प्रस्तावना मशरूम जिसे क्षेत्रीय भाषाओं में खुम्भ, छत्रक, गर्जना एवं धरती के फूल आदि नामों से जाना जाता है। अपनी पौष्टिकता एवं अन्य बहुमूल्य गुणों के कारण रोम में इसे फूड ऑफ गाड (भगवान का भोजन) कहा जाता है। भारत में इसे सब्जियों की मल्लिका भी कहा जाता है। मशरूम वनस्पति कुल के ही फफूंद का एक समूह है, जोकि मांसल युक्त क्लोरोफिल रहित होता है, जिसके बीजाणु इसके गलफड़ों में पाये जाते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में प्राकृतिक अवस्था में सड़े-गले पदार्थों पर उग जाता है। इसकी अनेक प्रजातियाँ हैं, जिसमें से कुछ खाद्य योग्य एवं कुछ विषैली होती है। मशरूम की खेती क्यों करें फसलों के अवशेषों तथा कृषि आधारित कुटीर उद्योग धन्धों से निकलने वाले अवशेष पदार्थों का प्रयोग। बन्द कमरे में खेती करने के कारण कम से कम जगह की आवश्यकता। पोषकीय एवं औषधीय गुणों से भरपूर। विभिन्न रोगों के प्रति रोग प्रतिरोधी क्षमता। प्रत्येक आयु वर्ग के लिए रोजगार का साधन। आय का अतिरिक्त स्रोत। कुटीर उद्योग धन्धों का बढ़ावा। प्रति इकाई क्षेत्रफल में अधिक उत्पादन। वातावरण के अनुकूल (इकोफ्रेंडली)। कृतिक दशा में खरीफ में दो प्रकार से मशरूम की खेती की जा सकती है। दुधचट्टा मशरूम (कैलोसाइव प्रजाति) यह मशरूम देखने में अत्यन्त आकर्षक एवं अत्यन्त स्वादिष्ट है। इसकी खेती सर्वप्रथम भारतवर्ष में शुरू हुई है। वर्तमान में इसकी खेती समुद्री इलाकों के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा एवं अन्य प्रदेशों में की जा सकती है। उपयुक्त प्रजातियाँ: कैलोसाइव इण्डिका, कैलोसाइव, इसकुलेन्टा समय जुलाई से अक्टूबर तथा फरवरी से अप्रैल खेती की विधि आधार सामग्री की तैयारी इस मशरूम की खेती हेतु गेहूँ के भूसें को बोरे में भरकर रातभर के लिए साफ पानी भिगो दिया जाता है यदि आवश्यक है तो 7 ग्राम का कार्बेन्डाजिम (50 प्रतिशत) तथा 115 मिली० फार्मलीन प्रति 100 लीटर पानी की दर से मिला दिया जाता है। इसके पश्चात् भूसे को बाहर निकालकर अतिरिक्त पानी निथार कर अलग कर दिया जाता है और जब भूसे में लगभग 70 प्रतिशत नमी रह जाये तब यह बिजाई के लिए तैयार हो जाता है। बिजाई इसमें ढ़िगरी मशरूम की तरह की बिजाई की जाती है परन्तु स्पान की मात्रा ढ़िगरी मशरूम से दो गुनी (5-6 प्रतिशत) प्रयोग की जाती है, तथा बिजाई करने के बाद थैलो में छिद्र नहीं बनाये जाते हैं। बिजाई के बाद तापक्रम २८0- 320होना चाहिए। बिजाई पश्चात इन थैलों को फसल कक्ष में रख देते है। आवरण मृदा लगाना बिजाई के 20 से 25 दिन बाद फफूंद पूरे भूसे में समान रूप से फैल जाती है। इसके बाद आवरण मृदा तैयार कर 2 से 3 इंच मोटी पर्त थैली के मुँह को खोलकर ऊपर समान रूप से फैला दिया जाता है। इसके पश्चात् पानी के फव्वारे से इस तरह आवरण मृदा के ऊपर सिंचाई की जाती है कि पानी से आवरण मृदा की लगभग आधी मोटाई ही भीगने पाये। आवरण मृदा लगाने के लगभग 20 से 25 दिन बाद आवरण मृदा के ऊपर मशरूम की बिन्दुनुमा अवस्था दिखाई देने लगती है। इस समय फसल कक्ष का तापक्रम 32 से 35 तथा आपेक्षित आर्द्रता 90 प्रतिशत से अधिक बनाये रखा जाता है। अगले 3 से 4 दिन में मशरूम तोड़ाई योग्य हो जाता है। उपज सूखे भूसे के भार का 70 से 80 प्रतिशत उत्पादन प्राप्त हो जाता है। धान के पुआल का मशरूम (वालवेरियल्ला प्रजाति) इस मशरूम को चाईनीज मशरूम तथा गर्मी का मशरूम भी कहा जाता है। इसकी खेती सर्वप्रथम सन् 1822 में चीन में शुरू हुई थी। यह बहुत ही कम समय में तैयार होने वाला मशरूम है। भारतवर्ष में इसकी खेती प्रायः समुद्र तटीय राज्यों जैसे-पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ एवं