भूमिका आज विज्ञान और तकनीक ने इतनी उन्नति कर ली है की उसके अन्वेषणों और आविष्कारों को निहार कर आदमी चमत्कृत हुए बिना नहीं रह पाता। इन अनेक प्रकार के चमत्कारों, अन्य नई खोजों की ओर बढ़ते कदमों के कारण ही आज के युग को विज्ञान का, उसके चमत्कारों का युग कहा जाने लगा है। विज्ञान का ये चमत्कार कोई दो-चार दिन की उपलब्धी नहीं है, इंसान को यहाँ तक पहुंचने के लिए सालों तक अथक परिश्रम करना पड़ा है। हम पाते है की स्वतंत्रता-प्राप्ति से पहले आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में भारत की अपनी गति-दिशा लगभग शून्य थी। सूई से लेकर हवाई जहाज, रेलवे इंजन, यहाँ तक की रेल के डिब्बे भी आयात किए जाते थे। उन आयातित वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से ही देश का परिचय विश्व के आधुनिक विज्ञान के साथ संभव हो पाया। धीरे-धीरे आज स्थिति इतनी बदल चुकी है की छोटे-बड़े प्रत्येक सामान, यंत्र, उपकरण आदि का निर्माण भारत में होने लगा है। इतना ही नहीं आज भारत कई तरह की मशीनरी, यंत्रों, वैज्ञानिक उपकरणों की वैज्ञानिक तकनीक अदि का आस-पास के अनेक छोटे-बड़े देशों को निर्यात भी करने लगा है। इन उद्योग व कलकारखानों जिन्हें विश्वस्तरीय उत्पाद निर्मित करने है, विकसित व उच्च तकनीकों को अपनाते हुए निर्माण कार्य करते हैं। तकनीकी विकास के दौरान मूल सिद्धांत नहीं बदलते है, सिर्फ उपयोगिता आधारित तकनीक व विधि में सुधार एवं परिवर्तन होते रहते हैं। समय की बचत, लागत में कमी, अधिक उत्पादन की क्षमता, न्यूनतम व कम मजदूरों की आवश्यकता आदि आजकल उद्योगों की मुख्य जरूरतें हैं। वर्तमान समय की कड़ी प्रतिस्पर्धा के युग में हर उत्पाद की पूरी लागत बाजार में पहुंचने से पहले इतनी ही होनी चाहिए, जिससे निर्माता अपना लाभ भी कमा सके। हर उत्पाद के निर्माण की लागत में कमी हेतु उत्पादन की उच्च गति व उत्पादन क्षमता में वृद्धि दोनों ही आवश्यक है। निरंतर एक कमान उत्पादों के निर्माण द्वारा भी उत्पादन की गति व मात्रा दोनों में वृद्धि की जा सकती है। मुख्य बात है, इन वस्त्रों व उत्पादों को पूरे विश्व के बाजार में सफलतापूर्वक स्वीकार करने की, जिसके लिए महत्वपूर्ण आवश्यकता है – गुणवत्ता। हर उत्पाद को विश्वव्यापी बनाने हेतु अपने गुणवत्ता में निरंतर सुधार करना परमावश्यक होता है। उत्पादों की गुणवत्ता निरंतर बरकरार भी रहनी चाहिए अन्यथा प्रतिस्पर्धा के मार्केट में अच्छे उत्पादों की कमी बिलकुल नहीं है। विकसित उपकरणों के द्वारा उत्पादों के द्वारा उत्पादों व कच्चे मालों का गुणवत्ता मूल्यांकन करके हर उद्योग उत्तम निर्मित कर लाभ कमा सकता है व निरंतर विकसित हो सकता है। आधुनिक उपकरण बनाम पारम्परिक पद्धति द्वारा परीक्षण वर्तमान में अधिकतर आधुनिक उपकरण बिजली से चलने वाले इलेक्ट्रोनिक उपकरण हैं, जिनके संचालन व परीक्षण की विधि सरल होती है। इनके द्वारा प्राप्त परिणामों का प्रिंट प्राप्त किया जा सकता है व ये मान सीडी अथवा पेन ड्राइव में संचित भी किए जा सकते हैं, ताकि इनका उपयोग दूसरे कम्प्यूटर आदि पर किया जा सके। इस मानों का कम्प्यूटर द्वारा सांख्यिकी विश्लेष्ण कर ग्राफ आदि बनाए जा सकते हैं व इन मानों में त्रुटियों आदि की प्रतिशतता आदि निकाली जा सकती है। पारम्परिक पद्धति में तकनीकी विशेषज्ञ बिलकुल सीधे-सीधे सिद्धांतों का प्रयोग कर परीक्षण करते हैं व प्राप्त मान प्राय: सही होते हैं, पर मानवीय गलतियों की संभावना हमेशा रहती है। आधुनिक व स्वचलित यंत्रों के मान ज्यादा सटीक हो सकते हैं एवं इनसे काफी अधिक परीक्षण अपेक्षाकृत काफी कम समय में किए जा सकते हैं, पर परिणामों में अनिश्चितता अधिक रहती है। हर मानों व परीक्षणों का पुनरावलोकन संभव नहीं होता है, जबकि पारम्परिक पद्धति के परीक्षणों व मानों का कई बार अवलोकन कर के ही अंतिम परिणाम व मान प्राप्त किए जाते हैं जिससे परीक्षण के परिणामों की अनिश्चितता अपेक्षाकृत कम होती है। पारम्परिक परीक्षण पद्धति सिद्धांत के अनुसार सरल व आसान हैं एवं इनके परीक्षण को प्राय: शोध कार्यों में उपयोग किया जाता है क्योंकि इनके द्वारा प्राप्त मानों में त्रुटियों की संभावनाओं को कम किया जा सकता है व ये मान विश्वसनीय होते हैं। पारम्परिक पद्धति में परीक्षण हेतु समय अपेक्षाकृत ज्यादा लगता है एवं हर उपकरण व परीक्षण हेतु तकनीकी विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है। कई बार ऐसा भी होता है की विशेषज्ञ तकनीकीगण के आभाव में परीक्षण नहीं हो पाता है। इन परिस्थितियों से निपटने हेतु ही आधुनिक उपकरणों का विकास होता गया जिनके द्वारा समय की बचत के साथ-साथ तकनीकी विशेषज्ञों की जरूरतों म एभि कमी हुई। पारम्परिक पद्धति द्वारा प्राप्त मान अपेक्षाकृत कम सटीक हो सकते हैं पर ये मान अत्याधुनिक यंत्रों द्वारा प्राप्त मान से ज्यादा विश्वसनीय होते हैं। पारम्परिक यंत्रों में समय व विशेषज्ञों की आवश्यकता अधिक होती है पर प्राय: इनका रखरखाव आसान होता है व इनके संचालन में विद्युत् आदि की कम खपत होती है। इतने आधुनिक उपकरणों व यंत्रों के उपलब्ध होने पर भी कई बार परिणामों की विश्वसनीयता हेतु पारम्परिक पद्धतियों व उपकरणों द्वारा प्राप्त मानों को ही शोध कार्यों में वरीयता दी जाती है। पारम्परिक उपकरणों के द्वारा परीक्षण करने पर प्राप्त मान अधिक विश्वसनीय होते है यदि उनमें मानवीय भूल न हो। रेशों के गुणवत्ता परीक्षण करने हेतु पारम्परिक पद्धति में रेशों के हर गुणों के लिए अलग-अलग उपकरण हैं व उनके द्वारा परीक्षण करने हेतु तकनीकी विशेषज्ञ भी। रेशों के गुणवत्ता मूल्यांकन हेतु विकसित तकनीक के उपकरण उत्तम गुणवत्ता वाले वस्त्रों के निर्माण हेतु जिस प्रकार धागों का एक रूप व मजबूत होना जरूरी है उसी प्रकार उत्तम धागों के निर्माण हेतु रेशों के उत्तम गुणवत्ता भी बहुत महत्वपूर्ण है। रेशों की गुणवत्ता उनके चार-पांच मुख्य गुणधर्मो पर निर्भर करती है, साथ ही इनके उत्पादों की गुणवत्ता भी क्रमश: प्रभावित होती है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है रेशों की लंबाई जो प्राय: मिलीमीटर में दर्शाई जाती है। रेशों की औसत या स्टेपल लंबाई अधिक होने पर उन्हें समानांतर व एकरूप बनाना सरल होता है, जिनसे कताई प्रक्रिया अच्छी तरह हो पाती है और गाँठ रहित धागों का निर्माण हो पाता है। कपास अ अन्य रेशों का गुणवत्ता मूल्यांकन एच.वी.आई. एक अत्याधुनिक व विकसित संयंत्र है, जिसके द्वारा रेशों के नौ गुण धर्मो को एक साथ मापा जा सकता है व इनके मान का कम्प्यूटर द्वारा प्रिंट भी साथ ही साथ प्राप्त किया जा सकता है। देश के उत्तरी क्षेत्र के उत्तम गुणवत्ता वाले कपास का एच.वी.आई. यंत्र द्वारा परीक्षण व गुणवत्ता मान तालिका में दर्शाया गया है। अत्यधिक गति व विकसित तकनीक के एच.वी.आई. द्वारा रेशों के एक साथ मूल्यांकन किए जाने वाले नौ गुणधर्म इस प्रकार है – रेशों की 2.5 प्रतिशत स्टेपल लंबाई, लंबाई की एकरूपता, तन्यता, लंबाई में विस्तार, महीनता, शॉर्ट फाइबर इंडेक्स, कलर, परिपक्वता व रेशों में उपस्थित अशुद्धियाँ। यह यंत्र विभिन्न पारम्परिक उपकरणों व सिद्धांतों का उत्कृष्ट सम्मिश्रण है। रेशों के गुणवत्ता मूल्यांकन हेतु यह एक अनूठा व पूरे विश्व में उपयोग किया जाने वाला यंत्र है। इसके निर्माण व कार्य प्रणाली हेतु प्रकाश विज्ञान, मैकेनिकल प्रौद्योगिकी व इलेक्ट्रोनिक्स विज्ञान का प्रयोग किया जाता है और यह जटिल यंत्र कई सिद्धांतों पर एक साथ काम करते हुए उत्कृष्ट परिणाम देने का परीक्षण करने में सक्षम है। ऊस्टर जेलवेगर कम्पनी द्वारा निर्मित इस यंत्र एच.वी.आई. 900 अर्ध-स्वचलित मशीन में गुणवत्ता मूल्यांकन की सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। वर्तमान में भारत के भी तीन-चार निर्माताओं ने एच.वी.आई. का निर्माण प्रारम्भ किया है एवं व ऊस्टर से काफी कम कीमतों पर उपलब्ध भी हैं। इनकी पूर्णत: स्वचलित मशीन भी उपलब्ध है, पर कुछ तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार अर्ध-स्वचलित मशीन में काम करना ज्यादा सरल व विश्वसनीय पाया गया है। वर्तमान समय में टैक्सटाईल उद्योग के लगभग हर मिल, परीक्षण लैब, कपास के शोध संस्थान आदि में एच.वी.आई. का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है और ये न सिर्फ भारत बल्कि पूरे विश्व के टेक्स्टाईल उद्योग में रेशों के गुणवत्ता मूल्यांकन का प्रमुख आधार हैं। उच्च तकनीक के यंत्रों के द्वारा ही देश के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त रेशों की गुणवत्ता मूल्यांकन आसानी से संभव हो पाता है। वर्तमान में एच.वी.आई. उपकरण द्वारा रेशों की 25 प्रतिशत स्टेपल लंबाई के साथ-साथ अन्य कई गुणों का एक साथ मूल्यांकन किया जाता है। कईगुणों का मूल्यांकन एक ही बार में कर पाने की क्षमता के कारण इस यंत्र द्वारा अधिक नमूनों के रेशों का गुणवत्ता एक ही बार में कर पाने की क्षमता के कारण इस यंत्र द्वारा अधिक नमूनों के रेशों का गुणवत्ता मूल्यांकन कम समय में कर पाना संभव हो गया है। इस विशेषता के कारण एच. वी.आई. को हाई वॉल्यूम इंस्ट्रूमेंट कहा जाता है। इसमें लंबाई मापने हेतु रेशों की बहुत थोड़ी मात्रा लगभग दो या तीन ग्राम ली जाती है फिर रेशों को कॉम्बिंग करके समांतर किया जाता है, जिसके पश्चात उसे यंत्र में फिक्स किया जाता है। प्रकाशीय पद्धति द्वारा लम्बाई की माप की जाती है। प्रकाश की तेज किरणें रेशों से होकर गुजरती है व दूसरी ओर स्थित सेंसर इन किरणों द्वारा रेशों की 50 प्रतिशत स्पान लंबाई व 25 प्रतिशत स्पान लंबाई का निर्धारण कर स्क्रीन पर डिस्प्ले करता है। हर रेशों के कम से कम चार या पांच नमूनों का परीक्षण करके औसत लंबाई प्राप्त की जाती है। इस प्रकार प्राप्त मान में गलती की संभावना नगण्य हो जाती है। एच.वी.आई. यंत्र का मानकीकरण एच.वी.आई यंत्र का हमेशा व नियमित तौर पर मानकीकरण किया जाता है ताकि जो भी मान प्राप्त हों वो बिलकुल सही व विश्वसनीय हों तथा गुणवत्ता मूल्यांकन की विश्वसनीयता बरकरार रहे। यंत्रों को परीक्षण की शुरुआत करने के पहले हमेशा उनका मानकीकरण किया जाता है, जो मानक रेशों के परीक्षण द्वारा होता है। मानक नमूने अमेरिका व सिरकॉट, मुम्बई द्वारा तैयार किए जाते हैं व पूरे विश्व के टेक्स्टाईल परीक्षण लैब की उचित मूल्य पर प्रदान किए जाते है। मानक नमूनों में हर गुणों के मान अंकित होते हैं, जिन्हें हर दिन परीक्षण प्रारम्भ करने से पहले परीक्षण करके सुनिश्चित करना होता है और देखना होता है की यंत्र मानक नमूनों का परीक्षण करने पर उनके निर्धारित जितना मान दे रहा है या नही। अगर यंत्र मानक नमूनों का परीक्षण करने पर उनके अंकित मान से विभिन्न नमूनों का परीक्षण करके उनके मानों की समीक्षा की जाती है और प्राप्त मानों को मानक मानों के साथ मिलाकर समतुल्य पाने पर ही आगे परीक्षण प्रारम्भ किया जाता है। हर बार यंत्र को मानकीकृत करने हेतु दो मानक नमूनों का परीक्षण आवश्यक है। एक वो मानक नमूने जिनके प्राय: हर गुणधर्म न्यूनतम स्तर के हों। जैसे 18-20 मिलीमीटर रेशों की लंबाई का परीक्षण जो लंबाई की श्रेणी में न्यूनतम है, महीनता हेतु 2.8 से 3.3 माइक्रोनेयर तक के रेशे लिए जाते हैं। दूसरा नमूना इस प्रकार किया जाता है जिनके गुणों के मान अधिकतम होते है। इस प्रकार दोनों सीमाओं के मानक नमूनों के परीक्षणों से प्राप्त मानों को मानक नमूनों पर निर्धारित अंकित मानों के समतुल्य पाने पर ही यंत्र का मानकीकरण पूरा माना जाता है व परीक्षण प्रारम्भ होता है। एच.वी.आई. द्वारा प्रति घंटे दस से बारह नमूनों के सभी गुणधर्मो का मूल्यांकन किया जा सकता है और वो भी हर नमूनों के पांच-पांच बार परीक्षण कर उनका औसत मान निकालकर। इस प्रकार परीक्षण की गति काफी बढ़ जाती है और कम समय में काफी अधिक कपास व अन्य नमूनों का गुणवत्ता मूल्यांकन संभव हो पाता है। यंत्र के मासिक मानकीकरण हेतु मानक कपासों के बारह-बारह नमूनों का परीक्षण किया जाता है जिससे इनके द्वारा प्राप्त मानों की विश्वसनीयता बनी रहती है। परीक्षण में भूल कम से कम हो व मान बिलकुल सटीक प्राप्त हों इस परीक्षण के दौरान बीच में एक बार कभी-कभी मानक नमूनों का परीक्षण कर प्राप्त मानों को सुनिश्चित करते रहना चाहिए। यंत्रों के मानकीकरण हेतु कपास के मानक नमूने कपास के मानक नमूनों के मान सम्दर्भ के तौर पर उपयोग में लाए जाते हैं अत: इनकी तैयारी हेतु विशेष सावधानी बरती जाती है। सबसे पहले रेशों के ब्लो रूम में अच्छी खोला जाता है जिससे उनकी अच्छी तरह सफाई हो जाती है और गंदगी पूरी तरह निकल जाती है। ब्लों रूम के पश्चात प्रत्येक प्रजाति के बीस से चालीस नमूनों का परीक्षण कर उनका मान निकाला जाता है। इन बीस के चालीस मानों का औसत मान निकाला जाता है जो मानक नमूनों का गुणवत्ता मान होते हैं। परीक्षण के दौरान विभिन्न यंत्रों का उपयोग किया जाता है। पारम्परिक व उच्च तकनीक दोनों उपकरणों द्वारा परीक्षण करके मान निकाला जाता है और उनका अध्ययन करके जांचा जाता है कि दोनों उपकरणों व विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा प्राप्त मान समतुल्य अर्थात लगभग एक समान हैं या नहीं। सभी सूत्रों से प्राप्त मानों में समानता पाए जाने के पश्चात ही उनका औसत मान निकालकर अंतिम रूप से उन्हें रेशों का गुणवत्ता मान दिया जाता है। इसे प्राप्त करने में पूरी सावधानी बरती जाती है क्योंकि यही मान सन्दर्भ मान के रूप में यंत्रों के मानकीकरण के दौरान उपयोग में लाए जाते हैं। कपास व अन्य विभिन्न प्रकार के रेशों व इनसे निर्मित धागों की गुणवत्ता व उनका सटीक मूल्यांकन टेक्स्टाईल व वस्त्र उद्योग के मूल्य आधार है। अलग-अलग किस्मों के रेशों के गुणधर्मो पर ही उनसे निर्मित वस्त्रों की गुणवत्ता, मजबूती, चमक, टिकाऊपन आदि निर्भर करती है। उत्तम, आधुनिक व सुदृढ़ यांत्रिक प्रणाली हर उद्योग का मुख्य स्तंभ होते है। उत्पादन हेतु यंत्रों की कार्य क्षमता काफी महत्वपूर्ण होती है। साथ ही यंत्रों का मानकीकरण व यंत्रों का रखरखाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है, ताकि उत्पादों का निर्माण निर्बाध्द रूप से चलता रहे। तालिक: उत्तरी क्षेत्र के उत्तम गुणवत्ता वाले कपास का एच.वी.आई. यंत्र द्वारा परीक्षण व गुणवत्ता मान ट्रायल स्थान प्रजाति 2.5 प्रतिशत स्पान लंबाई (मिमी.) एकरूपता (प्रतिशत) माइक्रोनेयर तन्यता मान (3.2 मिमी. ग्राम टेक्स) उत्तरी क्षेत्र Br 04 (a) श्रीगंगानगर CSH 3129 30.8 50 3.9 25.9 Br 04 (a) लुधियाना F 2228 30.3 51 4.4 24.9 Br 05 (a) लुधियाना CSHH 3008 31.3 52 4.6 25.1 Br 05 (a) लुधियाना LHH 1424 29.9 53 4.6 24.4 Br 05 (a) भटिंडा MRC 7365 31.4 50 4.3 28.8 Br 05 (a) कानपुर लोकल चेक 29.9 51 4.3 24.9 अन्य सिरसा - 30.0 51 4.3 24.2 अन्य सिरसा - 30.0 52 4.6 24.8 अन्य सिरसा - 29.7 52 4.0 24.4 अन्य सिरसा - 31.0 51 4.7 25.4 अन्य सिरसा - 29.1 52 4.4 23.6 अन्य सिरसा - 29.0 52 4.6 25.1 अन्य श्रीगंगानगर - 31.6 49 3.9 26.9 अन्य श्रीगंगानगर - 30.2 53 4.4 25.7 स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार।