प्याज को महत्वपूर्ण सब्जी एवं नगदी कंदीय फसल के रूप में जाना जाता है। भारत में विभिन्न प्रकार की सब्जियों की खेती में इसका बड़ा महत्व है। इसमें प्रोटीन एवं कुछ विटामिन भी अल्प मात्रा में रहते हैं। प्याज में बहुत से औषधीय गुण पाये जाते हैं। इसका सूप, अचार एवं सलाद के रूप में भी उपयोग किया जाता है। भारत के प्याज उत्पादक राज्यों में महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश एवं बिहार प्रमुख हैं। मध्य प्रदेश भारत का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक राज्य है। प्याज की उत्पादकता पर कीट एवं रोग अत्यधिक प्रभाव डालते हैं। इससे फसल को विभिन्न प्रकार से क्षति पहुंचती है। प्याज की फसल में लगने वाले कुछ प्रमुख रोगों एवं कीटों की पहचान एवं रोकथाम कर किसान इनकी क्षति से बच सकते हैं तथा अधिक उत्पादन प्राप्त कर अपनी आमदनी को भी बढ़ा सकते हैं। रोग प्रबंधन बेसल रॉट रोगजनकः फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पारेम फ.स्प. सीपाई लक्षणः पत्तियों में पीले रंग की धारियां शुरू होती है और धीरे-धीरे ये सूख जाती हैं। प्रभावित पौधे की पहचान संक्रमित पत्ती की नोक के नीचे सूखने से होती है। इस रोग में पूरा पौधा सूखने लगता है। प्रभावित भाग का बल्ब नरम घूर्णन दिखाता है और जड़ों की वृद्धि रुक जाती है। प्रबंधन उत्पादकों को फसलचक्र का पालन करना चाहिए। आशंकित भंडारण घाटे को कम करने के लिए कटाई वाले बल्बों को पूरी तरह से ठीक किया जाना चाहिए। प्याज में यह रोग तांबे की कमी के कारण होता है। रोग की संवेदनशीलता को देखते हुए फसल उत्पादन के अनुकूल परिस्थितियां करने के क्रम में मृदा में अतिरिक्त तांबे की आवश्यकता विशेष रूप से होती है। तांबा (कॉपर ऑक्सीक्लोराइड) 0.25 प्रतिशत के साथ मृदा की ड्रेचिंग करनी चाहिए। झुलसा रोग रोगजनकः बोटराइटिस स्कव्यामोसा लक्षण ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों में प्याज का यह सबसे बड़ा रोग है। कम संक्रमण उपज को प्रभावित नहीं करता है, लेकिन अधिक संक्रमण के कारण उपज में भारी गिरावट हो सकती है। इस रोग में जब पत्ते पर सैकड़ों सफेद धब्बे देखे जाते हैं, तब रोग बहुत तेजी से फैलता है। इससे पूरी फसल के शीर्ष भाग मर जाते हैं तथा पूरी फसल सूखकर नष्ट हो जाती है। प्रबंधन कैप्टॉन या थिरम 0.25 प्रतिशत के साथ बल्ब उपचार। रोग के नियंत्रण के लिए मानेब औ मैंकोजेब का छिड़काव प्रत्येक 5-7 दिनों में किया जा सकता है। कीट प्रबंधन कटुआ सूंडी(कटवर्म) यह एक रात्रिचर कीट है, जो मटमैले भूरे रंग का होता है। ये प्याज के पौधों को जमीन की सतह से काट देते हैं, जिससे पौधे गिर जाते हैं और सूखकर मर जाते हैं। प्रबंधन गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए। पौधरोपण से पहले खेत में कार्बोफ्यूरॉन एक कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर की दर से मिला दें। पौधरोपण के पश्चात इस कीट का प्रकोप होने पर क्लोरपायरीफॉस 20 ईसी नामक दवा 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर शाम के समय छिड़काव करें। शीर्षबेधक कीट इस कीट की सूंडी क्षतिकारक होती है, जिसकी पीठ पर तीन धारियां पाई जाती हैं। जो प्याज बीज उत्पादन के लिए लगाया जाता है, उसमें यह ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। शीर्षबेधक कीट, पुष्पण की अवस्था में आक्रमण करता है, जिससे बीज नहीं बन पाते हैं। प्रबंधन रोग नियंत्रण के लिए गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए। नर सूंडी को आकर्षित करने वाले फेरोमोन ट्रैप का प्रयोग करना चाहिए। एचएनपीबी विषाणु की 300 एलई (सूंडी समतुल्य) मात्रा में एक कि.ग्रा. देसी गुड़ व 0.01 प्रतिशत इंडोट्रॉन 100 एक्स (चिपकने वाला पदार्थ) को 800 लीटर पानी में मिलाकर 2 से 3 बार छिड़काव करना चाहिए बैंगनी धब्बा रोगजनक अल्टरनेरिया पोराई लक्षणः यह रोग मुख्य रूप से पत्तियों के शीर्ष पर होता है। पत्तियों के ऊपरी भाग पर अनियमित क्लोरोटिक क्षेत्रों के साथ पत्तियों पर सफेद छोटे-छोटे बिन्दुओं के साथ संक्रमण शुरू होता है। क्लोरोटिक क्षेत्र में सांद्रिक काली मखमली छल्ले जैसे परिपत्र दिखाई देते हैं। घाव पत्ते के आधार की ओर विकसित होते हैं, उसके बाद धब्बे एक साथ जुड़ते हैं और पूरे पत्ते के क्षेत्र में तेजी से फैल जाते हैं तथा पत्तियां धीरे-धीरे ऊपर से नीचे की ओर सूखकर मर जाती हैं। प्रबंधन रोपण के लिए रोगमुक्त कन्द का चयन किया जाना चाहिए। बीज का उपचार थिरम 4 ग्राम/कि.ग्रा. बीज के साथ किया जाना चाहिए। कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के साथ जब तीन पत्तियों के पौधे हों तो छिड़काव करना चाहिए या फिर 0.25 क्लोरोथोनिलिल 0.2 प्रतिशत या जिनेब 0.2 प्रतिशत या मैंकोजेब 0.2 प्रतिशत का भी छिड़काव किया जा सकता है। थ्रिप्स कीट यह एक छोटे आकार का कीट होता है, जिसके शिशु और वयस्क दोनों पत्तियों से रस चूसते हैं। इससे पत्तियों पर सफेद धब्बे बनते हैं, जो बाद की अवस्था में पीले सफेद हो जाते हैं। यह कीट शुरू की अवस्था में पीले रंग का होता है, जो आगे चलकर काले भूरे रंग का हो जाता है। प्रबंधन प्याज के बीज को इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस पाउडर से (2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज) शोधित करके बोना चाहिए। मुख्य खेत में रोपाई के उपरांत डाईमेथोएट 30 ई सी की 1 मि.ली. मात्रा या फॉस्फामिडॉन 85 ईसी 0.6 प्रतिशत की एक मि.ली. मात्रा को प्रति लीटर पानी में मिलाकर 2 से 3 छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करें। स्त्राेत : फल फूल पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), ओमकार सिंह, विषय वस्तु विशेषज्ञ (फसल सुरक्षा), कृषि विज्ञान केंद्र, पी.जी. काॅलेज, गाजीपुर (उत्तर प्रदेश)