परिवर्तन लाने की जरिया-स्वरोजगार सुनने में भले हास्यास्पद लगे कि कोई सब्जी बेचकर समाज बदल सकता है, परंतु ऐसा करने की जिद है, भारतीय प्रबंधन संस्थान (अहमदाबाद) के टॉपर कौशलेंद्र की। वे कहते हैं, राज्य में अकूत संसाधन है, लेकिन आज बिहार की गिनती बीमारू राज्यों में होती है। जबकि गुजरात प्राकृतिक संसाधन विहीन होते हुए भी विकास के पहले पायदान पर है। वास्तव में प्राकृतिक संसाधन बड़ी चीज नहीं होती बल्कि सबसे बड़ी चीज है, बुद्धि और कौशल। अगर इसका सही उपयोग किया जाए तो परिवर्तन निश्चित होगा। इसी उदाहरण को प्रस्तुत करने के लिए इस युवा ने अपने शानदार करियर को छोड़कर बिहार में सब्जी बेचने का नेटवर्क प्रारंभ किया है। राज्य के नालंदा और नवादा में प्रारंभिक शिक्षा पाने के बाद कौशलेंद्र ने बीटेक (कृषि अभियांत्रिकी) की पढ़ाई सन् 2003 में गुजरात के जूनागढ़ से पूरी की। कुछ समय नौकरी करने के पश्चात प्रबंधन की तैयारी की। 2005-07 के सत्र में अहमदाबाद स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) में उन्हें दाखिला मिला। गुजरात में पढ़ाई करने के दौरान ही उन्हें महसूस हुआ कि अगर परिवर्तन लाना है तो नौकरी नहीं बल्कि स्वरोजगार करना होगा। राज्य के हालात कई मामलों में अनुकूल हैं फिर भी राज्य पिछड़ा है, इसका एकमात्र कारण बिहारी समाज में उद्यमिता का अभाव है। आईआईएम के इनके बैच में पहली बार 320 में से 47 छात्र बिहार के थे। जब इन स्थितियों की चर्चा वे अपने सहपाठियों से करते थे तो वे उनका मजाक उड़ाते थे। परंतु संस्थान के प्राध्यापक प्रो। पीयूष कुमार सिन्हा ने उनका हौसला बढ़ाया। उन्होंने व उनके अन्य साथियों ने कहा कि पहले पढ़ाई पूरी करो फिर अपने मिशन में लगना। सब्जी बेच समाज बदलने का संकल्प, देखिये भारतीय प्रबंधन संस्थान (अहमदाबाद) के टॉपर कौशलेंद्र की सफलता और प्रेरणा से भरी कहानी कौशल्या फाउंडेशन जुलाई 2007 से कौशलेंद्र ने अपना मिशन शुरू किया। इन्हें ध्यान में आया कि लोगों को ताजी सब्जी, सही वजन एवं निश्चित मूल्य पर उपलब्ध करायी जाये तो अच्छा व्यवसाय चल सकता है। उनके पास पूंजी के तौर पर टॉप करने के कारण मिले नेस्ले अवार्ड का 25 हजार रुपये, गोदरेज अवार्ड का 30 हजार रुपये तथा समर ट्रेनिंग का कुछ पैसा ही था। छह महीने भटकने के बाद उन्होंने अपनी प्रेरणा अर्थात मां के नाम पर कौशल्या फाउंडेशन की नींव रखी। शुरुआत में आस-पास के किसानों को आश्वस्त किया कि उनकी सभी सब्जी वे खरीदेंगे। इधर सब्जी विक्रेताओं को एक निश्चित मानदेय तथा सब्जियों की बिक्री पर कमीशन देने का वादा किया परंतु कम पैसे में इस योजना को मूर्त रूप देना संभव नहीं था। अत: वे पैसे के लिए प्रयास करने लगे। पहली बार संयुक्त राष्ट्र की संस्था एफडब्लूडब्लूबी की विजी मैम ने उन्हें पांच लाख रुपये का ऋण दिया तब इनकी योजना काम करने लगी। फिर बैंक तथा राज्य सरकार की संस्थाओं से भी इन्हें काफी सहयोग मिला। आत्मा व बामेती के पदाधिकारियों ने कदम-कदम पर इनकी मदद की। आज इनकी श्रृंखला में 3000 किसान तथा 600 सब्जी विक्रेता जुड़ चुके हैं। पटना में 50 वातानुकूलित ठेलों पर इनकी सब्जी बिक रही है। इनके ठेलों पर कोई मोल भाव नहीं होता तथा सभी सब्जियां पॉलीथिन में बंद रहती हैं। पॉलीथिन पैक पर ही सब्जियों का दाम व वजन लिखा होता है। वे ग्राहकों की सुविधा के लिए प्री-पेड तथा पोस्ट-पेड स्कीम भी चलाते हैं। एक हजार रुपये के प्री-पेड खाते से कोई ग्राहक एक हजार पचास रुपये की सब्जी ले सकता है। इनके विक्रेता ग्राहकों के घर पर भी सब्जी पहुंचाते हैं। इनका दावा है कि इनकी सब्जियां तीन-चार दिनों तक खराब नहीं होतीं। पटना में प्रत्येक दिन औसतन लगभग 70,000 रुपये की सब्जियां बिकती हैं। पटना के प्रयोग से उत्साहित होकर लखनऊ में भी स्थानीय किसानों को संगठित कर इन्होंने 50 ठेले लगाये हैं। भविष्य में कौशल्या एवं समृद्धि फाउंडेशन की ओर से पुणे तथा दिल्ली में भी ग्राहकों को अच्छी सब्जियां उपलब्ध कराने की योजना है। कौशलेंद्र के प्रयासों का ही परिणाम है कि जहां पहले सब्जी विक्रेता कर्ज के जाल में फंसे रहते थे, वहीं इनके समूह से जुड़कर वे भयमुक्त होकर अपना व राज्य का भविष्य संवारने में जुटे हुए हैं। बंटी कुमार-60 बच्चों को स्कूल का रास्ता दिखाया राज्य के मधेपुरा जिले के मुरोह गांव के आठवीं में पढ़ने वाले बंटी कुमार को पोगो अमेजिंग किड्स अवार्ड (लीडरशिप कैटेगरी) से नवाजा गया है। कभीईट-भट्ठे में काम करने वाले 15 साल के बंटी कुमार को यह पुरस्कार इसलिए दिया गया कि उसने ईट-भट्ठे में काम करने वाले अपने ही गांव के करीब 60 बच्चों को नर्क की जिंदगी से निकाल कर स्कूल का रास्ता दिखाया। बंटी का कहना है किईट भट्ठे से बाल मजदूर के रूप में मुक्त होने के बाद मुङो मुक्ति आश्रम में शिक्षा का महत्व पता चला। यहां से अनौपचारिक शिक्षा लेने के बाद जब गांव गया तो वहां मेरे माता-पिता मेरे स्कूल जाने का विरोध करते थे, लेकिन मैं खुद तो स्कूल जाता ही, साथ में भट्ठे पर काम करने वाले गांव के अन्य बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित भी करता। मुक्ति आश्रम में मैंने शिक्षा पर कुछ नुक्कड़ नाटक किए थे। गांव में कुछ बच्चों की टोली तैयार कर लोगों के बीच नुक्कड़ नाटक करने लगा। इससे लोगों में चेतना आई और वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार हो गए। बंटी का चयन इस प्रतियोगिता में भले ही हो गया था, लेकिन बंटी को आखिर तक उम्मीद नहीं थी कि उसको यह पुरस्कार मिलेगा। उसका कहना है, वहां तो सब बड़े-बड़े पब्लिक स्कूल के अंग्रेजी बोलने वाले बच्चे आए हुए थे। बंटी को जब यह पुरस्कार मिला तो उसे घरों और भट्ठे पर काम करने वाले बच्चे बहुत याद आए। पोगो किड्स अवार्ड मिलने के बाद जब बंटी को सम्मानित करने आमिर खान पहुंचे तो बंटी की एक गुजारिश सुन कर दंग रह गए। बंटी के मुताबिक, मैंने उनसे बाल मजदूरी करने वाले बच्चों पर एक फिल्म बनाने की बात कही, आमिर ने मुझसे ऐसी फिल्म बनाने का वादा भी किया। बंटी को पोगो अवार्ड में जो पांच लाख रूपये मिले हैं उन्हें भी वह अपने ऊपर नहीं, गरीब बच्चों के उत्थान के लिए खर्च करना चाहता है। बंटी की आंखों में एक ऐसे समाज का सपना है जहां कोई गरीब और भूखा न रहे। यही वजह है कि बंटी बड़ा होकर समाजसेवी बनना चाहता है। स्त्रोत : संदीप कुमार,स्वतंत्र पत्रकार,पटना बिहार।