उपयोग ताजे करी पत्तों का महत्व दक्षिण-पूर्व एशिया के व्यंजनों में मसाले के रूप में है। ये सबसे व्यापक रूप से दक्षिण और पश्चिमी तट के भारतीय व्यंजनों को पकाने में उपयोग किए जाते हैं। आमतौर पर तैयारी के पहलेचरण में वनस्पति तेल, सरसों और कटे हुए प्याज के साथ करी पत्ते को तला जाता है। उनका उपयोग थोरन, वड़ा, रसम और करी बनाने के लिए भी किया जाता है। कम्बोडिया में इसकी पत्तियों को भूना जाता है और सूप में एक घटक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जावा में पत्तों को अक्सर स्वाद गुलई में सुखाया जाता है। करी पत्तों का तेल निकाला जा सकता है और सुगंधित साबुन बनाने के लिए उपयोग में लिया जा सकता है। करी पत्ता के पौधे का उपयोग मृदा एवं जल संरक्षण में भी बहुतायत से किया जा सकता है। इसका आकार छोटा होने के कारण इसे जैवीय बाडे (लाइव फेंस) के रूप में किसानों द्वारा उपयोग किया जा सकता है। वानस्पतिक अवरोध के रूप में करी पत्ता को अनन्नास व नीबू घास के साथ प्रयोग करके मृदा अपरदन एवं मृदा क्षरण को रोका जा सकता है। इस प्रकार से यह जनजातीय इलाकों में प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने तथा आदिवासी किसानों के स्वास्थ्य एवं आजीविका के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। करी पत्ता का वैज्ञानिक नाम: मुराया कोएनिजी है। इसके अन्य नामः बर्गेरा कोएनिजी, चल्कास कोएनिजी हैं। यह एक प्रकार का उष्णकटिबंधीय तथा उप-उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में पाया जाने वाला रूटेसी वंश का पौधा है, जिसका मूल निवास स्थान भारत है। करी पत्ता बहुत ही लाभप्रद और औषधीय पगुणों से परिपूर्ण अर्ध-पर्णपाती सुगंधित झाड़ी है जिसमें, पतले लेकिन मजबूत लकड़ी के तने और गहरे भूरे रंग की छाल से ढकी शाखाएं होती हैं। इसकी पत्तियां गहरी हरी, चमकीलीऔर बहुत ही तीव्र सुगंध वाली होती हैं। करी पत्ता तटवर्ती वनस्पतियों में से एक है, जो कि वन सीमा, अशांत वर्षा वनों, शहरी झाड़ियों, अवरूद्ध क्षेत्रों और बगीचों में बहुतायत से पाया जाता है। यह पेड़ एक बड़ी झाड़ी या छोटे वृक्ष के रूप में आमतौर पर 2.5-4 मीटर लंबा होता है, लेकिन कभी-कभी 6 मीटर तक की ऊंचाई भी प्राप्त कर सकता है। इसका मुख्य तना लगभग काले रंग का और छोटे सफेद बिंदुओं के आवरण में ढका होता है। इसके वैकल्पिक रूप से व्यवस्थित पत्ते (12-20 सें.मी.) लंबे होते हैं और जिसमें 7-31 पत्रक हो सकते हैं। ऐसी मान्यता है कि इन पत्तियों को कुचलने पर एक तीव्र करी जैसी महक आती है। इसी कारण इस पौधे का नाम करी पत्ता रखा गया। करी पत्ता के फूल आकार में छोटे और सफेद रंग के (लगभग 10-12 मि. मी. के पार) शाखाओं के मुहानों पर बड़े समूहों में (जैसे कि टर्मिनल पैन्कल्स, कोरिअम्ब्स या सिम्स में) व्यवस्थित होते हैं, जिसमें 60-90 तक फूल हो सकते हैं। ये फूल छोटे डंठल यानी पेडिकेल) पर होते हैं और इनमें 1 मि. मी. से कम लंबाई के पांच हरे रंग के छोटे फूल होते हैं। उनकी पांच सफेद पंखुड़ियां (5-8 मि.मी. लंबी) आकार में लंबी होती हैं। फूलों में दस पीले पुंकेसर (4-6 मि.मी. लंबे) और एक अंडाशय एक छोटी शैली (लगभग 4 मि.