<div id="MiddleColumn_internal"> <h3>बिहार के गाँव एवं प्रखंडों में फ़ैल रही है <a href="../../../../../../../agriculture/crop-production/91593e93094d92f92a94d93092393e93293f92f94b902-91593e-938902915941932/92493f932939928/93894b92f93e92c940928/सोयाबीन-की-खेती">सोयाबीन की खेती</a></h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-left" style="float: right;" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/best-practices/93093e91c94d92f94b902-92e947902-93893094d93594b92494d91594393794d91f-91594393793f-92a939932/92c93f93993e930/93892c94d91c940-935-92c94091c-90992494d92a93e926928/soyabeanharvesting.jpg" width="232" height="143" />बिहार के दर्जनों गांव व प्रखंडों में सोयाबीन की खेती कर किसान जिदंगी संवारने में लगें है। कम खर्च व मेहनत से अच्छी आमदनी का स्रोत है सोयाबीन की खेती। प्रखंड के सैकड़ों किसान वर्षों से इसकी खेती कर रहे हैं। प्रखंड क्षेत्र के श्यामनगर, धबौली, बहादुरपुर एवं नयानगर विष्णुपुर समेत दर्जनों गांव के किसान अपने बीघे-दो-बीघे की रकबे में सोयाबीन की खेती कर रहे हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">कैसा होता है सोयाबीन का फसल चक्र</h3> <p style="text-align: justify;">इस संबंध में किसान गंगा प्रसाद राय, सहदेव राय, बौकु राय ने बताया कि इसकी खेती के लिए खेतों की चार बार अच्छी जुताई करने के बाद अंकुर कंपनी का बीज प्रति कट्ठा एक किलो ग्राम की दर से बोया गया। वहीं पौधों को उखड़ा रोग से बचाने के लिए बोआई के समय : खेतों में थाइमेट डाला जाता है। आषाढ़ महीने में इसकी बोआई की जाती है। इसकी खेती की विशेषता है कि किसानों को उर्वरक डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। साथ ही बरसात का मौसम रहने से सिंचाई भी नहीं की जाती है। पौधा उगने के बाद खरपतवार के अनुसार एक बार निकौनी की आवश्यकता होती है। इसके पौधों में प्राय: रोग नहीं के बराबर लगते हैं। कभी-कभी दीमकयुक्त मिट्टी में उखड़ा रोग लग जाता है। पौधों में कीड़ों का प्रकोप देखा जाता है। इससे बचने के लिए 100 दिनों के परे फसल चक्र में एक बार डाइथेनएम 45, कीटनाशक एवं टॉनिक का छिड़काव किया जाता है। इस वर्ष पौधों में फली लगने के समय वर्षा कम होने से किसान चिंतित नजर आ रहे हैं। वर्षा से इसकी फली में फल छेदक रोग होने का भय रहता है। किसानों ने बताया कि इसकी उपज प्रति बीघा लगभग आठ क्विंटल होती है। पूरे फसल चक्र में 10 हजार प्रति बीघा की</p> <p style="text-align: justify;">लागत पर 25 हजार की आमदनी होती है। उपज होने पर इसे बेचने के लिए भटकना नहीं पड़ता है। स्थानीय बाजार में अच्छी कीमत मिल जाती है। किसानों ने बताया कि सोयाबीन की खेती के लिए जिले के बड़े भू-स्वामी से सीखा गया है। जिसे बाद में विकिसत होकर मध्यमवर्गीय किसानों ने अपनाया है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कम लगत पर मिलती है अधिक आय</h3> <p style="text-align: justify;">उधर खगड़िया में मक्के, गेहूं की खेती से बाहर निकलकर अब जिले के किसान अधिक फायदे वाली फसलों की बुआई में रुचि दिखा रहे है। हाल के कुछ वर्षों में जिले के किसान सोयाबीन की खेती में रूचि दिखा रहे हैं। कम लागत पर अधिक आय होने के कारण इन दिनों प्रखंडों में अधिक से अधिक सोयाबीन की खेती कर रहे है। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार लक्ष्य से सबसे अधिक सोयाबीन की ही खेती इस जिला में हुई है। यहां इस वर्ष सौ हेक्टेयर जमीन पर सोयाबीन की बुआई का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन इससे ढाई गुणा अधिक यानी 25 सौ हेक्टेयर जमीन पर किसानों ने सोयाबीन की खेती की है। बीते कुछ वर्षों से सोयाबीन की खेती कर रहे लाभगांव के किसान मुकेश कुमार सिंह की माने तो खरीफ सीजन में धान व मक्के से अधिक फायदेमंद सोयबीन की खेती है। क्योंकि बुआई के बाद न तो सोयाबीन के पौधों को उर्वरक की आवश्यकता पड़ती है और न ही पटवन की। बस कीड़ों से बचाने के लिए इसमें कीटनाशक से स्प्रे करने की जरु रत पड़ती है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>स्त्रोत : संदीप कुमार</strong><strong>, वरिष्ठ पत्रकार, पटना,बिहार</strong></p> </div>