मोरिंगा ओलिफेरा अर्थात सहजन प्राचीनकाल से उगाया जाने वाला वृक्ष है। दक्षिण भारत में इसका उपयोग अत्यधिक है। वहां इसे सेंजन, मुनगा या सहजन के नाम से जाना जाता है। इसमें 46 तरह के एंटीऑक्सीडेंट, 92 तरह के मल्टीविटामिन, 36 तरह के दर्द निवारक और 18 तरह के अमीनो अम्ल होते हैं। सहजन की पत्ती, पूफल, छाल, जड़, लकड़ी का उपयोग भोजन, चारा, औषधि, ईंधन, खाद एवं मूल्यवर्धित उत्पादों के रूप में होता है। सहजन की उत्पत्ति भारतीय उपमहाद्वीप के उपहिमालयन इलाकों से हुई है। इसकी 18 प्रजातियां अरेबिया भारत की उपहिमालयन पवर्तमाला, मेडागास्कर उत्तर-पूर्वी व दक्षिणी-पूर्वी अफ्रीका, श्रीलंका में पायी जाती हैं। वानस्पतिक परिचय यह तीव्र गति से बढ़ने वाला सदाबहार छोटे आकार का लगभग 10-15 मीटर लंबा पेड़ होता है। इसकी छाल थोड़ी सफेद सी धूमल रंग लिये होती है। यह मोटी कॉर्क से घिरी होती है। नई डाली की छाल कुछ बैंगनी या सफेद हरा रंग लिये होती है। सहजन के फूल मलाईदार सफेद तथा हल्के पीले रंग के होते हैं तथा इनमें हल्की मीठी महक भी होती है। एक परिपक्व सहजन पेड़ पर लटकती हुई फलियां 20-45 सें.मी. लंबी होती हैं। सहजन के बीज 15 से 20 की संख्या में 1-12 सें.मी. के व्यास के होते हैं। पेड़ अनूकूल परिस्थितियों में 3 मीटर से 4 मीटर तक प्रथम वर्ष में वृद्धि कर जाता है। सामान्य तौर पर पेड़ बहुत धीमी गति से वृद्धि करता है एवं अविकसित होता है। गर्मी के मौसम में वाष्पोत्सर्जन की क्रिया से बचने के लिये यह पेड़ अपनी पत्तियां गिरा देता है तथा भूमिगत मूलरुप (रूट स्टाकॅ) को बड़े आकार का कर लेता है। अपने इन गुणों के कारण सहजन सूखे में भी अपनी वृद्धि बनाये रखता है। नई पत्तियां आने के साथ-साथ फूल भी डालियों पर खिलना शुरू हो जाते हैं। सहजन का पुष्प उभयलिंगी (द्विलिंगी) होता है। पुष्प में परपरागण की क्रिया होती है। सहजन में पाये जाने वाले पोषक तत्व शुष्क पदार्थ 16.63 प्रतिशत प्रोटीन 15.32 प्रतिशत रेशा 35.54 प्रतिशत सिलिका 1.02 प्रतिशत कैल्शियम 0.8 प्रतिशत फॉस्फोरस 0.28 प्रतिशत मैग्नीशियम 0.51 प्रतिशत (देसी अंडे से 36 गुना ज्यादा) पोटेशियम 1.43 प्रतिशत (केले से 0.3 गुना ज्यादा) सोडियम 0.24 प्रतिशत कॉपर 8.78 पीपीएम जिंक 18.05 पी.पी.एम मैगनीज 35.57 पीपीएम लौह 474.25 पीपीएम (पालक से 25 गुना ज्यादा) औषधीय गुण एवं उपयोग सहजन बहुपयोगी पौधा है। इसके सभी भागों का उपयोग भोजन, दवा औद्योगिक कार्यों आदि में किया जाता है। सहजन में प्रचुर मात्र में पोषक तत्व व विटामिन विद्यमान होते हैं। यह अनेक रोगों के उपचार में काम आता है। इसकी फली से तैयार अचार और चटनी कई रोगों से मुक्ति दिलाने में सहायक हैं। इसका प्रयोग सांभर में डालने के लिये किया जाता है। इसके फूलों एवं फलियों की सब्जी बनायी जाती है। सहजन के बीज से तेल निकाला जाता है। इसकी छाल, पत्ती, गोंद, जड़ आदि से दवाएं तैयार की जाती हैं। सहजन में दूध की तुलना में चार गुना