परिचय सत्य आलू बीज प्रवर्धन तकनीक विश्वभर में आलू की खेती, उद्योग और अनुसंधान कार्यों में क्रांति ला सकती है। अभी तक आलू की किस्मों का प्रबंधन कंद द्वारा किया जाता है। सत्य बीज(टीपीएस) अर्थात वानस्पतिक बीज के उपयोग से बीज भंडारण, रखरखाव, अपवाहन एवं अ विषाणुओं, कीटों तथा रोगों की समस्याओं से आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त लक्षित आनुवंशिक जोड़-तोड़ भी सरलता से संयुग्मीय पैतृक किस्मों में की जा सकती है, जिसके फलस्वरूप उच्चतम आलू प्रजातियों का विकास किया जा सकता है। विश्व के बहुत से देशों में आलू मुख्य खाद्याहार है। उच्च विषम युग्मीयता एवं पॉलीप्लॉइड जीनोम होने के कारण किस्म की शुद्धता बनाए रखने के लिए इन्हें कंदों के माध्यम से उगाया व बढ़ाया जाता है। आलू एक ऑटो टेट्राप्लोइड एवं स्वयं परागण प्रजाति है। स्वपरागण के कारण आलू की प्रजातियां अंतः प्रजनन अवसाद प्रदर्शित करती हैं, जिसका कारण प्रजातियों की उच्च विषम युग्मता है। स्वपरागण से जानलेवा एलील व्यक्त होने के कारण पौधे जीवित नहीं रहते हैं। अतः समयुग्मक किस्मों को चतुगुर्णित आलू में विकसित नहीं किया जा सकता एवं किस्मों और उन्नत प्रजनन सामग्री का रखरखाव केवल कंद के रूप में किया जाता है। किस्म एवं अन्य प्रजनक किस्मों का कंदों के रूप में कृन्तक प्रवर्धन के माध्यम से रखरखाव के कारण कीट एवं रोगों, मुख्य रूप से विषाणुओं का संचयन होता है। यह क्लोनल प्रवर्धन के प्रत्येक चक्र के दौरान बढ़ता जाता है। इस कारण किस्म की उत्पादकता एवं स्वीकार्यता में कमी आती है। इसके अतिरिक्त आल प्रजनन कार्यक्रम के माध्यम से नई किस्म विकसित करने में 12 वर्षों का समय लगता है एवं यह कंदों के क्लोनल प्रवर्धन पर आधारित होती है। किस्म के बीज भी कंदों के माध्यम से क्लोनल रूप से बढ़ते हैं. जहां बीजों की गुणनदर लगभग 1:8 कंद प्रतिवर्ष होती है। टीपीएस से आलू को उगाने एवं बढ़ाने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास जारी हैं। द्विगुणित संकर आलू प्रजनन द्विगुणित संकर सत्य बीज आलू के माध्यम से आलू का प्रवर्धन एक पूर्ण रूपसे नवीन प्रजनन विधि है, जो नीदरलैंड में विकसित हुई थी। इसे भारत सहित सभी आलू उत्पादक देशों द्वारा अपनाने का प्रयास किया जा रहा है। नवीन द्विगुणित संकर प्रजनन तकनीक लैंगिक प्रवर्धन के माध्यम से कार्य करती है। यह विधि द्विगुणित खेती वाली प्रजातियों एवं सोलानम ट्यूबरोसम के द्विगुणित की पहचान एवं मूल्यांकन पर आधारित है। इसमें स्वीकार्य कंद एवं अन्य पादप संबंधी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए चयन किया जाता है। द्विगुणित आलू प्राकृतिक रूप से आत्म-विसंगत होते हैं। उन्हें आत्म-संगत बनाने के लिए द्विगुणित क्लोन में एस.एल.आई जीन का अनुक्रमण किया जाता है एवं समयुग्मीय द्विगुणित किस्म प्राप्त करने के लिए कुछ पीढ़ी तक इसका स्वपरागण किया जाता है। द्विगुणित समयुग्मीय अंत:प्रजनन किस्मों का विभिन्न कंदों, पादप एवं अनुकूलन संबंधी लक्षणों के लिए मूल्यांकन किया जाता है। कार्यक्षम किस्म में मौजूद दोनों पैतृक किस्मों से वांछित जीन प्राप्त करने के लिए एफ संकर सम्मिश्रण के लिए चयनित किया जाता है। सम युग्मीय द्विगुणित किस्म का विकास एक उत्तरोत्तर प्रक्रिया है, जिसमें विभिन्न क्रॉसिंग एवं चयन संबंधी चक्र सम्मिलित होते हैं। इसके पश्चात इन संकर सम्मिश्रण का परीक्षण नई प्रजाति प्राप्त करने के लिए किया जाता है, जो दोनों पैतृक किस्मों के सर्वोत्तम विशेषताएं प्रदर्शित करते हैं। इन दो पैतृक किस्मों के लैंगिक संकरण के परिणामस्वरूप कुछ आलू कंदों की बजाय प्रति पादप हजारों आलू के सत्य बीज प्राप्त होते हैं। अतः नवीन किस्म की बढोतरी तेजी से हो पाती है। लैंगिक संकरण से प्राप्त प्रजाति एक मूल सत्य बीज होता हैं। ये रोगों से मुक्त होते हैं एवं विश्व के समस्त आलू उत्पादकों के लिए उत्कृष्ट बीज सामग्री है। इन संकर आलू बीज को बुआई करके इसके छोटे पौधे प्राप्त किए जा सकते हैं। इन पौधों को व्यावसायिक खेती के लिए प्रक्षेत्रों में प्रत्यारोपण किया जा सकता है। यह तकनीक हमें विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नई किस्म के तेजी से विकास का अवसर प्रदान करती है। इस विधि में हम पैतृक किस्मों में सुधार करके तेजी व आसानी से लक्षित नई प्रजातियां प्राप्त कर सकते हैं। आलू प्रजनन में टीपीएस आधारित द्विगणित संकरण के प्रयोग से आलू प्रजनन में अत्यधिक जेनेटिक लाभ होगा। अर्द्धसूत्री विभाजन जीन संपादन के माध्यम से किस्म विशिष्ट सत्य आलू बीज विषयम युग्मता के नियतन द्वारा भी सत्य बीज आलू का प्रवर्धन सामग्री के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। इसके अंतर्गत वियोजन रहित सामान्य पैतृक प्रकार चतुर्गुणित पादप प्राप्त करने के लिए अनियोजित यम्मक का उत्पादन कर अगणित प्रेरक किस्म का प्रयोग किया जाता है। यह क्रिस्पर-कैस जीनोम संपादन उपकरणों के प्रयोग से अर्द्धसूत्री विभाजन में शामिल मुख्य जीन की अभिव्यक्ति को बाधित कर किया जा सकता है, जिससे अप अर्धसूत्री विभाजन वाले बीजों को विकसित किया जा सके। इस प्रक्रिया में कोशिका विभाजन के पुनर्संयोजन एवं वियोजन चरणों में शामिल तीन जीनों में बदलाव के द्वारा आलू में अर्द्धसूत्री विभाजन प्रक्रिया को लक्षित करना शामिल है। इससे अनियोजित युग्मकों का उत्पादन होता है। अनियोजित युग्मकों का उत्पादन करने वाले पादपों का अगणित प्रेरक किस्मों से संकरण । किया जाता है। इससे सामान्य बहुगुणित पैतृक प्रकार के सत्य आलू बीज प्राप्त होते हैं। इस । नई परिकल्पना के परिणामस्वरूप सत्य आल बीज उत्पादन में विषम युग्मता का नियतन किया जा सकता है।