मलेरिया की दवा मुजफ्फरपुर के किसान अब मेडिकल साइंस के क्षेत्र में ही अपनी पहचान बना रहे हैं। अनाज, फल-फूल की खेती से कदम आगे बढ़ाते हुए किसान खेतों में मलेरिया की दवा बनाने वाले पौधा उगा रहे हैं। कुढ़नी प्रखंड़ के केरमा गांव में बड़े पैमाने पर आर्टीमीशिया (मलेरिया की दवा बनाने का पौधा) की खेती हो रही है। पौधे के पत्ते की खरीद जानीमानी दवा कंपनी इपिका कर रही है। एकरारनामा के तहत कंपनी किसानों से तीस रुपये प्रति किलो की दर से आटेमेशिया के पत्ते की खरीद कर रही है। यही नहीं, दवा बनाने के लिए पत्ता का निर्यात विदेशों में किया जा रहा है। किसानों को पत्ता बेचने से प्रति कट्ठा 15 सौ दो हजार तक आमदनी है। बेरुआ के युवा किसान संतोष कुमार बताते हैं कि गांव में तीन साल से आर्टीमीशिया की खेती हो रहा है। दो साल पहले तक 15 से 20 किसान ही खेती करते थे। लेकिन अच्छी आमदनी व सुलभ बाजार को देखते हुए किसानों का आकर्षण बढ़ा है। कांट्रेक्ट फार्मिंग की शुरुआत इस साल गांव में 40 एकड़ जमीन में खेती हुई है।औषधीय पौधे के उत्पादन को किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य सरकार व दवा कंपनी किसानों को भरपूर मदद कर रही है। कृषि विभाग खेती के लिए 90 प्रतिशात तक अनुदान दे रही है। वहीं इपिका कंपनी पौधे का का बीज नि:शुल्क दे रही है। किसान ने संतोष का कहना है कि एक हेक्टेयर खेती पर करीब 36 हजार खर्च होता है। आर्टीमीश्यिा की खेती जनवरी से लेकर फरवरी के बीच में होती है। जून महीने में पौधे की कटाई होती है। दवा कंपनी किसानों को अपना बैग देती है। जिससे पत्ते का पैकिंग होती है। पौधे का डंठल जलवान के काम में चला अता है। मलेरिया की दवा बनाने वाली आर्टीमीशिया की खेती कांट्रेक्ट फार्मिंग के तहत हो रही है। दवा कंपनी व किसानों के बीच सेतु का काम कर रहा है। दवा कंपनी इपिका से केरमा के किसान का एकरारनामा है। कंपनी खेती के लिए बीज व एड़वांस पैसे भी देती है। प्रोड़क्ट का ट्रांसपोटेशन व पैकिंग का खर्च भी वहन करती है। औषधीय पौधों की खेती-एक लाभकारी खेती औषधीय पौधों की खेती इन दिनों जोरों पर है। अधिक से अधिक किसान इन फसलों को उगाने के लिए उत्सुक है। परंतु आमतौर पर किसान इन फसलों से संबंधित क्रियाओं की तकनीकी जानकारी का अभाव महसूस कर अपने आपको दिशाहीन पाते हैं। समय पर की गयी बुआई, सिंचाई, फसल सुरक्षा तथा कटाई आदि कृषि की क्रियाएं फसल उत्पादन व गुणवत्ता पर लाभदायक प्रभाव डालती है। इसके किये कृषि कार्यो की पूर्व नियोजित रूपरेखा तैयार करना अति आवश्यक है। वर्तमान में उन्नत किसानों द्वारा सर्वाधिक पसंद की जानेवाली कुछ महत्वपूर्ण औषधीय फसलों में आगामी तिमाही में किये जानेवाले कृषि कार्यो का विवरण दिया जा रहा है जिससे उत्पादक सही समय पर सही निर्णय लेकिन फसल उत्पादन तथा गुणवत्ता में वृद्धि कर सके। अश्वगंधा अश्वगंधा या असगंध की फसल की बुआई वर्षा के अनुसार जून से अगस्त तक की जाती है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई कीव्यवस्था उपलब्ध है। जून के प्रथम सप्ताह में नर्सरी तैयार कर लें। इसके लिए प्रति हेक्टेयर की दर से पांच किलोग्राम बीज की व्यवस्था करके रखे। अश्वगंधा की उन्नत प्रजातियां विकसित की जा चुकी है। अत: सिर्फ जवाहर असगंध-22 प्रजातियां बाजार में उपलब्ध है। पोशिता व अन्य प्रजातियां ‘सिमैप’ लखनऊ द्वारा विकसित की जा चुकी है। आजकल कुछ संस्थाएं किसान की पूरी उपज को खरीदने की गारंटी भी देती है। सुनिश्चित लाभ के लिएकिसान ऐसी संस्थाओं से तालमेल रख सकते हैं। एक हेक्टेयर भूमि में उगाने के लिए 500 वर्ग मीटर में नर्सरी लगायें। नर्सरी में बीज बोने से पहले डाइथेन एम-45 या मैंकाजब (उ प्र/किग्रा बीज) से उपचारित कर लें। बीजों कीसुषुत्तावस्था तोड़ने के लिए उन्हें 100 पीपीएम के जीए-3 घोल से 24 घंटे तक उपचारित किया जा सकता है। इससे बीजों की अंकुरण क्षमता बढ़ जायेगी। नर्सरी में बीजों को लगभग एक सेंटीमीटर की गहराई पर बोयें तथा फुहार से पानी लगायें। नर्सरी के अतिरिक्त अश्वगंधा को धीरे खेत में बीज छींट कर भी बोया जा सकता है। इसके लिए उपयुक्त समय वर्षाकाल है। असिंचित क्षेत्रों में भी वर्षा आरंभ होने पर ही बुआई करना लाभदायक रहेगा। कहिहारी कलिहारी के लिए दोमट भूमि उत्तम रहती है। यह छह महीने की फसल है, जिसे खरीफ में बीयर जाता है। अत: इसकी बुआई के लिए खेत को जून तक तैयार कर लें। इसे बीज अथवा कह दोनों ही माध्यम से बोयर जा सकता है। बीजों द्वारा उगाने पर इनमें पायी जानेवाली सुषुप्तावस्था के कारण इसकी फसल को फल अवस्था तक आने में वर्षो लग जाती है। अत: इसकी फसल को कंदों द्वारा ही बोया जाता है। बुआई जुलाई में वर्षा आरंभ होते ही की जानी चाहिए। इसके लिए अभी से बीज की व्यवस्था कर लें। एक हेक्टेयर क्षेत्र में रोपाई के लिए लगभग 10 क्विंटल कंदोंकी आवश्यकता पड़ेगी। बुआई के समय कंदों को फफूंदीनाशक द्वारा भी उपचारित किया जाता है। अत: उसकीव्यवस्था कर लें। खेत की तैयारी के समय 15-20 टन गोबर की खाद डाल कर भूमि में अच्छी तरह मिला दें। फसल को यदि बीजों द्वारा उगाना हो तो बुआई से पहले बीजों की सुषुप्तावस्था नष्ट कर लेनी चाहिए। उपचारित बीज को जून के दूसरे सप्ताह में नर्सरी में बोयें। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाने के लिए लगभग 20 किलोग्राम बीज से नर्सरी तैयार करना चाहिए। सनाय सनाय को क्षेत्रनुसार अलग-अलग समय पर बोया जाता है। उत्तर भारत में इसे नवंबर में पश्चिम भारत में जून, जुलाई व अक्तूबर-नवंबर में दक्षिण भारत में धान की कटाई के बाद सितंबर-अक्तूबर में तथा अन्य सिंचित क्षेत्रों में इसे फरवरी-मार्च में बोया जाता है। जून-जुलाई में बोई जानेवाली फसल की बुआई की तैयारी का सही समय चल रहा है। खेत को जून के आरंभ में 10 टन गोबर की खाद डाल कर तैयार कर लें। इसकी फसल के लिए सभी प्रकार की भूमि का प्रयोग की जा सकती है जिसमें 8।5 पीएच मान वाली लवणीय मृदा भी शामिल है। आमतौर पर इसे कम उपजाऊ भूमियों में ही उगाया जाता है। सनाय की उन्नत प्रजातियों में एक्रिय आनंद द्वारा विकसित एएलएफटी-2 है। सिंचित क्षेत्रों में बुआई के लिए 15 किलोग्राम तथा असिंचित क्षेत्रों में 25 किग्रा बीज की आवश्यकता होती है। बुआई छिक कर लाइनों में अथवा डिब्लर विधि द्वारा की जा सकती है। डिब्लर विधि से छह किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीजकी आवश्यकता होती है। जिन क्षेत्रों में पतियों की तुड़ाई अभी भी चल रही है। वहां प्रत्येक पत्ती तुड़ाई के बाद 20 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में बिखेर देनी चाहिए। सफेद मूसली सफेद मूसली की बुआई कर सही समय जून है। अत: बुआई की तैयारी कर लें। आमतौर इसे कंद द्वारा बोया जाता है। इसकी बुआई के प्रति हेक्टेयर 5-10 क्विंटल बीज की आवश्यकता पड़ती है। बुआई आमतौर पर उभरी हुई क्यारियों में की जाती है। परंतु आलू की तरह मेड़ बना कर भी बुआई की जा सकती है। रोपाई के दौरान लाइन से लाइन की दूरी 30 सेमी तथा पौधों से पौधों की दूरी 10 सेमी रखना होगा। कंदों को लकड़ी से छेद बनाकर लगभग एक इंच एक मिट्टी में गाड़ देना चाहिए। भूमि में गाड़ते समय इसका तने की ओर वाला भाग ऊपर की ओर रखे। कंद रोपाई के समय भूमि में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। खेत की तैयारी में समय लगभग 20 क्विंटल गोबर की खाद डालें। कीट एवं रोगरोधक तथा कार्बनिक खाद के रूप में नीम की खल्ली का प्रयोग किया जा सकता है। कंदों को फफूंदी के संक्रमण से बचाने के लिए बुआई से पहले गोमूत्र का प्रयोग करें। कंदों के अभाव में सफेद मूसली की फसल की बीजों द्वारा भी उगाया जा सकता है। छींकवार छींकवार की खेती विभिन्न प्रकार की जलवायु तथा खराब भूमियों में भी की जा सकती है। अच्छी फसल के लिए उचित जल निकासी वाली उर्वर तथा दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। सिंचाई सुविधा होने पर छींकवार की फसल को सर्दियों को छोड़ कर किसी भी मौसम में लगाया जा सकता है। इस समय इसकी फसल को लगाना हो तो पिछले वर्ष बीजों द्वारा लगायी गयी नर्सरी के नवांकुरों की खेत में रोपाई करें। पुरानी फसल के जड़ाकुरों द्वारा अथवा नवांकुरों को खेत में रोपने के बाद तुरंत पानी लगाये। बाबची बाबची की फसल को लगभग प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है। यह खरीफ की फसल है, जिसे वर्षा आरंभ होने के साथ ही बीजों द्वारा बोया जाता है। परंतु दिन क्षेत्रों में सिंचाई की उचित व्यवस्था हो। इसे मार्च-अप्रैल में भी बोया जा सकता है। व्यावसायिकस्तर पर खेती के लिए अभी इसकी प्रजातियां उपलब्ध नहीं है। अत: स्थानीय स्नेतों से प्राप्त बीज को बुआई से पहले बीजों में बाहरी सख्त आवरण को किसी बोरी या जून के फर्श पर अच्छी तरह रगड़ना चाहिए अथवा एक प्रतिशत गंधक अम्ल से उपचारित करना चाहिए। मुलहठी मुलहठी की फसल के लिए उचित जल निकासी वाली कम से कम एक मीटर गहरी हल्दी दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। मुलहठी को फरवरी-मार्च अथवा जुलाई-अगस्त में बोया जा सकता है। जो किसान मार्च तक मुलहठी की बुआई नहीं कर पायें हैं वे जुलाई में इसे लगाने के लिए खेत की तैयारी कर रखें। इसके खेत की तैयारी के लिए लगभग 15 टन गोबर की खाद मिला कर अच्छी तरह जुताई कर दें। शतावरी शतावरी को सर्दियों के अलावा किसी भी मौसम में लगाया जा सकता है। पर वर्षा के समय लगाये गये पौधे आसानी से स्थापित हो जाते हैं। फसल को बीज अथवा सकरों द्वारा उगाया जा सकता है। बीज द्वारा उगाने के लिए अप्रैल के महीने में तैयार कर लें। बुआई से पहले बीजों के कठोर बाहरी आवरण को नाम बमाने के लिए एक दिन तक गुनगुने पानी में भिगोंकर रखें। सर्पगंधा सर्पगंधा के लिए नमीयुक्त वातावरण वाली जलवायु तथा हल्की अम्लीय तथा मृतिका दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। अधिक रेताली भूमियों में इसकी फसल अपेक्षाकृत कम अच्छी होती है। सर्पगंधा की नर्सरी मई तक तैयार कर लें। इस बीज के अतिरिक्त पौधे के अन्य भागों से भी उगाया जा सकता है। पूरी तरह पके हुए भारी बीजों की अंकुरण क्षमता अधिक होती है। आंवला आंवले को हल्की तथा दोनों प्रकार की भूमियों में लगाया जा सकता है। इसकी फसल को बीजों द्वारा वानस्पतिक रूप से चश्मा बंधा कर कलम अथवा दाब विधि द्वारा उगाया जा सकता है। बीजों द्वारा उगायी गयी फसल अपेक्षाकृत निमA गुणवत्तावाली होती है तथा फल लगने में भी अधिकतम समय लगता है। अत: इसकी फसल को पौध तैयार करके उगाना चाहिए। मानसून आने से पहले ही मई-जून के महीने में 4।5 मीमी की दूरी पर एक वर्ग मीटर के आकार गड्ढे खोद लेना चाहिए। स्त्रोत: संदीप कुमार,स्वतंत्र पत्रकार,पटना बिहार।