<h3 style="text-align: justify;">परिचय </h3> <p style="text-align: justify;">रबी ऋतु में उगाई जाने वाली सब्जी की फसलों में प्याज एक महत्वपूर्ण फसल का स्थान ले चुकी है। हमारे देश के कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर यह उगाई जाती है एवं विश्व स्तर पर उत्पादन में दूसरा स्थान प्राप्त कर अन्य देशों में भारी मात्रा में निर्यात की जाने वाली फसल के रूप में जानी जाती है। प्याज का उपयोग सलाद के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की सब्जियों, मसाले एवं व्यंजन बनाने में किया जाता है। प्याज के औषधीय गुण के कारण इसका उपयोग दवाई बनाने के लिए भी किया जाता है। प्रसंस्करित उत्पादों के लिए इसके छल्ले, चूर्ण, तेल, शुष्क छिलके इत्यादि के रूप में इसे उपयोग किया जाता है। निरंतर घरेलू उपयोग एवं निर्यात की मांग के कारण व्यावसायिक फसल के रूप में किसानों के बीच इसकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है।</p> <p style="text-align: justify;">मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में अधिकांश कृषक सीमांत जोत वाले हैं। अर्धशुष्क जलवायु के साथ मध्यम काली मृदा और सिंचाई का पानी रबी मौसम की खेती करने के लिए कुछ क्षेत्रों को छोड़कर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। रबी में प्याज की फसल सोयाबीन की कटाई के बाद ली जाती है। सोयाबीन मृदा से सल्फर की अधिक मात्रा का दोहन करती है, जिसका विपरीत प्रभाव प्याज के उत्पादन पर पड़ता है। प्याज में सल्फर की वजह से गुणवत्तायुक्त कंद का उत्पादन व भंडारण क्षमता बढ़ जाती है। कुछ क्षेत्रों में किसानों को प्याज की नई व अच्छी प्रजातियों और तकनीकी जानकारी न होने की वजह से वे गुणवत्तायुक्त उत्पादन नहीं ले पाते हैं। अब खेती की नई जानकारी एवं तकनीक का उपयोग कर प्याज का अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">रबी प्याज उत्पादनकी तकनीकी</h3> <p style="text-align: justify;">तापमान, मृदा व ढलान, रोपण का समय, बीज की गुणवत्ता इत्यादि कारकों का प्रभाव प्याज की पैदावार एवं गुणवत्ता पर अधिक पड़ता है। इन पौधों की सर्वोत्तम वृद्धि व बढ़वार के लिए वातावरण का तापमान 25 डिग्री सेल्सियस कम एवं इससे अधिक तापमान कंद बनकर बड़े आकार लेते समय उपयुक्त होता है। वानस्पतिक वृद्धि के समय उच्च तापमान एवं वर्षा के कारण अधिक आर्द्रता होने से बैंगनी धब्बा एवं झलसा रोग का प्रकोप बढ़ जाता है। कंद के विकास के समय अधिक दिनों तक तापमान गिरावट होने से फूल के डंठल निकलने लगते हैं। अचानक तापमान बढ़ने से गांठें पूरी तरह विकसित हुए बिना परिपक्व हो जाती हैं। इसलिए रबी मौसम में प्याज की रोपाई मध्य दिसंबर से जनवरी प्रथम सप्ताह तक कर देने से प्याज की अच्छी बढ़वार व उत्पादन के लिए जनवरी से मार्च तक का वातावरण उपयुक्त होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">प्याज की किस्में</h3> <p style="text-align: justify;">बागवानी अनुसंधान संस्थानों, राष्ट्रीय बीज निगम एवं कृषि विश्वविद्यालों द्वारा विकसित की गई प्याज की उन्नत प्रजाति का उपयोग कर अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। यह किसान के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी है। अधिक उत्पादन देने वाली प्याज की प्रजातियां जैसे-<strong>पूसा रत्नार, पूसा माधवी, एग्रीफाउंड डार्क रेड, लाइन-883, भीमा डार्क रेड, भीमा किरण, भीमा शक्ति, भीमा</strong> <strong>श्वेता, भीमा रेड, भीमा राज, फुले</strong> <strong>स्वर्णा, फुले सामर्थ्य, अर्का कल्याण, एन-53 इत्यादि </strong>को अपने प्रक्षेत्र पर लगाकर अच्छा उत्पादन ले सकते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">खेत की तैयारी</h3> <p style="text-align: justify;">प्याज उत्पादन के लिए बलुई दोमट मृदा उपयुक्त होती है, लेकिन प्याज की फसल की सभी प्रकार की मृदा में बुआई कर सकते हैं। मृदा का पी-एच मान 6.5-7.5 के बीच एवं मध्यम कार्बनिक पदार्थ सहित नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम, सल्फर, सूक्ष्म पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में होने चाहिए। भूमि को सुविधानुसार 2-3 बार हल द्वारा भुरभुरा एवं समतल कर लें तथा 1.5-2.0 मीटर चौड़ाई एवं आवश्यकता अनुसार लम्बाई में मेड़ वाली या ऊंची उठी छोटी-छोटी क्यारियां तैयार करते हैं। मेड़ वाली क्यारियों की अपेक्षा ऊंची उठी क्यारियों में कंद का आकार व गुणवत्ता अच्छी होने के कारण प्याज उत्पादन अच्छा होता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">प्याज की पौध एवं रोपाई</h3> <p style="text-align: justify;">रबी की फसल के लिए बीज की बुआई फफूंदनाशक दवा से उपचारित कर मानसून समाप्ति के बाद अक्टूबर अंत तक करके 45-60 दिनों की पौध का रोपण नवंबर-दिसंबर में करते हैं। छिड़काव विधि में 8-10 कि.ग्रा. बीज की पौध एक हैक्टर खेत के लिए पर्याप्त होती है। बीज बुआई के 15-20 दिनों पहले खेत की सिंचाई करके काली पॉलीथीन बिछा देने से हानिकारक कीट, जीवाणु एवं खरपतवार के बीज सौरीकरण क्रिया से नष्ट हो जाते हैं। इसके पश्चात खेत की जुताई 5-7 सें.मी. गहराई तक करें। इससे अधिक गहरी जुताई करने से पौध की जड़ें अधिक गहरी चली जाती हैं और निकालते समय प्याज की पौध जड़के पास से अधिक टूटती हैं। बीज की बुआई गहरी नाली बनाकर 15-20 सें.मी. ऊंची उठी हुई क्यारियों में करें। बुआई के बाद बीज को हल्का मिला दें या बारीक मिट्टी या गोबर की खाद या कम्पोस्ट से ढककर फव्वारे से सिंचाई करें। रबी प्याज की पौध की रोपाई अधिकतर मेड़ बनाकर समतल क्यारियों में की जाती है, लेकिन नाली बनाकर ऊंची उठी क्यारियों में करने से इसका अधिक उत्पादन मिलता है। प्याज रोपाई के लिए सामान्यतः पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सें.मी. रखी जाती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">सिंचाई एवं खरपतवार प्रबंधन</h3> <p style="text-align: justify;">प्याज की जड़ उथली एवं सूक्ष्म होने से अधिकतम 15 सें.मी. तक सीमित होती है। रबी प्याज में एक सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद और 5-6 सिंचाइयां 15-20 दिनों के अंतराल पर कंद बनने तक आवश्यक होती हैं। सूक्ष्म टपक सिंचाई इसमें सतह सिंचाई की अपेक्षा अधिक लाभदायक पायी गयी है। इससे उत्पादन और गुणवत्ता के साथ ही पानी की बचत होती है। प्याज में खरपतवार जैसे-मोथा, दूब, बथुआ, दूधी, चौलाई इत्यादि खेत में उगते हैं। खरपतवारनाशी का उपयोग ऑक्सीफ्लोरोफेन का 10-15 मि.ली. या क्यूजालोफॉल इथाइल 25 मि.ली. प्रति 15 लीटर पानी मिलाकर छिड़काव करने से खरपतवार को नियंत्रित किया जा सकता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">पोषक तत्व प्रबंधन</h3> <p style="text-align: justify;">फसल बढ़वार एवं उत्पादन के लिए 20-25 टन/हैक्टर गोबर की खाद या 3 टन वर्मीकम्पोस्ट क्यारियों में तैयार करने के पूर्व समान रूप से खेत में मिलाएं। प्याज की फसल को 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 50 कि.ग्रा. पोटाश तथा 30 कि.ग्रा. सल्फर देने की सिफारिश की जाती है। फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर की पूरी एवं नाइट्रोजन की 20 कि.