<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify;">नर्सरी की बदौलत पायी कामयाबी</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>क़ृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा कृषिका प्रचार-प्रसार बड़ी कुशलता से किया जा रहा हैं। आज कृषि वैज्ञानिकों<img class="image-right" style="float: right;" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/best-practices/93093e91c94d92f94b902-92e947902-93893094d93594b92494d91594393794d91f-91594393793f-92a939932/92c93f93993e930/91493792793f92f94b902-915940-916947924940/copy2_of_.jpg" width="459" height="324" /> द्वारा इन केंद्रों के माध्यम से नयी कृषि तकनीक एवं उपयोगी सलाह तथा किसान उपयोगी सभी तरह के सामान उपलब्ध कराये जा रहे हैं। इसी का परिणाम है कि किसानों की सामाजिक एवं आर्थिक हालात में सुधार हो रहा हैं। आज का शिक्षित व प्रगतिशील किसान वैज्ञानिकों के साथ मिल बैठ कर नये तौर तरीके से खेती कर रहा हैं।</li> <li>पटना जिले के नौबतपुर ब्लक स्थित वीरपुर-नगवा के शारदानंद शर्मा एक प्रगतिशील किसान हैं। वे भारतीय कृषिअनुसंधान पूर्वी क्षेत्र फुलवारीशरीफ, पटना से जुड़ कर सफलता की नयी गाथा लिख रहे हैं। आजकल ये गाय पालन, मछली पालन, कागजी नींबू की नर्सरी एवं मशरूम उत्पादन के साथ खाली पड़ी भूमि में हल्दी की खेती कर रहे हैं।इसके अलावा इनके बगीचे में केला, नींबू, कदंब, पपीता और आम की कई किस्में मालदह, उष्ण भोग, आम्रपाली, मल्लिका, हिम सागर तथा बंबईया आदि मौजूद हैं।ये वीरपुर कृषक समिति के अध्यक्ष एवं नौबतपुर किसान कलाकार समन्वय समिति के सचिव भी हैं।</li> <li>गाय पालन शारदानंद शर्मा ने पशु पालन को खेती- किसानी का हिस्सा बताते हुए कहा कि अधिक उपज एवं टिकाऊ खेती के लिए गोबर की खाद अथवा वर्मी कंपोस्ट का उपयोग अति आवश्यक हैं। इनके पास मुर्रा भैंस के साथ दो जर्सी एवं दो शाहीवाल गायें हैं। इन्हीं पशुओं के गोबर का उपयोग वे वर्मी कंपोस्ट बनाने में करते हैं। इन दुधारू पशुओं के दूध की बिक्री से प्रति वर्ष इन्हें अच्छी आय प्राप्त हो जाती हैं।</li> <li>मछली पालन दस फीट के तालाब में मछली पालन कर रहें हैं। इस तालाब में में पांच फीट पानी रहताहैं। जिसमें रेहू, नैनी, कतला, ग्रास कार्प, कामन कार्प तथा सिल्वर कार्प आदि मछलियां हैं। जिनका वजन सौ ग्राम से लेकर तीन किलोग्राम तकहैं। मछली पालन से इन्हें प्रति वर्ष लगभग पचास हजार रुपये से अधिक की आय प्राप्त हो जातीहैं। इनके पास दो तालाब हैं। एक पारंपरिक तरीके से बना हुआ तथा दूसरा नया जो वैज्ञानिक तरीके से बनाया गयाहैं। इस नये तालाब में मछली का जीरा तैयार किया जाता हैं। पुराने तालाब के मुकाबले नये एवं वैज्ञानिक विधि से बने तालाब से अधिक आय प्राप्त होती हैं। इन दोनों तालाबों में बतख पालन भी किया गयाहैं। जिसकी बीट से तालाब में पलने वाली मछलियों को भोजन मिलता ही है साथ ही इनके अंडों से प्रतिदिन सैकड़ों रुपये की आय प्राप्त हो जातीहैं। मछली पालन को सही ढंग देख रेख के लिए एक मल्लाह सहयोगी के रूप में इनके साथ काम करताहैं। चारे के रूप में बना ब्रांड तथा सरसों की खली का उपयोग करते हैं। जो स्थानीय सतर पर ही उपलब्ध हो जाताहैं। साथ ही जरूरत पड़ने पर मछली का जीरा दूसरे प्रदेशों से भी मांगाना पड़ता है।</li> <li>इसके अलावा तालाब की मिट्टी भी उपजाऊ हो जाती हैं। यही उपजाऊ मिट्टी तालाब से निकाल कर तालाब के चारों ओर खाली पड़ी भूमि में डाल कर हल्दी की खेती, फूल तथा अन्य सब्जियों के पौधों की नर्सरी तैयार की जाती हैं।</li> <li>कागजी नींबू की नर्सरी रांची स्थित बागवानी प्रशिक्षण केंद्र से वैज्ञानिकों द्वारा नये पौधों को तैयार करने का प्रशिक्षण प्राप्त कर शर्मा ने प्रति वर्ष हजारों पौधों को अपने आसपास के किसानों को बेच रहे हैं।नये पौधों की कीमत 20 रुपये प्रति पौधे तथा एक वर्ष पुराने पौधों की कीमत 25-30 रुपये प्रति पौधे होतीहैं। इसके अलावा ये कई हजार पौधे बागवानी मिशन को दे चुके हैं।इन्होंने कहा कि नर्सरी के लिए फुहरा सिंचाई विधि अधिक उपयोगी हो रहीहैं। उन्होंने कहा कि नर्सरी रोपाई के दौरान पौधों की क्षति से बचने के लिए मुख्य उद्यान के पास होना चाहिए़ पानी के स्नेत भी सिंचाई के लिए पास होना चाहिए।</li> </ul> <h4 style="text-align: justify;">बीज तैयार कर किसानों को बेचना</h4> <ul style="text-align: justify;"> <li>धान, गेहूं तथा मकई का आधार बीज लाकर अपने खेत में बीज तैयार कर किसानों के बीच उचित मूल्य पर बिक्री करना भी इसकी सफलता की एक महत्वपूर्ण कड़ीहैं। यह बीज कृषिवैज्ञानिकों की देख रेख में तैयार किया जाताहैं। जिससे किसानों को सही एवं उचित मूल्य पर बीज मिल जाती है और शर्मा को अच्छी आय हो जातीहैं। बीज, खाद एवं कीटनाशी का प्रयोग वैज्ञानिकों की सलाह पर ही करते हैं।खाद में वर्मी कंपोस्ट का प्रयोग प्रमुखता से करते हैं।इसके साथ ही आवश्यकता पड़ने पर समय-समय पर डीएपी,पोटाश युरिया, फास्फोरस तथा कीटनाशी का प्रयोग करते हैं।इनकी खेती में मिट्टी तथा बीजोपचार पर विशेष ध्यान दिया जाताहैं। इनकी सफलता का श्रेय जाता है आईसीएआर पूर्वी क्षेत्र के कृषिवैज्ञानिक डॉक्टर यूएस गौतम, आत्मा के पूर्व परियोजना निदेशक डक्टर केएस सिंह, कृषिविज्ञान केंद्र बाढ़ ,पटना के वैज्ञानिक डक्टर उमेश सिंह तथा डॉक्टर उज्कुमार सिंह को,जिन्होंने समय-समय पर इनका मार्गदर्शन एवं सहयोग किया़ इसके साथ ही वैज्ञानिकों द्वारा नये बीज एवं तकनीक की जानकारी बराबर मिल रहती हैं।</li> <li>मशरूम उत्पादन किसान कलाकार समन्वय समिति नौबतपुर की देख-रेख में आसपास के किसानों को नयी तकनीक जानकारी दी जाती हैं। इसी समिति के तहत मशरूम इकाई की स्थापना की गई है जिसका संचालन महिलाओं द्वारा किया जाता हैं। इस मशरूम उत्पादन इकाई में जितना भी उत्पादन होताहैं। उसे नौबतपुर बाजार तथा आसपास के बाजारों में बेचा जाताहैं। जिससे इन महिलाओं की आय में काफी इजाफा हुआ है और वे आत्म निर्भर हो रही हैं।</li> <li>सफलता राज रू उन्होंने कहा कि खेती से संबंधित प्रकाशन संबंधी साम्रगी तथा कृषिमेलों में किसानों की अधिक से अधिक भागीदारी होने से उन्हें खेती पर होने वाले नये अनुसंधानों की जानकारी मिलेगी़ जिससे वे अपने खेती में आधुनिक कृषियंत्रों तथा कृषिवैज्ञानिकों द्वारा अनुसंसित बीज, खाद व कीटनाशी का प्रयोग कर अपनी कृषि उपज से अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं। इनका मानना है कि किसान भाइयों को एक दूसरे के अनुभव तथा नफा नुकसान की चर्चा करते रहना चाहिए तभी हम खेती में अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें जिला प्रशास की ओर से कई पुरस्कार मिल चुके हैं।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">अशोक नर्सरी आर बागवानी के क्षेत्र में बनाया पहचान</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>कुछ कर गुजरने के जज्बे के साथ जब कोई कार्य शुरू किया जाता है, तब देर-सबेर कामयाबी अवश्य मिलतीहै।प्रकृति के साथ अटूट रिश्ता रखनेवाले अशोक आज नर्सरी और बागबानी के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके हैं। विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद अशोक ने अपने बसंतपुर प्रखंड के नगौली गांव का रुख किया। उन्होंने छोटी सी नर्सरी से अपने कारोबार की शुरुआत की।अब यहां प्रतिवर्ष तकरीबन डेढ़ लाख पौधे तैयार हो रहे हैं। इसके अलावा फल उत्पादन के लिए छह एकड़ में की गयी बागबानी व नर्सरी के बदौलत प्रत्येक वर्ष औसतन पंद्रह लाख रुपये का मुनाफा होताहै।साथ ही एक दर्जन लोगों को उसने रोजगार भी उपलब्ध करायाहै। नगौली निवासी अशोक ने देश के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से भूगोल में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल कीहै।उच्च शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही अशोक सिंह सिविल सर्विसेज की तैयारी में लगे रहे। सिविल सर्विसेज में कामयाब होते, उसके पहले ही पंजाब के सत्यवीर सिंह से मुलाकात ने उनके सोच को ही बदल डाला। पहले से ही पर्यावरण के प्रति विशेष झुकाव व मित्र सत्यवीर की सलाह ने उन्हें अपने खेत व खलिहान से ही कैरियर की ऊंची मुकाम हासिल करने की प्रेरणा दी। नगौली गांव में अपने पुश्तैनी जमीन पर अशोक ने नर्सरी की नींव डाली। एक दशक पूर्व की कोशिश आज उन्हें राज्य ही नहीं, पूरे देश में ख्याति दिलायीहै।उनकी नर्सरी में तकरीबन डेढ़ लाख पौधे हैं, जिसमें फलदार आम, लीची, अमरूद, आंवला, विभिन्न प्रजाति के नीबू समेत अन्य फल तथा फर्नीचर में प्रयुक्त होनेवाले सागवान, गंभार, महोवनी, सीसम, पॉपुलर, सखुआ आदि के पौधे शामिल हैं।</li> </ul> <h4 style="text-align: justify;">वन विभाग को होती है पौधों की सप्लाइ</h4> <ul style="text-align: justify;"> <li>अशोक की नर्सरी में तैयार तकरीबन पचास हजार पौधे की सप्लाइ वन विभाग को होतीहै।जिसमें सबसे अधिक फर्नीचर तैयार होनेवाली लकड़ियों के पौधे हैं। ये पौधे दस से पंद्रह रुपये की दर से बिकते हैं। इसके बाग में तैयार लीची की सर्वाधिक मांग छत्तीसगढ़ के रायपुर के बाजारों मेंहै।आम व पपीता स्थानीय बाजार के अलावा आसपास के आधा दर्जन जिलों के बाजारों में सप्लाइ किये जाते हैं। साथ ही अशोक द्वारा यहां युवकों को नर्सरी तैयार करने का नि:शुल्क प्रशिक्षण भी दिया जाता है।</li> </ul> <h4 style="text-align: justify;">शोध के क्षेत्र में भी दिखती है दिलचस्पी</h4> <ul style="text-align: justify;"> <li>अशोक सिंह ने अपने नर्सरी में बीस डिसमिल जमीन पर नये प्रजाति के गेहूं तैयार करने में लगे हैं। अशोक कहते हैं कि गेहूं की ये बालियां नौ से 10 इंच लंबी हैं। व इसके दाने भी सामान्य से दोगुना आकार के हैं। स्ट्रॉबरी व टीनू के पौधों को लगा कर वे यहां की जलवायु में उसके विकास व उत्पादन के उपायों में जुटे हैं। इसका प्रयोग सफल रहा, तो क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि होगी।</li> </ul> <p style="text-align: justify;"><em><strong>स्त्रोत:</strong> संदीप कुमार,स्वतंत्र पत्रकार,पटना बिहार । </em></p> </div>