कैल्शियम और दोगुना प्रोटीन अधिक पाया जाता है। इसकी फलियां व पत्तियां उदरशूल में नेत्र रोग, मोच, सियाटिका, गठिया में उपयोगी हैं। सहजन की जड़ दमा, जलोदर, पथरी, प्लीहा रोग के लिए उपयोगी है। इसकी छाल को शहद में मिलाकर पीने से वात व कफ राेग दूर हाेता है। इसकी पत्ती का काढा़ बनाकर पीने से पक्षाघात, वायु विकार, सियाटिका, गठिया में लाभ मिलता है। सहजन की पत्ती की लुगदी सरसों के तेल में पकाकर, मोच में लगाने से शीघ्र आराम मिलता है। इसकी सब्जी खाने से गुर्दे एवं मूत्रशय की पथरी कटकर निकल सकती है। इसकी जड़ की छाल का काढ़ा सेंधा नमक और हींग डालकर पीने से पित्ताशय की पथरी में आराम मिलता है। इसके पत्तों के रस के प्रयोग से पेट के कीड़े खत्म होते हैं और उल्टी-दस्त भी रुकता है। सहजन की पत्तियों के रस के सेवन से मोटापा धीरे-धीरे कम होने लगना है। सहजन की छाल के काढ़े से कुल्ला करने पर दांतों के कीड़े नष्ट होते हैं और दर्द में भी आराम मिलता है। इसकी जड़ के काढ़े को हींग और सेंधा नमक के साथ उबालकर प्रयोग करने से मिर्गी में लाभ होता है। सहजन की पिसी पत्तियों से घाव और सूजन भी ठीक होता है। इसके पत्तों को पीसकर गर्म कर सिर में लेप लगाने से सिर दर्द दूर होता है। सहजन की पत्तियों का रस कुपोषित बच्चों को पिलाना चाहिये। इसकी पत्तियों का रस छोटे बच्चों को पिलाने से उनकी हड्डियां मजबूत होती हैं। गर्भवती महिलाओं को पिलाने से दूध का स्राव अच्छा होता है। एडेमा जैसे दर्दनाक रोग की रोकथाम में भी यह लाभप्रद है। सहजन की पत्तियों के सेवन से हमारा यकृत सुचारू रूप से काम करता है। कैंसर रोगी को सहजन की पत्तियों का रस पिलाने से कैंसर की रोकथाम होती है। इसकी पत्तियों के रस को पीने से कब्ज की समस्या नहीं रहती है। सहजन के सेवन से हमारे शरीर के रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है। हमारा रुधिर परिसंचरण तंत्र अच्छे से काम करता है। इतना ही नहीं हृदय संबंधित रोगों का खतरा नहीं होता। सहजन हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन को बढ़ाता है और रुधिर व मूत्र में बढ़े ग्लूकोज के स्तर को कम करता है। इस प्रकार यह डायबिटीज में भी मददगार है। सहजन का सेवन करने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। यह रक्ताल्पता एवं सिकल सेल रोग के उपचार में लाभप्रद है। किडनी में पथरी बनने की समस्या नहीं होती है। अस्थमा के रोगियों के लिये उत्तम है। सहजन के बीज के चूर्ण से पानी को शुद्ध किया जा सकता है। इसकी पत्तियों के रस को पीने से गर्भवती मां को प्रसव पीड़ा से राहत मिलती है। इसकी छाल सायटिका, गठिया एवं यकृत संबंधी रोगों के लिये लाभप्रद होती है। सहजन की ताजी पत्तियों का रस कान में डालने से कान का दर्द खत्म हो जाता है। इसकी जड़ की छाल का काढ़ा सेंधा नमक व हींग मिलाकर पीने से पित्ताशय की पथरी में लाभ मिलता है। इसकी सब्जी का सेवन करने से चेचक होने का खतरा टल जाता है। इसको पानी में उबालकर भाप लेने से जुकाम में नाक, कान और गले की जकड़न कम होती है। इसका सूप सेवन करने से सौन्दर्य में वृद्धि होती है और रक्त साफ रहता है। सहजन की पत्तियों का सेवन करने से मानसिक सेहत अच्छी रहती है तथा यह दिमाग के विभिन्न भागों में संतुलन बनाये रखता है। सावधानियां यदि आप किसी रोग की दवा ले रहे हों, तो सहजन का सेवन करने से पहले चिकित्सीय परामर्श अवश्य लें। सहजन की खेती मृदा खेती के लिये कम्पोस्टयुक्त लाल तथा रेतीली दोमट मृदा उपयुक्त होती है। मृदा का पी-एच 6.5-8.0 (क्षारीय) होना चाहिए। जल जमाव फसलों की वृद्धि को रोकता है अतः जल निकासी की उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिये। वर्षा ऋतु में जल जमाव होने से पूरी फसल बर्बाद हो जाती है। बंजर व कम उर्वरा मृदा भी सहजन की खेती के लिये उपयुक्त है। बुआई का समय सहजन के बीज को बसंतऋतु में बोया जाता है। शरद ऋतु एवं पतझड़ के मौसम में अच्छा अंकुरण होता है और अंकुरित बीज जमीन को पकड़ लेता है। वर्षा ऋतु में अत्यधिक नमी व खेत में जल जमाव को नहीं होने देना चाहिये। भूमि की तैयारी भूमि में पहले मृदा पलटने वाले गहरे डिस्क हल से जुताई करें और 2-3 जुताई के बाद इसमें पाटा चलाते हैं। सहजन सदाबहार पेड़ है। गहरी जुताई करने से सहजन की जड़ों को मृदा में फैलने में सहायता मिलती है। बुआई के 15 दिनों पहले 10 टन अच्छी प्रकार से सड़ी हुई गोबर के बाद खाद या कम्पोस्ट या हरी खाद प्रयोग में लाते हैं। यदि वर्मीकम्पोस्ट उपलब्ध हो तो 15 दिनों से पहले 3 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट या हरी खाद के स्थान पर इसे उपयोग में ला सकते हैं। खेत से खरपतवार की सफाई कर लेनी चाहिये। 45 सें.मी. के आकार का गड्ढा 2.5×2.5 मीटर दूरी पर बना लेते हैं और बीज की उसमें बुआई कर देते हैं। 15 दिनों में बीजों में अंकुरण हो जाता है। उर्वरक 150 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 40 कि.ग्रा. पोटाश, 30 कि.ग्रा. सल्फर एवं 10 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हैक्टर खेती के लिये उपयुक्त है। बीजोपचार सहजन के बीज को रातभर पानी में भिगो दें। इसके बाद ट्राइकोडर्मा विरिडी या कार्बोंडाजिम द्वारा 5 से 10 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से बीज को उपचारित करते हैं। बीजोपचार करने से अंकुरण तीव्र गति से होता है और जड़ों में होने वाले कवक रोगों से सुरक्षा होती है। बीज दर तथा बुआई एक हैक्टर क्षेत्रफल के लिये सहजन के 500-600 ग्राम बीज, 2.5 मीटर की दूरी के साथ बुआई के लिये पर्याप्त हाेते हैं। सिंचाई बुआई के तुरन्त बाद प्रथम सिंचाई, दूसरी सिंचाई बुआई के 15 दिनों बाद की जाती है। तीन माह तक सप्ताह में एक बार सिंचाई करनी चाहिये। जल जमाव खेत में नहीं होने देना चाहिये। अनुकूल नमी मृदा में बनाये रखना उपयुक्त होता है। खरपतवार नियंत्रण खुरपी या हंसिया की मदद से गुच्छे में एक स्थान पर उगी घास को साफ करते रहना चाहिये। खेत की निराई करने से खरपतवार पर नियंत्रण किया जा सकता है। पलवार बिछाकर, फसलचक्रीकरण, जुताई तथा रासायनिक खरपतवारनाशी का प्रयोग कर सकते हैं। पलवार बिछाना एक अच्छा प्रबंधन है, जिससे मृदा में पर्याप्त नमी एवं खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है। तुड़ाई फलियों को पकने की सही अवस्था के बाद सही समय पर तुड़ाई कर लेने से इसकी गुणवत्ता उच्चतम होती है। आदर्श प्रबंधन एवं देखरेख में सहजन का पेड़ तेजी से वृद्धि करता है। 9 माह में पेड़ परिपक्व हो जाता है। पेड़ लग जाने के लगभग 8 माह बाद पत्तियों को तोड़ सकते हैं। सदाबहार होने से अगले 6-8 माह में पुनः पत्तियों की तुड़ाई कर सकते हैं। सहजन से प्रथम दो वर्ष तक प्रतिपेड़ 100-150 तक फलियां प्राप्त होती हैं। सारणीः सहजन में उर्वरक देने का समय और मात्रा उर्वरक मात्र समय नाइट्रोजन 30 कि.ग्रा 60 कि.ग्रा 60 कि.ग्रा बुआई के 15 दिनों पहले, पौध लगने के 45 दिन बाद 1 पहली डोज के 15 दिनों बाद फास्फोरस 60 कि.ग्रा. बुआई के 15 दिन पहले पोटाश 40 कि.ग्रा. बुआई के 15 दिन पहले सल्फर 30 कि.ग्रा . बुआई के 15 दिन पहले जिंक सल्फेट 10 कि.ग्रा. बुआई के 15 दिन पहले अंतर फसल सहजन + टमाटर+ मिर्च+ बीन्स सहजन + करी पत्ता+ नीम सहजन + टीक सहजन +सुबबूल सहजन+ झाऊ सहजन+ मक्का फेंसिंग सामान्यतः सहजन के पेड़ को बाड़ लगाने में प्रयोग में लाया जाता है। मछली के तालाब की बाड़ लगाने में सहजन का पेड़ उपयुक्त है। आय एक एकड़ क्षेत्रफल में लगभग 1500 सहजन के पौधे लग सकते हैं। इसके पौधे मोटे तौर पर 12 महीने में उत्पादन देते हैं। पेड़ अगर अच्छी तरह से बढ़े हैं, तो 8 महीने में ही तैयार हो जाते हैं। कुल उत्पादन 3000 कि.ग्रा. तक हो सकता है। सहजन की फलियों का फुटकर रेट आमतौर पर 40 से 50 रुपये प्रति कि.ग्रा. रहता है। थोक में इसका रेट 25 रुपये प्रति कि.ग्रा. के आसपास रहता है। लागतःलाभ अनुपात कुल लागत 15000 रु. प्रति एकड़ बीज 750 प्रति प्रति कि.ग्रा भूमि की तैयारी 1500 रुपये श्रमिक 3000 रुपये निराई 4000 रुपये सिचाई एवं तुड़ाई 5750 रुपये उपज 9 टन/एकड़×20 रुपये प्रति कि.ग्रा मुनाफा 180000 रुपये इस प्रकार सहजन की खेती करने में 1 रुपये खर्च करने से 12 रुपये का आर्थिक लाभ मिलता है। पौष्टिक चारा सहजन दूध देने वाले पशुओं के लिये बेहतरीन पोषक तत्व वाला चारा है। इसमें विटामिन ‘ए’ गाजर से 4 गुना ज्यादा, विटामिन ‘बी’ केले से 50 गुना ज्यादा, विटामिन ‘सी’ संतरे से 7 गुना ज्यादा तथा दूध एवं दही से दोगुना प्रोटीन पाया जाता है। चारे के रूप में इसकी पत्तियों के प्रयोग से पशुओं के दुग्ध उत्पादन में डेढ़ गुना वृद्धि प्राप्त होती है। यही नहीं इसकी पत्तियों के रस को पानी में मिलाकर फसल पर छिड़कने से उपज में अधिक वृद्धि होती है। इन्हीं गुणों के कारण सहजन चमत्कार से कम नहीं है। स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर),