भूमिका पूर्वी गंगा के मैदानी क्षेत्रों में आमतौर पर धान की रोपाई करके खेती की जाती है। इस विधि में धान की पौध तैयार करके पौधों को खेत में मजदूरों द्वारा रोपाई की जाती है। कृषि मजदूरों का खेती की अपेक्षा उद्योग या अन्य कार्यों में लिप्त होने से धान की परम्परागत खेती में बढ़ती लागत एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। ऐसे में धान की सीधी बुआई किसानों के लिए आकर्षक विकल्प बनती जा रही है। इस विधि में धान की रोपाई (परम्परागत विधि) करने की अपेक्षा श्रम एवं लागत की कम आवश्यकता पड़ती है। इस विधि में लेवा लगाने की आवश्यकता न होने तथा सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ने के कारण लागत में और भी कमी आती है। स्थानीय स्तर पर बुआई के लिए यंत्रों की उपलब्धता सुनिश्चित होने पर इस विधि को छोटे व बड़े किसानों द्वारा आसानी से अपनाई जा सकती है। धान की सीधी बुआई के लिए गेहूँ बोने वाली जीरो टिलेज मशीन का उपयोग किया जाता है। उपयुक्त भूमि बलुई दोमट से लेकर भारी चिकनी मिट्टी वाली, जिसमें धान की रोपाई की जाती हो, उन सभी प्रकार की भूमियों में धान की सीधी बुआई की जा सकती है। हल्की मिट्टी जैसे बलुई दोमट या रेतीली भूमि जिनमें जलधारण क्षमता कम हो उस पर धान की सीधी बुआई नही करनी चाहिए। खेत की तैयारी खेत को समतल करना ध्यान देने योग्य बातें - सीधी बुआई के लिए खेत ठीक प्रकार से समतल होना चाहिए। धान की सीधी बुआई से अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए खेत का अच्छी तरह से समतल होना आवश्यक है। समतल खेत में बुआई ठीक ढंग से की जा सकती है तथा सिंचाई करने पर पूरे खेत में समान रूप से पानी लगता है। जिससे बीज का जमाव अच्छा होने के साथ-साथ उर्वरकों (खाद) का समुचित उपयोग तथा दक्षतापूर्ण खरपतवार नियंत्रण होने से अच्छी पैदावार मिलती है। समतल खेत में सिंचाई करने पर पानी की कम आवश्यकता होती है तथा लेजर लैण्ड लेवलर द्वारासमतल किये खेत में बुआई करने पर अच्छे परिणाम मिलते हैं। जुताई धान की सीधी बुआई, तैयार खेत में (परम्परागत) या बिना जुताई (शून्य कर्षण) दोनों तरह के खेत में भी की जा सकती है।खेत की जुताई करना या न करना खेत की समतलीकरण की दशा तथा चूहे, गिलहरीआदि जीवों से होने वाले हानि पर निर्भर करता है। अ) परम्परागत जुताई : धान के बीजों को मिट्टी के सम्पर्क में बोने योग्यभूमि बनाने के लिए मिट्टी की 10 सेमी की गहराई तक जुताई करनी चाहिए। मिट्टी की दशा और खेत की स्थितियों के अनुसार 1-2 बार डिस्क हैरो से जुताई करके 1-2 बार कल्टीवेटर और पाटा चलाकरमिट्टी को भुरभुरी बना लेनी चाहिए। ब) शून्य कर्षण या बिना जुताई : धान की सीधी बुआई यदि बिना जुताई किये खेत में करनी हो तो खाली खेत में उगे खरपतवारों को नष्ट करने के लिए बुआई से 2-3 दिन पहले पैराक्वाट या ग्लाइफोसेट खरपतवारनाशी का प्रयोग करना चाहिए। प्रयोग की विधि तालिका-3 में दर्शायी गयी है। यदि खेत में जगह-जगह पर खरतपतवार न उगे हों तो पूरे खेत में छिड़काव करने के बजाय जहां पर खरपतवार हों केवल वहीं पर छिड़काव करें। यदि खेत में नमी की कमी है तो बेहतर ढंग से खरपतवार को नष्ट करने के लिए