भूमिका मेरा नाम सोमनाथ भगत है। मैं ग्राम कोलसिमरी प्रखंड कुडू जिला लोहरदगा का एक किसान का बेटा हूँ। हम चार भाई हैं चारों भाईयों में मैं दूसरे नम्बर पर हूँ, मैंने प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक विद्यालय कोलसिमरी से की उसके बाद मैं नदिया हाईस्कूल से मैट्रिक की पढ़ाई की। मैट्रिक की पढ़ाई के बाद मैं स्नातक तक की शिक्षा वि.एस.कॉलेज, लोहरदगा से पूर्ण कर स्वच्छता निरीक्षक का एक वर्षीय डिप्लोमा करने जयपुर राजस्थान चला गया, सन 1992 में डिप्लोमा की डिग्री लेकर मैं अपने निवास स्थान कोलसिमरी चला आया। मैं एक पढ़ा लिखा इंसान होने के नाते मैं रोजगार की तलाश में लग गया। तीन साल तक मैं इधर-उधर रोजगार की तलाश में भटकता रहा। परन्तु हमें किसी प्रकार का रोजगार हासिल नहीं हुआ, इसी बीच 1995 में हमारी शादी ग्राम + पो.+ थाना – मांडर, जिला-राँची के एक कृषक परिवार में हुआ। समय बीतता गया और समय के अनुसार धीरे-धीरे मेरा एवं मेरे परिवार का खर्च बढ़ता गया। इसी बीच मेरे दो बच्चे हुए। मेरे घर वालों ने मेरे परिवार का खर्च सम्भालने से इंकार कर दिया। इस बीच मेरी कोई आय न होने के कारण मुझे घर से अलग कर दिया गया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैं क्या करू, कहां जाऊं बाल-बच्चों के खाने-पीने, पढ़ाई-लिखाई का खर्च सम्भाल सकूं। क्योंकि गाँव में जब कभी कोई छोटा-मोटा काम जैसे: बालू उठाना, लेबर का काम करना ऐसा कुछ करता था, तो गाँव के लोग मुझे ताने मारते थे, कि इतना पढ़ा-लिखा इंसान ऐसा काम कर रहा है। आज भी गाँव में एक धारणा हैं कि पढ़ा-लिखा आदमी को सिर्फ नौकरी करनी चाहिए। सन 2005 में, मैं गाँव के लोगों के तानों से उबकर अपने परिवार को लेकर उत्तर प्रदेश के एक ईंट भट्टे पर चला गया। वहां बहुत सारी कठिनाईयों के बावजूद भी कड़ी मेहनत कर अपने परिवार का भरण पोषण करने लगा। लेकिन बच्चे स्कूल जाने लायक होने लगे तो मुझे उसकी चिंता सताने लगी कि अगर मैंने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा-दीक्षा नहीं दिया तो मेरे बच्चे भी मेरी तरह का काम करेंगें। मुझे मेरे बच्चों को सही शिक्षा और दीक्षा दिलाने हेतु मैं 2010 में ईंट भट्टे से लौट कर अपने गाँव चला आया। गाँव में ही मैंने सुना कि गाँव में कोई किसान पाठशाला चलाया जा रहा है। चूँकि मैं पढ़ा-लिखा होने के कारण अपनी उत्सुकता को रोक नही पाया और जहाँ किसान पाठशाला चलाया जा रहा था मेरे कदम खुद-ब-खुद उधर की तरफ चल दिए वहां जाकर मैंने देखा कि पंचायत भवन में कुछ 30-35 किसान बैठ कर सीख रहे हैं। मैं भी वहां जाकर एक किनारे पर बैठ गया। वहां जानकारी दे रहे आत्मा के पदाधिकारी की बातों को बहुत गौर से सुनने लगा। वैज्ञानिक ढंग से खेती की जानकारी को सुनकर मुझे अच्छा लगा। मुझे आत्मा के पदाधिकारी की बातें खूब समझ में आ रही थी। कृषक मित्र बन बदला अपना जीवन बैठक उपरांत मैं आत्मा पदाधिकारी से मिला तो उन्होंने अपना परिचय मुझे आत्मा परियोजना निदेशक कार्यालय के विषय वस्तु विशेषज्ञ के रूप में दिये। मैंने भी अपनी आप-बीती सुनाई और कहा कि सर