<h3 style="text-align: justify;">परिचय </h3> <p style="text-align: justify;">आलू का उद्गम स्थल दक्षिणी अमेरिका के पेरू एवं बोलिविया के पास लेक टिटिकाका के समीप एंडीज पर्वत में माना जाता है। सोलहवीं शताब्दी में आलू, यूरोप पहुंचा और वहां से आलू का प्रसार विश्वभर में हुआ। भारत में आलू का आगमन संभवतः 17वीं शताब्दी के शुरू में पुर्तगाली व्यापारियों द्वारा लायी गयी किस्मों के साथ हुआ, लेकिन आयातित किस्में भारत में सफल नहीं हो पायीं। यह निर्णय लिया गया कि देश में आयातित किस्मों पर निर्भर रहना ठीक नहीं है। देश में आलू की नई किस्मों का प्रजनन कार्यक्रम 1935 में तत्कालीन इंपीरियल और अब भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के आलू प्रजनन केन्द्र, शिमला में शुरू किया गया। खाद्य उत्पादों में आलू के महत्व को देखते हुए भारत में एक स्वतंत्र आलू अनुसंधान संस्थान स्थापित करने की आवश्यकता महसूस हुई। इसके फलस्वरूप वर्ष 1949 में केन्द्रीय आलू अनसंधान संस्थान की स्थापना पटना (बिहार) में की गयी। बाद में वर्ष 1956 में संस्थान का मख्यालय शिमला (हिमाचल प्रदेश) में स्थानांतरित हो गया।</p> <p style="text-align: justify;"> केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान द्वारा वर्ष 1958 से देश के विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों, फसलचक्र प्रणालियों तथा रोग व कीट प्रतिरोधिता के लिए आलू की सुधरी किस्में विकसित कर जारी की जा रही हैं। संस्थान द्वारा अब तक 66 उन्नतशील किस्मों का विकास किया गया है। सबसे पहले आलू की कुफरी सफेद व कुफरी रेड नामक की दो किस्मों को क्रमशः आलू की फुलवा तथा दार्जलिंग रेड राउंड नामक देसी किस्मों के क्लोन चयन द्वारा तैयार किया गया। संस्थान द्वारा जारी शेष 64 किस्में संकर हैं। संस्थान द्वारा जारी 66 किस्मों में से 57 किस्मों के कंदों का रंग सफेद या हल्का पीला है, जबकि पूर्वी मैदानी इलाकों के उपभोक्ताओं की लाल कंद वाली किस्मों के प्रति पसंद को देखते हुए लाल रंग के कंदों वाली आठ किस्मों का भी विकास किया गया है। इसकी खेती से सफेद आलू की तुलना में किसानों को बाजार से अधिक कीमत प्राप्त होती है। संस्थान द्वारा बैंगनी रंग के कंदों वाली अधिक पोषण प्रदान करने वाली किस्म कुफरी नीलकंठ को भी खेती करने के लिए जारी किया गया है। संस्थान द्वारा आलू के प्रसंस्करण पर ध्यान देते हुए 8 किस्मों का विकास मुख्य रूप से चिप्स व फ्रेंच फ्राइज बनाने के लिए किया गया है। कुफरी सूर्या एवं कुफरी लीमा किस्मों को उच्च तापमान वाले इलाकों में उगाकर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। आलू के अधिक उत्पादन के लिए सही किस्म का चुनाव महत्वपूर्ण है। इसके लिए आलू उत्पादकों को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:</p> <h3 style="text-align: justify;">आलू की महत्वपूर्ण किस्में</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>किस्म क्षेत्र विशेष के लिए उपयुक्त हो। </li> <li> कम समय में तैयार होने वाली हो या शीघ्र कंद बनाने की क्षमता रखती</li> <li>अधिक उत्पादन देने की क्षमता हो।</li> <li> झुलसा रोग प्रतिरोधी हो। सामान्य विषाणु प्रतिरोधक क्षमता वाली हो, जिससे बीज स्टाक की गुणवत्ता लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सके।</li> <li>उच्च तापमान व पाले को सहने की क्षमता हो।</li> <li>अच्छी भंडारण क्षमता वाली हो।</li> <li>प्रसंस्करण के लिए किस्म में अधिक सूखा तत्व (> 20 प्रतिशत), कम अवकारक शर्करा (< 150 मि.ग्रा. /100 ग्राम ताजा आलू) तथा तलने पर सुन्दर हल्के रंग की चिप्स व फ्रेंच फ्राइज प्रदान करने जैसे गुणों का समावेश हो।</li> </ul> <p style="text-align: justify;">इस प्रकार यदि उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखकर हमारे किसान भाई खेती करें तो निश्चित तौर पर उन्हें अच्छी उपज प्राप्त होगी तथा वे अधिक लाभ भी कमा सकते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">आलू की सफेद या पीले रंग वाली किस्में</h3> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी पुष्कर</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद पीले, अंडाकार, मध्यम-गहरी आंखों वाले तथा गूदा क्रीमी होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। यह किस्म लगभग 90 से 100 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी उपज क्षमता 300 से 350 क्विंटल प्रति हैक्टर है। यह किस्म पिछेता झुलसा रोग प्रतिरोधी है। इस किस्म में शुष्क पदार्थ की मात्रा 17-18 प्रतिशत होती है। इसकी भंडारण क्षमता उच्च कोटि की है।