ब्रोकली एक विदेशीमूल की सब्जी है, जिसका गोभीवर्गीय फसलों में एक विशेष स्थान है। ब्रोकली का वानस्पतिक नाम ब्रेसिका ओलेरेसिआ वेरा. इटैलिएका है तथा इसका कुल ब्रेसिकैसी है। यह एक पौष्टिक इटालियन गोभी है, जिसे मूलतः सलाद, सूप, व सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है। गोभीवर्गीय फसलों (पत्तागोभी और फूलगोभी) की तुलना में ब्रोकली में विटामिन ‘ए’, प्रोटीन तथा खनिज (कैल्शियम, फास्फोरस एवं लौह तत्वों) की प्रचुरता पायी जाती है। यह एक शीत जलवायु वाली फसल है, जिसकी खेती भारत में सर्दियों के समय उन सभी स्थानों पर की जा सकती है, जहां वर्षा सामान्य रूप से कम होती है। यदि दिन अपेक्षाकृत छोटे हों, तो फूल की बढ़ोतरी अधिक होती है। मृदा इस फसल की सफल खेती के लिये बलुई दोमट मृदा, जिसमें पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद हो, इसके साथ ही पी-एच मान 6.0-6.8 हो, बहुत उपयुक्त होती है। उन्नत किस्में ब्रोकली की हरे रंग की गठी हुई शीर्ष वाली किस्में अधिक पसंद की जाती हैं। इनमें केलेब्रेस, पालम उपहार, पालम समृद्धि, इत्यादि प्रमुख हैं। के.टी.एस.-1 (पूसा ब्रोकली) इस किस्म के शीर्ष हरे रंग के कोमल डंठलयुक्त होते हैं, जिनका औसत वजन 200-300 ग्राम होता है और रोपाई के लगभग 80-90 दिनों बाद काटने योग्य हो जाती है। मुख्य शीर्ष काटने के कुछ दिनों बाद छोटे-छोटे शीर्ष शाखाओं की तरह मुख्य भाग के रूप में पत्तियों के कक्षों से निकलते हैं, उन्हें भी काटकर उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। डी.पी.जी.आर.-1 (पालम समृद्धि) यह किस्म भी हरे शीर्ष वाली स्प्राउटिंग ब्रोकली किस्म है, जिसका शीर्ष भाग बड़ा एवं लंबे कोमल डंठलयुक्त होता है। प्रत्येक शीर्ष का औसत वजन 250-300 ग्राम होता है। मुख्य शीर्ष को काटने के बाद छोटे-छोटे शीर्ष, पत्तों के कक्षों से निकलते हैं। यह किस्म 85-90 दिनों में रोपाई के बाद कटाई योग्य हो जाती है। इसमें येलो आई रोग एवं ब्रैक्टिंग विकार के लिए प्रतिरोधिता पायी जाती है। संकर किस्में सदर्न कॉमेट, क्लिपर, लेजर, प्रीमियम क्रॉप, स्टिफ, क्रूजर, ग्रीन सर्फ इत्यादि प्रमुख हैं। खेत की तैयारी खेत की तैयारी के लिए दो जुताई पर्याप्त होती है, जिसमें अच्छी सड़ी गोबर की खाद दो क्विंटल प्रति नाली की दर से मिलाकर रोपाई के लिए भलीभांति खेत तैयार करना चाहिए। खेत में पानी रुकना नहीं चाहिए अन्यथा पौधों की वृद्धि रुक जाती है और पौधे पीले पड़कर सड़ने लग जाते हैं। बीज बुआई का समय ब्रोकली बीजों के अंकुरण के लिए उचित तापमान 25-30 डिग्री सेल्सियस अनुकूल रहता है अथवा अच्छे शीर्षों के निकलने एवं विकास के लिए 16-20 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है। बीज दर ब्रोकली के लिए 375-400 ग्राम बीज प्रति हैक्टर (7-8 ग्राम प्रति नाली) पर्याप्त होता है। पौधशाला की तैयारी जमीन से 15 सें.मी. उठी हुई नर्सरी की क्यारी में अच्छी सड़ी हुई गोबर/कम्पोस्ट खाद 50-60 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से तथा सिंगल-सुपर-फास्फेट मिलाकर मृदा की तैयारी करनी चाहिए। पौधशाला में भूमिगत कीटों एवं व्याधियों से बचाव के लिए यह उपाय अपनायें। अधिक वर्षा से बचाव के लिए नर्सरी की क्यारी को घासपफूस का छप्पर अथवा पॉलीथीन शीट से ढकने का प्रबंध रखना चाहिए। बेमौसमी खेती के लिए पौध, पॉलीहाउस अथवा पॉलीटनल के अन्दर तैयार करनी चाहिए। रोपाई रोपाई के लिए 4 से 6 सप्ताह आयु की पौध उपयुक्त होती है। रोपाई से पूर्व नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा और 500 ग्राम थीमेट प्रति नाली की दर से खेत में छिड़ककर अच्छी तरह खेत तैयार कर लें। उसके बाद पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सें.