मुझे भी आप अपने विभाग से जोड़कर कुछ लाभ दिलवाएं। इस बात पर पदाधिकारी द्वारा भरोसा दिया गया और उन्होंने मुझे सुझाव दिया कि आप एक पढ़े-लिखे आदमी हैं। आप जैसे इंसान की विभाग को जरूरत भी है। आप के ग्राम एवं पंचायत स्तर पर ग्राम सभा के माध्यम से कृषक मित्र का चयन किया जाना हैं और मैं चाहूँगा कि आप जैसे शिक्षित किसान कृषक मित्र के रूप में चयन कर के आए ग्राम सभा की बैठक 15/12/2010 में की गई और गाँव वालों ने मुझे पढ़ा-लिखा समझ कर कृषक मित्र के रूप में कार्य करने हेतु चयन किया। आत्मा के द्वारा 06/01/2011 में राज्य स्तरीय किसान मेला में पाँच दिवसीय प्रशिक्षण में जाने का मौका मिला। प्रशिक्षण से लौटने के बाद मैं अपने हिस्से की तीन एकड़ जमीन पर पहली बार खेती बारी करने के मकसद से गया और चूँकि मेरे गाँव का सिवाना नदी के किनारे पड़ता है। पानी की वर्ष भर कोई कमी नही रहती। मैंने पहली बार एक एकड़ खेत में विभाग द्वारा प्राप्त चने की खेती की जिससे मुझे सोच से ज्यादा का इनकम हुआ। और पैसा आते देख मेरी इच्छा खेती पर और बढ़ती गई। मैं आत्मा के विषय वस्तु विशेषज्ञ एवं प्रखंड कृषि पदाधिकारी के सम्पर्क में आकर धीरे-धीरे पूरे खेत में खेती करना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे मेरी माली हालत सुधरने लगी। इस बीच आत्मा एवं कृषि विज्ञान केंद्र के द्वारा समय-समय पर अनेकों प्रशिक्षण प्राप्त करने का मौका मिला। आत्मा के द्वारा दिनांक 15.10.2012 से 19.10.2012 को पाँच दिवसीय प्रशिक्षण हेतु पूर्वी क्षेत्र भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र, पलान्डू में सब्जी, फसलों में कीट एवं रोग प्रबंधन पर प्रशिक्षण प्राप्त करने का मौका प्राप्त हुआ। मुझे इस प्रशिक्षण से बहुत समझ में आया और मैं आत्मा के विषय वस्तु विशेषज्ञ से शिमला मिर्च पर किसान पाठशाला चलाने का आग्रह किया तो उन्होंने मेरे गाँव में किसान पाठशाला चलाने का निर्णय लिया। गाँव से बाहर पलायन में जाने वाले सभी किसानों को समझाकर मैंने किसान पाठशाला में लाया। धीरे-धीरे सभी किसान, सब्जी फसलों की खेती की तरफ जाने लगे। और हमारे गाँव से पहली बार 30% पलायन रुक गया। इसी बीच हमारे प्रखंड में आत्मा के प्रखंड तकनीकी प्रबंधक श्री दिनेश चन्द जी आये और प्रथम बारे मेरे गाँव में एक दिवसीय प्रशिक्षण किया। उसी दौरान प्रशिक्षण के क्रम में उन्होंने बताया कि समय को देखते हुए सभी किसान भाईयों को वैज्ञानिक ढंग से खेती करनी चाहिए। वैज्ञानिक खेती से बदल डाला खेती का तरीका चूना, बोरेक्स सूक्ष्म तत्व खेत में मिटटी जांच कराकर प्रयोग करना चाहिए एवं दलहन की खेती करके खेत को उपजाऊ बनाना चाहिए उन्होंने हमें गर्मा मूंग लगाने की सलाह दी। साथ ही मूंग का बीज राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन से दिलाने का वादा किया। उनके द्वारा हमें समय पर मूंग, चूना, बोरेक्स, राईजोवीयम, कल्चर, पी.एस.