ब्रोकोली, रेड कैबेज एवं सलाद रबी मौसम में उगाई जाने वाली प्रमुख विदेशी सब्जी फसलें हैं। ब्रोकोली विटामिन-‘ए’, विटामिन-‘सी’ और खनिज लवण जैसे-कैल्शियम, पोटेशियम, फॉस्फोरस तथा आयरन का अच्छा स्रोत है। रेड कैबेज में खनिज लवण, विटामिन-‘ए’ तथा पोटेशियम की मात्रा सामान्य पत्तागोभी की तुलना में ज्यादा होती है। इसका उपयोग सलाद, सलाद की सजावट तथा मंचूरियन गोभी के रूप में किया जाता है। ब्रोकोली एवं रेड कैबेज कैंसर, आघात और हृदय रोगों के जोखिम को कम करने के साथ-साथ रक्तचाप को सामान्य बनाए रखने तथा रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने में भी सहायक होती हैं। सलाद एक लोकप्रिय पत्तेदार सब्जी है। इसकी पत्तियों में विटामिन-‘ए’, विटामिन-‘सी’, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और बहुत से खनिज पदार्थ पर्याप्त मात्रा में होते हैं। यह सब्जी बर्गर में प्रचुर मात्रा में इस्तेमाल होती है। उन्नत किस्में ब्रोकोली की प्रमुख उगाई जाने वाली किस्में-पूसा ब्रोकोली के.टी. ऐस-1, पालम समृद्ध, पालम कंचन तथा पालम विचित्रा हैं। रेड कैबेज की प्रमुख किस्में, रेड कैबेज तथा रेड ड्रमहेड कैबेज हैं। सलाद की भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख किस्में, ग्रेट लेक्स, चाइनी येलो तथा आइसबर्ग हैं। इनके अतिरिक ब्रोकोली एवं रेड कैबेज में संकर किस्में भी उपलब्ध हैं, जिनका खेती के लिए चयन किया जा सकता है। तापमान ब्रोकोली की अच्छी वृद्धि के लिए औसत तापमान 18-23 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त माना जाता है। रेड कैबेज के सफल उत्पादन के लिए 15-20 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। तापमान 25 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा होने पर इसकी वृद्धि दर कम हो जाती है। सलाद की वृद्धि के लिए औसत तापमान 12-20 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त होता है। तापमान 27 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने पर सलाद में शीर्ष बनने की प्रक्रिया तथा पौधे की गुणवत्ता प्रभावित होती है। खेत का चयन एवं तैयारी वैसे तो इन फसलों को विभिन्न प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है, परंतु सफल उत्पादन के लिए रेतीली-दोमट मृदा, जिसका पी-एच मान 6.0 से 6.5 तथा उच्च कार्बनिक पदार्थयुक्त मृदा अच्छी होती है। उच्च कार्बनिक पदार्थयुक्त मृदा, उत्पादन के साथ-साथ उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ाने में भी सहायक रहती है। अच्छी प्रकार से सड़ी हुई 20-25 टन गोबर की खाद खेत की तैयारी से 25-30 दिनों पहले खेत में डालनी चाहिए। मृदा में किसी भी पोषक तत्व की कमी को जानने के लिए मृदा परीक्षण करायें तथा जांच के अनुसार सूक्ष्म पोषक तत्वों का इस्तेमाल करें। बीज दर एवं पौध तैयार करना ब्रोकोली के लिए 400-500 ग्राम, रेड कैबेज के लिए 600-700 ग्राम तथा सलाद के लिए 500 ग्राम बीज प्रति हैक्टर पर्याप्त रहता है। इन फसलों की पौध तैयार करने के लिए पौधशाला में बीज की बुआइ मध्य सितम्बर-अक्टूबर के दौरान कर सकते हैं। बीज उपचार फफूंदनाशक दवा (थीरम या कैप्टॉन) 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. की दर से करें। पौधशाला में पौध उठी हुई क्यारियों पर तैयार करना चाहिए। इन क्यारियों की लंबाई कम से कम 3 मीटर व चैड़ाई 0.6 मीटर रखनी चाहिए।बीजों की बुआई पंक्तियों में करें तथा बुआई की गहराई 1.5-2.0 सें.मी. रखें। बीज को बोने के बाद गोबर की खाद व मृदा के मिश्रण से ढककर हजारे की सहायता से हल्की सिंचाई करनी चाहिये। यदि संभव हो तो क्यारियों को पुआल या सूखी घास से जमाव आने तक ढक देना चाहिये। इससे क्यारियों में नमी बनी रहती है तथा बीजों का एक समान जमाव होता है। रेड कैबेज तथा ब्रोकोली की पौध 28-30 दिनों तथा सलाद की पौध् 35-38 दिनों में रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। खाद एवं उर्वरक खाद व उर्वरकों का प्रयोग करने से पहले निकटतम कृषि विज्ञान केंद्र या जिला कृषि विभाग की मृदा प्रयोगशाला से मृदा की जांच करवा लेनी चाहिए। मृदा की जांच के अनुसार उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। बुआई पूर्व लगभग 20-25 टन प्रति हैक्टर अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग इन फसलों के लिए करना चाहिए। कच्ची गोबर की खाद का प्रयोग न करें। यह दीमक को आमंत्रित करती हैं। उर्वरकों का प्रयोग अनुशंसा के अनुसार नाइट्रोजन की मात्रा 100 कि.ग्रा., फॉस्फोरस की 60 कि.ग्रा. तथा पोटेशियम 50 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से करना चाहिए। सिंचाई सामान्यतः इन फसलों में 10-12 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिये। बूंद-बूंद सिंचाई विधि से इन फसलों की सिंचाई की जा सकती है। इससे पानी की बचत 30-40 प्रतिशत तक होती है व पानी में घुलनशील उर्वरक (एनपीके 19:19:19) भी सिंचाई के साथ दिये जा सकते हैं। खरपतवार नियंत्रण ब्रोकोली, रेड कैबेज एवं सलाद की अच्छी बढ़वार के लिए प्रारम्भिक अवस्था में खरपतवार नियंत्रण अत्यधिक आवश्यक है। फसल की अच्छी बढ़वार की अवस्था में खरपतवार कम हो जाते हैं। खरपतवार इन फसलों से पानी, प्रकाश एवं पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। ये कीट व रोग को शरण देते हैं। इससे फसलों की उपज में 20-80 प्रतिशत तक कमी हो जाती है। खरपतवार फसलों में शुरुआती 4-6 सप्ताह तक अधिक नुकसान करते हैं। पहली दो सिंचाई के बाद हल्की निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमिथेलीन (30 ई.सी.) 400 मि.ली. की मात्रा का प्रति एकड़ को 200 लीटर पानी में रोपाई से पहले छिड़काव करें। कटाई एवं उपज ब्रोकोली में जब हेड सामान्य आकार का हो जाए, तब तुड़ाई कर लेनी चाहिए। हाथ से छूने पर मजबूत व कठोर लगे परन्तु दरारें पड़ने व फटन शुरू होने से पहले इसकी तुड़ाई कर लेनी चाहिए। सामान्यतः रोपाई के 60-65 दिनों बाद हेड तैयार होने आरम्भ हो जाते हैं। सलाद की कटाई जब पत्तियां आवश्यक आकार की हो जाएं, तब की जानी चाहिए। मुख्यतः इन फसलों की उपज किस्मों, उगाये गए मौसम, प्रबंधन क्रियाओं आदि पर निर्भर करती है। अगर इन किस्मों की बुआई समय पर की गयी हो व कीट एवं रोग का प्रबंधन अच्छे से किया गया हो, तो रेड कैबेज से 20-25 टन, ब्रोकोली से 15-20 टन तथा सलाद से 8-12 टन प्रति हैक्टर उपज प्राप्त की जा सकती है। भण्डारण ब्रोकोली, रेड कैबेज एवं सलाद की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए इसका भण्डारण रेप्रफीजरेटर में 4-6 डिग्री सेल्सियस पर करना चाहिए। इससे श्वसन क्रिया कम हो जाती है और विटामिन-‘सी’ की मात्रा भी बनी रहती है, जिससे लंबे समय तक बिना नुकसान के सुरक्षित रखा जा सकता है। इनको और अधिक लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए प्लास्टिक में लपेटकर भी रखा जा सकता है। इससे श्वसन क्रिया लगभग रुक जाती है तथा ये मोल्ड की वृ(ि को रोक देता है व इसको सड़ने से बचाता है। फसल अन्तरण ब्रोकोली की फसल में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सें.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 30 सें.मी. रखनी चाहिए। रेड कैबेज के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सें.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 30-45 सें.मी. रखनी चाहिए। सलाद के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-45 सें.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 20-30 सें.मी. रखनी चाहिए। कीट एवं रोग प्रबंधन विदेशी सब्जियों की फसलों में कीटों व रोगों का प्रकोप कम होता है। खेत फसल में साफ-सफाई रखनी चाहिए, जिससे रेड कैबेज के प्रमुख कीटों जैसे-डायमंड बैक मोथ व माहूं का प्रकोप कम से कम हो। इस प्रकार के कीटों के लार्वा खेत में दिखाई दें, तो तुरंत पौधों की पतियों को तोड़कर उनको नष्ट कर देना चाहिए। खेत के एक किनारे में गहरा गड्ढ खोदकर उनको दबा देना चाहिए। कीटों का प्रकोप अधिक हो, तो कीटनाशक जैसे-स्पाइनोसेड 50 मि.ली. प्रति एकड़ का फसलों में छिड़काव किया जा सकता है। किसी खेत में पहले वर्ष में ब्रोकोली, रेड कैबेज एवं सलाद उगाई गई हो, तो उस खेत में अगले वर्ष में इन सभी फसलों की खेती नहीं करनी चाहिए। पुरानी फसल के अवशेष विभिन्न प्रकार के कीटों को शरण देते हैं। मृदुल आसिता तथा सलाद मोजेक वायरस, सलाद के प्रमुख रोग हैं। मृदुल आसिता से पत्तियों की निचली सतह पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए डायथेन एम-45, 2.5 ग्राम अथवा रिडोमिल 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। सलाद मोजेक वायरस के नियंत्राण के लिए रोगमुक्त बीज तथा रोगरोधी किस्मों का प्रयोग करना चाहिए। स्त्रोत : फल-फूल पत्रिका(आइसीएआर),गोगराज सिंह जाट, जोगेन्द्र सिंह, सचिन कुमार और बी.एस. तोमर ’शाकीय विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली-110012