खरपतवारनाशी के प्रयोग से पूर्व हल्की सिंचाई करनी चाहिए। ध्यान देने योग्य बातें खेत में बहुवर्षीय खरपतवारों के होने पर पैराक्वाट का प्रयोग न करें । ऐसी स्थिति में ग्लाइफोसेट का प्रयोग करें। छिड़काव के लिए खरपतवारनाशी का घोल बनाने के लिए साफ पानी और प्लास्टिक की बाल्टी या बर्तन काप्रयोग करें। खरपतवारनाशी के सही उपयोग के लिए तीन नॉजिल | वाले बूम (मल्टी नॉजिल) का उपयोग करें प्रजातियां रोपित धान में प्रयोग की जाने वाली प्रजातियों तथा संकर प्रजातियों (हाइब्रिड) को भी धान की सीधी बुआई हेतु लगाया जा सकता है। उपरिवार क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता को कम करने तथा समय से गेहूं की बुआई हेतु धान की कम अवधि वाली प्रजातियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। जबकि जल भराव वाले क्षेत्र में जहां जल निकासी का उचित प्रबंध नहीं है, कम समय में पकने वाली प्रजातियां लाभदायी नहीं होती अतः सामान्य अवधि वाली प्रजातियों का चयन करना। चाहिए। पूर्वी सिंधु गंगा के क्षेत्रों में धान की सीधी बुआई के लिए उपयुक्त प्रजातियों एवं संकर प्रजातियों की सूची नीचे दी गयी है गंगा के पूर्वी क्षेत्रों की मुख्य प्रजातियां व संकर धान विवरण के लिए तालिका 1 देखें : प्रजातियां पूर्वी उ.प्र. प्रजातियां (बिहार) संकर प्रजातियां पूर्वी उ.प्र. एवं बिहार एनडीआर-359 राजेन्द्र महसूरी-1 एराइज 6129 सहभागी धान एमटीयू 1001 एराइज 6444 बीपीटी 5204 एनडीआर-359 एराइज़ 6444 गोल्ड - घ एमटीयू 7029 प्रभात एराइज़ धानी मोती एमटीयू 7029 एराइज़ प्राइमा स्वर्णा सब-1 - क राजेन्द्र भगवती एवं सत्यम स्वर्णा सब1 राजश्री - ग सहभागी धान - ख पीएचबी-71 क - जलमग्नता सहनशील (रोपाई के दो सप्ताह बाद तक डूबने पर भी बचे रहने की सम्भावना होती है) ख - सूखे के लिए प्रतिरोधित ग - जलग्रस्त स्थितियों के लिए घ - यह बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट के लिए प्रतिरोधी संकर है। बुआई का समय ध्यान देने योग्य बातें- धान की सीधी बुआई का उपयुक्त समय 20 मई से 30जून तक होता है। कम सिंचाई की उपलब्धता में धान की छोटी अवधि वाली किस्में या संकर धान को प्राथमिकता देनी चाहिए। इससे धान की कटाई समय पर होगी। धान की सीधी बुआई का उपयुक्त समय 20 मई से 30 जून तक होता है। देर से बुआई करने पर थोड़े समय बाद ही भारी बारिश की आशंका होने का खतरा रहता है। भारी वर्षा विशेष रूप से मटियार मिट्टी पर बुआई प्रभावित कर सकती है। अतः जल्दी बुआई करना। सुरक्षित होता है। यद्यपि जल्दी बुआई करने पर अधिक सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। उन स्थानों पर जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो या मानसून से पहले एक बरसात होती है वहाँ पर धान की सीधी बुआई का बेहतर समय मानसून शुरू होने से 10-15 दिन पहले का होता है। पूर्वी गंगा के क्षेत्रों में धान की सीधी बुआई के लिए उपयुक्त समय मई का अन्तिम सप्ताह होता है। बुआई की विधि धान की सीधी बुआई सूखी या नमी युक्त भूमि में की जा सकती हैं। १॰ सूखी भूमि में धान की बुआई के बाद बीजों के जमाव के लिए हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है और २॰ नम भूमि में बुआई के लिए पलेवा (बुआई से पहले की सिंचाई) करने के बाद या वर्षा के बाद बुआई होती है। नमी की दशा में बुआई करने के बाद पाटा लगाने से भूमि में नमी संरक्षित करने और सही तरह से जमाव होने में सहायता मिलती है। परम्परागत विधि जुताई के बाद धान की बुआई इन दोनों विधियों में से किसी के भी द्वारा किया जा सकता है। जबकि नरम मिट्टी में जीरो टिलेज विधि बेहतर होती है। बुआई के लिए मशीन ठीक प्रकार से बुआई करने के लिए, झुकी हुई (इनक्लाइंड प्लेट) यंत्र युक्त बीज सह उर्वरक मल्टीक्रॉप प्लान्टर का प्रयोग करना चाहिए। धान की सीधी बुआई को परंपरागत फ्लूटेड रोलर बीज मापन यंत्र युक्त बीज-सह-उर्वरक ड्रिल मशीन से भी बोया जा सकता है। इससे बुआई करने पर बीज समान दूरी पर नहीं गिरते हैं तथा बीज के टूटने की संभावना अधिक होती है। जिसके कारण बीज की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। इनक्लाइंड प्लेट यंत्र युक्त मशीन में बीज टूटने की समस्या फ्लूटेड रोलर बीज मापन यंत्र युक्त की तुलना में कम होती है जिससे बीजों का सही उपयोग होता है। नमी बनाये रखने तथा चूहे, गिलहरियों और पक्षियों द्वारा नुकसान रोकने के लिए बीज को मिट्टी से अच्छी तरह से ढकने के लिए मशीन के पीछे चेन या हल्के पाटे का उपयोग करना चाहिए। इन्वर्टिड टी टाइन वाली मशीन जुताई विधि व जीरो टिलेज (बिना जुताई) दोनों विधियों में उपयुक्त है। इन्वर्टिड टी टाइन वाली मशीन जुताई विधि व जीरो टिलेज (बिना जुताई) दोनों विधियों में उपयुक्त है।मिट्टी से अच्छी तरह से ढकने के लिए मशीन के पीछे चेन या हल्के पाटे का उपयोगजीरो टिलेज (बिना जुताई किये) धान की सीधी बुआई के लिए जब पिछली फसल (गेहूँ) के बचे हुए अवशेष रहते हैं तब उपयुक्त फार युक्त या सामान्य मल्टीक्राप प्लान्टर का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन यदि मिट्टी की सतह पर फसल अवशेष (मूंग की फलियां, खुला पुआल, डंठल) अधिक मात्रा में हो तो टर्बो हैप्पी सीडर का प्रयोग करना चाहिए। फसल अवशेष अधिक मात्रा में हो तो टर्बो हैप्पी सीडर का प्रयोग करेंदुपहिया ट्रैक्टरों के लिए अब भारत में भी बीज सह उर्वरक ड्रिल उपलब्ध हैं, आमतौर पर ये पावर टिलर से जुड़े होते हैं। ये ड्रिल (इनक्लाइंड) प्लेट वाली बीज मापन प्रक्रिया के साथ उपलब्ध होते हैं, तथा बुआई एक ही बार में पूरी जुताई या पट्टीदार जुताई में की जा सकती है। दुपहिया ट्रैक्टर के लिए नये बीज सह उर्वरक ड्रिल प्लान्टर, पावर टिलर- प्रचलित सीडर का परिष्कृत रूप है जो कि कुछ समय से उपलब्ध है। सामान्य पीटीओएस में बीज का बाक्स होता है, लेकिन उर्वरक का बाक्स नहीं होता है, और फ्लटेड रोलर बीज बुआई यंत्र होती है। दुपहिया ट्रैक्टर से संचालित झुकी हुई प्लेट वाली (इनक्लाइंड प्लेट यंत्र) बीज मापन प्रणाली से युक्त बीज सह उर्वरक ड्रिल मशीन द्वारा जुताई और बुआई एक ही बार में हो जाती है। दुपहिया ट्रैक्टरों द्वारा बीज सह उर्वरक ड्रिल (इनक्लाइंड) प्लेट वाली बीज मापन प्रक्रिया के साथ उपलब्ध है तथा बुआई को एक ही बार में पूरी जुताई या पट्टीदार जुताई में की जा सकती है। बीज की गुणवत्ता, दर, बुआई की गहराई, पंक्ति के बीच अन्तर ध्यान देने योग्य बातें- प्रमाणित बीज प्रयोग करें 20 से 30कि.