भूमिका रामचन्द्र मिर्धा ग्राम – केंदवाद, प्रखंड – दुमका, जिला – दुमका के रहने वाले एक शिक्षित बेरोजगार थे। इनका जन्म एक गरीब आदिवासी किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता की माली हालत दयनीय थी। श्री मिर्धा, उच्चस्तर माध्यमिक तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद रोजगार/नौकरी के लिए बहुत प्रयास किए पर बेकार रहे। एक दिन उन्होंने स्थानीय समाचार पत्र में आत्मा-दुमका द्वारा कार्यान्वित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन योजना के तहत किसानों के लिए प्रायोजित कार्यक्रम के बारे में प्रकाशित समाचार पढ़। मिर्धा जी ने ‘आत्मा’ के दुमका कार्यालय में जाकर परियोजना निदेशक से मुलाक़ात की और योजनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी ली। परियोजना निदेशक आत्मा, दुमका मिर्धा को दलहन उत्पादन संबंधी एक प्रशिक्षण में भी भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किए। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद श्री मिर्धा को शत-प्रतिशत अनुदान पर 0.2 हें. क्षेत्र के लिए अरहर के 4.0 किलो उन्नत बीज (बहार) तथा 1.0 हें. क्षेत्र के लिए अन्य उपादान जैसे – चूना-3 क्विं., बोरेक्स-10 किलो, यूरिया-10 किलो, बीजोपचार हेतु कार्बेन्डाजिम (बेवीस्टीन) उपलब्ध कराया गया। मिर्धा जी को 0.8 हें. क्षेत्र के लिए 16.0 किलो उन्नत किस्म के अरहर बीज भी पचास प्रतिशत अनुदान पर दिया गया। अधिक उत्पादन के लिए जीवाणु खाद जैसे राईजोवीयम कल्चर 100 ग्राम x 5 पैकेट, शतप्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराया गया तथा प्रशिक्षण के दौरान राईजोबियम कल्चर के उपयोग हेतु जानकारी भी दी गई, जिसका अक्षरश: उपयोग कर मिर्धा ने बीज की बुआई की। बुआई के पूर्व खेत में एक ट्रैक्टर सड़ा हुआ गोबर का खाद भी मिलाया। पंक्तियों में 75 सें.मी. पंक्ति से पंक्ति तथा 25 सें.मी. बीज से बीज की दूरी बनाए रखते हुए बुआई की। बीज का अंकुरण अच्छा हुआ। मिर्धा जी ने दो बार निकाई-गुड़ाई किए, पहला बुआई के 30-35 दिनों बाद तथा दूसरा बुआई के 50-55 दिनों बाद। फसल को कीट तथा व्याधि से बचाने के लिए आत्मा, दुमका के अंतर्गत पदस्थापित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन योजना तथा आत्मा के विशेषज्ञ समय-समय पर फसल का निरीक्षण करते रहे और फेरोमोन ट्रैप + ल्यूर तथा अन्य आवश्यक कीटनाशी जैसे मोनोक्रोटोफ़ॉस, क्वीनोलफ़ॉस का छिड़काव किया। जिससे फसल फली छेदक तथा अन्य कीटों से सुरक्षित रहा। रामचन्द्र मिर्धा की फसल को देखकर अगल-बगल के गाँव के किसान अक्सर आते और फसल की तकनीकी के बारे में मिर्धा जी से जानकारी प्राप्त करते। फसल कटने के बाद कुल दाना का उपज 28.0 क्विं, डंठल 100 क्विंटल और भूसा करीब 50 क्विंटल हुआ। डंठल का व्यवहार मिर्धा ने घर में खाना बनाने के लिए ईंधन के रूप में किया तथा भूसा पशुओं को खिलाया। मिर्धा ने 10 क्विं. बीज अपने गाँव तथा अगल-बगल के गाँवों के किसानों को 30.0 रू. प्रति किलो की दर से बेचा, जिससे 30,000 (तीस हजार) नकद प्राप्त हुआ। शेष दाना उन्होंने घर में दाल के रूप में खाने के लिए रखा और आवश्यकतानुसार समय-समय पर उसकी बिक्री भी की। खेती ने जीवन को किया आसान अरहर की खेती ने मिर्धा को खेती की तरफ आकर्षित किया। आज मिर्धा जी ने ‘आत्मा’, दुमका के तकनीकी सहयोग से अन्य फसलों के साथ-साथ बत्तख पालन, मुर्गी पालन, बकरी पालन आदि का प्रशिक्षण प्राप्त कर अपनी आजीविका को मजबूत आधार दिया है। अगल-बगल गाँव के अन्य किसान आज श्री मिर्धा से सलाह मशविरा कर खेती कर रहे हैं। उन्नत तकनीकी से अरहर की खेती कर श्री मिर्धा आज जिला के एक सफल किसान की श्रेणी में शामिल हो गए हैं। वे हमेशा कहते है कि एन.एफ. एस.एम. हमारे लिए तथा देश के बहुतेरों किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है। ये अरहर की खेती प्रति वर्ष करते है। बढ़ती आमदनी को मिर्धा जी अपने बच्चों की शिक्षा तथा खेतों के विकास पर खर्च करते हैं। उन्नत कृषि यंत्र, सिंचाई पम्प, पाइप आदि के जरिये मिर्धा आज कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से खेती कर रहे हैं। उन्हें अब जिला के प्रगतिशील कृषक के रूप में मान्यता मिल गई है। स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार