीला चित्रवर्ण अवरोधी सम्पूर्ण उ.प्र. विशेषकर बुन्देलखण्ड क्षेत्र जे.एस.71.5 पीला छोट 100-105 25-28 पत्ती छेदककीट मध्यम अवरोधी बुन्देलखण्ड क्षेत्र पी.एस. 564 पीला मघ्यम 115-120 25-30 पीला चित्रवर्ण अवरोधी सम्पूण उ.प्र. पी.के. 262 पीला गोल बडा 120-125 28-30 पीला चित्रवर्ण तथा बैक्टीरियल पत्ती पस्टयूल्स तराई क्षेत्र तथा भाभर जे.एस. 2 - 98-105 25-30 झुलसा अवरोधी बुन्देलखण्ड जे.एस.93.5 - 102-108 25-30 जड सलन पत्ती धब्बा अवरोधी बुन्देलखण्ड जे.एस. 72.44 - 105-110 20-28 मध्यम अवरोधी बुन्देलखण्ड जे.एस. 75.46 - 105-110 25-30 झुलसा अवरोधी बुन्देलखण्ड पूसा 20 - 110-115 30-32 अच्छी अंकुरण क्षमता बुन्देलखण्ड पी.के. 416 पीला मध्यम 115-120 30-35 ब्लाइट से मध्यम अवरोधी पीला विषाणु व जीवाणु झोंका अवरोधी सम्पूर्ण उ.प्र. पी.के 1024 पीला गोल 115-120 30-35 पीला चित्रवर्ण रोग अवरोधी तदैव पूसा- 16 पीला मध्यम 110-115 25-35 पीला चित्रवर्ण मध्यम अवरोधी सम्पूर्ण उ.प्र पी.एस 1042 पीला गोल, बडा 120-125 30-35 पीला चित्रवर्ण अवरोधी सम्पूर्ण उ.प्र. जे.एस. 335 पीला मध्यम 100-110 30-35 झुलसा अवरोधी बुन्देलखण्ड हेतु एम.ए.यू.एस. 47 - 85-90 25-30 झुलसा अवरोधी बुन्देलखण्ड एन.आर.सी. 37 - - 100-105 25-30 झुलसा अवरोधी बुन्देलखण्ड 2. बीज दर 75-80 किलो बीज प्रति हेक्टेयर का प्रायोग किया जाय। अंकुरण प्रतिशत 75-80 से कम नहीं होनो चाहिए। 3. बीज उपचार बोने से पूर्व प्रति किलोग्राम बीज को 2 ग्राम थीरम एवं 1.0 ग्राम कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण के मिश्रण से शोधित कर लेना चाहिए अथवा कार्बेन्डाजिम 2.0 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से शोधित करना चाहिए। बोने से पहले बीज को सोयाबीन के विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से भी उपचारित करें। एक पैकेट 10 कि.ग्रा. बीज के लिये पर्याप्त होता है। एक पैकेट कल्चर को 10 कि.ग्रा. बीज के ऊपर छिड़क कर हल्के हाथ से मिलायें जिससे बी के ऊपर एक हल्की पर्त बन जाये। इस बीज की बुवाई तुरन्त करें। तेज धूप से कल्चर के जीवाणु के मरने की आशंका रहती है, ऐसे खेतों में जहां सोयाबीन पहली बार या काफी समय बाद बोई जा रही हो, कल्चर का प्रयोग अवश्य करें। 4. बुवाई मैदानी क्षेत्रों में इसकी बुवाई का उपयुक्त समय 20 जून से 10 जुलाई तक है। बुवाई 45 से.मी. की दूरी पर लाइनों में करें। बीज से बीज की दूरी 3 से 5 से.मी. रखें। बीज को 3 से 4 से.मी. से अधिक गहरा नहीं बोना चाहिए। 5. उर्वरकों का प्रयोग उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर किया जाय । यदि मृदा परीक्षण नहीं कराया गया है तो उन्नतिशील प्रजातियों के लिए नत्रजन 20 कि.ग्रा., सस्फोरस 80 कि.ग्रा तथा पोटोश 40 कि.ग्रा. प्रति हे. की दर से प्रयोग करें। खाद की पूरी मात्रा अन्तिम जुताई में हल के पीछे 6-7 से.मी. की गहराई पर डाली जाय। बोने के 30 से 35 दिन बाद सोयाबीन का एक या दो पौध उखाड़कर देखा जाय कि जड़ो में ग्रन्थियां पड़ी हैं अथवा नहीं। यदि ग्रन्थियां न पड़ी हों तो 30 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हे. की दर से फूल आने के एक सप्ताह पहले प्रयोग किया जाय। गोबर की खाद डालने से जड़ों में ग्रन्थियां अच्छी बनती हैं। 200 कि.ग्रा. जिप्सम का प्रयोग आवश्यक है। 6. निराई गुडाई क्र.स. शाकनाशी का नाम मात्रा प्रति हे. (व्यपारिक पदार्थ) मात्रा प्रति एकड़ (व्यपारिक पदार्थ) 1 फ्लूक्लोरेलिन 45 ई.सी. वेसालिन (बुवाई के पूर्व) 2.25 लीटर 900 से 1000 मिली. 2 मेटोलाक्लोर 50 ई.सी. डयूअल (बुवाई के दो दिनों में) 2.00 लीटर 800 मिली. 3 एलाक्लोर 50 डब्लू.पी. लासो (बुवाई के दो दिनों में) 4 लीटर 1600 मिली. 4 क्लोरीम्यूरान 25 ई.सी. क्लोवेन⁄ट्रान्ज⁄क्यूरिन (बुवाई के दो दिनों में) (घासकुल चौड़ी पत्ती एवं मेथी कुल के खरपतवार का प्रभावी नियन्त्रण) 30-40 मिली. 12-15 मिली. 5 फिनाक्साप्रोन 10 ई.सी. व्हिप सुपर(बुवाई के 20-25 दिनो बाद) 800-1000 मिली. 325-400 मिली. 6 क्विजैलोफोप-9-टरफ्लूराइल 4.4 ई.सी. पेन्टारा (बुवाई के 20-25 दिनो बाद) (केवल घास कुल के खरपतवारों का नियन्त्रण 750-1000 मिली. 300-400 मिली. 7 इमेजीक्राइपर 10 ई.सी पानी में मिलाकर 10-20 दिनों बाद छिड़काव करें 750-1000 मिली. 500-600 मिली. 7. सिंचाई एवं जल निकास सोयाबीन वर्षा आधारित फसल है। यदि वर्षा न हो तो फूल एवं फली आने पर सिंचाई करें। खेत में जल–निकास का प्रबन्ध करना चाहिए। फसल सुरक्षा कीट 1. सोयाबीन की फली छेदक कीट पहचान इनकी सूंड़ी फलियों को खाकर नुकसान पहुंचाती हैं। उपचान बुन्देलखण्ड में मध्यम अवरोधी प्रजाति गौरव को बोया जाय। इस कीट की रोकथाम के लिये निम्न कीटनाशकों में से किसी एक का छिड़काव करना चाहिए।(क) क्लोरपाययरीफास (20 ई.सी.) 1.5 लीटर प्रति हेक्टर या क्यूनालफास (25 ई.सी.) 1.5 लीटर प्रति हेक्टर। 2. ग्रीन सेमी लूपर कीट पहचान इसकी सूडियॉ शीघ्र पकने वाली प्रजातियों में फूल निकलते समय उसकी कलियों को खा जाती हैं। प्रथम फूल को समाप्त पर दुबारा पुष्प बनते हैं। जिनमें फलियॉ बनने पर उनमें दाने नहीं बनते। उपचार फसल में फूल निकलना शुरू हों तो क्यूनालफास 25 ई.सी. 1.5 लीटर प्रति है. की दर से छिड़काव करें। 