शिमला मिर्च, जिसे मीठी मिर्च या बेल मिर्च के रूप में भी जाना जाता है, पूरे भारत में उगाई जाने वाली लोकप्रिय सब्जियों में से एक है। इसके 100 ग्राम में विटामिन ‘ए’ (8493 आईयू), विटामिन ‘सी’ (283 मि.ग्रा.), कैल्शियम (13.4 मि.ग्रा.), मैग्नीशियम (14.9 मि.ग्रा.), फॉस्फोरस (28.3 मि.ग्रा.) और पोटेशियम, (263.7 मि.ग्रा.) होता है। इस फसल को 50-60 प्रतिशत की सापेक्ष आद्रर्ता के साथ 25-30 डिग्री सेल्सियस दिन के तापमान और 18-20 डिग्री सेल्सियस रात के तापमान की आवश्यकता होती है। यदि तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है या 12 डिग्री सेल्सियस से नीचे गिर जाता है, तो फल बनना प्रभावित होता है। देश में शिमला मिर्च के वार्षिक मौजूदा उत्पादन 3.21 लाख मीट्रिक टन के साथ 24,000 हैक्टर भूमि पर इसकी खेती की जा रही है। बाजार में इसकी विभिन्न किस्मों की बढ़ती मांग के साथ, यह उम्मीद की जाती है कि इस सब्जी के उत्पादन के क्षेत्र में विस्तार की गुंजाइश होगी। शिमला मिर्च के उत्पादन में भारत का स्थान चौथा है। संरक्षित खेती के फायदे शिमला मिर्च एक ठंडे मौसम की फसल है, लेकिन इसे संरक्षित सरंचनाओं का उपयाेग करके वर्षभर उगाया जा सकता है। संरक्षित वातावरण में तापमान और सापेक्षिक आर्द्रता में परिवर्तन किया जा सकता है। शहरी बाजारों में रंगीन शिमला मिर्च की बहुत मांग है। परंपरागत रूप से उगाई गई हरी शिमला मिर्च, किस्म और मौसम के आधार पर, आमतौर पर लगभग 4-5 महीनों में प्रति हैक्टर 20-40 टन उपज देती है। ग्रीनहाउस में, हरे और रंगीन शिमला मिर्च की फसल अवधि लगभग 7-10 महीने और पैदावार लगभग 80-100 टन प्रति हैक्टर होती है। संरक्षित वातावरण पौधों को बढ़ने के लिए बेहतर जलवायु प्रदान करता है। यह बारिश, हवा, उच्च तापमान से बचाता है और कीटों और रोगों के नुकसान को कम करता है। इससे गुणवत्ता और उपज में सुधार होती है। खुली खेती की तुलना में वर्ष-दर-वर्ष उत्पादन 2-3 गुना तक पैदावार में वृद्धि के साथ होता है। खेती के लिए संरक्षित संरचनाएं ग्रीनहाउस प्रचलित स्थानीय जलवायु परिस्थितियों के आधार पर बनाया जाता है। संरक्षित खेती के लिए विभिन्न प्रकार की संरचनाओं का निर्माण किया जाता है। हमारे देश में शिमला मिर्च उगाने के लिए लागत प्रभावी पॉलीहाउस और नेटहाउस संरचनाएं सबसे अधिक उपयोग की जाती हैं। नेटहाउस नेटहाउस में सब्जियां उगाना दक्षिणी राज्यों के कई हिस्सों में और विशेष रूप से बेंगलुरु के आसपास लागत प्रभावी तरीका है। पॉलीहाउस पॉलीहाउस बारिश के पानी के प्रवेश से बचने के कारण नेटहाउस की तुलना में बेहतर सुरक्षा देता है। इसलिए पत्ती रोगों को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। नेटहाउस की तुलना में पॉलीहाउस में पैदावार आमतौर पर 15-20 प्रतिशत अधिक होती है। संरक्षित दशा में खेती करने को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार की एम.आई.एचडी. (एन.एच.वी.) द्वारा विभिन्न संरचनाओं के लिए 50-70 प्रतिशत तक अनुदान लघु और मध्यम जोत वाले किसानों को दिया जा रहा है। प्राकृतिक रूप से हवादार पॉलीहाउस की लागत 800-900 रुपये प्रति वर्गमीटर, जबकि कीटरहित नेटहाउस की लागत लगभग 650-700 रुपये प्रति वर्गमीटर है। संरक्षित दशा में शिमला मिर्च की खेती की योजना अधिक उपज तथा गुणवत्तायुक्त उत्पादन के लिए निम्नलिखित बातों पर अवश्य ध्यान देना चाहिएः शिमला मिर्च की किस्में आमतौर पर उगाई जाने वाली किस्मेंः इंद्रा, बॉम्बे, ओरोबेल तथा स्वर्ण नर्सरी तैयार करना बेहतर पौध तैयार करने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों की आवश्यकता होती है। प्रो-ट्रे को रोगाणुहीन कोकोपिट से भरा जाता है और बीज बोया जाता है, प्रति सेल एक बीज और उसी मीडिया के साथ 1/2 सें.