वर्तमान समय में, अपने सूक्ष्म आकार तथा अद्वितीय भौतिक-रासायनिक विशेषताओं के कारण नैनोमैटेरियल्स का विभिन्न क्षेत्राों में प्रयोग बढ़ा है। नैनो तकनीक में कृषि संबंधित प्रतिकूल समस्याओं को कम करने के साथ-साथ, पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा व कृषि उत्पादकता में सुधार करने की अपार क्षमता है। कृषि उत्पाद, मानव जीवन के अधिकांश पहलुओं को प्रभावित करते हैं। इनमें दैनिक जीवन की उपयोगी वस्तुएं जैसे-ईंधन, कपड़ा, पफर्नीचर, भोजन और पशु आहार इत्यादि शामिल हैं। कृषि से भावी वैश्विक जरूरतों को पूरा करने के लिये प्रौद्योगिक उन्नति की आवश्यकता है। नैनोटेक्नोलॉजी के कृषि क्षेत्रा में विभिन्न अनुप्रयोगों एवं आशंकाओं को संक्षेप में इस लेख में वर्णित किया गया है। शोधकर्ताओं द्वारा हाइड्रोजन, नैनाेक्ले और नैनोजियोलाइट्स का सफल परीक्षण मृदा की जलधारण क्षमता को बढ़ाने के लिये किया गया है। इसलिये फसल परिपक्वता के दारैान पानी धीमी गति से प्रवाहित होता है तथा लंबी अवधि तक आवश्यकतानुसार उपलब्ध भी होता है। इस प्रकार की प्रणाली का प्रयोग पत्ती क्षेत्राों के पुनर्वितरण के लिये अनुकूल है। कार्बन नैनोट्यूब और अकार्बनिक जैसे नैनो धातु तथा मेटल ऑक्साइड का उपयोग पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले हानिकारक पदार्थों को अवशोषित करने के लिये भी किया गया है। नैनौमटेरियल्स द्वारा पौधों की प्रभावी वृद्धि कार्बन नैनोट्यूब और Mo, SiO2, ZnO एवं TiO2 के नैनोकणों के प्रयोग के पश्चात पौधों की वृद्धि आंकी गयी है। इस तकनीक द्वारा पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा पौधों को मिलती है। पौधों पर नैनोमैटेरियल्स का वास्तविक प्रभाव उनकी प्रजातियों की संवेदनशीलता के अलावा उनकी संरचना, आकार, सतह, भौतिक और रासायनिक गुणों पर निर्भर करता है। भाकृअनुप-कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान में नैनोटेक्नोलॉजी नैनोटेक्नोलॉजी के कृषि संबंधित क्षेत्रों में प्रयोगों पर संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा उल्लेखनीय तकनीकों का विकास किया गया है, जो निम्नलिखित हैं: नैनोसेल्युलोज पायलट प्लांट भारत सरकार के महत्वाकांक्षी 'मेक इन इंडिया' अभियान में पहल करते हुए संस्थान ने अपने हितधारकों एवं नवउद्यमियों के लिए प्रौद्योगिकी प्रदर्शन व अपने देश में अपनी तरह का प्रथम नैनोसेल्युलोज पायलट प्लांट मुंबई मुख्यालय में स्थापित किया है। इस पायलट प्लांट में कपास लिंटर्स, कपास अपशिष्ट और खोई से 10 कि.ग्रा. प्रति 8 घंटे की दर से जलीय रूप में नैनोक्रिस्टलाईन सेल्युलोज (एनसीसी) और शुष्क रूप नैनोफायब्रिलेटेड सेल्युलोज (नएफसी) का उत्पादन लिया जाता है। संस्थान के हितधारकों को नैनोसेल्युलोजयुक्त विभिन्न अनुप्रयोगों की कुशल तकनीकें विकसित करने और कस्टमाइज्ड उत्पादों का टेस्ट ट्रायल करने के लिए उष्मायन इकाई के रूप में नैनोसेल्युलोज पायलट प्लांट की सुविधा प्रदान की जाती है। नैनोकणयुक्त सूती कपड़ा इस पायलट संयंत्र की सुविधा अन्य नैनोमटेरियल्स तैयार करने के लिए भी प्रयोग में लायी जा रही है जैसे कि नैनो जिंक ऑक्साइड, जिसके उपयोग से परिष्कृत की गई रोगाणुरोधी सूती चादरें अस्पताल में भर्ती किये गए मरीजों में पारसक्रंमण रोकने के लिए सफलतापूर्वक प्रयोग में लाई रही हैं। हाई-एंड पेपर कोटिंगयुक्त क्रॉफ्ट पेपर नैनोसेल्युलोज का उपयोग करके कम से कम लागत में शुद्ध लुगदी प्राप्त हुई है। योजक या एडिटीव के रूप में पुनर्चक्रित क्रॉफ्ट पेपर में डालने से पेपर की मजबूती में वृद्धि दिखाई दी है। नैनोसेल्युलोजयुक्त ग्रीन कंपोजिट खाद्य पैकेजिंग में नैनोसेल्युलोज से बनी नैनोकंपोजिट फिल्म से शीघ्र खराब होने वाले खाद्य पदार्थों की शेल्फ लाइफ में सुधार आया है। नैनो उर्वरक दूषित मृदा सुधार के लिए, नाइट्रोजन उर्वरकों के निक्षालन से होने वाले नुकसान, पौधों में अमोनिया विषाक्तता को कम करने तथा कृषि पैदावार बढ़ाने के लिए प्रभावी व धीमी गति में उर्वरक प्रवाहित करने हेतु नैनोसेल्युलोज द्रव्य की उपयोगिता सिद्ध हो रही है। इससे उर्वरक की खपत कम होगी और फसलों का उत्पादन भी बढ़ेगा। इन सफल तकनीकों के अतिरिक्त संस्थान में नैनोटेक्नोलॉजी क्षेत्र में शोध कार्य संबंधी सभी अत्याधुनिक उपकरण व सुविधाएं उपलब्ध हैं। संस्थान द्वारा समय-समय पर इस संदर्भ में विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। उद्यमी/शोधकर्ता संस्थान एवं सिरकोट द्वारा विकसित नैनोसेल्युलोज उत्पादन प्रौद्योगिकी से न केवल कपास लिंटर और अन्य सेल्युलोज प्रचुर कृषि अपशिष्ट का मूल्यवर्धन हो रहा है, बल्कि प्रौद्योगिकी लाइसेंसिग के लिए अन्वेषक, उद्यमी और उद्योगपति भारत सरकार के स्टार्टअप पहल के तहत संस्थान से भी जुड़ रहे हैं। भविष्य की आशंकाएं कृषि जगत में नैनोप्रौद्योगिकी के संभावित अनुप्रयोगों की पहचान करने में कापफी प्रगति के बावजूद, कृषि क्षेत्रा में महत्वपूर्ण योगदान देने से पूर्व निकट भविष्य में कई अन्य मुद्दों का समाधान किया जाना बाकी है, ये निम्नलिखित हैंः नैनोसिस्टम्स के प्रभावों की मौजूदा व्यावसायिक उत्पादों के प्रभावों के साथ तुलना करना नैनोमैटेरियल्स, नैनोपेस्टिसाइड्स नेनाैफर्टिलाइजर्स संबंधित नुकसान और जीवनचक्र के मूल्यांकन और तरीकों के साथ-साथ गैर लक्षित जीवों जैसे-अन्य पौधे, मृदा और मधुमक्खियों पर विपरीत प्रभाव का आंकलन नैनोमैटेरियल्स और नैनोकणों का प्रयोग करके उत्पादित भोजन की प्रक्रिया में नियुक्त श्रमिकों और उपभाेक्ताओं की सुरक्षा काे संबंधित करना भी आवश्यक है। बढ़ती हुई वैश्विक जनसंख्या और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न हो रही चुनौतियों के निवारण को ध्यान में रखते हुए, कृषि क्षेत्र में नैनोमैटेरियल्स से टिकाऊ के मुद्दे का समाधान तलाशा जा सकता है। वास्तव में उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को नैनोस्केल करिअर के उपयोग से बढ़ाया जा सकता है। इससे कम खपत में उचित उत्पादकता को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। नैनोटेक्नोलॉजी द्वारा किसी भी प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाले कचरे एवं उपोत्पाद की मात्रा में भी कमी आती है, जिसके साथ ही साथ कचरे के पुनः उपयोग में भी यह तकनीक सहायक है। नैनोसेंसर्स तकनीक, ऊर्जा तथा संसाधनों के कुशल प्रबंधन के साथ प्रिसिजन(सटीक) कृषि को प्रोत्साहन देने में भी उपयोगी है। पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य पर होने वाले नैनोटेक्नोलॉजी के प्रभावों का सटीक मूल्याकंन करने के लिए विश्वसनीय तरीकों के विकास की आवश्यकता है। इससे विभिन्न मेट्रिसेसों में उपयोग होने वाले नैनोमैटेरियल्स के लक्षणों तथा मात्रा का अंदाजा लगाया जाना सुनिश्चित होगा। नैनोसेंसर्स प्रणाली नैनोसेंसर्स द्वारा किसानों को सटीक नियंत्रण के साथ पाैधाें की सामयिक जरूरतों को पूर्ण करने में सहायता मिलती है। इस प्रकार फसलों की निगरानी, मृदा में पोषक तत्वों और कीटनाशकों के सटीक विश्लेषण या स्मार्ट कृषि के लिये पानी के उपयोग की दक्षता को नियंत्रित करने संबंधित अनुसंधान प्रयासों पर कार्य करना अनिवार्य है। नैनोसेंसर्स द्वारा मृदा के कई मापदंडों ;पी-एच मान, पोषक तत्व, फसल और मृदा में अपशिष्ट कीटनाशकाें की मात्रा, आर्द्रता, रोगजनकों का पूर्वानुमान, नाइट्रोजन का अपटेक इत्यादि स्थायी खेती को बढ़ावा देने संबंधी केवल कुछ उदाहरण हैं। नैनाैसेंसर्स प्रणाली, पारंपरिक सेंसर प्रणाली की तुलना में उच्च संवेदनशीलता और विशिष्टता दर्शाती हैं। इसके द्वारा मृदा में उपस्थित मृदा जल तनाव का आंकलन करके वास्तविक पानी उपयोग की दक्षता को बढ़ाया जा सकता है। इसके साथ ही इसे स्वायत्त सिंचाई नियंत्रकों के साथ भी जोड़ा जा सकता है। सिंचाई प्रणाली का स्वचालन, स्मार्ट कृषि की एक प्रमुख तथा महत्वपूर्ण आवश्यकता है, विशेष रूप से उन इलाकों में जहां सिंचाई जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। स्त्राेत : खेती पत्रिका, आईसीएआर, मनोज कुमार महावर,वैज्ञानिक, ए.के. भारीमल्ला-वरिष्ठ वैज्ञानिक, पी.जी. पाटील-निदेशक और प्राची म्हात्रो-पुस्तकालयाध्यक्ष, भाकृअनुप-केंद्रीय कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, मुंबई (महाराष्ट्र)।