<h3 style="text-align: justify;">आलू से बिजली पैदा करने की तैयारी</h3> <p style="text-align: justify;"> दुनियाभर में बिजली पैदा करने के लिए ५नए विकल्पों की तलाश की जा रही है। कोयले और पानी से चलने वाले पॉवर ग्रिडों में बिजली पैदा करने से पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है। ऐसे में कई शोधकर्ता आलू से बिजली पैदा करने के मिशन में लगे हुए हैं। एक साइंस जर्नल में प्रकाशित लेख के अनुसार क्या बल्ब जलाने और घरों को रोशन करने के लिए बिजली ग्रिड की जगह आलू का इस्तेमाल संभव है? शोधकर्ता राबिनोविच और उनके सहयोगी पिछले कुछ वर्षों से लोगों को यही करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। यह सस्ती धातु की प्लेट्स, तारों और एलईडी बल्ब को जोडकर किया जाता है। उनका दावा है कि यह तकनीक दुनियाभर के छोटे कस्बों और गांवों को रोशन कर सकती है।</p> <p style="text-align: justify;">येरुशलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी के राबिनोविच का दावा है, 'एक आलू चालीस दिनों तक एलईडी बल्ब को जला सकता है।' राबिनोविच इसके लिए कोई नया सिद्धांत नहीं दे रहे हैं। यह सिद्धांत हाईस्कूल की किताबों में पढ़ाया जाता है और बैटरी इसी पर काम करती है। इसके लिए जरूरत होती है दो धातुओं की-पहला एनोड, जो निगेटिव इलैक्ट्रोड है, जैसे कि जिंक और दूसरा कैथोड जो पॉजीटिव इलेक्ट्रोड है, जैसे कॉपर यानी तांबा।</p> <p style="text-align: justify;">आलू के भीतर मौजूद एसिड, जिंक और तांबे के साथ रासायनिक क्रिया करता है और जब इलैक्ट्रॉन एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ की तरफ जाते हैं तो ऊर्जा पैदा होती है। इसकी खोज वर्ष 1780 में लुइगी गेल्वनी ने की थी, जब उन्होंने मेंढक की मांसपेशियों को झटके से खींचने के लिए दो धातुओं को मेंढक के पैरों में बांधा था। इसी प्रभाव को पाने के लिए इन दो इलेक्ट्रोड्स के बीच कई पदार्थ रख सकते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">एलेक्जेंडर वोल्टा ने नमक के पानी में भीगे हुए कागज का इस्तेमाल किया था। अन्य शोधों में धातु की दो प्लेट्स और मिट्टी के एक ढेर या पानी की बाल्टी से 'अर्थ बैटरियां' बनाई गई थीं। वर्ष 2010 में राबिनोविच ने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के एलेक्स गोल्डबर्ग और बोरिस रुबिस्की के साथ इस दिशा में एक और कोशिश करने की ठानी। गोल्डबर्ग बताते हैं हमने 20 अलग-अलग तरह के आल देखेऔर उनकी आंतरिक प्रतिरोध की जांच की। इससे हमें यह समझने में मदद मिली कि गरम होने से कितनी ऊर्जा नष्ट हुई।इस प्रकार आल को आठ मिनट उबालने से आलू के अंदर कार्बनिक ऊतक टूटने लगे, प्रतिरोध कम हुआ और इलैक्ट्रॉन्स ज्यादा मूवमेंट करने लगे, इससे अधिक ऊर्जा बनी।आलू को चार-पांच टुकड़ों में काटकर इन्हें तांबे और जिंक की प्लेट के बीच रखा गया। इससे ऊर्जा 10 गुना बढ़ गई यानी बिजली बनाने की लागत में कमी आई।राबिनोविच कहते हैं, "इसकी वोल्टेज कम है, लेकिन ऐसी बैटरी बनाई जा सकती है, जो मोबाइल या लैपटॉप को चार्ज कर सके। एक आलू उबालने से पैदा हुई बिजली की लागत 9 डॉलर प्रति किलोवाट घंटा आई, जो डी-सेल बैटरी से लगभग 50 गुना सस्ती थी।विकासशील देशों में जहां केरोसिन (मिट्टी का तेल) का इस्तेमाल अधिक होता है, वहां भी यह छह गुना सस्ती थी। दुनिया में करोड़ों लोग बिजली से वंचित हैं और एक आलू उनका घर रोशन कर सकता है।<strong> मामला जटिल? </strong>शायद यह इतनी सीधी बात नहीं है. मामला कुछ जटिल है। पहली वजह है। यह मुद्दा 'बिजली के लिए खाद्यान्न' से जुड़ा है। संयुक्त राष्ट्र के कृषि और खाद्य संगठन का कहना है कि गन्ने या जैव ईंधन से ऊर्जा बनाने से बचना चाहिए। पहली आवश्यकता इस बात को देखने की है कि क्या खाने के लिए पर्याप्त आलू हैं? केन्या जैसे देश में लोगों के लिए मक्का के बाद आलू सबसे प्रमुख आहार है। विशेषज्ञों के अनुसार भंडारण न किए जाने या अन्य वजहों से नष्ट होने वाले आलू को बचाने के लिए इसे जरूर ऊर्जा पैदा करने के काम में लगा सकते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"> </p>