ग्रा. मात्रा को पौध रोपाई के साथ और शेष बची नाइट्रोजन को तीन समान भागों में विभाजित करके पौध रोपण के 30, 45 और 60 दिनों के बाद खड़ी फसल में एक समान छिड़क देते हैं। यदि फसल ऐसी मिट्टी में लगाई गई हो, जिसमें नाइट्रोजन व अन्य पोषक तत्वों की हानि जल अंत:स्राव के कारण अधिक होती है, तो ऐसी स्थिति में पौध रोपण के 15, ३० और 45 दिनों के बाद जल घुलनशील उर्वरक एनपीके (19:19:19) को 150-200 ग्राम प्रति पम्प (15 लीटर जल) और एनपीके (13:0:46) को भी 150-200 ग्राम प्रति पम्प 60, 75 और 90 दिनों के बाद एवं जल घुलनशील पोटेशियम सल्फेट (0:0:50:17.5) का 45, 60 और 75 दिनों के बाद पर्णीय छिड़काव करने से उपज में बढ़ोतरी के साथ लम्बी अवधि के भंडारण के लिए गुणवत्तायुक्त कंद की प्राप्ति होती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कंद खुदाई एवं भंडारण</h3> <p style="text-align: justify;">रबी प्याज के कंदों की खुदाई मार्च मध्य तक पत्तियों का रंग पीला होने पर करते हैं। जब कंद मिट्टी की ऊपरी सतह पर निकलने लगते हैं, तो कंद का ऊपरी या पत्तियों के नीचे का डंठल हाथ से दबाने पर मुलायम होता है या ऊपरी हिस्सा पत्तियों सहित गिरने लगता है। कंदों की खुदाई कर इन्हीं की पत्तियों से इस प्रकार ढककर रखते हैं कि कंद पर सूर्य का प्रकाश न पड़े। ऐसा करने से कंद का रंग, भंडारण क्षमता एवं बाजार मूल्य बढ़ जाता है। कंद की पत्तियों के 20-30 दिनों में सूख जाने के पश्चात कंद से डंठल को हटाना चाहिए। वैज्ञानिक तरीके से कंद भंडारण 0-3 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा 90 प्रतिशत आर्द्रता पर करते हैं। किसान स्वयं सुविधानुसार हवादार शुष्क स्थान पर मोटे तार की जाली में प्याज कंद का भंडारण 6-8 माह के लिए आसानी से कर सकते हैं। तार की जाली की संरचना इस प्रकार तैयार करें कि जिसे ईंट या लकड़ी के चौकोर टुकड़ों पर रखा जा सके। इससे प्याज के कंदों के चारों तरफ से हवा का आवागमन हो सकता है। प्रायोगिक रूप से यह देखा गया कि एक समान आकार के कंद में हवा का आवागमन अधिक होने से ग्रेडिंग किए कंद में सड़न-गलन की समस्या भंडारण में 90 प्रतिशत तक कम हो जाती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">रोग एवं कीट सुरक्षा</h3> <p style="text-align: justify;">बैंगनी धब्बा रोग ऑल्टरनेरिया पोरी फफूंद से होता है। इस रोग में प्याज की पत्तियों पर सफेद भूरे मध्य में बैंगनी रंग के धब्बे बनते हैं। इसकी रोकथाम के लिए इप्रोडियोन 30 ग्राम/पम्प या हैक्साकोनाजोल15 ग्राम/पम्प घोलकर 10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">स्टेमफिलियम झुलसा फफूंद रोग है, इससे पत्तियों में सफेद और हल्के भूरे रंग के बाद काले या भूरे धब्बे हो जाते हैं। नियंत्रण के लिए क्लोरोथेलोनिल का 30 ग्राम/पम्प या मैन्कोजेब 35 ग्राम/पम्प 15 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">आर्द्रगलन फ्यूजेरियम ऑक्सीपोरम नामक फफूंद से नर्सरी पौध का प्रमुख रोग है। पौधे भूमि की सतह के पास से सड़ जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए थायरम 2 ग्राम/कि.ग्रा. बीज या नर्सरी पौध की जड़ों में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 30 ग्राम/पम्प छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify;">थ्रिप्स कीट आकार में बहुत छोटे पीले से ब्राउन रंग के होते हैं। ये नई पत्तियों का रस चूसते हैं। इनकी रोकथाम के लिए एसीफेट 30 ग्राम/पम्प या प्रोफेनोफॉस 15 ग्राम/पम्प घोलकर छिड़काव करना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">चने की कटुआ इल्ली पौध रोपण के बाद भूमि की सतह से पौध को काट कर जड भाग को खाती है। इसके नियंत्रण के लिए कार्बोरिल डस्ट 30 ग्राम/पम्प या जड़ क्षेत्र में फोरेट का छिडकाव करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">पैदावार</h3> <p style="text-align: justify;">सामान्यतः प्याज की उपज 200-300 क्विंटल/हैक्टर तक प्राप्त हो जाती है, लेकिन उपज प्रजातियों पर निर्भर करती है, जैसे आकार में चपटे कंद की उपज अधिक एवं नारियल के समान कंद की कम उपज, किंतु भंडारण क्षमता अधिक होती है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका (आईसीएआर), राजेन्द्र सिंह यशोना-यशोना कृषि सेवा केन्द्र, प्रगति नगर, सोनकच्छ, देवास-455118 (मध्य प्रदेश)और राधेश्याम शर्मा,कृषि इंटर विद्यालय, आगेरा, सोनकच्छ, देवास-455118 (मध्य प्रदेश)</p>