मी. की गहराई तक कवर किया जाता है। भरे हुए ट्रे को एक के ऊपर एक रख देते हैं और बीज के अंकुरण तक प्लास्टिक की चादर से ढक दिया जाता है। बीज, बुआई के लगभग एक सप्ताह के बाद अंकुरित होते हैं बीजों की रोपाई से पहले इमिडाक्लोप्रिड 0.2 मि.ली./लीटर और क्लोरोथेलेानिल/1 ग्राम/लीटर का छिड़काव करें। भूमि की तैयारी खेत अच्छी तरह से जुताई करके मृदा को अच्छी तरह से ढकना चाहिए। अच्छी तरह से विघटित जैविक खाद को 20-25 कि.ग्रा. प्रति वर्गमीटर की दर से मृदा में मिलाया जाता है। क्यारियां 4 प्रतिशत फार्मेल्डिहाइड (4 एल/एम 2 बेड (4L में M2 of bed ) का उपयोग करके भीग जाती हैं और काले पॉलीथीन पलवार शीट से गीला करके ढकते हैं।फॉर्मेलिन का उपयोग करते समय मास्क, दस्ताने और एप्रन पहनने पर ध्यान देना चाहिए। उर्वरक 20:25:20 एनपीके की एक प्रारंभिक उर्वरक खुराक प्रति एकड़ की आवश्यकता होती है। 80 कि.ग्रा. कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट, 125 कि.ग्रा. सुपर फॉस्फेट और 32 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश या 40 कि.ग्रा. सल्फेट रोपाई से पहले क्यारी पर समान रूप से दिया जाता है। सिंचाई साप्ताहिक या 10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। प्लास्टिक पलवार पलवार, शिमला मिर्च फलों को अधिक क्लोरोफिल-ए, क्लोरोफिल-बी और कुल क्लोरोफिल सामग्री के साथ उत्पादन करने में मदद करती है। इससे फलों का उत्पादन तथा प्रति पौधा फलों की संख्या में भी वृद्धि होती है। वृद्धि और उपज पर प्लास्टिक पलवार का जबरदस्त प्रभाव पड़ता है और काली प्लास्टिक पलवार खरपतवार की वृद्धि को रोकने में मदद करती है। इससे फलों की पैदावार में वृद्धि होती हैं। खरपतवार नियंत्रण 30वें दिन एक बार निराई करनी पड़ती है। तुड़ाई पकने से पहले हरे फलों को तोड़ लें। शिमला मिर्च की फसल तुड़ाई के लिए सुबह का समय सबसे उपयुक्त होता है। हरी शिमला मिर्च की फसल रोपाई के 55 से 60 दिनों बाद, पीली शिमला मिर्च 70-75 दिनों पर और लाल शिमला मिर्च 80-90 दिनों में परिपक्व हो जाती है। पीले और लाल रंग के फलों की तुड़ाई तब की जा जाती है, जब उनके रंग के विकास में 22 से 50-80 प्रतिशत की वृद्धि हुई हो। तुड़ाई के बाद फलों को ठंडी जगह पर रखना चाहिए और धूप के सीधे संपर्क में आने से बचाना चाहिए। उच्च गुणवत्ता युक्त पैदावार के लिए सुझाव उच्च गुणवत्ता की पैदावार पाने के लिए ग्रीनहाउस में शिमला मिर्च की देखभाल के कुछ विशेष तरीके नीचे दिए गए हैंः जैविक खाद की उचित और पर्याप्त आपूर्ति मृदा को अच्छी माइक्रोबियल उपचार के साथ दी जानी चाहिए कीटों के हमले को कम करने के लिए ग्रीनहाउस कवर की सुरक्षा के लिए देखभाल की जानी चाहिए। ग्रीनहाउस को एक संरक्षित वातावरण बनाए रखने के लिए एक डबल डोर सिस्टम द्वारा सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। अंकुर को कुछ वृद्धि प्राप्त करने के बाद ही प्रत्यारोपित किया जाना चाहिए। नियमित कटाई-छंटाई पौधों के उत्पादन को बढ़ाने में मदद कर सकती है। स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका, डिम्पल,पी.एच.डी. शोध छात्रा जितेन्द्र राजपूत ,प्राध्यापक, मृदा और जल अभियांत्रिकी विभाग, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर-313001 (राजस्थान) और एस.आर. भाकर,वैज्ञानिक, कृषि अभियांत्रिकी विभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली।