परिचय अन्य फसलों की तरह मशरूम को भी कई प्रकार के जैविक व अजैविक तत्व प्रभावित करते हैं। जैविक तत्वों में फफूंदी, जीवाणु, विषाणु, सूत्रकृमि, कीट-पतंगे आदि इन्हें प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से क्षति पहुंचाते हैं। श्वेत बटन मशरूम की खेती के दौरान खाद बनाते समय या केसिंग मिट्टी बनाते समय विभिन्न प्रकार की नुकसानदायक फफूदियों का सामना करना पड़ता है। इनमें कई प्रतिस्पर्धी फफूंद, मशरूम के कवक जाल फैलाव में बाधा डालते हैं, जबकि कुछ इनकी अलग-अलग अवस्थाओं को प्रभावित करते हैं, जिसके कारण मशरूम में विशिष्ट लक्षण प्रकट होता है। कई बार खुम्ब या मशरूम उत्पादन के कदौरान संक्रमण की स्थिति में पूरी की पूरी फसल नष्ट हो जाती है। आमतौर पर विभिन्न प्रतिस्पर्धी फफूंदों व रोगजनक फफूंदों का वितरण खाद व केसिंग मिट्टी में निम्नलिखित प्रकार से देखने में आया है खाद में पाए जाने वाले फफूंद जैतूनी हरा फफूंद रोग (कीटोमीयम ओलवासीयम व अन्य संबंधित प्रजातियां), ईन्क केप (कोपराईनस प्रजाति), हरा फफूंद (एस्परजीलस, पेनीसीलियम, और ट्राइकोडर्मा), काला फफूंद (मयूकर राइजोपस) और अन्य जैसे कि माइरियोकोकम, स्पोरोट्राइकम, सेपोडोनियम, फ्यूजोरियम, सेफालोस्पोरियम व पेपलोस्पोरा प्रजाति आदि। खाद व केसिंग मिट्टी में पाए वाले फफूंद सफेद लेप फफूंद (स्कोपूलारियपासिस फीमीकोला), भूरा लेप फफूंद (पेपलोस्पोरा बेसियाना), लिपस्टिक फफूंद (स्पोरेनडोनेरमा) आभासी ट्रफल (डे हली यो माई सीज माइक्रोस्पोरस) और हरे फफूंद। केसिंग मिट्टी व उगते हुए मशरूम में पाए वाले फफूंद सिनामान फफूंद (पेजीजा), गीला बुलबुला (माइकोगोन परनीसियोसा), सूखा ङ्केबुलाबाला (वटी सीलियम पी जीका ला),मकड़ीजाला (कलेडोबोटरियम), गुलाबी फफूंद (ट्राइकोथिशयम रोजीयम) और अन्य हरी फफूंदिया। फलनकाय को क्षति पहुंचाने वाले फफूंद फ्यूजेरियम सड़न रोग (फ्यूजेरियम प्रजाति)। फसल उत्पादन की किसी भी अवस्था में अवांछित फफूंदों का पाया जाना फसल को बाद में बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। इस लेख में मशरूम को आर्थिक द्रस्टी से क्षति पहुंचाने वाले महत्वपूर्ण रोगोंभाकृअनुप-खुम्ब अनुसंधान निदेशालय,चम्बाघाट, सोलन-173213 (हिमाचल प्रदेश)प्रतिस्पर्धी फफूंदों और मक्खियों का वर्णनकिया गया है।यह रोग माईकोगोन परनीसीयोसा| मुख्य रोग गीला बुलबुला रोग गीला बुलबुला रोग फफूंद से होता है। पूरी दुनिया के मुख्य मशरूम उत्पादक देशों में गीला बुलबुला एक मुख्य गंभीर रोग है। भारत में यह रोग वर्ष 1978 में जम्मू-कश्मीर के कुछ मशरूम फार्म में देखा गया था। बाद में गीला बुलबुला रोग हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा व महाराष्ट्र में भी पाया गया। संक्रमित तना व टोपी के विभाजन से पहले यह रोग होता है तो विकृत गोले बनते हैं। यदि संक्रमण, तना व टोपी के विभाजन के बाद होता है तो मशरूम का तना मोटा व गिलों में विकृति पैदा होती है। संक्रमण से मशरूम में सुनहरे भूरे रंग का तरल पदार्थ निकलता है। कई बार इस रोग के कारण शत्-प्रतिशत मशरूम खराब हो जाता है। गीला बुलबुला एगेरिकस कम्पेस्ट्रिस, काबुली ढिंगरी व प्लूरोटस नेवरोडेनसिस को भी संक्रमित करता है।श्वेत बटन मशरूम की लगभग सभी प्रजातियां इस रोग के प्रति ग्रहणक्षम हैं। गीला बुलबुला का फैलाव मुख्यतः केसिंग मिट्टी द्वारा भी होता है। इसका प्रवेश अन्य साधनों द्वारा जैसे कि स्पेंट कम्पोस्ट, संक्रमित कचरा आदि द्वारा भी होता है। संक्रमण हवाजनित, पानीजनित या बारूथी द्वारा या मशरूम की मक्खियों द्वारा फैलता है। पानी के छींटे भी इस रोग को फैलने का एक महत्वपूर्ण तत्व हैं। बैगों की सिंचाई व तुड़ाई के समय भी यह रोग फैलता है। कलेमाइडोस्पोर लंबे समय तक केसिंग मिट्टी में बने रहते हैं, जो प्रारंभिक संक्रमण के साधन रूप में रहते हैं। विकृत मशरूमों के ऊपर बनने वाले कोनीडिया संभवत: माध्यमिक संक्रमण के लिए जाने जाते हैं। केसिंग मिट्टी को भाप द्वारा 54.4 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर 15 मिनट के लिए उपचार करने से इस रोग को खत्म किया जा सकता है।गीला बुलबुला फैलने से रोकने के लिए रोगग्रसित मशरूम को प्लास्टिक के कप द्वारा ढक देना चाहिए। उच्च गुणवत्ता वाली खाद, केसिंग मिट्टी का सही तरीके से पाश्चुरीकरण, खाली उत्पादन कक्षों का धूमन करना, हर 6महीने बाद सफेदी करना व उत्पादन कक्षों के आसपास साफ-सफाई रखने पर इस रोग से बचा जा सकता है। रोग प्रतिरोधी मशरूम प्रजातियों के प्रयोग से भी इस रोग से बचा जा सकता है। इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है कि मशरूम की तुड़ाई हमेशा नए कमरों से आरंभ करते हुए पुराने कमरों में प्रवेश करना चाहिए। केसिंग के तुरंत बाद बैगों में 2 प्रतिशत फार्मेलीन का छिड़काव करने पर इस रोग को रोका जा सकता है। फसल की शुरूआत में ही छोटे-छोटे गोलों को तोड़कर 2 प्रतिशत फार्मेलीन के घोल में डालकर गड्ढों में दबा देना चाहिए व गोले वाले स्थान पर नमक छिड़कने से गीला बुलबुला रोग के फैलाव को रोका जा सकता है। सूखा बुलबुला रोग यह रोग वर्टीसीलियम फंजीकोला नामक फफूंद से होता है। केसिंग मिट्टी के ऊपर शुरू में सफेद कवक जाल नजर आता है, जिसकी प्रवृति भूरे पीले रंग में बदलने की होती है। प्याज के आकार के मशरूम बनने लगते हैं। अगर फसल आने के बाद संक्रमण होता है, तो विकृत तना व झुकी टोपी वाला मशरूम पैदा होता है। यदि टोपी के थोड़े से भाग में संक्रमण होता है तो खरगोश के होंठ जैसे लक्षण व भूरे मशरूम नजर आते हैं। यदि संक्रमण बाद में होता है, तो मशरूम में भूरा फफूंद देखा जा सकता है। यह फफूंद बहुत बड़ी संख्या में एक सेल वाले लंबाकार से बेलनाकार पारदर्शी कोनीडिया पैदा करता है। यह फफूंद उत्पादन कक्षों में संक्रमित केसिंग मिट्टी के द्वारा प्रवेश करता है। बाद में यह फफूंद संक्रमित औजारों, हाथों व कपड़ों द्वारा फैलता है। मशरूम की मक्खियां भी इस रोग को फैलाती हैं। इस रोग के विकास के लिए 20 डिग्री सेल्सियस तापमान जिम्मेदार होता है। संक्रमण से उभरने के लिए लगभग 10 दिनों का समय लगता है, जबकि विकृत व धब्बे वाले मशरूम बनने में 3 से 4 दिनों का समय लगता है। अधिक आर्द्रता, ताजी हवा की कमी, देरी से तुड़ाई और 16 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान इस रोग के विकास व फैलने में सहायक होता है। यह रोग प्रायः तब देखने को मिलती है, जब फसल उत्पादन की अवधि 61 दिनों से ज्यादा की रखी जाती है। केसिंग मिट्टी को भाप द्वारा 54.4 डिग्री सेल्सियस पर 15 मिनट के लिए उपचार करने पर इस रोग को खत्म किया जा सकता है। केसिंग मिट्टी को एक घंटे के लिए 63 डिग्री सेल्सियस तापमान पर उपचारित करने पर बीजाणु अंकुरण पूरी तरह रुक जाता है। प्रयोगशाला में बोतल ब्रश, भांग, सफेदा, धतूरा आदि के पत्तों के प्रयोग से कुछ हद तक इस रोग को नियंत्रित किया जा सका। केसिंग के तुरंत बाद, 0.1 प्रतिशत फार्मेलीन के घोल के छिड़काव से फसल को भी इस रोग से बचाया जा सकता है। हरा फफूंद रोग यह रोग ट्राइकोडर्मा की विभिन्न प्रजातियों व पेनीसीलियम और एस्परजीलस के कारण उत्पन्न होता है। मशरूम उत्पादन में यह एक प्रायः देखा जाने वाला हानिकारक रोग है।हरा फफूंद ट्राइकोडर्मा द्वारा श्वेत बटन, ढिंगरी, कालाकनचपड़ा, दुधिया मशरूम व शिटाके में महत्वपूर्ण परिमाणात्मक व गुणात्मक उत्पादन में क्षति पहुंचाता है। ट्राइकोडर्मा की विभिन्न प्रजातियां खाद, केसिंग मिट्टी और बीज में, हरे फफूंद का लक्षण पैदा करने में जुड़े होने के लिये वर्णित हैं। शुरू में खाद या केसिंग मिट्टी के ऊपर, सफेद, घना कवक जाल, जो कि मशरूम के कवक जाल से मिलता-जुलता है, नजर आता है। यह बाद में उत्याधिक बीजाणु जनन के कारण हरे रंग में परिवर्तित हो जाता है, जो कि हरे फफूंद का एक विशेष लक्षण होता है। इसके बाद कवक, जाल केसिंग की सतह में पहुंचकर नई उगी हुई मशरूम कलिकाओं को संक्रमित करता है। कवक जाल के नजदीक विकसित होने वाला मशरूम भूरा, फटा, विकृत व तना सूखे बुलबुले की तरह दिखता है। कुछ प्रजातियां भूरे धब्बे, टोपी के ऊपर धब्बे पैदा करती हैं। ये अनुकूल परिस्थिति में टोपी के पूरे भाग में फैल जाते हैं। हरा फफूंद प्रायः उस खाद में प्रकट होता है, जिसमें कार्बोहाइड्रेट की भरपूर मात्रा व नाइट्रोजन की कमी होती है। यदि खाद को बहुत ज्यादा दबाया जाये या अधिक मात्रा में भरा जाए तो पीक हीटिंग करना मुश्किल हो जाता है। इस अवस्था में खाद की बनावट पर प्रभाव पड़ता है और अत्याधिक नमी के कारण पाश्चुरीकरण व अनुकूलन सही तरीके से नहीं हो पाती है। फार्मेलीन का बराबर उपयोग भी हरे फफूंद के विकास में सहायक होता है। हरे फफूंद के विभिन्न आरंभिक स्रोतों जैसे कि धूली कण, संक्रमित कपड़े, बरूनी, मशरूम की मक्खियां, वायुजनित संक्रमण या संक्रमित बीज द्वारा भी यह होता है। अत्याधिक आर्द्रता व केसिंग मिट्टी का कम पी-एच मान भी हरे फफूंद के विकास को बढ़ावा देता है। ट्राइकोडर्मा हारजीनियम 20 डिग्री सेल्सियस तापमान की तुलना में 30 डिग्री सेल्सियस तापमान पर मशरूम उत्पादन में