उत्पादक से निर्यातक बिहार के मधुबनी जिला के बासोपट्टी प्रखंड़ के हथापुर गांव में फूल की खेती बडे पैमाने पर हो रही है। मिथिलांचल का गरीबी से ग्रसित छाटा गांव आज फूलों की खेती की वजह से फूलों की तरह खिल गया है। फूलों की खेती से जुड़कर ये किसान सिर्फ आर्थिक रूप से संपन्न हो रहे हैं। बल्कि फूल की खेती की वजह से अपनी अलग पहचान बनाने में सफल भी रहे हैं। खुशी की बात यह है कि इस गांव की महिलाएं फूल की खेती कर पुरुषों से आगे निकल गयी है। इस गांव की महिलाएं फूलों की खेती को लेकर काफी जुनून है। इस कारण छोटा सा गांव आज उत्पादक के साथ निर्यातक बन चुका है। फूलों की खेती से आर्थिक स्थिति में बदलाव फूल की खेती कर इस गांव के लोग आर्थिक स्थिति से काफी मजबूत हो रहे हैं। विगत चार साल में इस गांव की स्थिति काफी बेहतर हो गयी है। इस गांव की स्थिति यह है कि अब न सिर्फ घरेलू बाजार में फूलों की आपूर्ति करता है। बल्कि यहां से विदेशों में भी फूलों का निर्यात किया जाता है। इस गांव के हर महिला व पुरुषों को खेती करने का गुण है। यहां के लोगों का माना है कि जब अपने ही गांव में मिसाल कायम कर बेहतर तरीके से जीवन-यापन कर सकते हैं तो फिर बाहर के राज्यों में काम करने की जरूरत क्या है। गांव की सौ से अधिक महिलाएं प्रशिक्षण लेकर रोजगार में लगी है। असास-पास के गांवों की महिलाएं व बच्चे को माला गूंथने में रखा गया है। इस क्षेत्र के बहुत से छात्र फूलों की खेती कर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। घर का काम निबटा कर करती है खेती गांव की महिला किसान सुनीता देवी, शैल्या देवी, परम देवी, परम देवी, कौशल्या देवी, जयकुमारी देवी, गुलाब देवी सहित कई महिलाएं घरेलू कार्य को पूरा करके खेत में जाती है। फूल के बीज बोने के समय से लेकर पूर्व सिंचाई तक भार स्वयं संभालती है। समय-समय पर खेतों में उर्वरक छिड़का जाता है। प्रत्येक साल खेत में अलग-अलग किस्म के मखमली गेंदा, गुलजारी, तगरी, चेरी फूल की खेती की जाती है। एक बीघा फूल की खेती करने में करीब बीस हजार रुपये खर्च होते हैं। जबकि प्रति एकड़ पचास से 75 हजार का मुनाफा होता है। महिला किसानों के घर पर दरभंगा, मुजफ्फरपुर सहित अन्य जिला के लोग थोक मात्र में फूल खरीदने आते है। किसान नारायण भंडारी ने बताया कि फूलों की खेती के कमाई से हमने अपने बटियों की शादी की है। इस गांव की स्थिति कुछ इस तरह थी कि लोग रात को भूखे सोते थे। कई लोगों के पास रहने के लिए घर नहीं था। कुछ साल पहले गांव के बुजुर्गों ने फूलों की खेती करना चालू किया। कठिन मेहनत और लगन से मिली सफलता इसी विधि को अपना कर गांव के कई लोग खेती करने लगें। कुछ सालों में किसानों का रुझान फूलों की खेती की ओर बढ़ा है। फूलों में बरसाती गेंदा, कलकती गेंदा, गुलाब और कई फूलों की खेती होती है। इस फूलों को तैयार करने में दो से तीन महिने का समय लग जाता है। एक एकड़ में तैयार फसल के लिए लगभग दस से पंद्रह बार फूलों की तुड़वायी का काम एक से डेढ़ महीनों तक चलता है। फूल की खेती करने से खेतों को विशेष रूप से तैयार करना होता है। इसमें दो महीने का समय लगता है। किसानों का कहना कठिन मेहनत व लगन से कार्य करने पर सफलता मिलती है। पड़ोसी देश नेपाल के कामांडू,जयनगर, लहान सहित जिलों में फूलों को भेजा जाता है। दूदराज के लोग इस गांव में विवाह व पर्व त्योहारों के अवसरों पर फूल खरीदने के लिए आते है। रोजाना खेतों में काफी मात्र में फूलों को लगाया जाता है। किसानों के घर पर फूल खरीदने वाले ग्राहक को अधिक इंतजार नहीं करना पड़ता है। स्त्रोत: संदीप कुमार,स्वतंत्र पत्रकार,पटना बिहार।