मी. लंबी) और गोल (यानी सिर के रूप का) क्षतचिन्ह (स्टिग्मा) होते हैं। आमतौर पर फूल वसंत और शुरूआती गर्मियों के दौरान लगते हैं। फल एक गोल (यानी उप गोलाकार)या अंडे के आकार के (यानी ओवॉइड) बेरी जैसे होते हैं, जो परिपक्व होते ही हरे से काले या नीले-काले रंग में बदल जाते हैं। ये फल (10-16 मि.मी. लंबे और 10-12 मि.मी. चौड़े) दिखने में चमकदार होते हैं और इनमें एक या दो हरे बीज (11 मि.मी. तक लंबे और 8 मि.मी. चौड़े) होते हैं। फल आमतौर पर गर्मियों के दौरान परिपक्व होते हैं। इसके छोटे-छोटे, चमकीले काले रंग के फल तो खाए जा सकते हैं, लेकिन इनके बीज विषैले होते हैं। औषधीय गुण एक शोध के अनुसार प्रति सौ ग्राम करी पत्ते में 66.3 प्रतिशत नमी, 6.1 प्रतिशत प्रोटीन, एक प्रतिशत वसा, 16 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 6.4 प्रतिशत फाइबर और 4.2 प्रतिशत खनिज पाया जाता है। इसमें कैल्शियम, फॉस्फोरस, आयरन और विटामिन 'सी' भी पाया जाता है। करी पत्ते का सेवन कई चिकित्सा स्थितियों और अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए फायदेमंद साबित हुआ है। इसके कई महत्वपूर्ण स्वास्थ्य लाभ होने के साथ-साथ यह भोजन को प्राकृतिक रूप से स्वादिष्ट बनाने का मसाला घटक है। करी पत्ते भोजन को सुखद और खुशबूदार बनाने के साथ-साथ इसको पौष्टिक और स्वादिष्ट भी बनाते हैं। इनमें विभिन्न ऑक्सीकरणरोधी (एंटीऑक्सीडेंट) गुण होते हैं और दस्त, जठरांत्र (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल) की समस्याओं जैसे-अपच, अत्यधिक अम्लीय स्राव, पेप्टिक अल्सर, पेचिश, मधुमेह और एक अस्वास्थ्यकर कोलेस्ट्रॉल संतुलन को नियंत्रित करने की दक्षता रखते हैं। यह भी पाया गया है कि इसमें कैंसररोधी गुण विद्यमान होते हैं और यह यकृत या लीवर की रक्षा करने के लिए जाना जाता है। इच्छित उपयोग के आधार पर पत्तियों को सुखाया या तला जा सकता है। ताजा रूप भी खाना पकाने और हर्बल दवाओं दोनों के लिए बहुत लोकप्रिय है। आयुर्वेदिक चिकित्सा में भी करी पत्ते में कई औषधीय गुण पाए जाते हैं। ये एंटी-डायबीटिक, एंटीऑक्सीडेंट, रोगाणुरोधी (एंटीमाइक्रोबियल), एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-कार्सिनोजेनिक और हेपेटोप्रोटेक्टिव (लीवर को नुकसान से बचाने की क्षमता) गुणों से युक्त हैं। करी पत्ता की जड़ें शरीर के दर्द के इलाज के लिए उपयोग की जाती हैं और छाल का उपयोग सांप के काटने से उत्पन्न दर्द और विष के दुष्प्रभाव से राहत के लिए किया जाता है। इसके धुले हुए पत्तों को खाने से उल्टी बंद हो जाती है। करी पत्ते का उपयोग कैल्शियम की कमी में भी किया जाता है। इसके पोषण मूल्य से युवा और वृद्ध दोनों वर्गों को समान रूप से लाभ होता है, जो महिलाएं कैल्शियम की कमी, ऑस्टियोपोरोसिस आदि से पीड़ित हैं, वे करी पत्ते को एक आदर्श और प्राकृतिक रूप से कैल्शियम पूरक के रूप में पा सकती हैं। नीबू के रस और चीनी के साथ करी पत्ते का ताजा रस, अपच और वसा के अत्यधिक उपयोग के कारण सुबह के रोग, मिचली और उल्टी के उपचार में एक प्रभावी दवा भी है। करी पत्ते को महीन पीस कर छाछ के साथ मिश्रित करके खाली पेट भी लिया जा सकता है, जो कि पेट में हो रहे उतार-चढ़ाव के मामले में लाभकारी परिणाम देता है। यह एक लैक्सेटिव के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। गर्मियों के दौरान त्वचा पर फोड़े-फुसी दिखाई देते हैं। अधिकांश फोड़े समय के साथ कम हो जाते हैं, लेकिन कुछ बने रह सकते हैं और दर्दनाक हो सकते हैं। इस तरह की स्थितियों के इलाज में करी पत्ते काम आते हैं। जल्दी राहत के लिए करी पत्ते से बना पेस्ट लगाया जाता है। पुदीना और धनिया पत्ती के साथ करी पत्ता का उपयोग अत्यधिक पित्त के इलाज में किया जा सकता है। इसका उपयोग जलने, खरोंच और त्वचा के फटने के इलाज के लिए प्रभावी है। करी पत्ते के ताजा रस का उपयोग करके मोतियाबिंद के विकास को रोका जा सकता है। इसकी जड़ के रस के उपयोग से गुर्दे के दर्द को ठीक किया जा सकता है। मृदा एवं जल संरक्षण में करी पत्ते का महत्व करी पत्ते के पौधे का उपयोग मृदा एवं जल संरक्षण में भी बहुतायत से किया जा सकता है। पेड़ का आकार छोटा होने के कारण जैवीय बाड़े के रूप में किसानों द्वारा इसका उपयोग किया जा सकता है। वानस्पतिक अवरोध के रूप में अनन्नास व नीबू घास के साथ प्रयोग करके मृदा अपरदन एवं मृदा क्षरण को रोका जा सकता है। इस प्रकार से करी पत्ता जनजातीय इलाकों में प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षण करने तथा आदिवासी किसानों के स्वास्थ्य एवं आजीविका के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। करी पत्ते का मृदा एवं जल संरक्षण से संबंधित अनुसंधान बहुत सीमित है। इस प्रकार के औषधीय पौधों को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में अधिक प्रयोग करने की जरूरत है। करी पत्ते का पोषक महत्व पोषक तत्व करी पत्तों में पाए जाने वाले मुख्य पोषक तत्व कार्बोहाइड्रेट (सूक्ष्म मात्रा में), फाइबर, कैल्शियम, फॉस्फोरस, लोहा, मैग्नीशियम, तांबा और खनिज हैं। इसमें विभिन्न विटामिन जैसे-निकोटिनिक एसिड, एंटीऑक्सीडेंट, अमीनो एसिड, ग्लाइकोसाइड और फ्लेवोनोइड भी शामिल हैं। इसके साथ ही इसमें वसा लगभग 0.1 ग्राम प्रति 100 ग्राम पाया जाता है। करी पत्ते में मौजूद अन्य रासायनिक घटक कार्बोजल एल्क्लॉइड हैं। बालों की उचित वृद्धि के लिए पोषक तत्वों के स्रोत के लिए यह एक उत्कृष्ट माध्यम है। करी पत्ते के नियमित सेवन से बाल मजबूत होते हैं, रूसी ठीक होती है और बालों का असमय सफेद होना रुक जाता है। इसमें विटामिन 'ए', विटामिन 'बी', विटामिन 'सी', विटामिन बी2, कैल्शियम और लौह प्रचुर मात्रा में विद्यमान होते हैं। विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि करी पत्ता में एलडीएल कोलेस्टॉल के स्तर को कम करने की क्षमता होती है। करी की लोकप्रियता करी पत्तों का बड़े पैमाने पर दक्षिण भारत और श्रीलंका में उपयोग किया जाता है (और प्रामाणिक स्वाद के लिए बिल्कुल आवश्यक भी है), लेकिन उत्तर भारत में इसका कुछ अलग महत्व भी है। दक्षिण भारतीय प्रवासियों के साथ करी पत्ते का चलन मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका और रियूनियन द्वीप तक फैला हुआ है।