</p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी सदाबहार</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद सफेद, आकर्षक, अंडाकार, सतही आंखों वाले व गूदा सफेद होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है और फसल 80 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार 300 से 350 क्विंटल प्रति हैक्टर है। यह पिछेता झुलसा रोग की मध्यम प्रतिरोधी है। इस किस्म में कंद बनने की प्रक्रिया जल्दी शुरू होती है। इस किस्म में शुष्क पदार्थ की मात्रा 18-19 प्रतिशत होती है और इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है। इसे नवंबर के पहले सप्ताह में लगाकर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।</p> <h4 style="text-align: justify;"> कुफरी गरिमा</h4> <p style="text-align: justify;">इसके कंद हल्के पीले आकर्षक, अंडाकार, सतही आंखों वाले तथा गूदा हल्का . पीला होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। फसल 80 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार 300 से 350 क्विंटल प्रति हैक्टर है। यह किस्म झुलसा रोग कुफरी गरिमा की प्रतिरोधी है। इस किस्म में शुष्क पदार्थ की मात्रा 18-19 प्रतिशत होती है व इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है।</p> <h4 style="text-align: justify;"> कुफरी गौरव</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद सफेद-क्रीमी, अंडाकार, मध्यम गहरी आंखों वाले तथा गुदा सफेद-क्रीमी होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। इसकी फसल 90 से 100 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार 300 से 350 क्विंटल प्रति हैक्टर है। यह किस्म अन्य किस्मों की तुलना में पोषक तत्वों (नाइट्रोजन) का कम अवशोषण करती है। इसमें शुष्क पदार्थ की मात्रा 16-17 प्रतिशत होती है व इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है। </p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी मोहन</h4> <p style="text-align: justify;"> यह किस्म मैदानी क्षेत्रों में मुख्य फसल के रूप में लगाने के लिए उपयुक्त है। इस किस्म के कंद सुन्दर सफेद, अंडाकार, उथली आंखें व गूदा सफेद होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। यह फसल 90 से 100 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार 350 से 400 क्विंटल प्रति हैक्टर है। इसमें पिछेता झुलसा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधकता है। इस किस्म में शुष्क पदार्थ की मात्रा 15-18 प्रतिशत होती है और इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है। </p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी गंगा</h4> <p style="text-align: justify;">यह किस्म मैदानी क्षेत्रों में मुख्य फसल के रूप में लगाने के लिए उपयुक्त है। इसके कंद सुन्दर सफेद-क्रीमी, अंडाकार, उथली आंखें व गूदा क्रीमी होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। इस किस्म से लगभग 350 से 400 क्विंटल प्रति हैक्टर तक उपज</p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी ख्याति</h4> <p style="text-align: justify;"> इस किस्म के कंद सफेद-क्रीमी, अंडाकार, मध्यम-गहरी आंखों वाले तथा गूदा क्रीमी होता है। यह अगेती-मध्यम अवधि वाली किस्म है। यह लगभग 70 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है। अगेती खुदाई वाली फसल के रूप में इसकी पैदावार क्षमता 250 से 300 क्विंटल प्रति हैक्टर है। मुख्य फसल से इस किस्म की पैदावार 350 से 400 क्विंटल/हैक्टर तक ली जा सकती है। यह किस्म अगेती और पिछेता झुलसा की प्रतिरोधी है। इस किस्म में आलू बनने की प्रक्रिया जल्दी शुरू होती है। इस किस्म में शुष्क पदार्थ की मात्रा 16-17 प्रतिशत होती है और इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है।</p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी लीलिमा</h4> <p style="text-align: justify;">यह किस्म मैदानी क्षेत्रों में अगेती फसल में लगाने के लिए उपयुक्त है। इसमें अधिक तापमान के साथ-साथ हॉपर और माईट कीटों के प्रति सहनशीलता भी है। इसके कंद सुन्दर सफेद-क्रीमी, अंडाकार, उथली आंखें और गूदा क्रीमी होता है। इस किस्म को मुख्य फसल से 15-20 दिनों पहले लगाकर लगभग 300 से 350 क्विंटल प्रति हैक्टर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। मध्य सितंबर में लगाई अगेती फसल से लगभग 150-200 क्विंटल उपज प्राप्त की जा सकती है। अगेती आलू फसल के ताजा उत्पाद की सर्दियों के त्योहारी दिनों में अच्छी मांग के कारण मुनाफा भी अधिक मिलता है। इस किस्म में शुष्क पदार्थ की मात्रा 18-19 प्रतिशत होती है। इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ww17.jpg" width="160" height="115" /></p> <h4 style="text-align: justify;"> कुफरी अरुण</h4> <p style="text-align: justify;">इसके कंद लाल, अंडाकार, मध्यम-गहरी आंखों वाले तथा गूदा क्रीमी होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। इसकी फसल 80 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है। यह किस्म पिछेता झुलसा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधी है। इसकी पैदावार 300 से 350 क्विंटल प्रति हैक्टर है। इसकी भंडारण क्षमता सामान्य है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ww16.jpg" width="160" height="125" /></p> <h4 style="text-align: justify;"> कुफरी नीलकंठ</h4> <p style="text-align: justify;">यह मैदानी इलाकों में मुख्य फसल में लगाने के लिए भोज्य आलू की विशेष किस्म है। इसके कंद सुन्दर बैंगनी, अंडाकार, उथली आंखें व गूदा पीला होता है। सेहत की दृष्टिकोण से इस किस्म में एंटीऑक्सीडेंट (एनथो-सायनीन व करोटीनोइड्स) की मात्रा अन्य लाल रंग वाली किस्मों से अधिक है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। इस किस्म से लगभग 350 से 380 क्विंटल प्रति हैक्टर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। इस किस्म में शुष्क पदार्थ की मात्रा 17-18 प्रतिशत तक होती है। इसमें पिछेता झुलसा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधिता है और इसकी भंडारण क्षमता भी अच्छी है। </p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी माणिक</h4> <p style="text-align: justify;">यह किस्म पूर्वी मैदानी इलाकों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इस किस्म के कंद लाल, गोल, मध्यम-गहरी आंखों वाले तथा गूदा पीला होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। इसकी फसल 90 से 100 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी उपज क्षमता लगभग 250 से 300 क्विंटल प्रति हैक्टर है। इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है। शुष्क पदार्थ की मात्रा 19 प्रतिशत होती है। यह किस्म झुलसा रोग की प्रतिरोधी है।</p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी शैलजा</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद सफेद-क्रीमी. अंडाकार, उथली आंखें और गूदा सफेद होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। फसल 100 से 120 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार लगभग 300 से 350 क्विंटल प्रति हैक्टर है। यह पिछेता झुलसा रोग से मध्यम प्रतिरोधी है। इसमें शुष्क पदार्थ की मात्रा 18-19 प्रतिशत होती है। इसकी भंडारण क्षमता औसत है। </p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी सूर्या</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद पीले, लंबे अंडाकार, सतही आंखों वाले व गूदा पीला होता है। फसल 70 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है। मध्य सितंबर में लगाई अगेती फसल से लगभग 150-200 | क्विंटल उपज प्राप्त की जा सकती है. जबकि अक्टूबर के पहले सप्ताह में इसकी पैदावार 250 से 300 क्विंटल प्रति हैक्टर है। यह किस्म पिछेता झुलसा से सुग्राही है। यह मैदानी क्षेत्रों में अगेती फसल में लगाने के लिए उपयुक्त है। इसमें अधिक तापमान के साथ-साथ हॉपर व माईट कीटों के प्रति सहनशीलता भी है। इस किस्म में शुष्क पदार्थ की मात्रा 18-19 प्रतिशत होती है व इसकी भंडारण क्षमता उच्च कोटि की है।</p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी नीलिमा</h4> <p style="text-align: justify;"> इस किस्म के कंद सफेद, अंडाकार, उथली आंखें व गूदा सफेद होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। फसल 100 से 120 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार लगभग 250 से 300 क्विंटल प्रति हैक्टर है। इसमें पिछेता झुलसा रोग की प्रतिरोधकता है। यह किस्म सिस्ट निमेटोड की भी अधिक प्रतिरोधी है। इसमें शुष्क पदार्थ की मात्रा 18-19 प्रतिशत तक होती है। इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है। यह किस्म नीलगिरी पहाडियों में खेती के लिए उपयुक्त है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>भारत के पहाड़ी इलाकों में खेती के लिए उपयुक्त है</strong></p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी गिरधारी</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद सफेद-क्रीमी. अंडाकार, उथली आंखें व गूदा सफेद होता है। यह मध्यम से पिछेती अवधि वाली किस्म है। फसल 110 से 130 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार लगभग 300 से 350 क्विंटल प्रति हैक्टर है। इसमें पिछेता झुलसा रोग से बहुत अधिक प्रतिरोधकता है व शुष्क पदार्थ की मात्रा 18-19 प्रतिशत तक होती है। इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है। यह किस्म भारत के पहाडी इलाकों में खेती के लिए उपयुक्त है।</p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी हिमालिनी</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद सफेद-क्रीमी और अंडाकार होते हैं तथा मध्यम गहरी आंखें व गूदा क्रीमी होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। फसल 100 से 120 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार लगभग 300 से 350 क्विंटल प्रति हैक्टर है। यह पिछेता झुलसा रोग की मध्यम प्रतिरोधी है। इसमें शुष्क पदार्थ की मात्रा 19-20 प्रतिशत होती है। इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है। यह किस्म उत्तर भारत के पहाडी इलाकों में खेती के लिए उपयुक्त है।</p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी सहयाद्री</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद हल्के पीले अंडाकार, उथली मध्यम आंखें व गूदा पीला होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। फसल 100 से 120 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार लगभग 300 से 320 क्विंटल प्रति हैक्टर है। इसमें पिछेता झुलसा रोग से प्रतिरोधकता है। यह किस्म सिस्ट निमेटोड की दोनों स्पीशीज की अत्याधिक प्रतिरोधी है। इसमें शुष्क पदार्थ की मात्रा 19 प्रतिशत तक होती है। इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है। यह किस्म नीलगिरी पहाड़ियों में खेती के लिए उपयुक्त है। </p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी कर्ण</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद सफेद-क्रीमी अंडाकार, उथली आंखें व गूदा सफेद होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। फसल 100 से 120 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार लगभग 250 से 300 क्विंटल प्रति हैक्टर है। इसमें पिछेता झलसा रोग की प्रतिरोधकता है व शुष्क पदार्थ की मात्रा 17-20 प्रतिशत तक होती है। इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है। इस किस्म में कुछ वायरस के प्रति रोधिता भी है। यह किस्म पठारी और पहाड़ी इलाकों में खेती के लिए उपयुक्त है। </p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी फ्राईसोना</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद आकर्षक सफेद-क्रीमी, लंबे-अंडाकार, सतही आंखों वाले तथा गूदा सफेद होता है। फसल 110-120 दिनों में तैयार हो जाती है। देश के मैदानी इलाकों में रबी की फसल में लगभग 300-350 क्विंटल प्रति हैक्टर कंद की पैदावार होती है। इसमें उच्च कंद शुष्क पदार्थ की मात्रा (22 प्रतिशत) और कम अवकारक शर्करा (30-80 मि.ग्रा. प्रति 100ग्राम ताजा आलू) पाई जाती है। यह किस्म पिछेता झुलसा रोग की प्रतिरोधी है। इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है। इस किस्म के कंद फ्रेंच फ्राइज बनाने के लिए उपयुक्त हैं।</p> <p style="text-align: justify;"> </p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी ललित </h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद हल्के लाल, गोल, मध्यम-गहरी आंखों वाले तथा गूदा हल्का पीला होता है। यह मध्यम अवधि वाली किस्म है। इसकी फसल 90 से 100 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी उपज क्षमता लगभग 300 से 350 क्विंटल प्रति हैक्टर है। यह किस्म झुलसा रोग की प्रतिरोधी है व इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है।</p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी फ्राईओम</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद आकर्षक सफेद, लंबे-अंडाकार, सतही आंखों वाले तथा गूदा सफेद होता है। फसल 100-110 दिनों में तैयार हो जाती है। मैदानी इलाकों में रबी की फसल में लगभग 300-350 क्विंटल प्रति हैक्टर पैदावार होती है। इसमें 20 प्रतिशत शुष्क पदार्थ और कम अवकारक शर्करा (50-90 मि.ग्रा. प्रति 100 ग्राम ताजा आलू) तथा इसमें बहुत अच्छी गुणवत्ता वाले फ्रेंच फ्राइज तैयार किए जा सकते हैं। यह किस्म पिछेता झुलसा रोग की सामान्य प्रतिरोधी है। इसमें आलू वायरस वाई से भी प्रतिरोधिता है। इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है।</p> <p style="text-align: justify;">किसानों को उपयुक्त किस्म का चुनाव अपने क्षेत्रों की जलवायु व विशेष उद्देश्यों के अनुसार करना चाहिए। किसान यह भी ध्यान रखें कि चुनी गयी किस्म झुलसा रोग प्रतिरोधी हो। इससे रोगनाशक दवाओं के इस्तेमाल से बचा जा सकेगा तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होगा। बैंगनी रंग वाली किस्म कुफरी नीलकंठ को विशिष्ट आलू किस्म के रूप में उगाकर अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। इसके उपभोग से उपभोक्ताओं को अच्छा पोषण भी मिलेगा। इस प्रकार उपयुक्त उन्नत किस्मों का चुनाव कर किसान अपने खेत से आलू की अधिक पैदावार ले सकते हैं तथा आर्थिक समृद्धि की ओर अग्रसर हो सकते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">आलू की चिप्स वाली किस्में</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ww15.jpg" width="160" height="125" /></p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी चिप्सोना</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद सफेद-क्रीमी, अंडाकार, सतही आंखों वाले तथा गूदा सफेद होता है। फसल 110-120 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार लगभग 300 से 350 क्विंटल प्रति हैक्टर तक है। यह किस्म पिछेता झुलसा रोग प्रतिरोधी है। इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है। इस किस्म के कंदों में अवकारक शर्करा 10-100 मि.ग्रा. प्रति 100 ग्राम ताजा आलू और कुफरी चिप्सोना शुष्क पदार्थ की मात्रा 20-23 प्रतिशत तक होती है। इस किस्म के कंद चिप्स बनाने के लिए उपयुक्त हैं। </p> <h4 style="text-align: justify;">कुफरी हिमसोना</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद सफेद-क्रीमी, गोल-अंडाकार, सतही आंखों वाले तथा गूदा क्रीमी होता है। फसल 120-130 दिनों में तैयार हो जाती है। यह किस्म देश के पहाड़ी क्षेत्रों में लगभग 15-20 क्विंटल प्रति हैक्टर पैदावार देती है। मैदानी क्षेत्रों में इस किस्म से लगभग 300-350 क्विंटल उपज प्राप्त की जा सकती है। इसके कंदों में अवकारक शर्करा 10-80 मि.ग्रा. प्रति 100 ग्राम ताजा आलू और शुष्क पदार्थ की मात्रा 21-24 प्रतिशत तक होती है। यह किस्म पिछेता झुलसा रोग की मध्यम प्रतिरोधी है। इसकी भंडारण क्षमता अच्छी है। इस किस्म के कंद चिप्स तथा लच्छा बनाने के लिए उपयुक्त हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;"> कुफरी चिप्सोना</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म के कंद सफेद-क्रीमी, गोल-अंडाकार, सतही आंखों वाले तथा गूदा सफेद होता है। फसल 100-110 दिनों में तैयार हो जाती है। यह कर्नाटक में खरीफ की फसल के दौरान लगभग 180-220 क्विंटल प्रति हैक्टर उपज और देश के मैदानी इलाकों में रबी फसल में लगभग 300-350 क्विंटल प्रति हैक्टर उपज देती है। यह अपने गोल-अंडाकार कंद, शुष्क पदार्थ की मात्रा (20 प्रतिशत से अधिक) और कम अवकारक शर्करा (40-80 मि.ग्रा. प्रति 100 ग्राम ताजा आलू) के कारण चिप्स बनाने के लिए उपयुक्त है। यह कर्नाटक, <a href="../../../../../../../e-governance/93093e91c94d92f/92a93694d91a93f92e-92c90291793e932">पश्चिम बंगाल</a> व मध्य प्रदेश के लिए उपयुक्त किस्म है, जहां प्रसंस्करण के लिए उच्च कंद उपज और उच्च स्तर की पिछेता झुलसा रोग प्रतिरोधिता के संयोजन की आवश्यकता होती है। अच्छी भंडारण क्षमता से इस किस्म को लंबी अवधि के लिए रखने में मदद मिलती है और इस तरह कच्चे माल की वर्षभर उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान परिसर, मोदीपुरम, मेरठ-250110 (उत्तर प्रदेश) (सतीश कुमार लूथरा, विजय किशोर गुप्ता, विनोद कुमार, जागेश कुमार तिवारी,दलामु , विनय भारद्वाज, राज कुमार और शम्भू कुमार)।</p>