कलौंजी एक औषधीय फसल है, जिसका प्रयोग विभिन्न प्रकार की परंपरागत दवाओं को बनाने में किया जाता है। यह डायरिया, अपच और पेट दर्द में काफी लाभदायक है। कलौंजी का उपयोग यकृत के लिए लाभकारी है। इसका प्रयोग सिर दर्द और माइग्रेन में भी किया जाता है। इसके बीज में 0.5 से 1.6 प्रतिशत तक आवश्यक तेल पाया जाता है, जो कि अमृतधारा इत्यादि औषधियों के बनाने में काम आता है। कलौंजी की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थ वाली बलुई दोमट मृदा अच्छी रहती है। पुष्पण और बीज के विकास के समय मृदा में उचित नमी का होना आवश्यक है। इसकी खेती के लिए कम से कम 5-6 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। यह फसल किसानों के लिए काफी लाभदायक है। उन्नत किस्में एन.आर.सी.एस.एस.एन.-1: यह प्रजाति 135 दिनों में तैयार हो जाती है। यह जड़गलन रोग के प्रति सहनशील है। इसकी उत्पादन क्षमता 12 क्विंटल/हैक्टर है। आजाद कलौंजीः यह 130 से 135 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता 8-10 क्विंटल/ हैक्टर है। एन.एस.-44: यह 140 से 150 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता 4.5-6.5 क्विंटल/हैक्टर है। एन.एस.-32: यह 140 से 150 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता 4.5-5.5 क्विंटल/हैक्टर है। अजमेर कलौंजीः यह 135 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता 8 क्विंटल/हैक्टर है। कालाजीराः यह फसल 135 से 145 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता 4-5 क्विंटल/ हैक्टर है। अन्य किस्में: राजेन्द्र श्याम एवं पंत कृष्णा। कलौंजी (काला जीरा) रनेनकुलेसी परिवार की बीजीय मसाला फसल है। इसका उत्पत्ति स्थान मेडिटेरियन क्षेत्र है और पश्चिमी एशिया से पूर्वी एशिया में इसका विस्तार हुआ। कलौंजी के उत्पादन में भारत, विश्व में प्रथम स्थान पर है। मध्य प्रदेश में रीवा, मंडला, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, नीमच और मंदसौर जिलों में इसको बहुतायत से उगाया जाता है। जलवायु उत्तर भारत में इसकी बुआई रबी की फसल के रूप में की जाती है। प्रारंभ में वानस्पतिक वृद्धि के लिए ठंडा मौसम अनुकूल होता है, जबकि बीज परिपक्व होते समय शुष्क एवं अपेक्षाकृत गर्म मौसम उपयुक्त होता है। भूमी की तैयारी यद्यपि कलौंजी को विभिन्न प्रकार की मृदा में उगाया जा सकता है, लेकिन पर्याप्त कार्बनिक पदार्थ वाली बलुई दोमट मृदा उत्तम होती है। मृदा, भुरभुरी एवं उचित जल निकास वाली होनी चाहिए।खेत की तैयारी के लिए एक गहरी जुताई तथा दो-तीन उथली जुताइयों के बाद पाटा लगाना पर्याप्त होता है। बआई से पूर्व खेत को सुविधानुसार छोटी-छोटी क्यारियों में बांट लेना चाहिए, ताकि सिंचाई के जल का फैलाव समान रूप से हो सके इससे बीज का जमाव एक समान होता है 5 और फसल अच्छी होती है। अगर मृदा में दीमक की समस्या है तो अंतिम जुताई के समय क्विनॉलफॉस 1.5 प्रतिशत अथवा मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत में से किसी एक दवा की 25 कि.ग्रा. मात्रा को प्रति हैक्टर की दर से खेत में एक समान बिखेर कर मिला दें। खरपतवार नियंत्रण जब फसल 30-35 दिनों की हो जाये, उसी समय कतारों से अतिरिक्त पौधों को भी निकाल देना चाहिए, ताकि फसल वृद्धि एवं विकास अच्छी तरह हो सके। दूसरी निराई-गुड़ाई 60-70 दिनों के बाद करनी चाहिए। इसके बाद अगर आवश्यक हो तो एक निराई और कर देनी चाहिए। रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डिमेथलिन दवा 1 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व को जमाव पूर्व 500-600 लीटर पानी में घोलकर मृदा पर छिड़काव करना चाहिए। इस विधि से अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि भूमि में पर्याप्त नमी हो। बुआई का समय उत्तर भारत में बुआई के लिए मध्य सितंबर से मध्य अक्टूबर सबसे अच्छा होता है। बीजदर सीधी बुआई के लिए 7 कि.ग्रा. बीज एक हैक्टर के लिए पर्याप्त होता है। बीजोपचार बीज को बुआई से पूर्व कैप्टॉन, थीरम व बाविस्टीन से 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. की दर से उपचारित करना चाहिए। बुआई की विधि कतार विधिः इस विधि में बीज की बुआई 30 सें.मी. की दूरी पर बनी कतारों में करनी चाहिए। बीज बोते समय यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि गहराई 2 सें.मी. से ज्यादा न हो अन्यथा बीज जमाव पर इसका असर पड़ता है। सिंचाई पुष्पण एवं बीज विकास के समय मृदा में उचित नमी का होना आवश्यक है।अच्छी पैदावार के लिए कल 5-6 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। फसल संरक्षण रोग नियंत्रण जड़ सड़नः यह रोग राइजोक्टोनिया और फ्यूजेरियम द्वारा संयुक्त रूप से उत्पन्न होता है। इस रोग में रोगग्रस्त पौधे पहले तो पीले दिखते हैं तथा बाद में पत्तियां सूख जाती हैं और पौधा मर जाता है। इससे बचाव के लिए बीज को बुआई से पूर्व ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए। गर्मी की जुताई एवं उचित फसलचक्र अपनाने से भी जड़ रोग का प्रकोप कम होता है। सड़न की रोकथाम माहूं (एफिड): इस कीट के वयस्क तथा प्रौढ़ फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। ये फसल के कोमल हिस्सों से रस चूसते हैं। इस कारण फसल की उपज घट जाती है। इसके नियंत्रण के लिए 0.1 प्रतिशत मैलाथियान (50 ई.सी.) अथवा 0.03 प्रतिशत डाइमेथोएट (30 ई.सी.) दवा के 500 लीटर घोल का प्रति हैक्टर की दर से प्रभावित फसल पर छिड़काव करना चाहिए। दीमकः यह कीट कलौंजी को काफी क्षति पहुंचाता है। दीमक फसल के विभिन्न भागों को खाकर हानि पहुंचाता है। इसकी रोकथाम के लिए 4 लीटर प्रति हैक्टर की दर से क्लोरोपाइरीफॉस को पानी में मिलाकर सिंचाई के साथ दें। खाद व उर्वरक भूमि की तैयारी के समय अच्छी प्रकार से सड़ी हुई गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट 10 क्विंटल प्रति हैक्टर की दर से खेत में मिला देनी चाहिए। सामान्य उर्वर क्षमता वाली भूमि में 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 20 कि.ग्रा. फॉस्फोरस तथा 20 कि.ग्रा. पोटाश का प्रति हैक्टर प्रयोग करना चाहिए। एक तिहाई नाइट्रोजन तथा सम्पूर्ण फॉस्फोरस मृदा में अंतिम जताई के समय मिला देनी चाहिए। शेष नाइट्रोजन को दो भागों में बांटकर बआई के 30 और 60 दिनों बाद खडी फसल में सिंचाई के साथ देना चाहिए। स्त्राेत : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर),आई.एस. नरूका’, पी.पी. सिंह’, जितेन्द्र भण्डारी’ और के.सी. मीणा, वैज्ञानिक, (मसाला एवं बागानी फसल). उद्यानिकी महाविद्यालय, मंदसौर-458002 (मध्य प्रदेश)