3. सोयाबीन की बिहार रोमिल सूंड़ी पहचान प्रारम्भिक अवस्था में सूंड़िया एकत्र होकर पत्तियों की सतह पर रहकर हरित पदार्थ खुरचकर खाती हैं। बाद में पूरे खेत में बिखरकर पत्तियों की सतह पर रहकर हरित पदार्थ खुरचकर खाती हैं। बाद में पूरे खेत में बिखरकर पत्तियों को खाकर पौधों को नंगा कर देती हैं। उपचार प्रारम्भिक अवस्था में गिडारें झुण्ड में पत्तियों पर रहती हैं। पत्तियां तोड़कर नष्ट कर दें। क्यूनालफास 25 ई.सी. 1.5 लीटर का 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टर 2 से 3 बार आवश्यकतानुसार छिड़काव करें। 4. गर्डिल बिटिल ( सोयाबीन) पहचान वयस्क मादा तने अथवा टहनियों पर दो छल्ले बनाती है, जिसके बीच मे पीले रंग के अण्डे देती है। अण्डे से निकली गिडार अन्दर – अन्दर खाती है। पौधा सूख जाता है। उपचार ग्रीष्मकालीन जुताई करनी चाहिए। सम्भावित क्षेत्रों में बुवाई के समया फोरेट 10 जी. 10 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर खेत में मिलायें या कार्बोफ्यूरान 3 जी. 30 कि.ग्रा. अथवा इथियान 50% ई०सी० 1.5 ली० प्रति हे० 1000 ली० पानी में अथवा ट्राइजोफास 40% ई०सी० 625 मिली० प्रति हे० 500 ली० पानी में शेष उक्त क्रम -2 के अनुसार। रोग 5. सोयाबीन का पीला चित्रवर्ण रोग पहचान यह बीमारी वाइरस द्वारा फैलती है, जिसे सफेद मक्खी फैलाती है। प्रभावित पौधों की पत्ती पीली और चित्तीदार दिखाई देती है। उपचार रोग रोधी प्रजातियां जैसे पी.के. –416, 472 पी.एस.-564,पी.के. -262 पी.के.-327, पी.के.-1024 को बोयें। इसकी रोकथाम हेतु जमाव के बाद रोग के लक्षण दिखाई पड़ने पर प्रभावित पौधों को निकालकर निम्न में से किसी एक कीटनाशी का छिड़काव करना चाहिए। (क) मिथाइल–ओ–डिमेटान (25 ई.सी.) 1 लीटर प्रति हेक्टर या (ख) डाईमिथोएट (30 ई.सी.) 1 लीटर प्रति हेक्टर। 6. सूत्रकृमि सूत्रकृमि जानित बीमारियॉ रोकने के लिये हरी खाद गर्मी की गहरी जुताई या खलियों की खाद का उचित मात्रा में प्रयोग किया जाये। 10 किग्रा. फोरेट 10 जी बुवाई से पूर्व प्रयोग करें अथवा नीम की खली 15-20 कुन्तल/हे. की दर से प्रयोग करें। मुख्य बिन्दु क्षेत्र विशेष के लिए संस्तुत प्रजातियों के प्रमाणित बीजों का प्रयोग करें। सोयाबीन बीज का अंकुरण 75-80 प्रतिशत से कम नहीं होना चाहिए। बीज का उपचार करें एवं कल्चर का प्रयोग अवश्य करें। बीज को 3-4 से.मी. से अधिक गहरा न बोयें। सन्तुलित उर्वरकों का प्रयोग बुवाई के समय ही बेसल ड्रेसिंग में किया जाय। सामयिक निराई-गुड़ाई अवश्य करें। वर्षा के अभाव में फूल फली आने की अवस्था में सिंचाई अवश्य करें। स्त्राेत : पारदर्शी किसाना सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश।