सुप्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डा. स्वामीनाथन के अनुसार विश्व में खेती का सूत्रापात और वैज्ञानिक विकास का प्रारंभ महिलाओं ने ही किया। महिलाओं के उत्थान और सशक्तिकरण के लिए जेंडर संवेदीकरण, महिलाओं को तकनीकी प्रशिक्षण उपलब्धता, स्वयं सहायता समूहों द्वारा उद्यमिता विकास तथा लघु उद्योगों आदि पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए। कृषि क्षेत्रा में महत्वपूर्ण भूमिका होते हुए भी उन्हें बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। महिलाओं की अशिक्षा, अनभिज्ञता, उदासीनता और अंधविश्वास उनकी सशक्तिकरण की राह और मुश्किल बढ़ाते हैं। कई महिलाओं ने इन बाधाओं से जूझकर समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई है, जो अन्य लोगों के लिए प्रेरणास्रोत तथा अनुकरणीय है। महिलाओं के समग्र विकास के लिए भारत सरकार शुरू से ही प्रयासरत है। स्वतंत्रता के बाद महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में लोन के लिए पांचवी पंचवर्षीय योजना (वर्ष 1974-79) से महिला संबंधित कार्यक्रमों का केंद्र महिला कल्याण से महिला विकास की ओर हुआ। इन योजनाओं के सफल निष्पादन के बाद महिलाओं को समाज में समान दर्जा दिलाने के लिए योजनाबद्ध तरीके अपनाए गए। महिलाएं राष्ट्र के विकास में पुरुषों के बराबर ही महत्व रखती हैं। हमारे देश में 70 प्रतिशत आबादी आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। 85 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवार अपनी आजीविका के लिए कृषि पर ही निर्भर हैं। आज कृषि में महिलाओं का योगदान 65 से 70 प्रतिशत है। परंतु अधिकांश महिलाएं नई तकनीकों को अपनाने और आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों का लाभ उठाने तथा औपचारिक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में भाग लेने में असमर्थ हैं। वे अपनी घरेलू जिम्मेदारियों में ही उलझी रहती हैं। भारत के 48 प्रतिशत कृषि से संबंधित रोजगारों में महिलाएं ही कार्यरत हैं, जबकि लगभग 7.5 करोड़ महिलाएं दुग्ध उत्पादन तथा पशुधन व्यवसाय से संबंधित गतिविधियों में सार्थक भूमिका निभाती हैं। आंकड़ों के मुताबिक कृषि उत्पादन में महिलाओं का योगदान 20 से 30 प्रतिशत ही है। एक शोध के अनुसार, भारतीय हिमालय क्षेत्र में, एक हैक्टर खेत पर एक वर्ष में बैलों की एक जोड़ी 1064 घंटे, एक आदमी 1212 घंटे और एक महिला 3485 घंटे काम करती है। यह एक ऐसा आंकड़ा है, जो महिलाओं के कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान को दर्शाता है। आज अनेक महिलाएं, महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनकर सामने आयी हैं, जिन्होंने कृषि एवं संबंधित क्षेत्राों में अनेक आयाम छुए हैं। इनमें से कुछ की सफलता गाथा निम्नवत है। इन महिलाओं को भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के नवोन्मेषी कृषक पुरस्कार से भी इन्हें सम्मानित किया जा चुका है। श्रीमती कृष्णा यादव श्रीमती कृष्णा यादव, महिला किसानों के लिए उद्यमिता विकास के रूप में प्रेरणा स्रोत हैं। कृष्णा यादव जी 'श्री कृष्णा पिकल्स' की मालकिन हैं और दिल्ली के नजफगढ़ में रहती हैं। ये एक सफल खाद्य प्रसंस्करण उद्यमी हैं। श्रीमती कृष्णा यादव ने वर्ष 2001 में कृषि विज्ञान केंद्र, ऊजवा में खाद्य प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन तकनीक का प्रशिक्षण लिया और अपने सफर की शुरूआत की। करौंदे का अचार और कैंडी बनाने के शुरुआती दिनों के बाद आज ये कई तरह की चटनी, अचार, मरुब्बा आदि सहित कम से कम 87 प्रकार के उत्पाद तैयार करती हैं। वर्तमान में उनकी फैक्ट्री में लगभग 500 क्विटंल फलों और सब्जियों का प्रसंस्करण होता है, जिसका सालाना व्यापार लगभग एक करोड़ रुपये से ऊपर का है। इनके व्यापार ने कई लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाया है। वर्ष 2006 में श्रीमती कृष्णा यादव ने भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में कटाई पश्चात प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षण लिया। इस क्रम में उन्होंने बिना रासायनिक परिरक्षकों के प्रयोग के फलों से तैयार होने वाले पेय के बारे में जानकारी हासिल की। इन्होंने अपने दृढ़ विश्वास, कर्मठता और सकारात्मक सोच से एक पफैक्ट्री के मालिक बनने तक के सपफर में एक लंबी दूरी तय की है। श्रीमती यादव को सरकार व अनेक गैर सरकारी संगठनों द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका हैं। श्रीमती खुशबू श्रीमती खुशबू गांव शकटपुर, जिलाः गुरूग्राम, हरियाणा की रहने वाली हैं। इनके पास 5 एकड़ भूमि है। ये गांव में स्वयंसहायता समूह 'आरजू' की अध्यक्षा हैं। इन्होंने स्वयंसहायता समूह की मदद से मसालों के प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन का कार्य प्रारंभ किया। ये स्वयं सहायता समूह आधारित प्रसंस्करण इकाई चिकन मसाला, मीट मसाला, पनीर मसाला बनाती हैं। अब यह समूह एक लघु उद्योग के रूप में स्थापित हो गया है। यह लघु उद्योग वर्ष 2013 में प्रारंभ हुआ और इसकी कमाई 44,631 रुपये हुई। इसी प्रकार वर्ष 2017 में इनका टर्न ओवर 20 लाख रुपये तथा मुनाफा प्रतिवर्ष 4 लाख रुपये पहुंच गया। श्रीमती खुशबू महिला स्वयं सहायता संस्थाओं के लिए मास्टर ट्रेनर के रूप में भी कार्य कर रही हैं और महिलाओं को अपना उद्यम स्थापित करने के लिए प्रशिक्षित करती हैं। इनके स्वयंसेवी सहायता समूह ने लघु हरित जैविक कृषि की शुरुआत की और इसे आगे बढ़ाया। इन्होंने जैविक तरीके से उगाई गई सब्जियों का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रा के लग्जरी होटलों में सीधे विपणन किया। लघु हरे-भरे उत्पादों को ट्रे में उगाया जाता है, जिसकी लागत 5 से 7 रुपये आती है और ये प्रति ट्रे 40 से 50 रुपये में बिक जाते हैं। इस प्रकार किसानों को भारी मुनाफा होता है। स्वयं सहायता समूह को होने वाली आय की वजह से इस समूह की अपने सदस्यों को )ण प्रदान करने की क्षमता बढ़ गई। इससे समाज में लघु ऋण प्रणाली को प्रोत्साहन मिला है। इसने सामाजिक कुरीतियों जैसे-महिलाओं को पुरुषों के सामने नहीं आना चाहिए और बैठकों में भाग नहीं लेना चाहिए, को दूर किया तथा महिलाओं का सशक्तिकरण किया। उद्यमिता संबंधी गतिविधियों से अन्य लोगों को भी आय बढ़ाने और सामाजिक उत्थान के लिए लघु उद्योग स्थापित करने के लिए प्रोत्साहन मिला। श्रीमती खुशबू को भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के नवोन्मेषी कृषक पुरस्कार वर्ष 2018 से भी सम्मानित किया जा चुका है। श्रीमती गौरीप्रिया श्रीमती गौरीप्रिया नवासाहि, पुरी (ओडिशा) की रहनी वाली एक उन्नत महिला किसान हैं। इन्होंने भाकृअनुप-केंद्रीय कृषिरत महिला संस्थान, भुबनेश्वर, ओडिशा के मार्गदर्शन से साथी किसानों को प्रोत्साहित किया है तथा ज्ञान को प्रसारित किया है। अपने खेतों में ये मशीनीकरण, समेकित कीट प्रबंधन, जैव उर्वरक एवं वर्मीकंपोस्ट (केंचुए की खाद) का इस्तेमाल करती हैं। अपने खेतों में उन्नत प्रजातियां, पंक्तिबद्ध पौध प्रत्यारोपण, फेरोमोन ट्रैप, धान के लिए नीम के तेल का छिड़काव का उपयोग करती हैं। श्रीमती गौरीप्रिया महिला किसानों को खुम्भ उत्पादन का प्रशिक्षण प्रदान करने के क्षेत्र में प्रमुख प्रशिक्षक के रूप में जानी जाती हैं। इन्होंने 16 प्रशिक्षणों द्वारा लगभग 800 महिला किसानों को प्रशिक्षण प्रदान किया है। अपने खेत को श्रीमती गौरीप्रिया ने बीज उत्पादन के पोषण स्थल के रूप में विकसित किया है तथा इसमें वह वर्षभर अच्छी गुणवत्ता वाली सब्जियों, कद्दूवर्गीय फसलों तथा हरी पत्तेदार सब्जियों की पैदावार भी लेती हैं। भाकृअनुप-केंद्रीय कृषिरत महिला संस्थान, भुबनेश्वर, ओडिशा द्वारा इन्हें महिला किसान पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। श्रीमती गौरीप्रिया को भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के नवोन्मेषी कृषक पुरस्कार 2019 से भी इन्हें सम्मानित किया जा चुका है। श्रीमती पूजा शर्मा भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने सोयाबीन का मूल्य संवर्धन कर 'सोयानट' विकसित किया तथा विभिन्न क्षेत्राों की महिलाओं को तकनीकी जानकारी दी। तकनीकी हस्तांतरण द्वारा महिलाओं ने इसे लघु उद्योग के रूप में अपनाकर आजीविका का साधन बनाया है। गुरूग्राम से सटे चन्दू गांव की श्रीमती पूजा शर्मा ने अपनी जागरूकता, इच्छा शक्ति और परिश्रम से खुद स्वावलंबी बनकर तथा आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर आसपास के इलाकों में एक मिसाल कायम की है। इन्होंने भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की मदद से एक स्वयं सहायता समूह 'क्षितिज' का गठन किया और महिलाओं को जोड़कर उद्यम विकास की ओर अग्रसर किया है। श्रीमती पूजा शर्मा ने भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के शिकोहपुर, गुड़गांव स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र से कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन के विषय में तकनीकी ज्ञान प्राप्त किया तथा सोयाबीन से निर्मित 'सोयानट' तैयार कर अपनी उद्यम यात्राा का शुभारंभ किया। इन्होंने अपने स्वयं सहायता समूह द्वारा सोयानट बनाकर आसपास के स्कूलों, जिमखाना तथा विभिन्न राष्ट्रीय व क्षेत्राीय प्रदर्शनी में अपने स्टॉल लगाकर सीधे ग्राहकों से सम्पर्क किया तथा अपना व्यापार बढ़ाया। इसके साथ ही अब इनके समूह ने अन्य कृषि खाद्य उत्पादों के मूल्य संवर्धन आधरित उत्पाद जैसे-बाजरे का आटा, बाजरे का दलिया, मक्के का दलिया व आटा, बाजरे के बिस्कुट व पोषण से परिपूर्ण सोया से निर्मित स्वास्थ्यवर्धक पेय आदि बनाना व बेचना आरंभ किया है। इन्हें भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के नवोन्मेषी कृषक पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। उपरोक्त सफल महिलाएं सशक्तिकरण की एक पहचान हैं, जिनके अभूतपूर्व प्रयासों से समाज ने, खासकर इनके परिवारों ने, विभिन्न आय सृजन गतिविधियों द्वारा इनके कार्यों के महत्व को स्वीकार किया है। ये महिलाएं परिवार, समाज व देश के सर्वांगीण विकास में अपना योगदान दे रही हैं। इनकी सफलता गाथा सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। स्त्राेत : खेती पत्निका निशा शर्मा,वरिष्ठ वैज्ञानिक और प्रतिभा जोशी, वैज्ञानिक कृषि प्रौद्योगिकी आकलन एवं स्थानांतरण केंद्र, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली-११००१२