ग्रा./हे. (इनक्लाइंड प्लेट यंत्र की बीज बोने की प्रक्रिया के साथ) 35 से 40कि.ग्रा./हे. (फ्लटेड रोलर बीज बुआई तंत्र बीज बोने की प्रक्रिया के साथ) बीज बोने की गहराईः 1-2 सेमी. बीज की गुणवत्ता अंकुरण दर को प्रभावित करती है अतः प्रमाणित बीजों का ही प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। मल्टीक्राप प्लान्टर से पंक्तियों के बीच 20 सेमी दूरी के साथ 95 प्रतिशत से अधिक अंकुरण क्षमता एवं अच्छी गुणवत्ता वाले बीज की मात्रा 20-30कि.ग्रा./हे. के लिए पर्याप्त होती है। खेत की अच्छी दशा के तहत, बीज की दर न्यूनतम मात्रा में करनी चाहिए। जबकि जहाँ पर खेत समतल न होने, पानी का इकट्ठा होने, या जीवों द्वारा बीज का परिभक्षण जैसी समस्या हो वहाँ पर बीज दर अधिकतम मात्रा में प्रयोग करनी चाहिए। किसी भी दशा में बुआई के लिए बीज दर 50कि.ग्रा./हे. से अधिक मात्रा नहीं होनी चाहिए। धान के लिए बीज की बुआई करने की गहराई निर्धारण करना एक जटिलप्रक्रिया है। धान की बुआई को 1-2 सेमी की गहराई पर करना चाहिए। यह ध्यान रहे कि किसी भी दशा में 3 सेमी से अधिक गहराई नहीं होनी चाहिए। बीज उपचार अ.बुआई हेतु बीज तैयार करना सीधी बुआई वाले धान की बुआई 2 सेमी या उससे कम गहराई पर की जानी चाहिए। आमतौर पर बुआई परम्परागत मानसून आने से पहले की जाती है। बुआई के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। नमी के अभाव में बीज के जमाव तथा फसल के अच्छी बढ़वार होने में बाधा उत्पन्न होती है। अतः मिट्टी में नम बीजों की बुआई करनी चाहिए जिससे बीज का जमाव तथा पौधों की बढ़वार में मदद मिल सकती है। इसके लिए बीजों को टाट के बैग में रखकर 10-12 घंटे तक पानी में भिगोने के बाद बीजों को कुछ घंटों तक हवा में सुखाया जाता है जिससे बीज मशीन से आसानी से गिरते हैं। यदि बुआई नम मिट्टी में (बरसात के बाद या बुआई से पहले सिंचाई करके) की जाती है तो पूर्व अंकुरण कराने के लिए बीजों को भिगोने के बाद 8-12 घंटे तक गर्म स्थान पर रखा जाता है। अंकुरण होने के थोड़ी देर बाद ही उनकी बुआई कर देनी चाहिए। यदि बुआई सूखी मिट्टी में की जाती है तो पूर्व अंकुरित बीजों के जमाव पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अतः खेत में नमी अवश्य होनी चाहिए।सूखी मिट्टी में पूर्व अंकुरित कराये गये बीजों को बोने के बाद तुरन्त सिंचाई करना आवश्यक होता है। फफूंद और कीटनाशक से बीज का शोधन बीमारियों एवं कीटों से बचाव के लिए फफूदीनाशकों व कीटनाशकों से बीज शोधन करने की सलाह दी जाती है। इसके लिए बीजों को फफूदीनाशक टेबुकोनाजोल (रेक्सिल ईजी 1 मिली), या कार्बेन्डाजिम (बाविस्टिन 2 ग्रा) प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से शोधित पानी में 24 घंटे तक भिगोया जाता है। भिगोने के लिए पानी की मात्रा बीजों की मात्रा के बराबर होती है। फिर बीजों को फहूंदनाशक के घोल से निकालकर 2 घंटे छाये में सुखाया जाता है। जहां मिट्टी में दीमक जैसे कीट की समस्या होती है, वहां कीटनाशक से बीजों का शोधन लाभकारी होता है। इसके लिए इमिडाक्लोप्रिड (गाचो 350 एफएस) की 3 मिली/कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। फफूदीनाशक और कीटनाशक दोनों को एक साथ मिलाकर संयुक्त शोधन (उपचार) किया जा सकता है। दोनों के संयोजन से भूमि जनित फफूंद और कीटों से बीजों की सुरक्षा हो सकती है। दोनों रसायनों का प्रयोग सूखे बीजों के शोधन के लिए भी उपयुक्त होता है। रसायनों को 15 मिली पानी/कि.