आन्ध्र प्रदेश में की जाती है। वर्तमान में इसकी खेती देश के मैदानी भागों में प्रायः माह जुलाई से सितम्बर तक की जाती है। उपयुक्त प्रजातियाँ वालवेरियल्ला डिप्लेसिया, वाललेरियल्ला वालवेसिया समय जून से सितम्बर खेती की विधि आधार सामग्री की तैयारी तथा शैय्या बनाने हेतु धान के वाल लगभग 1.25 किग्रा० के 35 बंडलो की आवश्यकता होती है। इन बंडलों को रात भर (12 से 14 घण्टे तक) साफ पीने योग्य पानी में भिगोया जाता है। इसके पश्चात् इन बंडलो को बाहर निकालकर अतिरिक्त पानी निथार दिया जाता है जब इसमें नमी 68-70 प्रतिशत शेष रह जाती है तो इन बंडलो को फसलक्ष में ईटों अथवा बांस के ट्टर या स्टील के बने फ्रेम पर चार-चार बंडलों को इस तरह से रखते हैं कि इनमें आमने-सामने का भाग एक दूसरे के सामने एवं लगभग 6 इंच तक एक दूसरे के ऊपर रहे। बिजाई अब इन बंडलों के ऊपर चारों तरफ से 6 इंच की जगह छोड़कर लगभग 50 ग्राम स्पान तथा 20 ग्राम चने के बेसन को समान रूप से छिड़क देते है। इसके ऊपर इसी तरह की बंडलो की दूसरी, तीसरी एवं चौथी पर्त बिछाकर प्रत्येक पर्त पर प्रथम पर्त के तरह की बिजाई कर दी जाती है। शेष बचे तीन बंडलो की चौथी पर्त के ऊपर बिछाकर पूरी शैय्या को सफेद पालीथीन से ढक दिया जाता है। इस समय फसल कक्ष का तापक्रम 32 से 35 तथा आपेक्षित आर्द्रता लगभग 85-90 प्रतिशत होनी चाहिए। बिजाई के लगभग एक सप्ताह पश्चात् फंफूद पूरे पुआल में फैल जाती है और शैय्या के किनारे-किनारे बटन के आकार के मशरूम दिखाई देने लगते हैं। इस समय पालीथीन को हटाकर तापक्रम एवं आपेक्षित आर्द्रता बनाये रखा जाता है। अगले 4-5 दिन के अन्दर ही मशरूम अण्डाकार अवस्था में आ जाता है और इस अवस्था पर ही तोड़ लेना चाहिए। इस तरह से एक फसल 22 से 25 दिन के अन्दर पूर हो जाती है। उपज सूखे पुआल के भार के आधार पर 6 से 7 प्रतिशत उपज प्राप्त हो जाती है। मशरूम स्पान प्राप्त करने के स्रोत मशरूम की खेती करने के लिए गुणवत्तायुक्त स्पान अति आवश्यक है। जिसके लिये निम्न स्रोतों से सम्पर्क किया जा सकता है। पादप रोग विज्ञान विभाग, चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर। पादप रोग विज्ञान विभागः गोविन्द बल्लभपन्त कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय पन्त नगर, उधमसिंह नगर, उत्तरांचल। पादप रोग विज्ञान विभागः राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, उदयपुर राजस्थान। पादप रोग विज्ञान विभागः महात्मा फूले कृषि विद्यापीठ, पूना महाराष्ट्र। पादप रोग विज्ञान विभागः हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार हरियाणा। मशरूम प्रशिक्षण मशरूम उत्पादन में प्रशिक्षण एक महत्वपूर्ण अंग है। क्योंकि बिना प्रशिक्षण प्राप्त किये कोई व्यक्ति मशरूम का सफलता पूर्वक उत्पादन नहीं कर सकता है। सभी सामग्री का सही मात्रा में प्राप्त करने सम्बन्धित जानकारी हेतु निम्न केन्द्रों से सम्पर्क किया जा सकता है। राष्ट्रीय खुम्ब अनुसंधान केन्द्र, बम्बाघाट सोलन (हि०प्र०) पादप रोग विज्ञान विभागः चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कानपुर-208002 उ०प्र० अखिल भारतीय समन्नित मशरूम विकास परियोजना के अन्तर्गत कुछ राज्य स्तरीय ने भी प्रशिक्षण कार्य चलाया जा रहा है जोकि निम्नवत् है। पादप रोग विज्ञान विभागः इन्दिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़। पादप रोग विज्ञान विभागः आई०आईएच०आर० बंगलोर कर्नाटक। उद्यान विभाग, मेघालय, शिलांग। उद्यान निदेशालय, लखनऊ, उ०प्र०। उद्यान निदेशालय, ईटानगर, अरूणांचल प्रदेश। स्त्राेत : पारदर्शी किसान सेवा याेजना,कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश।