कृषि के अंतर्गत, जल और उर्वरक दो प्रमुख संसाधन हैं एवं इनका प्रभावी उपयोग बहुत आवश्यक है। यह केवल अधिक उत्पादन के लिए ही नहीं, अपितु पर्यावरण सुरक्षा एवं मृदा की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए भी जरूरी है। सिंचाई के लिए अपनायी जाने वाली विभिन्न तकनीकों में से सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली, फर्टिगेशन के लिए संपूर्ण विश्व में सबसे अधिक अपनायी जाने वाली तकनीक है, जिसमें से टपक सिंचाई (ड्रिप सिंचाई विधि) और फव्वारा सिंचाई सर्वाधिक लोकप्रिय है। फर्टिगेशन से तात्पर्य उर्वरकों को खेत में देने की प्रक्रिया या विधि से है। इसके अंतर्गत, उर्वरकों के मिश्रण को सिंचाई के काम में लाये जाने वाले जल के साथ मिलाकर सिंचाई संयंत्र के माध्यम से पौधों या फसलों को बराबर मात्रा में दिया जाता है। फर्टिगेशन के लिए टपक सिंचाई प्रणाली(ड्रिप सिंचाई विधि) सबसे अधिक उपयुक्त है। फर्टिगेशन तकनीक का उपयाेग फर्टिगेशन तकनीक का उपयोग व्यावसायिक कृषि और बागवानी में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसका प्रयोग पौधों के ऊतक विश्लेषण में पाई गई पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए किया जाता है। यही नहीं आमतौर पर सब्जियों तथा फलों जैसे उच्च मूल्य वाली फसलों में भी किया जाता है। उर्वरक सिंचाई की आवश्यकता सिंचाई के साथ उर्वरकों के प्रयोग से जल व उर्वरकों का सही मात्रा में उपयोग होता है। इस माध्यम से उर्वरक प्रभावी रूप से पौधों की जड़ों तक पहुंचते हैं। फर्टिगेशन माध्यम से की गयी सिंचाई से पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता अधिक रहती है। इससे उर्वरकों की उपयोग दक्षता बेहतर होती है। उर्वरकों के अधिक उपयोग से न केवल मृदा में रासायनिक बदलाव आते हैं बल्कि धीरे-धीरे उत्पादकता में भी कमी आती है। अतः फर्टिगेशन के माध्यम से पौधों को उचित मात्रा में पोषक तत्व ही नहीं मिलते बल्कि मृदा के स्वास्थ्य को भी संतुलित बनाये रखा जा सकता है। फर्टिगेशन में उपयोग होने वाले उर्वरक अधिकांश पोषक तत्वों का फर्टिगेशन सिंचाई प्रणाली के माध्यम से उपयोग किया जा सकता है। फर्टिगेशन में नाइट्रोजन सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला पोषक तत्व है। स्वाभाविक रूप से पायी जाने वाली नाइट्रोजन एक डायटोमिक अणु है, जिससे पृथ्वी के वायुमंडल का लगभग 78 प्रतिशत हिस्सा बनता है। अधिकांश पौधे सीधे डायटोमिक नाइट्रोजन का उपयोग नहीं कर सकते हैं, इसलिए नाइट्रोजन को अन्य रासायनिक पदार्थों के एक घटक के रूप में समाहित किया जाता है, ताकि पौधों द्वारा उपयोग किया जा सके। आमतौर नाइट्रोजन को अमोनियम नाइट्रेट और यूरिया के रूप में प्रयोग किया जाता है। पौधों द्वारा उपयोग किए जाने वाले आवश्यक अन्य पोषक तत्वों में फॉस्फोरस और पोटेशियम शामिल हैं। नाइट्रोजन की तरह पौधों को फॉस्फोरस की भी आवश्यकता होती है, लेकिन उन्हें जैव-रासायनिक पोषक तत्वों के रूप में काम करने के लिए अन्य रासायनिक पदार्थों जैसे कि मोनोअमोनियम फॉस्फेट या डाईअमोनियम फॉस्फेट के रूप में होना चाहिए। ठीक इसी तरह पोटेशियम का एक सामान्य स्रोत म्यूरेट ऑफ पोटाश है, जो रासायनिक रूप से पोटेशियम क्लोराइड है। पोटेशियम सल्पेफट जैसे विशेष उर्वरक, पानी में अत्यधिक घुलनशील होने के कारण फर्टिगेशन के लिए अत्यधिक उपयुक्त होते हैं। फेरस, मैंगनीज, जिंक, कॉपर, बोरॉन, मॉलीब्डेनम आदि पोषक तत्वों की आपूर्ति विशेष उर्वरकों के साथ की जाती है। उर्वरक सिंचाई प्रणाली के लाभ प्रभावी रूप से पोषक तत्वों का उपयोग उर्वरकों के मृदा में सीधे प्रयोग की तुलना में फर्टिगेशन माध्यम से उर्वरकों का पौधों द्वारा अधिक दक्षतापूर्ण उपयोग होता है। फर्टिगेशन द्वारा पोषक तत्व सीधे जड़ के सक्रिय भाग में पहुंचते हैं और पौधे इसे आसानी से ग्रहण करने में सक्षम होते हैं। जल प्रदूषण में कमी रासायनिक