भारत की अधिकतर कृषि वर्षा पर निर्भर है। वर्षा की अनिश्चितता, अपर्याप्त सिंचाई की सुविधा व सीमित कृषि क्षेत्र से अधिक उत्पादन की चुनौती की गंभीरता को समझते हुए जल के समुचित उपयोग की आवश्यकता है। सिंचाई के पर्याप्त साधन वाले क्षेत्रों में जल का न्यायसंगत उपयोग नहीं होने से गंभीर समस्याएं जैसे-जलमग्नता, भूक्षरण सरीखी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। शुष्क रेतीले क्षेत्रों जैसे पश्चिमी राजस्थान में बलुई मृदा की अधिकता के कारण मृदा में जल शीघ्र ही पौधों की जड़ों की पहुंच से दूर गहराई में नीचे चला जाता है। यहां मृदा की सतह से जल का वाष्पीकरण बहुत अधिक होता है। इससे लाभदायक खेती कर पाना बहुत ही कठिन कार्य है। मृदा जल के वाष्पीकरण को कम करने तथा नमी संरक्षण के लिए विभिन्न कृषि अपशिष्टों जैसे-सूखी पत्तियां, सूखी घास, भूसा, सरसों की तूरी व गोबर की खाद आदि को हमारे किसान पुराने समय से खेत में पौधों के आसपास के क्षेत्र में मृदा में मिलाकर उपयोग करते आ रहे हैं। इससे खेत में नमी का नुकसान कम होता है। प्रगति के साथ कृषि में प्लास्टिक के उपयोग से भी क्रांति आई है। पलवार (मल्चिंग), पौधों के चारों तरफ की भूमि को प्लास्टिक से ढकने की क्रिया है। इससे कीट और रोगों के नियंत्रण के साथ-साथ कीटनाशकों का खर्चा भी काफी कम आता है। यह वायु व तापरोधी होने के साथ-साथ वजन में हल्की होती है तथा इसे खेत में र बिछाना व समेटना आसान है। पलवार की मोटाई कृषि कार्यों में एलएलडीपी प्लास्टिक पलवार (लिनियर लो डेंसिटी पॉलीथीलीन) अधिक काम 7 में लेते हैं। पलवार की मोटाई फसल की अवधि पर निर्भर करती है। अल्पकालीन फसलों के लिए 25माइक्रॉन, मध्यकालीन फसलों के लिए 50 माइक्रॉन तथा दीर्घकालीन फसलों के लिए 100 से 200 माइक्रॉन मोटाई की पलवार उपयुक्त रहती है। पलवार का रंग प्लास्टिक पलवार विभिन्न रंगों में उपलब्ध हैं। उद्देश्य के अनुसार इसका रंग चुना जाता है। पारदर्शी पलवार, सर्दियों में तापमान बढ़ाने में सहायक होती है। इससे जड़ों की वृद्धि ठीक होती है। पारदर्शी पलवार के उपयोग से भूसतह पर जड़ क्षेत्र में लवणों के अधिक इकट्ठा होने से फसलों को नुकसान भी हो सकता है। काली पलवार खरपतवारों की रोकथाम के लिए तथा लवणीय मृदा के लिए भी उपयोगी है। सिल्वर रंग की या सफेद अपारदर्शी पलवार कीटों की रोकथाम के लिए अच्छी रहती है, जबकि पीली-सुनहरी पलवार कीटों को आकर्षित करती है। सब्जियों के लिए लगभग एक मीटर चौड़ी व 15 सें.मी. उठी हुई क्यारी व दो क्यारियों के बीच में 50 सें.मी. चौड़ी व 15 सें.मी.xगहरी नाली बनाएं, जिसे चलने व टपक सिंचाई पद्धति नहीं होने पर सिंचाई के लिए काम में ले सकते हैं। इस तैयार क्यारी पर टपक सिंचाई, जिसे बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति भी कहते हैं, की नलियां बिछा दी जाती हैं। एक मीटर चौड़ी व 25 माइक्रॉन मोटाई की पलवार को तैयार क्यारी पर लंबाई में बिछा देते हैं। पलवार बिछाकर किनारे की लगभग 10 सें.मी. पलवार मृदा में 7 से 10 सें. मी. तक दबा देनी चाहिए। इससे हवा का आगमन कम होगा व वाष्पीकरण भी नहीं होगा। पौध रोपाई वाले स्थान पर 10 सें.मी. चौडा गोलाकार छेद कर पलवार को काटकर अलग कर देते हैं। छेदों में पौधों का रोपण करते हैं। इसकी कीमत लगभग आठ रुपये प्रति मीटर तक आती है। सावधानी से रखने पर पलवार कई बार पुनः प्रयोग की जा सकती है। समतल क्यारी विधि की तुलना में इससे सिंचाई के पानी, खरपतवारनाशी दवा, उर्वरक व मानव श्रम की बचत के साथ-साथ उत्पादन की गुणवत्ता भी अच्छी रहती है। पलवार की उपयोगिता यह वर्षा पोषित खेती में नमी संरक्षण के लिए उपयोगी है। खुली क्यारी में पानी के अधिक वाष्पीकरण के साथ-साथ नाइट्रोजन का भी गैसीय अवस्था में उड़कर नुकसान होता है। सिंचित क्षेत्र में दो सिंचाई के बीच का अंतराल बढ़ाने से सिंचाई की संख्या कम करने के लिए प्रयोग खरपतवार नियंत्रण के लिए सब्जियों में बारंबार सिंचाई करने से खरपतवारों की समस्या बनी रहती है। इससे कई बार निराई-गुड़ाई करने से लागत भी बढ़ जाती है और खरपतवार पोषक तत्वों, स्थान, पानी व सूर्य के प्रकाश आदि के लिए पौधों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। ये लगभग 25 प्रतिशत तक पैदावार को कम कर देते हैं। अपारदर्शी फिल्म में रोशनी नहीं मिलने से खरपतवारों का अंकुरण व वृद्धि रुक जाती है। भोजन नहीं बनाने के कारण खरपतवार नष्ट हो जाते हैं। इससे खरपतवारनाशी दवा व मानव श्रम की बचत होगी। मृदा के तापमान को अनुकूल बनाने के लिए। पौधों के ऊपरी भाग का मृदा से संपर्क नहीं होने से रोगों का संक्रमण कम होता है। टमाटर आदि सब्जियों के फल मृदा के संपर्क में नहीं आने से गुणवत्ता में सुधार होता है। पानी के साथ लीचिंग (पानी का भूमि मे नीचे जाना) क्रिया के साथ पोषक तत्वों का ह्रास कम होता है। वाष्पीकरण के साथ-साथ नाइट्रोजन का भी गैसीय अवस्था में उड़कर नुकसान नहीं होने के कारण उर्वरकों की बचत व उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। लवणीय मृदा में प्लास्टिक पलवार का प्रयोग करने से मृदा की ऊपरी सतह पर वाष्पीकरण कम होने से नमी की उपलब्धता ज्यादा समय तक बनी रहती है। पौधों के जड़ क्षेत्र में नमी तनाव कम रहता है। इसके फलस्वरूप लवणीय मृदा में लवणों की सांद्रता जड़ क्षेत्र में कम रहती है। इससे उत्पादन पर विपरीत असर नहीं पड़ता है। पलवार मृदा को वर्षा की बूंदों के सीधे घात से बचाती है। इससे मृदा ह्रास नहीं होता है तथा उसकी संरचना में भी परिवर्तन नहीं होता है। मृदा ढकी होने से जैविक अपशिष्ट व उपजाऊ तत्व तेज हवा के साथ उड़ने से बच जाते हैं। जल भराव की स्थिति में भी फसलों को नुकसान नहीं होता है। क्यारी पर बुआई व रोपाई करने जड़ों में वायु संचार अनुकूल होने तथा पौधों की अधिक वृद्धि होने से अधिक पैदावार मिलती है। निवेदन लेखक बंधु फल फूल पत्रिका के लिए अपने लेख और संबंधित फोटो, कवरिंग लैटर के साथ सिर्फ ई-मेल पर ही भेजें। ध्यान रखें कि फोटो जेपीजे फॉर्मेट में और उच्च रेज्योल्यूशन की हों। लेख में अधिकतम 1200 शब्दों की संख्या रखने का प्रयास करें। इसके अतिरिक्त सुझाव और प्रतिक्रियाएं भी ई-मेल के माध्यम से भेज सकते हैं। भेजने के लिए कृपया कृतिदेव 010 टाइप फेस का प्रयोग करें। हमारा ई-मेल है : phalphul@gmail.com