महत्वपूर्ण कमी पैदा करता है। हरे फफूंद को साफ-सफाई, खाद और केसिंग, मिट्टी का सही पाश्चुरीकरण, अनुपूरक का निर्जीवीकरण करना व अच्छे तरीके से मिलाना, फार्मेलीन की सही मात्रा का उपयोग करके (अधिकतम 2 प्रतिशत) नियंत्रित किया जा सकता है। जैतूनी हरा फफूंद रोग इसका रोगजनक कीटोमीयम ओलीवेसीयम, डी. गलाबोसम है। बिजाई करने के लगभग 10 दिनों बाद खाद में अगोचर, घूसर सफेद हवाई सूक्ष्म कवकजाल नजर आता है। शुरू में बीज की विकास दर रुक जाती है या कम हो जाती है। देर में बीज की विकास दर रुक जाती है या कम हो जाती है। खाद से बासी गंध आती है। इसके फैलने का कारण खाद का सही तरीके से पाश्चुरीकरण न होना, पर्याप्त मात्रा में ताजी हवा की कमी व तापमान का अत्याधिक होना है। जैतूनी हरे फफूंद के नियंत्रण के लिए खाद की फर्मेंटेशन की अवधि कम नहीं होनी चाहिए। सक्रिय खाद, जो अधिक गीली न हो व बनावट भी अच्छी होनी चाहिए। टनल में खाद डालने से पहले नाइट्रोजन, अमोनियम सल्फेट, यूरिया, मुर्गी की खाद या अन्य सामग्री न मिलाएं। पाश्चुरीकरण के समय पीक हीटिंग पर्याप्त अवधि के लिये जाती हवा को देना अत्यंत आवश्यक है। लंबे समय के लिये अत्यधिक तापमान से खाद को बचाना चाहिए। जाला रोग यह रोग क्लेडोबोटरियम डेनडरोइडस नामक फफूंद से होता है। जाला रोग के लक्षण शुरू में केसिंग मिट्टी के ऊपर सफेद छोटे-छोटे धब्बों के रूप में नजर आते हैं। यह बाद में नजदीकी उगते हुए मशरूम पर सूक्ष्म कवक जाल द्वारा पहुंच जाता है। रोमिल सफेद कवक जाल तना, टोपी व गलफड़ों को धीरे-धीरे ढक लेता है, जिसके कारण पूरा मशरूम सड़ जाता है। जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता जाता है कवक जाल रंजित हो जाता है, जो बाद में गुलाबी रंग में परिवर्तित हो जा है। अधिक आर्द्रता व तापमान इस रोग को बढ़ाता है। रोग प्रायः बीजाणु द्वारा फैलता है। इसका रोगजनक प्रायः मिट्टी में पाया जाता है। उत्पादन कक्षों में यह दूषित मृदा, बीजाणु, कचरे में विक जाल या श्रमिकों द्वारा प्रवेश करता है। जीवाणु, हवा की गति से श्रमिकों के हाथों से, औजारों, कपड़ों व पानी के छींटों से आसानी से फैल जाता है। मशरूम की मक्खियां भी इस रोग को फैलाने में सहायक होती हैं। अत्याधिक आर्द्रता व 19-22 डिग्री सेल्सियस तापमान में इस रोग द्वारा अधिकतम नुकसान देखा गया है। इस रोग के विकास के लिये अनुकूलतम तापमान 20 डिग्री सेल्सियस है व बीजाणु के अंकुरण के लिये 25 डिग्री सेल्सियस है। भाप द्वारा केसिंग मिट्टी का निर्जीवीकरण या केसिंग मिट्टी का 50 डिग्री सेल्सियस पर चार घंटों के लिये निसंक्रमण करने पर प्रभावी तरीके से रोगजनक को खत्म किया जा सकता है। नियमित साफ-सफाई, कटे हुए मशरूमों के तनों को निकालना व हर फ्लश ब्रेक के बाद भरे हुए पिन हेड्स को निकालना, तापमान और आर्द्रता के नियंत्रण से इस रोग की रोकथाम की जा सकती है। प्रयोगशाला में भांग धतूरा, बोतल ब्रश, सफेदा के पत्तों के अर्क से कुछ हद तक इस रोग पर नियंत्रण देखा गया है। मशरूम उत्पादन कक्षों व उसके आसपास के स्थानों पर वार्षिक 2 प्रतिशत बोरडेक्स मिश्रण से कीटाणुशोधन करना चाहिए। भूरालेप फफूंद इस फफूंद का नाम पोपुलोस्पोरा बाईसीना है। शुरूआत में खाद व केसिंग मिट्टी की सतह व थैलों के चारों ओर सफेद भूरालेप फफूंद कवक जाल का बढ़ाव देखा जा सकता है। यह बाद में घने धब्बों में परिवर्तित होकर रंग को हल्का लाल से भूरा व बाद में जंग लगने जैसे रंग में बदल जाता है। उन जगहों पर जहां पर भूरालेप फफूंद होता है, वहां पर मशरूम का कवक जाल नहीं फैलता या विकसित नहीं होता है। अधिक गीली, चिपचिपी या गलत ढंग से तैयार की गई खाद इस रोग के विकास में सहायक होती है। बीज फैलते समय अधिक तापमान भी इस रोग को बढ़ावा देता है। जिप्सम को कम मात्रा में डालना और अधिक चिपचिपाहट इस रोग के विकास में सहायक है। नियंत्रण के लिए खाद में सावधानीपूर्वक पर्याप्त मात्रा में जिप्सम मिलाना व अधिक पानी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। पीक हीटिंग सही तापमान पर पर्याप्त अवधि के लिये होनी चाहिए। रोग के धब्बों को 2 प्रतिशत फार्मेलीन के घोल से उपचार करना चाहिए। बैक्टीरियल ब्लोच रोग यह रोग सूडोमोनास टोलासी नामक जीवाणु से होता है। श्वेत बटन मशरूम में बैक्टीरियल बलोच रोग के कारण टोपी के ऊपर भूरे धब्बे या छाले गंभीर संक्रमण में तने तक फैल जाते हैं। टोपी के किनारो में गोल या अनियमित पीले धब्बे विकसित हो जाते हैं, जो अनुकूल परिस्थिति में आपस में मिलकर गहरे भूरे धब्बो में परिवर्तित हो जाता है। इसरोग का प्रमुख लक्षण टोपी पर भूरे छालों के रूप में नजर आता है। गंभीर रूप से संक्रमित मशरूम में विकृति उत्पन्न होती है व टोपी फट जाती है। प्रायः मशरूम छोटी अवस्था में ही इस रोग से संक्रमित हो जाते हैं। टोपी के ऊपर धब्बे बनना वातावरण पर निर्भर करता है। मशरूम के ऊपर पानी की सतह व 20 डिग्री सेल्सियस तापमान इस रोग को बढ़ाने में सहायक होते हैं। केसिंग मिट्टी व हवा में धूल के कारण ब्लोच रोग का उत्पादन कक्षों में प्रवेश करने का प्रमुख साधन है। पाश्चुरीकरण के बाद भी यह रोगजनक केसिंग मिट्टी में रहता है। आर्द्रता में हेर-फेर, तापमान तथा हवा की गति इस रोग कीरोकथाम में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान व 85प्रतिशत से अधिक आर्द्रता से बचना चाहिए।पानी के छिड़काव के बाद हवा चलाना या कमरे को अतिरिक्त हवादार बनाने से मशरूमकी टोपी तेजी से सूख जाए, यह सुनिश्चित करना चाहिए आभासी ट्रफल ये अखरोट गिरी के समान नजर आते हैं। आभासी ट्रफल फफूंद खाद में मशरूम के कवक जाल को फैलने नहीं देता है, जिसके कारण खाद निष्क्रिय भूरे रंग में बदल जाती है। संक्रमण का प्रमुख माध्यम पिछली फसल की बची केसिंग मिट्टी, जीवित एस्कोस्पोर या कवक जाल होते हैं। इस फफूंद का अनुकूलतम विकास 26-28 डिग्री सेल्सियस पर दर्ज किया गया है। नियंत्रण के लिए खाद को हमेशा पक्के फर्श पर ही बनाना चाहिए। मिट्टी के ऊपर खाद को नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि खाद बनाते समय तापमान बढ़ जाता है। खाद का पाश्चुरीकरण व अनुकूलन सावधानीपूर्वक करना चाहिए। बीज फलते समय व केसिंग मिट्टी डालने के बाद तापमान 26-27 डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं जाना चाहिए। फसल उत्पादन के समय तापमान 18 डिग्री सेल्सियस से कमहोना चाहिए। फसल उत्पादन के बाद उत्पादन कक्षों का कुक आउट (70 डिग्री सेल्सियस) करने पर थैलों में व्याप्त बीजाणु व कवक जाल के टुकड़ों को खत्म किया जा सकता है। शुरूआती संक्रमण को प्रभावित भागों को 2 प्रतिशत फार्मेलीन के घोल से उपचार करने पर रोका जा सकता है। जाति का फफूंद है। इन्क केप बीज फैलते समय या नये केसिंग किये हुएथैले या खाद की ढेरी में खाद बनाते समय प्रकट होते हैं। इनकालंबा व सख्त तना खाद के निचले हिस्सों में पहुंच जाता है। प्रकट होने से कुछ दिनों बाद सड़कर काले चिपचिपे पदार्थ में बदल जाते हैं। खाद में अत्याधिक नाइट्रोजन की मात्रा या मुर्गी के खाद का अधिक उपयोग या कम अवधि की पीक हीटिंग के कारण इन्क केप प्रकट होते हैं। इनके नियंत्रण के लिए सही तरीके से पाश्चुरीकृत की गई खाद व केसिंग मिट्टी का उपयोग करें। ज्यादा पानी देने से बचें। फफूद को फैलने से बचाने के लिये छोटे-छोटे इन्क केप को तोड़कर नष्ट कर लें। मशरूम की मक्खियां और सूत्रकृमि फोरिड मक्खी मेगासीलिया हाल्टे रेटा तथा मे. नाइग्रा फोरिड मक्खी की दो ऐसी प्रजातियां हैं, जो श्वेत बटन मशरूम को अत्याधिक हानि पहुंचाती हैं। फोरिड एक छोटी (2-3 मि.मी.) कूबड़युक्त पीठ वाली मक्खी है। इसका रंग भूरा-काला होता है और यह सियारिड मक्खी से अधिक मजबूत होती है। इसके लार्वा का रंग सफेद होता है और ये पदरहित होते हैं। इनके मुंडक का सिरा नुकीला होता है। ये मक्खियां तेज एवं झटके वाली गति से इधर-उधर भागती हैं। मादा प्रौढ़ मक्खियां बढ़ते हुए मशरूम के गिलों (गलफड़ों) या केसिंग मिश्रण की सतह पर अंडे देती हैं। लार्वा, मशरूम के तनों में सुरंग बनाते हैं। प्रति 30 ग्राम खाद में 100 लार्वा की संख्या, खाद में कवक जाल को गहन क्षति पहुंचाने के लिए पर्याप्त होती है। मे. हेलेटा की प्रौढ़ मक्खियां बढ़ते हुए, कवक-जाल की महक से स्पॉन विस्तार कक्ष की ओर आकर्षित होती हैं और खाद में एक मादा लगभग 50-60 अंडे देती है। सेसिड मक्खी इसकी प्रौढ़ मक्खियां इतनी सूक्ष्म होती हैं कि आंखों से शायद ही दिखती हैं। इनके छोटे लार्वा की सहायता से इन्हें पहचाना जा सकता है, जो पदरहित एवं सफेद अथवा नारंगी रंग के होते हैं। इनका मुंडक स्पष्ट नहीं होता, यद्यपि उनके मुंडक के स्थान पर दो ‘ढ़क-बिन्दू' मौजूद होते हैं, जो इसे एक्स का आकार देते हैं। सेसिड मक्खी की प्रजनन क्षमता बहुत तीव्र है। इसके कारण ये उत्पादन को भारी हानि पहुंचाती हैं। इसके लार्वा , कवक जाल, तने के बाहरी भाग तथा तने एवं गलफड़ों की संधि-स्थल का भक्षण करते हैं। मशरूम में लार्यों की उपस्थिति तथा बाद में जीवाणु संक्रमण के कारण मशरूम भूरे एवं बदरंग हो जाते हैं और उनमें छोटे-छोटे स्रावी दाग पैदा हो जाते हैं। सियारिड मक्खी ये मशरूम की सर्वाधिक क्षतिकारक मक्खियां मानी जाती हैं। इनकी दो प्रजातियां लाईकोरियेला सोलेनाई तथा ला. अरिपिला मशरूम की फसल को हानि पहुंचाती हैं। इन छोटी (3-4 मि.मी.) जाल के आकार की मक्खियों की लंबी शृंगिकायें होती हैं। ये प्रायः पत्ती की खाद, जंगली कवकों तथा सड़ती हुई पादप-सामग्रियों में रहती हैं और मशरूम की खुशबू से आकर्षित हो कर उत्पादन कक्षों में पहुंच जाती हैं। इनके लार्वा, सफेद, पदरहित 1-8 मि.मी. लंबे मैगट होते हैं, जिनमें काला चमकता हुआ मुंडक होता है। यदि इनका आक्रमण प्रारंभिक अवस्था में हो तो ये कवक जाल फैलाव में बाधा डालते हैं, जिसके कारण उत्पादन बहुत कम हो जाता है। लार्वा, मशरूम की नवजात कलिकाओं तथा परिपक्व मशरूम दोनों को क्षतिग्रस्त करते हैं और उन्हें भूरे रंग का व चिमड़ा बना देते हैं। लार्वा,मशरूम के तने की ऊतकों को खाकर उनमें सुरंगों का निर्माण कर देते हैं और कभी-कभी पूरे परिपक्व मशरूम को ही खा लेते हैं। प्रौढ़ावस्था प्राप्त कर ये मक्खियां मशरूम के कई प्रकार के रोगों व बरुथियों के संवाहक का कार्य करती हैं। माध्यम कम्पोस्ट को चरम-उष्मानित करने के बाद ठंडा किया जाता है, तब प्रौढ़ सियारिड मक्खियां खाद की मीठी महक से आकर्षित हो जाती हैं। खाद में प्रत्येक मादा मक्खी लगभग 100-140 अडे देती है। इन्हीं अंडों से लार्वा पैदा होते हैं, जो स्पॉन विस्तार (कवक जाल फैलाव) की अवधि में फैलने वाले कवक जाल को नष्ट कर देते हैं। इन लाओं से उत्पादन कक्षों में उपलब्ध तापमान के अनुसार 2-3 सप्ताह के भीतर प्रौढ़ मक्खियों की नई पीढ़ी पैदा हो जाती है। मक्खियों और सूत्रकृमि का प्रबंधन और रोकथाम प्रबंधन और रोकथाम के लिए साफ-सफाई सबसे महत्वपूर्ण अंग है। मशरूम उत्पादन में साफ-सफाई खाद बनाने से पहले ही शुरू हो जाती है। खाद बनाने के प्रांगण में खाद बनाने के 24 घण्टे पूर्व 2 प्रतिशत फार्मेलीन का छिड़काव करना चाहिए। खाद प्रांगण की साफ-सफाई, कीट-पतंगों का नियंत्रण करता है। पाश्चुरीकरण कीट-पतंगों की सभी अवस्थाओं को नियंत्रित करता है। मशरूम की मक्खियां बढ़ते हुए कवक जाल की महक की ओर आकर्षित होती हैं। मशरूम उत्पादन के समय ये मक्खियां उत्पादन कक्षों में प्रवेश करती हैं और बीजित कम्पोस्ट और मशरूम क्यारियों में प्रजनन करती हैं। छोटे आकार के कारण ये मक्खियां साधारण जाली से आसानी से आवागमन कर सकती हैं। इसलिए इन मक्खियों के प्रवेश को रोकनाऔर भी जरूरी हो जाता है। दरवाजों और रोशनदानों को 14-16 मेश/सें.मी. आकार के नाइलोन और तार की जाली लगाने से इन मक्खियों के प्रवेश को रोका जा सकता है। यदि उत्पादन के समय, मक्खियां हों तो इनको अन्य विधियों द्वारा भी नियन्त्रित किया जा सकता है। बैगॉन कीटनाशक को पानी में 1:10 के अनुपात में मिलाकर और उसमें थोड़ी सी चीनी डालकर उत्पादन कक्षों में रखने पर मक्खियों को प्रभावी ढंग से नियन्त्रित किया जा सकता है। पॉलीथीन की शीट में चिपचिपा पदार्थ लगाकर मक्खियों का नियंत्रण