भूमिका अलबिनुस सोरेंग, ग्राम-कल्हाटोली, प्रखंड-कोलेबिरा, जिला-सिमडेगा के रहने वाले एक शिक्षित बेरोजगार किसान हैं। शिक्षित होने के कारण उन्होंने कई बार सरकारी नौकरी की तलाश की, परन्तु निराश रहे। उनका परिवार वर्षो से पारंपरिक विधि से धान की खेती करता आया है। इस विधि से उत्पादन इतना कम हो रहा था कि किसी तरह परिवार का भरण-पोषण हो रहा था। उन्होंने स्वयं खेती करने का निर्णय लिया तथा धान के अलावा कैश क्रॉप, सब्जी, धनियाँ, आलू, प्याज इत्यादि की खेती शुरू कर दी। इस कार्य में पत्नी का भरपूर सहयोग मिला और अलबिनुस फसलों की खेती कर अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने में जुट गए। जमीन के जोत छोटे होने के कारण धान का जो उत्पादन हो रहा था, वह काफी नहीं था। उर्वरक आदि का भी प्रयोग किया, परन्तु उपज में बहुत ज्यादा अंतर नजर नहीं आया। इसी बीच आत्मा सिमडेगा के द्वारा अलबिनुस के गाँव में एक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। रा.खा.सु.मि. के तकनीकी सहायक श्री आलोक कुमार, श्री अगस्तुस तिग्गा एवं सुनिती शमा भेंगरा ने यहाँ प्रशिक्षण दिया। आलोक कुमार द्वारा प्रशिक्षण के क्रम में श्री विधि से धान की खेती की जानकारी दी गई। प्रशिक्षण की समाप्ति के बाद अलबिनुस उनसे मिला तो उन्होंने उसकी उत्सुकता देखकर रा.खा.सु.मि. के तहत एक प्रत्यक्षण उनके नाम पर उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। इसी क्रम में वे एक दिन परियोजना निदेशक आत्मा, सिमडेगा के पास पहुंचे, जहाँ उन्हें बताया गया कि वैज्ञानिक तकनीकी से खेती करके ही कम लागत में अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है तथा अधिक शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने श्री विधि की खेती पर आत्मा, सिमडेगा द्वारा आयोजित विशेष प्रशिक्षण में भी भाग लिया, जिसमें यह बतलाया गया कि इस विधि को अपनाकर अपने उत्पादन को दोगुना किया जा सकता है। परियोजना निदेशक, आत्मा एवं उप परियोजना निदेशक, आत्मा सिमडेगा के द्वारा कहा गया कि वे इस विधि से एक बार धान की खेती करें, उन्हें सम्पूर्ण तकनीकी सहायता प्रदान की जाएगी। जिले में फसल प्रत्यक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत जिले के 10 प्रखंडों के कृषकों को श्री विधि से धान उत्पादन हेतु प्रत्यक्षण दिया गया तथा सभी कृषकों को श्री विधि से धान उत्पादन करने हेतु उपादान उपलब्ध कराया गया। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत मिली श्री विधि के लिए मदद राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, सिमडेगा से उपलब्ध कराये गए उपादान – संकर बीज – 2 किग्रा., जिंक – 10 किग्रा., कोनोवीडर- 1, ब्यूटाक्लोर- 1 लीटर के अलावा आवश्यकतानुसार कीट एवं व्याधि से सुरक्षा के लिए कीटनाशी एवं कवकनाशी उपलब्ध कराया गया। प्रशिक्षणोंपरांत सबसे पहले इस विधि का ज्ञान अलबिनुस ने अपने पिता को दिया, परन्तु इस तकनीकी में अधिक मेहनत होने के कारण पिता इस विधि को अपनाने के इच्छुक नहीं थे। एक दिन अलबिनुस अपने पिता के साथ आत्मा कार्यालय, सिमडेगा पहुंचा। परियोजना निदेशक, आत्मा एवं उप परियोजना निदेशक, आत्मा सिमडेगा के सुझाव के पश्चात पिता ने एक हें. खेत पर इस विधि के द्वारा धान की खेती करने की अनुमति दी। प्रखंड तकनीकी प्रबंधक, कोलेबिरा एवं श्री आलोक कुमार, तकनीकी सहायक के द्वारा रा.खा.सु.मि. के तहत इस विधि से धान की खेती पर प्रत्यक्षण हेतु नि:शुल्क बीज, दवा एवं कोनोवीडर के अलावा रा.खा.सु.मि. एवं आत्मा सिमडेगा के तहत प्रकाशित साहित्य भी उपलब्ध कराया गया। खेत को तैयार कर आलोक कुमार, तकनीकी सहायक के तकनीकी सहयोग से 12 दिनों के बिचड़ा को मिटटी सहित थाली में लेकर 10 x 10 इंच पर लगया तो सारे ग्रामवासी उपहास करने लगे बेकार की इतना मेहनत कर रहे हो। इससे कितना उत्पादन प्राप्त कर सकोगे, परन्तु जब खेतों में कोनोवीडर चलाया गया तो उसके कुछ दिन पश्चात ही टिलर्स की संख्या इतनी बढ़ गई कि खेत भरा-भरा सा दिखने लगा और अन्य खेतों की तुलना में पौधा भी स्वस्थ था। तब जाकर ग्रामवासियों ने कहा फसल बहुत ही अच्छा है और उपज भी बहुत अच्छा होगा। हमलोग भी अगले वर्ष इस विधि को अपनाएंगे। अलबिनुस अपना प्रत्यक्षण प्लाट देखकर फूला नहीं समा रहा था कि एक दिन अचानक परियोजना निदेशक आत्मा एवं उप परियोजना निदेशक आत्मा, सिमडेगा अपनी पूरी तकनीकी टीम के साथ प्रत्यक्षण प्लाट पर पहुंचे। टीम के सदस्यों ने टिलर्स की संख्या को गिना। कुल एक बिचड़ा से 66 टिलर्स पाया गया। बतलाया कि फसल अच्छा है, देख-रेख की जरूरत है। फसल इतना अच्छा था कि आस-पास के पंचायत एवं प्रखंडों से किसान धान के खेत को देखने के लिए आने लगे। फसल तैयार होने पर डॉ. बंधनु उराँव, परियोजना निदेशक आत्मा, सिमडेगा कटनी पूर्व प्रक्षेत्र दिवस-सह-किसान गोष्ठी का आयोजन करने तथा मौके पर खुद उपस्थित होने की बात कही। प्रत्यक्षण प्लाट पर आयोजित इस गोष्ठी में परियोजना निदेशक एवं उप परियोजना निदेशक, आत्मा सिमडेगा अपनी पूरी तकनीकी टीम के साथ पहुंचे। ग्रामवासी तथा आसपास के पंचायतों के किसानों ने भी इसमें हिस्सा लिया। कटनी प्रारंभ हुआ, सर्वप्रथम परियोजना निदेशक आत्मा, सिमडेगा के कर कमलों द्वारा धान फसल को काटा गया। तत्पश्चात मजदूर के द्वारा फसल काटकर दौनी कर उसका वजन लिया गया। जब उत्पादन का आंकलन किया गया, ग्रामवासी तथा आसपास के किसान उत्पादकता को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। उत्पादन 71 क्विंटल प्रति हें. आया, जबकि सामान्य विधि से उसी प्रभेद के बचे बिचड़े से की गई खेती से मात्र 28 क्विंटल प्रति हें. उत्पादन प्राप्त हुआ। आज श्री अलबिनुस सोरेंग अपने गाँव ही नहीं बल्कि पंचायत एवं प्रखंड के कृषकों के लिए प्रेरणा श्रोत बने हुए हैं और श्री विधि द्वारा धान की खेती करने के लिए अन्य कृषकों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। इनकी सफलता को देखकर इनके गाँव के पुरुष एवं महिला कृषकों ने अगले खरीफ मौसम में श्री विधि से ही धान की खेती करने का निश्चय किया है। स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार