<p style="text-align: justify;">पोषण वाटिका या रसोईघर बाग या फिर गृह वाटिका, उस वाटिका को कहा जाता है, जो आंगन में ऐसी खुली जगह पर होती है जहां पारिवारिक श्रम से परिवार के इस्तेमाल के लिए विभिन्न मौसमों में मौसमी फल तथा विभिन्न सब्जियां उगाई जाती हैं। भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय पोषण अभियान के अंतर्गत महिलाओं और बच्चों के पोषण स्तर में सुधार के लिए सितंबर माह को राष्ट्रीय पोषण माह के रूप में मनाने का आह्वान किया गया है। देश के सभी कृषि विज्ञान केंद्रों द्वारा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को पोषण थाली एवं पोषण वाटिका की महत्ता एवं स्थापना के लिए जागरूक करने के उद्देश्य से 17 सितम्बर को पोषण दिवस का आयोजन किया जाता है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/sda90.jpg" width="160" height="115" /></p> <h3 style="text-align: justify;"> पोषण वाटिका के मुख्य तीन लाभ</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li><strong> स्वास्थ्य-</strong> पोषण वाटिका से परिवार, पड़ोसियों एवं रिश्तेदारों को तरोताजा हवा, प्रोटीन, खनिज एवं विटामिन से युक्त फल, फूल व सब्जियां प्राप्त होती हैं। इसके साथ ही परिवार के प्रत्येक सदस्य द्वारा बगिया में कार्य करने से शारीरिक व्यायाम भी होता है। इससे परिवार के सदस्य स्वस्थ्य एवं प्रसन्न रहते हैं।</li> <li><strong>समृद्धि-</strong> प्रत्येक छोटे परिवार में औसतन 100 रुपए की सब्जी प्रतिदिन बाजार से खरीदी जाती है। इस प्रकार प्रति माह 3000 रुपये की बचत कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त यदि फलदार पौधे जैसे-नीबू, पपीता, आम अमरूद आदि भी बगिया में लगे हों, तो फलों के लिए खर्च होने वाले बजट की भी बचत की जा सकती है ।</li> <li><strong> बुद्धिमत्ता-</strong> स्वयं की मेहनत एवं पसीने से उपजी हरी-भरी तरो-ताजा सब्जियों को देखकर सभी का तन-मन प्रफुल्लित होगा। इसके अतिरिक्त सब्जियां खरीदने के लिए बाजार में जाने का बहुमूल्य समय भी बच जाता है। वास्तव में स्वयं की देखरेख एवं मेहनत से पैदा की गई सब्जियों का स्वाद और आनंद कुछ और ही होता है । इस प्रकार पोषण वाटिका स्थापित करना परिवार के स्वास्थ्य एवं समृद्धि के लिए बुद्धिमत्तापूर्ण कदम साबित होगा।</li> </ul> <p style="text-align: justify;">बच्चों को बेहतर संतुलित आहार मिले,इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र एवं राज्य सरकार के प्रयासों से विद्यालयों में पोषण वाटिका विकसित की जा रही है। इससे प्रतिदिन मिड-डे मील के भोजन के साथ बच्चों को ताजी एवं पोषक सब्जियां परोसी जा रही हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">आकार</h3> <p style="text-align: justify;">पोषण वाटिका का आकार अलग-अलग परिस्थितियों, जैसे कि जगह, परिवार में सदस्यों की संख्या, रुचि और समय की उपलब्धता पर निर्भर करता है। लगातार फसलचक्र, सघन बागवानी और अंत:फसल खेती को अपनाते हुए एक औसत परिवार, जिसमें कुल ५ सदस्य हों, के लिए औसतन 250 वर्ग मीटर जमीन काफी है।</p> <h3 style="text-align: justify;"> बनावट</h3> <p style="text-align: justify;">आदर्श पोषण वाटिका या गृह वाटिका के लिए राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में उपलब्ध 250 वर्ग मीटर क्षेत्र में बहुवर्षीय पौधों को वाटिका के उस तरफ लगाना चाहिए, जिससे उन पौधों की अन्य दूसरे पौधों पर छाया न पड़ सके। इसके साथ ही इस बात का भा ध्यान रखना चाहिए कि ये पौधे एकवर्षीय सब्जियों के फसलचक्र और उन के पोषक तत्वों की मात्रा में बाधा न डाल सकें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/sda89.jpg" width="160" height="115" /></p> <h3 style="text-align: justify;">सब्जियों का चयन</h3> <p style="text-align: justify;">सब्जियों का चयन करते समय फसलचक्र अपनाना चाहिए। सब्जियों की किस्मों का चुनाव करते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि वे उन्नत, स्वस्थ एवं प्रतिरोधी हों। किस्में अगर देसी हों. तो हमें अगले मौसम में बीज खरीदने की जरूरत नहीं पडेगी। मौसम के अनुसार सब्जियों को निम्न प्रकार से बांटा जा सकता है।</p> <ul style="text-align: justify;"> <li><strong> खरीफ-</strong> लौकी, तोरई, कद्दू, टिंडा,खीरा, करेला, भिंडी, टमाटर, बैंगन, मिर्च, पालक, धनिया आदि।</li> <li><strong>रबी-</strong> गोभी, ब्रोकली, पत्तागोभी, टमाटर, बैंगन, मिर्च, पालक.मली. मेथी, सोया, चौलाई, धनिया, सेम, मटर, राजमा चुकंदर, गाजर, लहसुन, शलजम, प्याज आदि।</li> <li><strong> जायद -</strong>लौकी, तोरई, कद्दू, खीरा, ककड़ी, करेला, टिंडा, भिंडी, टमाटर, बैंगन, मिर्च, पालक, धनिया, चौलाई आदि। सब्जियों के साथ आम, अमरूद, सहजन, किन्नू, संतरा, पपीता, करौंदा, अनार, नीबू, आंवला, चीकू, ड्रैगनफूट आदि फलदार पौधे लगाये जा सकते हैं।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">भूमि की तैयारी</h3> <p style="text-align: justify;">जिस स्थान पर पोषण वाटिका लगानी हो, वहां की मृदा में जल एवं वायु का प्रवाह अच्छा होना चाहिए। मृदा जितनी भुरभुरी, कार्बनिक खाद एवं जीवांश तत्वों से भरपूर होगी, पैदावार भी उतनी ही अच्छी मिलेगी। गमले तैयार करते समय भी कस्सी या खुरपी से मृदा अच्छी तरह भुरभुरी कर तथा गोबर की खाद मिलाकर गमले तैयार कर लेने चाहिए। जिन व्यक्तियों के पास घर पर खुला स्थान नहीं है, वे अपनी छत पर सब्जियां उगा सकते हैं। आजकल बाजार में अलग अलग आकार के प्लास्टिक बैग, गमले, ट्रे इस काम में प्रयोग किए जा सकते हैं। सीमेंट एवं प्लास्टिक के गमले, कबाड़ में अनुपयोगी वस्तुएं जैसे-बाल्टी, प्लास्टिक के कट्टे , ट्रे, मटकियां, बोतल आदि का भी उपयोग कर सकते हैं। इनमें बराबर मात्रा में मिट्टी एवं कम्पोस्ट का मिश्रण भरकर सब्जियों का रोपण एवं बिजाई कर सकते हैं। </p> <h3 style="text-align: justify;">खाद एवं उर्वरक</h3> <p style="text-align: justify;">खाद एवं उर्वरक का अच्छी पैदावार प्राप्त करने में अत्यधिक महत्व है। इसके लिए आवश्यक है कि मृदा में कार्बनिक खाद का प्रयोग हो। यह खाद मृदा की दशा सुधारती है व पौधों को आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति भी करती है। इसके लिए गृहवाटिका के एक कोने में कम्पोस्ट खाद का निर्माण भी किया जा सकता है। खाद में पोषक तत्वों की वृद्धि के लिए, संभव हो तो, केंचुओं द्वारा तैयार वर्मीकम्पोस्ट इकाई की स्थापना कर वर्मीकपोस्ट का उपयोग करें। </p> <h4 style="text-align: justify;">प्रबंधन</h4> <p style="text-align: justify;">सामान्यतः सब्जियों की बुआई दो तरीकों से की जा सकती है-पौधशाला तैयार करके (टमाटर, बैंगन, मिर्च, प्याज, गोभीवर्गीय सब्जियां, सलाद) एवं सीधी बुआई से (खीरावर्गीय सब्जियां, मूली, मटर, भिन्डी, सेम, पालक, इत्यादि)। जब भी पोषण वाटिका या गृह वाटिका में खरपतवार दिखें, तो हाथ से निकाल देने चाहिए। प्लास्टिक पलवार लगाने से भी खरपतवार की रोकथाम होती है और मदा में नमी भी बरकरार रहती है। कीट एवं रोग प्रबंधन पोषण वाटिका से अस्वस्थ पौधों को तुरंत निकालकर नष्ट कर दें। फसलचक्र अपनाना लाभदायक होता है। बुआई के लिए प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें। स्वस्थ पौधशाला तैयार करें। गार्डन को साफ रखें खरपतवार निकालते रहें तथा अति आवश्यक होने पर पौध संरक्षण रसायनों के स्थान पर जैविक कीटनाशकों जैसे जीवामृत का ही प्रयोग करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">सब्जियों की तुड़ाई</h3> <p style="text-align: justify;">तुड़ाई की अवस्था फसल के स्वभाव है।पर निर्भर करती है।उदाहरण के लिए लौकी,करेला, टिंडा, भिंडी, तोरई आदि को कच्ची अवस्था पर एवं तरबूज, खरबूजा, टमाटर आदि को पकने पर तोड़ा जाता है।घर पर पोषण वाटिका का विकास करके खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति, स्वास्थ्यऔर पर्यावरण सुरक्षा जैसे तीनों महत्वपूर्ण उद्देश्यों को एक साथ परा किया जाना संभव है। </p> <p style="text-align: justify;">स्रोत: खेती पत्रिका(आईसीएआर), रमाकांत शर्मा, दिनेश अरोड़ा और डी.एस. भाटी, कृषि विज्ञान केंद्र, अजमेर, एसकेएन कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर (राजस्थान)।</p>