मी. तथा पौध से पौध की दूरी 45 सें.मी. रखते हुये पौध की रोपाई कर, हल्की सिंचाई करें। यदि रोपाई के बाद भी कुछ पौधे मर गये हों अथवा वृद्धि अच्छी न हो तो उनके स्थान पर नई पौध की पुनः रोपाई एक हफ्रते के अन्दर कर दें। रोपाई के 30 और 45 दिनों बाद क्रमशः शेष नाइट्रोजन की मात्रा दो भागों में छिड़ककर, पौधों के चारों तरफ मिट्टी चढ़ायें। उर्वरक उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना उपयुक्त रहता है। अच्छी उपज के लिए प्रति हैक्टर 30-35 टन गोबर/ कम्पोस्ट खाद, 100-150 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 80-100 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 100-120 कि.ग्रा. पोटाश का प्रयोग अधिक उपज के लिए किया जाना अनुकूल होता है। खरपतवार नियंत्रण शुरू के डेढ़ से दो माह तक खेत से खरपतवार निकालते रहें, जिससे पौधों की वृद्धि अच्छी हो सके। इसके लिए आवश्यकतानुसार 2 से 3 निराई व गुड़ाई पर्याप्त होगी। कीट नियंत्रण माहूं इस कीट के वयस्क तथा शिशु दोनों ही मुलायम पत्तियों से रस चूसकर पौधों को हानि पहुंचाते हैं। पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती हैं। प्रकोप अधिक होने पर गोभी के शीर्षों में भी माहूं दिखायी पड़ते हैं। इसके नियंत्राण के लिए एजेडारेक्टिन 1-2 मि.ली. अथवा इमिडाक्लोप्रिड 0.3 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। गोभी की तितली यह एक सफेद रंग की तितली है, जिसके पीले रंग के अंडे गुच्छे में पत्तियों की पिछली सतह पर बहुतायत में दिखाई पड़ते हैं। अंडाें से निकलने वाली शुरुआती अवस्था से ही पत्तियों को भारी मात्रा में क्षति पहुंचती है। फसल की कटाई ब्रोकली की फसल पौध की रोपाई के 65-70 दिनों बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। ब्रोकली के शीर्ष की कटाई शीर्ष की कलियों के खुलने से पहले ही की जाती है। शीर्ष को 6-10 सें.मी. तने (डंठल) एवं कुछ पत्तियों के साथ, दांती या तेज धार वाले चाकू की सहायता से काट लिया जाता है। उपज ब्रोकली की औसत उपज 100-150 क्विंटल प्रति हैक्टर (2-3 क्विंटल प्रति नाली) है। रोग नियंत्रण इस फसल में रोगों का प्रकोप अधिक नहीं होता है, किन्तु रोपाई के बाद कुछ कीटों एवं व्याधियों का प्रकोप हो सकता हैः आर्द्रपतन यह रोग नर्सरी में पिथियम, राइजोक्टोनिया अथवा फ्यूजेरियम नामक कवक द्वारा लगता है। इसमें पौधे अंकुरण के तुरन्त बाद मर जाते हैं। रोकथाम के लिए उपचारित बीजों का प्रयोग करें तथा क्यारियों में कैप्टाॅन नामक दवा की 2 मि.ली. मात्रा/लीटर पानी की दर से भलीभांति उपचार कर देना चाहिए। जड़ विगलन इस रोग के कारण रोपाई के उपरान्त कुछ पौधों की बढ़वार रुकी हुई दिखायी पड़ती है। पौधों को उखाड़कर देखने पर पता चलता है कि इनकी जड़ें गलकर केवल एक तार की तरह हो गई हैं। इसकी रोकथाम के लिए बीज उपचार, आर्द्रगलन रोग जैसा करें। रोपाई के समय पौध को दवा के घोल में डुबोकर लगायें तथा रोग के लक्षण खेत में दिखाई देने पर कार्बेन्डाजिम का 0.1 प्रतिशत की दर (एक ग्राम/लीटर पानी) से घोल बनाकर पौधों की जड़ों के पास छिड़काव करें तथा उचित फसलचक्र भी अपनायें। स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर),मनीष कुमार, विनोद कुमार कुड़ी, रामधन जाट और पवन चाैधरी श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर, जयपुर-303329 (राजस्थान)