<h3 style="text-align: justify;">घाटे का सौदा कही जाने वाली खेती से मुनाफा</h3> <p style="text-align: justify;">देशभर के कई युवा पेशेवर नियमित काॅरपोरेट जाॅब और एसी ऑफिसों को छोड़कर खेती को अपना रहे हैं। ये शहरी युवा किसान अपनी मेहनत और लगन से घाटे का सौदा कही जाने वाली खेती को मुनाफे में बदलकर सफलता की नई लकीर भी खींच रहे हैं। बहुत से युवाओं को हालांकि यह लगता है कि खेती में काफी मेहनत है और लाभ अर्जित करने में काफी समय लगता है। आपको सही समय पर खेती के लिए प्रयास करना पड़ता है। इसके साथ ही बीज रोपना, रोगों की पहचान, पानी की व्यवस्था आदि का भी काफी ध्यान रखना पड़ता है। इन सभी चुनौतियों के बाद भी खेती कर रहे युवा इंजीनियर किसान काफी खुश हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">श्री अभिषेक धामा</h3> <p style="text-align: justify;">जब 27 साल के श्री अभिषेक धामा ने इंजीनियरिंग छाेड़कर खेती करने का फैसला किया तो उनके परिवार के सदस्यों ने अविश्वास जताते हुए इस पर आपत्ति की। उनके फैसले पर घरवालों का कहना था, ‘यदि खेती ही करनी थी तो इतनी पढ़ाई करने की क्या जरूरत थी?’ उत्तरी दिल्ली के पल्ला गांव में जब श्री अभिषेक धामा ने <a href="../../../../../agriculture/crop-production/91593e93094d92f92a94d93092393e93293f92f94b902-91593e-938902915941932/91493792794092f-92a94c92794b902-915940-916947924940/92c93f93993e930-92e947902-91493792794092f-92a94c92794b902-915940-916947924940/93894d91f94093593f92f93e-915940-916947924940">स्टीविया की खेती </a>शुरू की थी तो इलाके के दूसरे किसानों ने उनकी खेती को देखते हुए मजाक में श्री धामा का नाम मिस्टर स्टीविया रख दिया। कम प्रचलित स्टीविया के बारे में क्षेत्र के लोग कुछ जानते नहीं थे कि यह मिठास पैदा करने वाला प्राकृतिक पौधा है। श्री धामा पहले इलेक्ट्राॅनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग के कार्यक्षेत्र में नौकरी कर रहे थे। तीन साल पहले उन्होंने बिना किसी की परवाह किए नौकरी छोड़कर खेती करने का फैसला किया था।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownload.jpg" width="238" height="151" /></p> <h3 style="text-align: justify;">श्री अजय नाइक</h3> <p style="text-align: justify;">ऐसे ही एक शहरी युवा किसान गोवा के श्री अजय नाइक हैं। खुद को ये बहुत बड़ा फूडी मानते हैं। वे सब्जियों की बिगड़ती गुणवत्ता की वजह से काफी परेशान थे। आईटी सेक्टर में 10 वर्षों तक जाॅब करने वाले इस कंप्यूटर इंजीनियर ने कहा, ‘मैंने इस बात पर रिसर्च की है कि बेहतर गुणवत्ता वाली सब्जियां किस तरह उगाई जा सकती हैं। मैं परंपरागत खेती क तुलना में बिना कीटनाशक और रासायनिक खाद के बेहतर गुणवत्ता वाली सब्जियां उगाना चाहता था।’ इन्होंने देश का पहला इंडोर वर्टिकल हाइड्रोपोनिक्स फार्म स्थापित किया है, जिसमें मृदा की जगह पोषक तत्व वाले पानी की मदद से खेती की जाती है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccdownload2.jpg" width="229" height="156" /></p> <p style="text-align: justify;">श्री नाइक ने बताया, इस प्रकार की शुरुआत इसलिए की जिससे कि न सिर्फ हमारे ग्राहकों को बेहतर उत्पाद पाने संबंधी फायदा हो, बल्कि हम पर्यावरण का भी ध्यान रख सकें।’उन्हाेंने कहा कि उनकी इंजीनियरिंग और साॅफ्टवेयर डिग्री से उन्हें खेती करने में भी काफी मदद मिली। श्री अजय नाइक ने बताया, जब हमने खेती की शुरुआत की तो हमारा कामकाजी खर्च और सेटअप बहुत महंगा था। इसके बाद हमने तकनीक के अपने ज्ञान की मदद ली और खर्च घटाने के लिए अपना समाधान विकसित किया। इससे हमें खर्च कम करने और प्रक्रिया को बेहतर बनाने में भी काफी मदद मिली। उनका मानना है कि अगली हरित क्रांति में इजीनियरिंग बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती है।’ सिर्फ 9 महीने के करिअर में ही वे समझ गए कि काॅरपोरेट लाइफ उनके लिए नहीं है।</p> <h4 style="text-align: justify;"> पौधे को बढ़ता हुआ देखकर मिलने वाला सुकून</h4> <p style="text-align: justify;">अजय नाइक बताते हैं एक पौधे को बढ़ता हुआ देखना आपको इतना सुकून देता है कि कोई भी पार्टी, क्लब या वेतन इसका मुकाबला नहीं कर सकता।</p> <h3 style="text-align: justify;">श्री वेंकट अय्यर </h3> <p style="text-align: justify;">आईबीएम के पूर्व एग्जीक्यूटिव श्री वेंकट अय्यर 53 वर्ष के हैं। वर्ष 2003 में जाॅब छोड़ने के बाद उन्होंने खेती शुरू की। लगभग 16 वर्ष बाद अपनी कृषि यात्रा पर उन्होंने एक किताब लिखी है, जिसका नाम है- ‘मूंग ओवर माइक्रोचिप्स एडवेंचर ऑफ अ टेकी टर्न्ड फार्मर।’ अब वे नाव एवं शहरी जीवन से दूर अपने खेत में ही रहते हैं और अपने इस जीवन से बहुत खुश हैं।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), (प्रस्तुति: अश्विनी कुमार निगम), नई दिल्ली । </p>