परिचय गिलोय, का वैज्ञानिक नाम टीनोस्पोरा कोर्डीफोलिया है, जो मेनिस्पमेंसी परिवार का सदस्य है। यह एक बहुवर्षीय झाड़ीदार लता हैयह समुद्रतट से 1200 मीटर से 3000 मीटर की ऊंचाई तक भारत के उष्णकटिबंधीय व उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में पायी जाती है। यह लता कई वर्षों तक फूलती और बढ़ती रहती है। इसकी बेल वृक्षों की सहायता से बढ़ती है, जिस वृक्ष को यह अपना आधार बनाती है, उसके गुण भी इसमें समाहित रहते हैं। इस दृष्टि से नीम के वृक्ष पर चढ़ी गिलोय को सबसे उत्तम औषधि माना जाता है। इसके पत्ते प्रायः पान के पत्तों के समान होते हैं। गिलोय के पत्तों का व्यास 2 से 4 इंच तक होता है। इसके फूल छोटे-छोटे गुच्छों में लगते हैं, जो गर्मी के मौसम में आते हैं। गिलोय के फल मटर के समान अंडाकार तथा गुच्छों में लगते हैं और पकने पर लाल रंग के हो जाते हैं। औषधीय रूप में संपूर्ण गिलोय का जापौधा महत्वपूर्ण है। इसकी ताजी छाल हरे रंग की तथा गुच्छेदार होती है। इसकी बाहरी छाल हल्के भूरे रंग की होती है, जिसे हटा देने पर भीतर का हरित मांसल भाग दिखाई देता है। काटने पर अंतर्भाग चक्राकार दिखाई पड़ता है। इसका व्यास लगभग एक इंच तक होता है। यह स्वाद में तीखा होता है, पर गंध कोई विशेष नहीं होती। गिलोय के अमृततुल्य गुणों के कारण इसे अमृता भी कहते हैं। गिलोय में गिलोइन नामक कड़वा ग्लूकोसाइड, ग्लिस्टेराल, ब्रेरिन, गिलोइनिन नामक एल्कोलाइड पाए जाते हैं। इसमें अनेक प्रकार के वसा, अम्ल एवं उड़नशील तेल पाए जाते हैं। इसमें काफी मात्रा में लाभदायक तत्व पाए जाते हैं जैसे-टिनोस्पोरिन, टिनोस्परिक एसिड, सिरिनजेन, शिलोइन इत्यादि। इसकी पत्तियों में कैल्शियम, प्रोटीन, फॉस्फोरस और तने में स्टार्च पाया जाता है। सोडियम सेलिसिलेट होने के कारण अधिक मात्रा में इसमें दर्द निवारक गुण पाए जाते हैं। गिलोय की खेती इसकी खेती के लिए रेतीली, दोमट, बलुई दोमट, हल्की चिकनी मृदा तथा अच्छी जल निकास वाली चिकनी मृदा उपयुक्त होती है। गिलोय की खेती इसके बीज एवं कलम दोनों से की जाती है। कलम से इसकी खेती ज्यादा सफलतापूर्वक की जाती है। गिलोय एक लता है, इसलिए इसकी वृद्धि अधिक होती है तथा इसको सहारे की आवश्यकता होती है। गिलोय के लिए नीम व आम सर्वोत्तम सहारा वृक्ष हैं। गिलोय की नर्सरी तैयार की जाती है और एक वर्ष के बाद नर्सरी में तैयार पौधों का रोपण किया जाना उचित रहता है। गिलोय के तने सर्वोत्तम औषधीय रूप में उपयोग में आते हैं। इसके तने का उत्पादन लगभग 8-10 क्विंटल प्रति हैक्टर होता है। ताजे गिलोय में से गिलोय अर्क प्राप्त होता है। 10 कि.ग्रा. गिलोय के तने से एक से दो कि.ग्रा. तक के सत् में ग्लूकोसाइन एवं ग्लिोइन मुख्य तत्व पाए जाते हैं। गिलोय के औषधीय गुण गिलोय बुखार को दूर करने की सबसे अच्छी औषधि मानी जाती है। यह सभी प्रकार के बुखार जैसे-टाइफाइड, मलेरिया, मंद ज्वर तथा पुराने बुखार के लिए बहुत ही उत्तम औषधि है। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायक होती है। गिलोय इंसुलिन की उत्पत्ति को बढ़ाकर ग्लूकोज का पाचन करती है तथा रोग के संक्रमणों को रोकने का कार्य करती है। इसका रस कड़वा तथा तीखा होता है, जो पाचन शक्ति को तेज करने वाला तथा पीलिया को खत्म करने वाला होता है। यह तेज बुखार, उल्टी, खांसी, बवासीर, टी.बी., जलन, पेशाब करने में कष्ट तथा जोड़ों का दर्द आदि रोगों को दूर करने में सहायक होता है। यह तीखा होने के कारण पेट के कीटों को मारने का कार्य करता है। इसमें काफी मात्रा में लाभदायक तत्व पाए जाते हैं। जैसे-टिनोस्पोरिन, टिनोस्परिक एसिड, सिरिनजेन, शिलोइन, बरबेरियन आदि। यह स्वाइन फ्लू की रोकथाम में लाभदायक है। कुष्ठ, एलर्जी और सभी प्रकार के त्वचा विकारों में गिलोय लाभकारी है। इसमें सोडियम सेलिसिलेट होने के कारण अधिक मात्रा में दर्द निवारक गुण पाए जाते हैं। क्षय रोग उत्पन्न करने वाले 'माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस' जीवाणु की वृद्धि को यह सफलतापूर्वक रोकता है। एस्कनिशिया कोलाइ नामक रोगाणु जो मूत्रवाही संस्थान तथा आंत्र संस्थान को ही नहीं सारे शरीर को प्रभावित करता है, यह उसे जड़ से नष्ट कर देता है। गिलोय पीलिया, यकृत तंतुमयता और अन्य जिगर से संबंधित रोगों में बहुत प्रभावी हैं। गिलोय तथा शतावरी का क्वाथ पीने से श्वेत प्रदर में फायदा होता है। गिलोय सत् को आंवले के रस के साथ लेने से नेत्र रोगों में आराम मिलता है। इसकी बेल को हल्के से छीलने पर नीचे हरा, मांसल भाग होता है। इसका काढ़ा बनाकर पीने से यह शरीर के त्रिदोषों को नष्ट कर देता है। त्रिदोषों का अर्थ हमारा शरीर कफ, वात और पित्त द्वारा संचालित होता है। पित्त का संतुलन गड़बड़ाने पर पीलिया, पेट के रोग जैसी कई परेशानियां सामने आती हैं। कफ का संतुलन बिगड़े तो सीने में जकड़न, बुखार आदि दिक्कतें आती हैं। वात अगर असंतुलित हो गया तो गैस, जोड़ों में दर्द, शरीर का टूटना, असमय बुढ़ापा जैसी परेशानियां आती हैं, गिलोय का काढ़ा इन विकारों में लाभकारी है। इसको सोंठ के साथ खाने से गठिया रोग ठीक हो जाता है। सहायक प्राध्यापक, उद्यान विभाग, डॉल्फिन (पी. जी.) इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल एंड नेचुरल साइंसेस, मांडुवाला, देहरादून (उत्तराखंड)