<p style="text-align: justify;">बेल, भारत का अति प्राचीन एवं औषधीय गुणों से परिपूर्ण फल वृक्ष है। इसे वैदिक साहित्य में 'दिव्यवृक्ष' का नाम भी दिया गया। इसके पंचांग (जड़, छाल, पत्ते, शाख एवं फल) को औषधि के रूप में विभिन्न रोगों के उपचार के लिए बहुत उपयोगी पाया गया है। बेल के औषधीय गुणों का वर्णन यजुर्वेद, जैन साहित्य, उपवन विनोद, चरक संहिता, वृहत संहिता तथा अन्य आयुर्वेद साहित्य में विस्तृत रूप से मिलता है। इसके विशिष्ट गुणों जैसे कि विपरीत परिस्थितियों के प्रति सहनशीलता, जननद्रव्यों में विविधता, प्रति इकाई उच्च उत्पादकता, विभिन्न प्रकार की भूमि एवं जलवायु में उगाने के लिए उपयुक्तता, कम देखभाल, पोषण तथा औषधीय गुण तरह-तरह के परिरक्षित पदार्थ बनाने के लिए उपयोगिता आदि का विशेष महत्व है। अधिक समय तक भंडारण क्षमता के कारण यह फल वृक्ष शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में बारानी खेती के लिए लाभकारी पाया गया है।</p> <h3 style="text-align: justify;">गोमा यशी बेल का उपयोग</h3> <p style="text-align: justify;">पौधों का कद छोटा तथा फलों का आकार और वजन औसतन अनुकूल होने के कारण इसको आसानी से तोडा जा सकता है। फल का छिलका पतला, कम बीज एवं रेशा होने के कारण इसको चम्मच से भी खाया जा सकता है। 'गोमा यशी' के कच्चे फलों से मुरब्बा एवं कैंडी बनाई जा सकती है। इसके पके फलों के गूदे से पल्प, स्क्वै श, टॉफी, जैम, पाउडर, आइसक्रीम आदि बनाकर इसका उपयोग किया जा सकता है। 'गोमा यशी' के फल को फलाहार के तौर पर भी लिया जा सकता है। कच्चे फल को भूनकर खाने से भूख संबंधी समस्या एवं अन्य पेट के विकारों से छुटकारा पाया जा सकता है। इसके पके फलों के गूदे को सुखाकर पाउडर के रूप में प्रतिदिन दूध के साथ लेने से तथा नियमित इसके गूदा या इसका शर्बत बनाकर सेवन करने से पेट के विकारों से छुटकारा पाया जा सकता है। इसके गूदे से उच्च कोटि का शर्बत बनाया जा सकता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">'गोमा यशी' की विशेषताएं</h3> <p style="text-align: justify;">इसका वृक्ष कद में बौना, फल का वजन (1.4 कि.ग्रा.), पतला छिलका (1.5 सें.मी.) रेशा (2.4 प्रतिशत), छिलके का वजन (160 ग्राम), गूदे की मात्रा (72-76 प्रतिशत) टी.एस.एस. गूदा (380 ब्रिक्स), टी.एस.एस.म्यूसिलेज (430 ब्रिक्स), अम्लता (0.29 प्रतिशत) विटामिन सी (22 मि.ग्रा./100 ग्राम गूदा) एव फल तथा गूदे का रंग आकर्षक होता है। इसके साथ-साथ पौधों का आच्छादन घना तथा शुष्क क्षेत्रों में कांटे नहीं पाये जाते हैं। इस प्रजाति की सघन बागवानी (5 x 5 मीटर) में 400 पौधे एक हैक्टर क्षेत्रफल में लगाये जा सकते हैं। इसकी सघन बागवानी से विपरीत परिस्थिति में भी आय दोगुनी से तिगनी की जा सकती है।</p> <p style="text-align: justify;">'गोमा यशी' के विविध रूप बेल की इसी उपयोगिता एवं विपरीत परिस्थिति में सहनशीलता को ध्यान में | रखकर केन्द्रीय बागवानी परीक्षण केन्द्र, वेजलपुर द्वारा पिछले 17 वर्षों से पूरे भारत में बेल के विविध जननद्रव्यों (196) का संग्रहण एवं उनका मूल्यांकन करके चयन पद्धति से नई प्रजाति 'गोमा यशी' का विकास वर्ष 2010 में किया गया है। मूल्यांकन के दौरान यह पाया गया कि शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों के लिए यह किस्म अपेक्षाकृत बौनी होती है। इसकी टहनियों पर सूखे क्षेत्रों में कांटे नहीं पाये जाते हैं। फल का औसतन वजन पारिवारिक जरूरतों के अनुरूप लगभग 1.41 कि.ग्रा. है। फलों का रंग पीला, आकार गोल एवं आकर्षक होता है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="337" height="130" /></p> <h3 style="text-align: justify;">प्रजातियां </h3> <p style="text-align: justify;">बेल की विविध प्रजातियों जैसे कि एन.बी. 4-5, एन.बी.-7, एन.बी.-9, एन.बी.-16, एन.बी.-17, सी.आई.एस.एच.बी.-1, सी.आई. एस.एच.बी.-2, पंत शिवानी, पंत अपर्णा, पंत सुजाता और पंत उर्वशी का चयन पद्धति से विकास हुआ है। अपनी विशिष्टताओं के कारण 'गोमा यशी' बेल प्रजाति, देश के किसानों की पहली पसंद बन चुकी है। इसके पौधे कद में छोटे होने के कारण इनकी सघन बागवानी की संस्तुति की गई है। किसान भी बड़े पैमाने पर इसकी व्यावसायिक खेती करना प्रारंभ कर चुके हैं। 'गोमा यशी' के फल के गूदे का रंग आकर्षक तथा स्वाद मिठासयुक्त होता है। टी. एस.पी. 37-39° ब्रिक्स है। इसमें बीज एवं रेशे की मात्रा बहुत कम तथा छिलका बहुत ही पतला होता है। पकने के बाद हाथ के हल्के दबाव से फल को तोड़ा जा सकता है। इसका गूदा पकने के बाद छिलके से अलग हो जाता है, जिसको आसानी से उपयोग में लाया जा सकता है। अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में बारानी खेती से 'गोमा यशी' के 10 वर्ष के पौधे से 75-95 कि.ग्रा. तक फल प्रतिवृक्ष प्राप्त होते हैं। इसमें गूदे की मात्रा 72-76 प्रतिशत होती है।</p> <p style="text-align: justify;">फल स्वादिष्ट एव सुवासयुक्त होते हैं और इसके फल से कई प्रकार के मूल्यवर्धित उत्पाद तथा उच्च कोटि का शर्बत बनाया जा सकता है। इसके पके फलों के गूदे को चम्मच से भी खाया जा सकता है। यह प्रजाति बारानी क्षेत्रों में सघन बागवानी (5x5 मीटर) के लिए भी उपयुक्त पायी गई है। किसान इसकी सघन बागवानी कर अधिक आय प्राप्त कर रहे हैं। सघन बागवानी में एक हैक्टर क्षेत्रफल से 10 वर्ष के बगीचे से लगभग 2.5-4.0 लाख रुपये का लाभ कमायाजा सकता है। ऐसी लाभकारी विशिष्टताओं की वजह से 'गोमा यशी' प्रजाति के पौधों को देश के शुष्क एवं अर्ध शुष्क क्षेत्रों में लगाने के लिए दिन-प्रतिदिन मांग बढ़ती जा रही है।</p> <p style="text-align: justify;">बेल के महत्व को देखते हुए केन्द्रीय बागवानी परीक्षण केन्द्र में शोध का कार्य वर्ष 2003 से प्रारंभ किया गया, जो कि पश्चिम भारत में बेल पर परीक्षण करने वाला एक मात्र केन्द्र है। सर्वप्रथम देश के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों तथा भाकृअनुप के संस्थानों द्वारा विकसित की गई प्रजातियों का इस केन्द्र पर मूल्यांकन किया गया। इसके साथ ही साथ देश के विभिन्न राज्यों से आशाजनक जननद्रव्यों का संग्रहण किया गया। कुल 196 जननद्रव्यों का इस केन्द्र के प्रक्षेत्र में संग्रहण और मूल्यांकन किया जा रहा है। इस केन्द्र पर 'गोमा यशी' प्रजाति का विकास किया गया जिसको भाकृअनुप-केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर द्वारा वर्ष 2010 में जारी किया गया।</p> <p style="text-align: justify;">'गोमा यशी' प्रजाति के विशिष्ट गुणों, उत्पादकता तथा गुणवत्ता की वजह से यह किस्म देश के किसानों की पहली पसंद बन चुकी है। अभी तक यह प्रजाति देश के विभिन्न राज्यों में लगभग 450 हैक्टर क्षेत्रफल में लगाई जा चुकी है। सीमांत किसान 5-20 पौधे अपने प्रक्षेत्र पर तथा विकासशील किसान 100-500 पौधे अपने प्रक्षेत्र पर लगा रहे हैं। यह प्रजाति राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक इत्यादि प्रदेशों में किसानों के प्रक्षेत्र पर पहुंच चुकी है। पश्चिम भारत में 2009 से पहले किसान बेल के व्यावसायिक बगीचे नहीं लगा रहे थे। अब किसान 'गोमा यशी' की उत्पादकता तथा गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए अपने प्रक्षेत्र पर इसकी व्यावसायिक बागवानी करना प्रारंभ कर रहे हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;"> किसानों के अनुभव</h3> <p style="text-align: justify;">श्री रमणलाल पुराणी गायत्री परिवार ने बेल शर्बत का व्यवसाय वर्ष 2018 में गोधरा में प्रारंभ किया। उनको केन्द्र पर आने का निमंत्रण दिया गया। उन्होंने गुजरात में पहली बार बेल शर्बत बनाना शुरू किया, जिसकी वजह से पंचमहल जिले में इसका प्रचार-प्रसार हुआ। उनको गर्मी में बेल शर्बत से प्रत्येक वर्ष 25-30 हजार रुपये शुद्ध आय प्राप्त हो रही है।आज वे दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बन गए हैं।</p> <p style="text-align: justify;">इसी वर्ष भुज से एक किसान श्री गोविंदभाई ने 500 कि.ग्रा. फल इस केन्द्र से ले जाकर स्क्वैश बनाकर 25 हजार रुपये का लाभ प्राप्त किया है। राजस्थान में पर्क फूड की हंसा जैन ने इस केन्द्र का दौरा कर प्रशिक्षण लेकर बेल स्क्वैश, कैंडी इत्यादि से लगभग 50 हजार से एक लाख रुपये का लाभ प्राप्त किया है।</p> <p style="text-align: justify;">दभोड़ा ग्राम गांधीनगर के किसान रणछोड़भाई पटेल ने भी इस केन्द्र से 'गोमा यशी' के 70 कलमी पौधे वर्ष 2012 में अपने फार्म पर लगाये थे। आज वे 30-35 हजार शुद्ध आय प्राप्त कर रहे हैं। गुजरात में किसानों को बेल वृक्ष की जानकारी नहीं थी। केन्द्र द्वारा अथक प्रयासों से किसानों के बीच इस फल वृक्ष की जानकारी बढ़ी है और लोगों ने अब इसे उपयोग में लेना प्रारंभ कर दिया है। इस प्रजाति के कलमी पौधों की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यह पौधा कद में छोटा होता है, जिसको 5 x 5 मीटर की दूरी पर लगाने की संस्तुति केन्द्र द्वारा दी जा चुकी है। इसकी बागवानी से किसानों को दोगुना लाभ प्राप्त हो रहा है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), ए.के. सिंह, संजय सिंह, आर.एस. सिंह और पी.एल. सरोज.केन्द्रीय बागवानी परीक्षण केन्द्र (भाकृअनुप-केशुबासं) <br />वेजलपुर, पंचमहल (गोधरा), गुजरात।</p>