वी. एवं कार्बोडाजीम उपलब्ध कराया और मैंने एक एकड़ में मूंग की खेती की। प्रखंड तकनीकी प्रबंधक दिनेश चन्द जी के द्वारा मेरे खेत पर चूने का इस्तेमाल कराया गया और बीज उपचारित करना सिखाया गया उनकी उपस्थिति में फसलों की बुआई की गई। मैं समय-समय पर पटवन कराता रहा, बीच-बीच में फसल निरक्षण करने आत्मा प्रखंड तकनीकी प्रबंधक प्रखंड कृषि पदाधिकारी एवं उप परियोजना निदेशक (आत्मा) आते रहे। और समय-समय पर सुझाव देते रहे, धीरे-धीरे गरमा मूंग का फसल का आच्छादन बहुत ही अच्छा रहा। पौधा बहुत अच्छा बना जब मेरे खेत के पौधे में फूल आना शुरू हुआ तो प्रखंड तकनीकी प्रबंधक दिनेश चन्द के द्वारा दवा का छिड़काव कराया गया, जिसके चलते फसल में किसी प्रकार का कीट या रोग का प्रभाव नही पड़ा। जब पौधे में बाली आई, तो गाँव के लोग देखकर चकित रह गये। एक-एक बाली की साईज तीन इंच तक की हुई। हमारी फसल आकर्षण का केंद्र रही,बहुत से किसानों को क्षेत्र भ्रमण हेतु हमारे खेत पर लाया गया हमने मूंग की तीन बार तोड़ाई की, बहुत अच्छी फसल के चलते अच्छी पैदावार भी हुई। कुल 700 किलोग्राम पैदावार हुई, फिर प्रखंड तकनीकी प्रबंधक ‘आत्मा’ के कहने पर हमने धान लगाने से पहले फसल के साथ में खेत की जुताई कर गहरी सिंचाई की और धान के समय श्री विधि से धान लगाया। आज मैं दलहन फसल की वजह से मेरे धान के खेत में ज्यादा खाद देने की जरूरत नही पड़ी और मेरा धान पौधा बहुत अच्छा बना एक-एक पौधे में 60 से 85 कल्ले तक निकले जिसको देखने कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक आत्मा के पदाधिकारी और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन तकनीकी सहायक मेरे खेत पर आये और वहां एक दिवसीय प्रशिक्षण भी रखा गया। मैं कृषक मित्र के रूप में आज किसानों को समय-समय पर ट्रेनिंग प्रशिक्षण कराता रहता हूँ। मैंने भूमि संरक्षण विभाग से 2013-14 में चार लिफ्ट एवं उद्यान विभाग से बूंद-बूंद सिंचाई योजना का लाभ कुल 20 किसानों में एवं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन योजना से पम्पसेट, पाइप, स्प्रेयर आदि, दलहन की खेती, एवं कृषक प्रक्षेत्र पाठशाला का आयोजन मैंने अपने प्रयास से करवाया। आज मुझे कृषि से सम्बधित सभी विभाग के लोग कृषक मित्र के रूप में जानते हैं। अभी भी मैं प्रयासरत हूँ। मैंने अभी अपने गाँव में 25 हेक्टेयर में बगवानी, एक संस्था के माध्यम से करवाया हूँ। आज मैं शुक्रगुजार हूँ ‘आत्मा’ के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन योजना द्वारा किसानों को कृषि विज्ञान केंद्र एवं प्रखंड कृषि पदाधिकारी के सभी विभागों के लोग हमें उस लायक समझे और मुझे अपने और अपने गाँव के लिए कुछ मौका दिया। जिसके चलते मेरे गाँव के 65% पलायन रोकने में सफल रहा। आज किसानों के लिए मैं प्रेरणा का विषय हूँ। गाँव के सभी किसान अपनी समस्याओं अपनी आवश्यकताओं को मुझे बताते हैं, और मैं सभी के लिए खुले दिल से सहयोग करता हूँ। मैं पूरा प्रयास करता हूँ कि मेरे गाँव का कोई भी किसान पलायन न करे। इसके लिए समय-समय पर विभाग से प्राप्त जानकारी एवं योजनाओं को बताते रहता हूँ। एक बार फिर मैं आत्मा के साथ-साथ सभी विभाग को धन्यवाद देता हूँ। स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार