भारत में उगाये जाने वाले फलों में संतरा (सिट्रस रेटिकुलाटा ब्लेन्को) एक मुख्य व्यावसायिक फल है। यह देश में उगाये जाने वाले फलों के अंतर्गत कल क्षेत्रफल में 4 प्रतिशत तथा कुल उत्पादन में 2.5 प्रतिशत का अंशदान करता है। संतरे को नारंगी के नाम से भी जाना जाता है तथा यह रूटेसी कुल का पौधा है। इसका प्रयोग अधिकांशतः ताजा खाने में किया जाता है तथा इसके फलों से शर्बत, मार्मलेड, स्क्वेश आदि बनाए जाते हैं। छिलके से प्राप्त तेल प्रसाधन सामग्री. साबन, इत्र व औषधीय सामग्री के उत्पादन में उपयोगी हैं। इसके रस में हेस्पेरेडीन नामक कैंसर अवरोधी तत्व पाया जाता है। इसके समुचित प्रयोग से मनुष्य में कैंसर रोग की आशंका कम होती है। इस लेख में संतरे में लगने वाले प्रमुख कीटों का विवरण दिया गया है। संतरे के प्रमुख कीट नीबू की तितली/लेमन बटर फ्लाई इसे स्थानीय भाषा में संतरे की चितकबरी इल्ली के नाम से जाना भी जाता है। यह एक तितली है, जिसकी इल्लियां संतरे व नीबूवर्गीय पौधों की पत्तियां खाती हैं। इसकी सूंडियां पत्ती के बीच की शिरा को छोड़कर सम्पूर्ण पत्ती को खा जाती हैं। अण्डों से निकलने के तुरन्त बाद लटें पत्तों को खाने लगती हैं तथा नुकसान पहुंचाती हैं। शुरुआती अवस्था में ये चिड़ियों की बीट की तरह दिखती हैं, जो बाद में पत्ती के समान रंग रूप की हो जाती हैं। छोटे पौधों या नर्सरी में इसका नुकसान ज्यादा देखा गया है। यह कीट नीबूवर्गीय फसलों में वर्षभर नुकसान पहुंचाता है, लेकिन जुलाई-अगस्त में अधिक सक्रिय रहता है। यह कीट छोटे पौधों को पत्तीविहीन कर देता है। रोकथाम संडियों को इकट्ठा कर मिट्टी के तेल मिले पानी में डालकर नष्ट करें। कीट की लार्वा अवस्था में क्लोरोपायरीफॉस 3 मि.ली. प्रति लीटर या क्यूनालफॉस (25 ई.सी.) 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें। पर्ण सुरंगक कीट इस कीट का प्रकोप मार्च व सितंबर में अधिक होता है। यह कीट नर्सरी एवं बगीचे दोनों जगह नुकसान पहुंचाता है। इस कीट का लार्वा पत्ती की सतह के अंदर टेढ़ी-मेढ़ी सुरंग बनाता है, जो चांदी के रंग की तरह चमकती दिखाई देती है। प्रभावित पत्तियां किनारों से अंदर मुड़ जाती हैं और इससे नई बढ़वार प्रभावित होती है। बादामी सफेद रंग का वयस्क इस कीट की मुख्य पहचान है। नियंत्रण इसके प्रकोप होने पर क्यूनालफॉस (25 ई.सी.) 2 मि.ली. या इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।फल मक्खी स्थानीय भाषा में इसे फलछेदक मक्खी के नाम से जाना जाता है। यह कीट बारिश के मौसम में अधिक सक्रिय रहता है। यह कीट फलों में छेद करके अण्डे देता है, जिनसे निकलने वाले लार्वा फल के अंदर गूदा खाते हैं। इससे फल संक्रमित होकर सड़ने लगते हैं व झड़ने लगते हैं। फल पकने के बाद पेड़ पर अधिक समय तक रहने से इस कीट का प्रकोप बढ़ने की आशंका अधिक रहती है। रोकथाम इसके लिए क्षतिग्रस्त फलों को एकत्र कर जमीन में दबा दें। पेड़ों के नीचे तने के चारों तरफ गहरी जुताई करें और कार्बोरिल कीटनाशी जमीन में मिलाएं। इसका प्यूपा जमीन में छुपा रहता है। फल मक्खी के नियंत्रण के लिए मैलाथियॉन 0.05 प्रतिशत व शक्कर एक प्रतिशत युक्त विषघोलक फल पकने के पूर्व 2 से 10 दिनों के अंतराल पर बाग में रखें। मिलीबग यह एक सफेद रंग का कीट होता है, जो नर्सरी व बढ़ते पौधों को अत्यधिक नुकसान पहुंचाता है। यह वसंत व पतझड़ वाले मौसम में अधिक सक्रिय रहता है। यह पौधे की कोमल पत्तियों का रस चूसकर उन्हें नुकसान पहुंचाता है, जिससे मुलायम प्ररोह मुड़कर गांठनुमा व कुंडलीनुमा बन जाते हैं। यह कीट शहदनुमा चिपचिपा पदार्थ स्रावित करता हैऔर इसके परिणामस्वरूप काली फफूंद पैदा हो जाती है। रोकथाम इसके लिए डाइमिथोएट 1.5 मि.ली. या मैलाथियॉन 2.0 मि.ली. का प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें। पेड़ के तने के चारों तरफ मिट्टी में क्लोरोपायरीफॉस मिलाएं या उसका छिड़काव करें। थ्रिप्स यह कीट फल, पत्ती, प्ररोह तथा विकसित होते फलों का रस चूसकर उन्हें निम्फ अवस्थाएं हानिकारक होती हैं। इसके प्रकोप से पत्तियां कप की आकृति की तथा चमड़ानुमा हो जाती हैं। पत्तियों की मध्य शिरा के समानान्तर दो सफेद धारियां व फल की गर्दन पर सफेद रिंग इसकी मुख्य पहचान है। रोकथाम इसके लिए क्यूनालफॉस या डाइमिथोएट 1.0 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर पेड़ पर तथा इसके आसपास छिड़काव करें। माइट इन्हें स्थानीय भाषा में लाल कीड़ी या चिचड़ी कहा जाता है। ये बहुत ही छोटे कीट होते हैं और आंखों से दिखाई भी नहीं देते हैं। ये फलों की त्वचा से रस चूसते हैं, जिससे त्वचा का रंग लाल-भूरे से बैंगनी रंग हो जाता है। गर्मी के मौसम में पानी की कमी होने पर इनका प्रभाव अधिक देखा गया है। रोकथाम इनके लिए मार्च-अप्रैल या जून-जुलाई के महीने में क्यूनालफॉस (25 ई.सी.) 1.0 मि.ली. या डाइकोफॉल 1.5 मि.ली. या ऑक्सीडेमेटॉन मिथाइल 1.5 मि.ली. का प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। फल चूषक पतंगा इसे स्थानीय भाषा में फलछेदक कीट के नाम से जाना जाता है। ये कीट रात्रि के समय आक्रमण करते हैं तथा दिन के समय छिपे रहते हैं। यह फलों में सुराख करके रस चूसता है, जिससे छेद के चारों तरफ से फल गोलाई में गला हुआ सा दिखता है, जो कि इसकी मुख्य पहचान है। सुबह होने से पूर्व ये कीट छिप जाते हैं। नियंत्रण इसके नियंत्रण के लिए सितंबर- अक्टूबर में विष चुग्गा, जिसमें मैलाथियान (डब्ल्यू. पी.) 20 ग्राम व 200 ग्राम गुड़ या सिरका या फल रस को 2 लीटर पानी में मिलाकर बाग में जगह-जगह पौधों पर लटका दें। फल परिपक्वता के समय रात्रि में प्रकाश पाश का प्रयोग करें। बाग को साफ-सुथरा रखें तथा परपोषी पौधों को नष्ट कर दें। झड़कर गिरे हुए फलों को एकत्र कर जमीन में दबा दें। अगर कीट का प्रकोप ज्यादा हो. तो बरसात वाली फसल नहीं लेनी चहिए। कुंडलीनुमा बन जाते हैं। यह कीट शहदनुमा चिपचिपा पदार्थ स्रावित करता है साइला ये कीट नई शाखाओं, पत्तियों तथा फूल कलिका का रस चूसकर उन्हें कमजोर बनाते हैं। इस कीट के निम्फ तथा प्रौढ़ झुंड में रहकर नुकसान पहुंचाते हैं। इसके निम्फ शहद जैसा पदार्थ उत्सर्जित करते हैं और इस पर काली मस्सी उग जाती है। यह कीट पौधे के अंदर एक जहरीला पदार्थ छोड़ता है, जिससे डाइबैक रोग हो जाता है। इसके साथ ही यह कीट ग्रीनिंग नामक रोग को फैलाने में वाहक का कार्य करता है। रोकथाम इसके लिए मार्च-अप्रैल या जून-जुलाई में क्यूनालफॉस (25 ई.सी.) 1.0 मि.ली. या डाइमिथोएट 2.0 मि.ली. या मेटासिस्टॉक्स 2.0 मि.ली. या प्रोफेनोफॉस 2.0 मि.ली. का प्रति लीटर पानी में घोलकर 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें। काली मक्खी इसे स्थानीय भाषा में काली मस्सी के नाम से जाना जाता है। यह बहुत ही हानिकारक काले रंग का सूक्ष्म कीट होता है, जो पत्तियों की निचली सतह से रस चूसकर उन्हें नुकसान पहुंचाता है। इसकी निम्फ तथा प्रौढ़ दोनों अवस्थाएं ही हानिकारक होती हैं। नई फुटान वाली पत्तियों पर इस कीट के पीले रंग के हजारों की संख्या में अण्डे व प्रौढ़ पाए जाते हैं। ये कीट शहद की तरह एक चिपचिपा पदार्थ छोड़ते हैं, जो बाद में काली फफूंद के रूप में पत्तियों पर जम जाता है। मौसम में आर्द्रता अधिक होती है, तो यह काली फफूंद तीव्र गति से बढ़ती है, जिससे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बाधित होकर पौधों की बढ़वार रुक जाती है। रोकथाम इस कीट की रोकथाम के लिए प्रकोप शुरू होते ही जुलाई के दूसरे तथा दिसंबर व अप्रैल के प्रथम सप्ताह में 15 दिनों के अंतराल पर दो छिड़काव क्यूनालफॉस (25 ई.सी.) 1.5 मि.ली. या डायमिथोएट 2.0 या प्रोपेनोफॉस 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से करें। कैप्नोडियम (काली फफंद या कज्जली रोग) से बचाव के लिए 2 ग्राम का कार्बेन्डाजिम अथवा कॉपर ऑक्साक्लोराइड प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। मोयला स्थानीय भाषा में इसे भूरा या काला मच्छर कहा जाता है। यह एक भूरे रंग का कीट होता है, जो कोमल पत्तियों या प्ररोह का रस चूसकर उन्हें कमजोर बना देता है। इसका प्रकोप दिसंबर से मार्च तक रहता है। इससे प्रभावित पत्तियां ऊपर की तरफ मुड़ जाती हैं तथा प्ररोह व पौधे की वृद्धि रुक जाती है। यह कीट ट्रिसटेजा वायरस को फैलाने में वाहक का कार्य करता है। रोकथाम इसके लिए क्यूनालफॉस (25 ई.सी.) 1.5 मि.ली. या डाइमिथोएट 2.0 मि.ली. या मैलाथियॉन 2.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर एक सप्ताह के अंतराल पर छिड़काव करें।