उर्वरकों के निरन्तर प्रयोग से सतही जल और भूजल निरंतर प्रदूषित हो रहे हैं। अतः फर्टिगेशन से जल प्रदूषण को भी कम किया जा सकता है। कृषि संसाधन सरंक्षण उवर्रक सिंचाई प्रणाली से निम्न कृषि संसाधनों की बचत की जा सकती हैः पानी उर्वरक ऊर्जा श्रम समय कार्य प्रणाली में अधिक लचीलापन फसल में वृद्धि के साथ-साथ खेत में प्रवेश कर सिंचाई तथा उर्वरकों का प्रयोग आदि कार्य उर्वरक सिंचाई प्रणाली की कमियां उच्च प्रारंभिक लागत। सूक्ष्म पोषक तत्वों का समुचित प्रबंधन सूक्ष्म पोषक तत्वों की बहुत कम मात्रा भी सिंचाई जल के साथ घोलकर पौधों को सरल तरीके से प्राप्त करवाई जा सकती है। स्वस्थ फसल वृद्धि फर्टिगेशन के माध्यम से पत्ती, तना आदि भाग सूखे ही रहते हैं तथा कम भीगते हैं, जिससे रोग पनपने की आशंका कम होती है। ऊबड़-खाबड़ भूमि का प्रयोग इस विधि का टपक सिंचाई के माध्यम से उपयोग करके ऊबड़-खाबड़ भूमि में भी उर्वरकों का अधिक दक्षता से उपयोग किया जा सकता है। खरपतवार नियंत्रण फर्टिगेशन विधि के प्रयोग से खरपतवारों की वृद्धि कम होती है। जल और उर्वरक की बचत सब्जियों में उर्वरक सिंचाई प्रणाली से पानी की लगभग 40 से 70 प्रतिशत और उर्वरक की 30 से 50 प्रतिशत बचत होती है। सारणी 2. फर्टिगेशन द्वारा उर्वरक उपयोग दक्षता पोषक तत्व उर्वरक उपयोग दक्षता (प्रतिशत) मृदा अनुप्रयोग फर्टिगेशन विधि नाइट्रोजन 30-50 95 फाॅस्फोरस 20 45 पोटेशियम 50 80 स्रोतः कृषि पोषक तत्व प्रबंध उर्वरता मृदा अपरदन में कमी पोषक तत्वों को पानी के साथ मिलाकर ड्रिप सिस्टम के माध्यम से सिंचाई की जाती है, इसलिए इसके उपयोग से पारंपरिक सिंचाई की अपेक्षा मृदा अपरदन की आशंका शून्य होती है। खनिजों के निक्षालन (लीचिंग) में कमी उर्वरक सिंचाई को नियोजित करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली विधियों से अक्सर खनिजों का निक्षालन (लीचिंग) कम हो जाता है। सारणी 1. फर्टिगेशन में उपयोग किये जाने वाले उर्वरक नाम नाइट्रोजन-फाॅस्फोरस-पोटाश ( N-P2O5-K2O (प्रतिशत) 20 डिग्री सेल्सियस पर घुलनशीलता(ग्राम प्रति लीटर) अमोनियम नाइट्रेट 34.0.0 1830 अमोनियम सल्फेट 21.0.0 760 यूरिया 46.0.0 1100 मोनोअमोनियम फाॅस्फेट 12.61.0 282 डाईअमोनियम पफाॅस्पेफट 18.46.0 575 पोटेशियम क्लोराइड 0.0.60 347 पोटेशियम नाइट्रेट 13.0.44 316 पोटेशियम सल्फेट 0.0.50 110 मोनोपोटेशियम फाॅस्फेट 0.52.34 230 फाॅस्फोरिक एसिड 0.52.0 457 स्रोतः agrivi.com>post>fertigation उर्वरक सिंचाई प्रणाली की कमियां उच्च प्रारंभिक लागत। ड्रिपरों तथा लेटरल पंक्तियों के अवरुद्ध होने की आशंका। अधिक देखरेख की आवश्यकता व फर्टिगेशन के लिए उपयोग होने वाले उर्वरकों की अधिक लागत। यदि सिंचाई प्रणाली में खराबी हो तो पोषक तत्वों का असंतुलित वितरण होता है जैसे कि असंतुलित नाइट्रोजन के कारण पौधों के अधिक विकास व कम उत्पादन की आशंका। फर्टिगेशन के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें उर्वरकों का पूर्णतः घुलनशील होना अत्यन्त आवश्यक है। फॉस्फोरस के साथ कैल्शियम तथा मैग्नीशियम का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे एमीटर अवरुद्ध हो जाता है। उर्वरक सिंचाई के बाद प्रणाली में कम से कम 5 से 10 मिनट तक साफ पानी चलाना चाहिए, जिससे प्रणाली में बचे हुये उर्वरक घुल जाएं और पानी के साथ बाहर निकल जायें। इससे एमीटर को अवरु( होने से बचाया जा सकता है। सभी घुलनशील पदार्थों का उपयोग फर्टिगेशन में किया जा सकता है, परन्तु नाइट्रोजन तथा पोटेशियम मुख्य रूप से उपयोग में लाये जाते हैं। स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), सरोज चौधरी-मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विभाग, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी-221005 (उत्तर प्रदेश), और अर्जुन सिंह भाकृअनुप-राष्ट्रीय केला अनुसंधान केंद्र, तिरुचिरापल्ली-६20102 (तमिलनाडु)।