<h3 style="text-align: justify;">परिचय </h3> <p style="text-align: justify;">ग्वारपाठा, सम्पूर्ण भारत में प्राकृतिक रूप से मिलता है तथा अनेक नामों से जाना जाता है जैसे-घृतकुमारी, इंडियन एलो, कुंवार पाठ इत्यादि। इसके पौधे बहुवर्षीय तथा 2-3 फीट ऊंचे होते हैं और मूल के ऊपर से पत्ते निकलते हैं। ग्वारपाठा के पत्ते हरे, मांसल, भालाकार, 1.5-2.0 फीट लंबे व 3-5 इंच चौड़े एवं सूक्ष्म कांटेयुक्त होते हैं। पत्तों के अंदर घृत के समान चमकदार गूदा होता है। यह एक औषधीय पौधा है, जिसका उपयोग विभिन्न रोगों जैसे-गठिया, मांसपेशियों की समस्या, मधुमेह, त्वचा विकार, उच्च रक्त दाब, दमा, कैंसर, अल्सर, पाचन क्रिया दोष, कब्ज आदि में किया जाता है। कम वर्षा वाले क्षेत्र ग्वारपाठा की खेती के लिए सर्वथा अनुकूल होते हैं। अनेक औषधियों में प्रयुक्त होने के कारण वर्तमान में इसकी मांग काफी बढ़ रही है। ग्वारपाठा की मांसल पत्तियों से प्राप्त जैल व सूखे पाउडर की मांग विश्वस्तर पर बनी रहती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">औषधीय महत्व</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>ग्वारपाठा एंटी-इनफ्लेमेट्री और एंटी-एलर्जिक है। यह बिना किसी साइड इफेक्ट के सूजन एवं दर्द को मिटाता है व एलर्जी से उत्पन्न रोगों को दूर करता है।</li> <li>यह हाजमे के लिए लाभदायक है। इसके नियमित सेवन से पेट में उत्पन्न विभिन्न प्रकार के रोगों को दूर किया जा सकता है, जैसे कि गैस का बनना. पेट का दर्द आदि।</li> <li>ग्वारपाठा शरीर में सूक्ष्म कीटाणु, बैक्टीरिया, वायरस एवं कवकजनित रोगों से लड़ने में एंटीबॉयोटिक के रूप में काम करता है।</li> <li>यह जख्मों को भरने में अत्यंत लाभदायक है। मधुमेह के रोगियों के जख्म भरने में भी ग्वारपाठा कारगर सिद्ध हुआ है।</li> <li>यह हृदय के कार्य करने की क्षमता को बढ़ाता है और उसे मजबूती प्रदान करता है तथा शरीर में ताकत एवं स्फूर्ति लाता है।</li> <li>ग्वारपाठा शरीर में यकृत एवं गुर्दो के कार्यों को सुचारू रूप से संचालित करने में मदद करता है तथा शरीर से टॉक्सिक पदार्थों को बाहर निकालता है। इसमें उपस्थित एंजाइम, कार्बोहाइड्रेट, वसा एवं प्रोटीन को पेट एवं आंतों में शोषण करने की क्षमता को बढ़ाते हैं।</li> <li>ग्वारपाठा जैल प्राकृतिक रूप से त्वचा को नमी पहुंचाता है एवं उसे साफ करने के उपयोग में लाया जाता है।</li> <li>यह एग्जिमा, चोट एवं जलन, कीट के काटने, मुंहासे, घमौरियां, छालरोग इत्यादि के उपचार में भी लाभदायक है।</li> <li>ग्वारपाठा जैल, बालों में डैण्ड्रफ को दूर करने तथा बालों को झड़ने से रोकता है।</li> </ul> <p style="text-align: justify;"> ग्वारपाठा की फसल कंदों के द्वारा उगाई जाती है। इसका पौध रोपण मुख्यतः वर्षाकाल में जुलाई-अगस्त माह में किया जाता है। ग्वारपाठा की खेती के लिए चयनित खेत की 2-3 बार हलद्वारा जुताई करके अंतिम जुताई के बाद पाटा लगा देना चाहिए। इसकी खेती के लिए मुख्यतः खाद एवं उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती है। यह बहुवर्षीय पौधा है इसलिए पौध रोपाई से पूर्व 1015 सड़ी गोबर की खाद खेत में डालना लाभप्रद माना जाता है। पौधों को क्रमबद्ध तरीके से पंक्तियों में लगाना चाहिए। पंक्ति से पंक्ति एवं पौधे से पौधे के बीच की दूरी क्रमशः 2 x 2, 2.5 x 2.5 एवं 3 x 3 फीट रखनी चाहिए। इस प्रकार एक हैक्टर क्षेत्रफल में लगभग क्रमश: 28 000, 18,000 एवं 12 ,000 तक पौधों की आवश्यकता होती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई</h3> <p style="text-align: justify;">साधारणत: ग्वारपाठा की खेती के लिए सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है, परन्तु गर्मियों में कभी-कभी हल्की सिंचाई करना लाभदायक होता है। पत्तियों की कटाई के एक माह पूर्व फसल में सिंचाई करने से अधिक जैल प्राप्त होता है। प्रत्येक माह के अंतराल पर खेत की निराई-गुड़ाई करके अवांछित पौधों को निकालते रहना चाहिए। फसल के जमने के बाद इसकी जड़ों से कंद निकलने शुरू हो जाते हैं, जो खेत में लगातार पौधों की संख्या बढ़ाते हैं। खेत में संख्या से ज्यादा पौधे होने पर इसके उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ता है। प्रत्येक छह माह बाद जड़ों से निकली कंदों को हटाते रहना चाहिए, जिससे पौधों की वांछित संख्या खेत में बनी रहे।</p> <h3 style="text-align: justify;">फसल की कटाई एवं भंडारण</h3> <p style="text-align: justify;">पौधे लगाने के एक वर्ष बाद प्रत्येक चार माह में पौधे की 3-4 पत्तियों को छोड़कर शेष सभी पत्तियों को तेज धारदार हसिये से काट लेना चाहिए। ग्वारपाठे की ताजी कटी हुई पत्तियों को छाया में रखना चाहिए। कटी हुई पत्तियों को ज्यादा दिनों तक भंडारित नहीं किया जा सकता। अतः कटाई के बाद 2-3 दिनों के भीतर इनमें से जैल को निकाल लेना चाहिए। जैल निकालने के बाद इसमें उपयुक्त परिरक्षक डालकर एक से दो वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">उपज</h3> <p style="text-align: justify;">इस प्रकार की कृषि क्रिया से वर्षभर में प्रति हैक्टर लगभग 250 क्विंटल ताजा पत्तियां प्राप्त होती हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 25.000 कंद प्राप्त होते हैं जिनको रोपाई के काम में लाया जा सकता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">आय</h3> <p style="text-align: justify;">प्रथम वर्ष की शुद्ध लाभ 39500 रुपये (प्राप्ति 75,000-लागत 35,500 रुपये) प्राप्त हुई। इसके उपरांत ग्वारपाठा की ताजी पत्तियां लगातार 5 वर्षों तक प्रत्येक 3-4 महीने के अंतराल पर काटी जा सकती हैं। इसकी खेती का प्रमुख लाभ यह है कि फसल के एक बार जमने के बाद प्रत्येक वर्ष खेत की तैयारी, रोपण सामग्री व बुआई की आवश्यकता नहीं होती है तथा आगे के वर्षों में कंदों को हटाना व पत्तियों की कटाई की लागत मात्र 10,000 रुपये प्रति हैक्टर आती है। अतः प्रतिवर्ष प्रति हैक्टर लगभग 65,000 रुपये का लाभ प्राप्त किया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सारणी 1. ग्वारपाठा की खेती में लागत और आमदनी</strong></p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 7.70037%;"><strong>क्र.स .</strong></td> <td style="width: 19.6928%;">विवरण<br /><br /></td> <td style="width: 18.6541%;">व्यय (रुपये) </td> <td style="width: 7.51158%;"><strong>क्र.स .</strong></td> <td style="width: 23.1867%;">विवरण<br /><br /></td> <td style="width: 15.352%;">प्राप्ति (रुपये)</td> </tr> <tr> <td style="width: 7.70037%;"><strong>1</strong></td> <td style="width: 19.6928%;">खेत की तैयारी एवं गोबर खाद </td> <td style="width: 18.6541%;">6000</td> <td style="width: 7.51158%;"><strong>1</strong></td> <td style="width: 23.1867%;">ताजा पत्तियां (250 क्विंटल x 2.00 दर)</td> <td style="width: 15.352%;">50,000</td> </tr> <tr> <td style="width: 7.70037%;"><strong>2</strong></td> <td style="width: 19.6928%;">रोपण सामग्री (18000 पौधे x1.00 रुपये प्रति पौध)</td> <td style="width: 18.6541%;">18000</td> <td style="width: 7.51158%;"><strong>2</strong></td> <td style="width: 23.1867%;">रोपण कंदों से आय</td> <td style="width: 15.352%;">25,000 </td> </tr> <tr> <td style="width: 7.70037%;"><strong>3</strong></td> <td style="width: 19.6928%;">बुआई, सिंचाई, निराई-गुड़ाई, कटाई व अन्य खर्च</td> <td style="width: 18.6541%;">1150</td> <td style="width: 7.51158%;"> </td> <td style="width: 23.1867%;"> </td> <td style="width: 15.352%;"> </td> </tr> <tr> <td style="width: 7.70037%;"> </td> <td style="width: 19.6928%;">कुल लागत</td> <td style="width: 18.6541%;">35500</td> <td style="width: 7.51158%;"> </td> <td style="width: 23.1867%;">कुल प्राप्ति</td> <td style="width: 15.352%;">75000</td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">ग्वारपाठा की खेती के लाभ</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>इसकी खेती के लिए खाद, कीटनाशक आदि की आवश्यकता नहीं होती है। अतः लागत कम आती है एवं मुनाफा ज्यादा होता है। </li> <li>यह फसल वर्षभर आमदनी देती है। </li> <li>पशु इसको नहीं खाता। अत: इसकी रखवाली की आवश्यकता नहीं होती है।</li> <li> इसके सूखे पाउडर व जैल की विश्व बाजार में व्यापक मांग होने के कारण इससे विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है।</li> <li> ग्वारपाठा आधारित एलुआ व सूखा पाउडर बनाने वाले उद्योगों की स्थापना की जा सकती है।</li> <li> यह हल्की मृदा व कम वर्षा वाले क्षेत्रों की उपयुक्त फसल है और मृदा क्षरण को रोकने में भी सहायता प्रदान करती है</li> </ul> <p style="text-align: justify;"> स्त्राेत: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), सरफराज अहमद’,पी.एच.डी. अनुसंधान स्कॉलर, आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग, जितेन्द्र सुमन और सुनील गोचर- एस.के.एन. एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, जोबनेर, जयपुर (राजस्थान)</p>