किया जा सकता है। इस विधि द्वारा मक्खियों के उत्पादन कक्षों में प्रकट होने का समय व संख्या के बारे में पता लगाया जा सकता है। सूत्रकृमि सूत्रकृमियों का प्रकोप फसल में किसी भी समय हो सकता है। यह सूक्ष्मजीव है। मशरूम का कवक जाल इन सूत्रकृमियों का मुख्य आहार है। सूत्रकृमि मशरूम का प्रमख परजीवी है जिसका मशरूम उत्पादन के समय प्रवेश पूरी फसल को नष्ट कर देता है। मशरूम में प्रायः तीन प्रकार के सूत्रकृमि आते हैं; कवक जाल को खाने चाले सूत्रकृमि (परजीवी), खाद और केसिंग मिश्रण को खाने वाले सूत्रकृमि (मृतभक्षी)और परभक्षी सूत्रकृमि। परजीवी सूत्रकृमियों के मुंह में सुई जैसी संरचना स्टाइलेट होती है, जिसकी सहायता से ये कवक जाल में छेद करके कवक का रस चूसते हैं। फलस्वरूप कवक जाल धीरे-धीरे खत्म हो जाता है। इन सूत्रकृमियों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती है (50-100 गुना/सप्ताह)। इस कारण कुछ ही सूत्रकृमियों का प्रवेश कुछ दिनों में पूरी फसल को नष्ट कर देता है। मृतभक्षी सूत्रकृमि क्षतिग्रस्त बैगों में भारी संख्या में पाये जाते हैं। इन सूत्रकृमियों में स्टाइलेट नहीं होता, जिसके कारण ये मशरूम को प्रत्यक्ष रूप से क्षति नहीं पहुंचा पाते। यह सूत्रकृमि बैगों में गन्दगी फैलाते हैं व यह अपने शरीर पर हानिकारक जीवाणुओं का वहन करते हैं। परभक्षी सूत्रकृमि बहुत कम संख्या में पाए,जाते हैं। ये परजीवी सूत्रकृमियों और कीट-पतंगों के अंडे व बरुथियों को खाते हैं। सूत्रकृमियों का प्रमुख स्रोत अपाश्चुरीकृत कम्पोस्ट व केसिंग मिश्रण होता है। इसके अतिरिक्त यह मशरूम उत्पादन में प्रयोग में लाए जाने वाले उपकरणों से भी फैलते हैं। मशरूम की मक्खियां भी सूत्रकृमि वाहक का काम करती हैं। सूत्रकृमि क्षति के लक्षण जैसे-कवक जाल का धीरे-धीरे धब्बों में फैलना, खाद की सतह का धसना, बढ़ते कवक जाल के सफेद रंग का धीरे-धीरे भूरा होना, मशरूम का कम और देर से उत्पादन होना, मशरूम कलिकाओं का भूरा होना, उत्पादन में गिरावट, पूरी फसल का असफल होना इत्यादि हो सकते हैं। रोकथाम के लिए साफ-सफाई का ध्यान रखें।कम्पोस्ट बनाने के फर्श और बिजाई करने एवं कम्पोस्ट बनाने में उपयोग में लाये जानेवाले सभी उपकरणों को 2 प्रतिशत फार्मेलीन के घोल से धो लें। बिजाई से 24 घण्टेपूर्व उत्पादन कक्ष व उसमें बने चौखटों पर 2 प्रतिशत फार्मेलीन का छिड़काव करें। उत्पादन कक्ष प्रवेश पर 1-1-5 इंच गहरा पांव पोश बनाकर उसमें 2 प्रतिशत फार्मेलीन का घोल भरें तथा जूते डुबोकर ही कक्ष में प्रवेश करें। कम्पोस्ट और केसिंग मिट्टी का सही ढंग से पाश्चुरीकरण करें। छिड़काव में उपयुक्त होने वाला पानी स्वच्छ हो। श्वेत बटन मशरूम-ढिंगरी मशरूम फसलचक्र अपनायें। मशरूम की मक्खियों का नियंत्रण करें। फसल लेने के बाद, पेटियों को 70 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 8-12 घंटे तक अति उष्मानित करें। पूरा उत्पादन लेने के बाद, खाद को उत्पादन कक्ष से दूर गड्ढे में डालकर मिट्टी से ढक दें।