भूमिका बिहार के पूर्णिया जिले की इन महिलाओं ने केले की खेती के दम पर पूरे इलाके की दशा और दिशा को ही बदल कर रख दिया है इस खेती के दम पर क्षेत्र में फलों की खेती को नया आकार तो मिल ही रहा है पूरे देश से व्यापारियों के आवागमन होने के कारण रोजगार के तमाम नये अवसर भी शुरू होने लगे हैं। केले की प्रजातियां बिहार में केले की प्रजाति की अलग - अलग किस्में हैं। उन किस्मों की अपनी - अपनी खूबियां भी हैं। हाजीपुर का चिनिया केला अपने अनोखे स्वाद के लिए मशहूरहै इस प्रजाति के केले में मिठास तो रहती है लेकिन उसमें हल्का से खट्टापन भी रहता है, जो इसके शौकीनों को बहुत पसंद आता है ठीक वैसे ही, पूर्णिया जिले में उत्पादन होने वाले केले की भी अलग पहचानहै इस क्षेत्र में केले की खेती पहले से भी होती रही है और महिलाएं इसकी खेती करती रहती थी़ इलाके में महिलाओं की उत्थान के लिए काम करने वाली एक संस्था का ध्यान इन महिलाओं की मेहनत पर गया़ उसने महिलाओं से बात कीक़ केले की फसल नगद होती है, इसलिए महिलाओं ने इसकी खेती के तरफ ही अपनी प्राथमिकता जतायी़ । बड़े क्षेत्र में की जाती खेती पूर्णिया जिले के सभी 14 प्रखंडों में केले की फसल की खेती होती है, लेकिन भवानीपुर, रुपौली, धमदाहा, धरहरा कोठी में बड़ी संख्या में महिलाएं इस काम में लगीहै इसके अलावे श्रीनगर, पूर्णिया इस्ट, सत्यानंद नगर में भी खेती की जाती है इन क्षेत्रों में मानकी, मालभोग, सिंगापुरी प्रजाति का उत्पादन किया जाताहै इनमें मालभोग किस्म सबसे उन्नत मानी जातीहै फिर मानकी, उसके बाद सिंगापुरी प्रजाति का स्थान आता है मालभोग जहां 40 से 45 रुपये दर्जन वहीं मानकी 25 से 30 रुपये प्रति दर्जन की दर से बिकता है सिंगापुरी केले का मूल्य 15 से 20 रुपये प्रति दर्जन के करीब रहता है मौसम और मांग के हिसाब से भी मूल्य में उतार चढ़ाव होते रहताहै त्योहारों के मौसम में इसकी कीमत बढ़ जाती है इसके अलावा अन्य दूसरे मौकों पर आवक में जैसे मांग बढ़ती है, इसकी कीमत में उछाल आ जाताहै रेखा कहती हैं, मांग तो लगातार रहती ही हैं, हां इन मौकों पर हमें कुछ ज्यादा लाभ मिल जाता है। कई राज्यों के लोग करते हैं पसंद पूर्णिया के इन केलों के स्वाद के दीवाने पूरे देश में हैं। रेखा बताती हैं, यहां के केले की आपूर्ति बिहार के हर कोने में तो होती ही है, साथ ही वाराणसी, दिल्ली, लखनऊ, गाजियाबाद से भी बड़ी संख्या में फल व्यापारी आते रहते हैं। ये फलों के हिसाब से केले की घौंद को खरीद लेते हैं। इसके अलावा गाड़ी को बुक करा कर फसल कटवा लेते हैं। चूंकि ये फल बहुत नाजुक होता है, इसमें समय का बहुत महत्व होताहै इसलिए गाड़ी को सीधे खेत के पास लगा कर फसल को लाद लिया जाता है इन फसलों को इसके पकने की अवधि को देखते हुए काटना होताहै केले की फसल के साथ महिलाएं मिश्रित खेती भी करती हैं। इसके लिए वह इन खेतों में ही टमाटर, मिर्च, कद्दू, जैसे मौसमी फलों, सब्जियों को लगा कर अतिरिक्त मुनाफा प्राप्त कर लेती हैं केले की खेती पूरे साल होती है खेती में सबसे खास बात यह है कि केले की कोई भी किस्म से तीन साल तक ही फसल की प्राप्ति होती है इसलिए चौथे साल में इन खेतों में केले के साथ मक्के की भी फसल लगा देती हैं। मक्का की खेती कोशी नदी के इलाके में बरसात खत्म होने के बाद विशेष रुप से होती है केले की खेती करने वाले किसान, महिलाएं कटिहार से पौधे को लाती हैं। इसके अलावा फसल देने के तीन चक्र पूरा करने के बाद केले की जड़ में से जो फसल निकलती है उसे भी फसल के रुप में प्रयोग किया जाता है। समय पर दवा का छिड़काव फलों की खेती में अच्छी फसल आर्थिक रुप से बहुत महत्वपूर्ण होती है अतरू केले की खेती में भी इसका ख्याल रखा जाताहै घौंद फूटने के बाद फसल की देखभाल बहुत जरूरी होती है साथ ही कुछ कीड़े फल निकलने के पहले भी क्षति पहुंचाते हैं। इसके लिए दवा का समय पर छिड़काव किया जाता है। व्यापार बढ़ा पहले से केले की खेती कर रही इन महिलाओं के हालात में बदलाव तब आया, जब इस इलाके में मूलभूत सुविधाओं का हालत दुरुस्त हुई़ पहले से खुद खेती कर रही और बाद में संस्था से जुड़ कर केले की खेती से लाभ कमा रही रेखा देवी बताती हैं, खेती तो पहले भी होती थी लेकिन ट्रांसपोर्ट की उचित सुविधा नहीं होने के कारण कितना लाभ होता था, पता हीं नहीं चलता था़ सबसे बड़ी असुविधा खराब सड़कों को लेकर होती थी़ इससे फसल पर सीधा असर पड़ता था़ अब सड़क की हालत सुधरी है तो व्यापारियों की भी आवाजाही बढ़ गयी है इससे खेती में भी बढ़ोत्तरी हो गयी है। स्त्रोत: संदीप कुमार,वरिष्ठ पत्रकार।