ग्रा. बीज में मिलाकर उपचारित करना चाहिए। उर्वरक प्रबंधन ध्यान देने योग्य बातें- उर्वरक के रूप में बुआई के समय यूरिया का प्रयोग न करें नाइट्रोजन उर्वरक को कम से कम 3 भागों में प्रयोग करें नाइट्रोजन फास्फोरस पोटैशियम और जिंक धान की सीधी बुआई में प्रजातियों के आधार पर 80 से 120कि.ग्रा./हे. तक नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है (इसके लिए तालिका-1 देखें)। इसके अलावा फॉस्फोरस 60कि.ग्रा., 60कि.ग्रा. तथा जिंक सल्फेट 25कि.ग्रा. प्रति हे. की आवश्यकता होती है। यदि परम्परागत जुताई किये गये खेत में सीधी बुआई करनी हो तो, खेत में हरी खाद उगाकर नाइट्रोजन की मात्रा को 25 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। हरी खाद के लिए बैंचा (ससबेनिया) को उगाकर धान की सीधी बुआई से 2-3 दिन पहले इसे खेत में मिला देना चाहिए। यूरिया (छ) को छोड़कर सभी उर्वरकों की पूरी मात्रा का प्रयोग बुआई के समय करना चाहिए। यौगिक उर्वरकों को बुआई के समय सीड ड्रिल के माध्यम से मिट्टी में। डालना चाहिए। यदि बुआई के समय जिंक नहीं डाला गया है। तो इसे बुआई के 30 दिनों बाद तथा फूलों की मंजरी निकलने की अवस्था पर डाल देना चाहिए। दोनों अवस्थाओं में । तत्वों के रूप में 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट और 1.0 प्रतिशत यूरिया का छिड़काव किया जा सकता है। शेष नाइट्रोजन को यूरिया के रूप में बुआई के 2-3 सप्ताह बाद से शुरू करके बाली निकलने की अवस्था (पीआई) तक तीन या चार चरणों में समान अन्तराल पर बराबर मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। नाइट्रोजन का प्रयोग सिंचाई से पहले करना चाहिए। नाइट्रोजन खाद की वास्तविकआवश्यकता मापने के लिए लीफ कलर चार्ट का प्रयोग भी कर सकते हैं। इस विधि से पैदावार में हानि के बिना नाइट्रोजन की दर को कम किया जा सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान फिलीपीन्स द्वारा विकसित 5 इंच लम्बी प्रमाणित एलसीसी उच्च गुणवत्ता वाली प्लास्टिक से बनी हुई होती है। जिसमें पीले हरे रंग (नम्बर 2) से लेकर गहरे हरे रंग (नम्बर 4) की चार रंगीन पट्टियां होती हैं। अधिक पैदावार वाली प्रजाति/ संकर प्रजाति के लिए नाइट्रोजन का प्रयोग 4 नम्बर वाली (गहरे हरे रंग) एलसीसी पट्टी पर आधारित होनी चाहिए। सिंचाई या बरसात के बाद नम मिट्टी में यूरिया न फैलायें । सिंचाई अथवा बरसात (यदि संभावना हो) से पहले यूरिया का उपयोग करना चाहिए।भारत में गंगा के पूर्वी मैदानी क्षेत्रों में धान की सीधी बुआई हैत मार्गदर्शिका लौह (आयरन) धान की सीधी बुआई जब हल्की मिट्टी (बलुई दोमट और दोमट) में की जाती है तब फसल में लौह तत्व की कमी दिखाई पड़ती है। यह कमी कम बरसात के दौर में और बढ़ जाती है। लौह की कमी के लक्षण सामान्यतः वानस्पतिक स्थिति में पीलेपन, अविकसित पौधे तथा अंकुरण न होने के रूप में दिखाई देते हैं। कमी दिखाई देने। पर 1 प्रतिशत फेरस सल्फेट के घोल का छिड़काव करना चाहिए। एक सप्ताह बाद भी लक्षण मौजूद रहने पर दुबारा छिड़काव करना चाहिए। अगर आयरन की कमी के गम्भीर लक्षण हों तो फैरस सल्फेट का प्रयोग करने के बाद कुछ दिनों के लिए खेत को पानी से भरा रखना चाहिए। यदि फसल के विकास के दौरान बाद में आयरन की कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं तो ये अनाज की पुटी के गोल कीड़ों के कारण हो सकते हैं। इस सम्भावित लक्षण को सुनिश्चित करने के लिए जड़ों की जाँच करनी चाहिए। यदि जड़ों में गाल पुटी मौजूद रहती हैं तो। भविष्य में इस खेत का उपयोग सीधी बुआई के लिए न करें। सिंचाई प्रबन्धन ध्यान देने योग्य बातें जमाव तथा बीज स्थापन के दौरान बीज/जड़ क्षेत्र में मिट्टी में नमी बनाये रखना चाहिए। बाली निकलने से पहले दाना बनना शुरू होने तक मिट्टी में नमी बनाये रखना चाहिए | पानी की कमी व सिंचाई करने में खर्च बढ़ती जा रही है। इसके लिए बिना पैदावार घटाये पानी बचाने के लिए सिंचाई का सावधानी से प्रबंधन करने की जरूरत होती है। धान के अच्छे विकास और पैदावार के लिए खेत में लगातार पानी के भरे रहने की जरूरत नहीं होती है। धान की खेती मिट्टी की सतह सूखने पर सिंचाई करने से सफल हो सकती है। धान की सीधी बुआई में सिंचाई की जरूरत काफी हद तक मौसम और मिट्टी के प्रकार पर निर्भर करती है। बारिश न होने पर अधिक हल्की (कम चिकनी से अधिक बलुई) मिट्टी के लिए कम दिनों के अन्तर पर सिंचाई की जरूरत होती है। बीज के सही तरह से जमाव के लिए सीधी बुआई वाले धान को बुआई के बाद पहले तीन सप्ताह में पानी की आपूर्ति की जरूरत होती है। जब धान की सीधी बुआई गर्म और शुष्क स्थितियों में की जाती है। तो जड़ क्षेत्र में मिट्टी नम रखने के लिए 3-5 दिनों के अन्तराल में 1-2 सिंचाई की जरूरत पड़ती है। सक्रिय कल्ले निकलते समय जो कि बुआई के 30-45 दिन के बीच की अवस्था तथा बाली निकलने से लेकर दाना भरने की अवस्था में मिट्टी के ऊपरी भाग (0-15 सेमी) में नमी का होना अनिवार्य है। अन्य स्थितियों में मिट्टी के ऊपरी भाग को थोड़ा शुष्क रहने दिया जा सकता है। ध्यान रहे कि मिट्टी का ऊपरी भाग इतना भी नहीं सूखने दें जिससे सुबह के समय धान की पत्तियां सिकुड़ी, मुड़ी हुई या गोल आकार में मुरझाई दिखाई दें। इस हालात में सिंचाई करना अनिवार्य है। चिकनी मिट्टी के लिए मिट्टी की सतह पर दरारों का दिखाई देना भी सामान्यतः सिंचाई की आवश्यकता का संकेत होता है। किसानों की मदद के लिए पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा सिंचाई की आवश्यकता को सुनिश्चित करने में एक आसान एवं सस्ता उपकरण टेंसियोमीटर को विकसित किया गया है। टेंसियोमीटर को पानी से भरकर चीनी मिट्टी (सेरेमिक) कप के साथ मिट्टी में 15-20 सेमी गहराई पर स्थापित किया गया है। जैसे-जैसे मिट्टी सूखती है कप के बाहर की मिट्टी पानी सोखता जाता है जिससे ट्यूब में पानी का स्तर गिरता जाता है। जब यह स्तर हरे से पीले बैंड की ओर पहुँचता है तो खेत में सिंचाई करने की आवश्यकता होती है| खरपतवार प्रबंधन सामान्यतः सीधी बुआई वाले धान के उत्पादन में खरपतवार प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है। रोपाई वाले धान की तुलना में सीधीबुआई में खरपतवार काफी अधिक मात्रा में निकलते हैं। यदि खरपतवारों का नियंत्रण समय से नहीं किया जाता है तो धान की उपज घटकर शून्य तक हो सकती है। धान के खरपतवारों की तीन विस्तृत वर्ग हैं-घास, चौड़ी पत्ती व नरकट। पूर्वी भारत में धान की सीधी बुआई में आमतौर पर पाये जाने वाले खरपतवार को तालिका 2 में सूचीबद्ध किया गया है। इनका निम्न विधियों द्वारा नियंत्रण करना चाहिए। पशुओं में चारे के फसलों के लिए प्रयुक्त क्षेत्रों या जहां पहले भीषण घास फूस का संक्रमण रहा हो, ऐसे क्षेत्रों में धान की सीधी बुआई नहीं करनी चाहिए। सांस्कृतिक विधि जिन खेतों में खरपतवारों के बीजों की संख्या बहुत ज्यादा है उसके लिए यह विधि सबसे अनुकूल है। खरपतवारों के नियंत्रण के लिए खेत में सीधी बुआई करने के एक महीने पहले एक या दो सिंचाई देकर खरपतवार के बीजों को उगने के लिए प्रोत्साहित करें। खरपतवारों के उगने के बाद ग्लाइफोसेट या पैराक्वाट का छिड़काव करके नियंत्रण कर सकते हैं। उगे हुए खरपतवारों का नियंत्रण खेत की गहरी जुताई से भी किया जाता है। गहरी । जुताई करने से खरपतवारों के बीज मिट्टी की सतह के और अधिक करीब लाते हैं जिससे उनका अंकुरण बढ़ता है। ध्यान रखें कि खरपतवारनाशियों का प्रयोग करते समय खरपतवार का बढ़वार सक्रिय रूप से होना चाहिए। इसलिए यदि मिट्टी सूखी है तो खरपतवारनाशी के प्रयोग से पहले सिंचाई की जरूरत होगी। गेहूं की फसल और धान की बुआई के बीच दो महीने की परती अवधि होती है। धान की सीधी बुआई में खरपतवार घटाने के लिए यह विधि काफी सार्थक है। इससे जंगली धान के खरपतवार को प्रबंधित करने में भी मदद मिलती है जो कि पूर्वी गंगा के निचले क्षेत्रों में धान की खेती में प्रमुख समस्या बनती जा रही है। रसायन नियंत्रण खरपतवारनाशी का चयन खरपतवार की प्रजाति व संख्या पर निर्भर करता है तथा धान की फसल में एक खरपतवारनाशी सभी खरपतवारों को नष्ट नहीं कर सकता है। सभी खरपतवारनाशियों (तालिका 3-4) के छिड़काव से पहले प्रति एकड़ लगने वाले पानी का अन्दाजा लगा लें । छिड़काव के लिए हमेशा साफ पानी का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि गंदे पानी से खरपतवारनाशी का प्रभाव कम हो जाता है। इससे खरपतवार पर उनका प्रभाव घट सकता है अथवा धान के पौधों के लिए हानिकारक हो सकता है। जब तक सलाह न दी गयी हो, दो रसायनों को साथ-साथ नहीं मिलाना चाहिए। रसायनों को सदैव सुझायी गयी दर पर ही प्रयोग करना चाहिए। प्रयोग करने के बाद स्प्रे टैंक, बूम तथा नॉजिल को साफ पानी से अच्छी तरह साफ करना चाहिए। पूरे । खेत में चारों तरफ समान रूप से छिड़काव करना आवश्यक होता है क्योंकि यदि किसी जगह पर छिड़काव छूट जाता है तो खरपतवार को हाथ से निकालना पड़ता है जिससे खर्च बढ़ता है। या दुबारा छिड़काव करना पड़ता है जिससे महंगे रसायनों की बर्बादी होती है। सभी खरपतवारनाशी और कीटनाशी खतरनाक होते हैं। इससे बचने के लिए निम्नलिखित सुरक्षा और सावधानियों का पालन करना चाहिए। मिट्टी की सतह पर फ्लैट फैन नॉजिल के साथ मल्टी नॉजिल से छिड़काव करना सर्वश्रेष्ठ तरीका होता है। ओवरलैप से बचाव के लिए बूम को सही ऊँचाई (लगभग 50 सेमी) पर रखना चाहिए। (अंकुरण पूर्व के लिए मिट्टी की सतह लक्ष्य है तथा अंकुरण के बाद के लिए खरपतवार लक्ष्य हैं। छिड़काव करने से पहले ध्यान देने योग्य बातें- छिड़काव करने से पहले बूम को खरपतवार के शीर्ष से 50 सेमी ऊपर रखना चाहिए। खरपतवारनाशी का छिड़काव करते समय दस्तानें, सांस लेने कामास्क तथा चश्मा पहनना चाहिए। छिड़काव करते समय सुरक्षात्मक कपड़े पहनना चाहिए। (उदाहरणके लिए धुले हुए उर्वरक के बोरे से बने हुए) (i) बुआई पूर्व खरपतवारनाशिया धान की सीधी बुआई के तहत धान की बुआई से पहले खेत में मौजूद खरपतवार को नष्ट करने के लिए ग्लाइफोसेट (1.0कि.ग्रा. सक्रिय तत्व/हे. या 1 प्रतिशत का घोल) तथा पेराक्वेट (0.5कि.ग्रा. ए.आई./हे. या 0.5 प्रतिशत का घोल ) का प्रयोग करना चाहिए। यदि खेत में बारहमासी खरपतवारों का संक्रमण है तो पेराक्वेट के बजाय ग्लाइफोसेट का प्रयोग करना चाहिए।छिड़काव करते समय वस्त्रों द्वारा सुरक्षा कृइन वस्त्रों को खाद के खाली धुले हुए बोरे से बना सकते हैं (ii) फसल की बुआई के बाद ध्यान देने योग्य बातें- अंकुरण के पूर्व खरपतवारनाशी का प्रयोग करने से पहले मिट्टी नमी होना आवश्यक होता है। मिट्टी नम नहीं हो तो अंकुरण के बाद प्रयोग वालेखरपतवारनाशी का प्रयोग करने के 24 घंटे बाद सिंचाई करें। खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए कई प्रकार की खरपतवारनाशी उपलब्ध हैं। कई स्थितियों में खरपतवार के प्रभावी नियंत्रण के लिए खरपतवारनाशियों को सीधी बुआई के तुरन्त बाद या बुआई के 3 दिन बाद तक प्रयोग करना चाहिए। उसके बाद अंकुरण के पश्चात प्रयोग होने वाले खरपतवारनाशी का बुआई के 15-20 दिन बाद प्रयोग करना चाहिए। आमतौर पर अंकुरण पूर्व पेंडीमेथलीन या ऑक्जाडायर्जिल का प्रयोग होता है। और इसके बाद अंकुरण के पश्चात या बुआई के 15-25 दिन बाद बिस्पाइरीबैक सोडियम या अजिमसल्फ्यूरॉन या बिस्पाइरीबैक सोडियम + अजिमसल्फ्यूरॉन का प्रयोग कर सकते हैं। जिन खेतों में बुआई के तुरन्त बाद खरपतवारनाशी का प्रयोग सम्भव नहीं हो उस स्थिति में खरपतवारनाशी का प्रयोग बुआई के 15 दिन बाद करना चाहिए। फसल में उगे हुए। खरपतवारों के आधार पर ही खरपतवारनाशी का चुनाव करें।खरपतवारनाशी की सिफारिस किये गये समय पर ही करें । खरपतवारनाशी के छिड़काव के पहले प्रति एकड़ लगने वाले पानी का अन्दाजा लगा लें । आमतौर पर खरपतवारनाशी के लिए 125-135 लीटर पानी प्रति एकड़ प्रयोग होता है। खरपतवारनाशी के प्रयोग के बाद पानी की कमी न होने दें। सूखी मिट्टी पर अंकुरण पूर्व खरपतवारनाशी प्रयोग न करें यदि जरूरी हो तो पहले सिंचाई करें अंकुरण के पश्चात वाले खरपतवारनाशी के प्रयोग के बाद पानी की कमी न होने दें भौतिक नियंत्रण इस विधि से खरपतवारों का हाथ से निराई-गुड़ाई या यांत्रिक विधि से नियंत्रण किया जा सकता है। श्रमिकों की कमी तथा बढ़ती हुई श्रमिकों की मजदूरी के कारण खरपतवारों का पूरी तरह से हाथ से निराई करना आर्थिक रूप से असंभव होता है। लेकिन जो खरपतवार खरपतवारनाशियों के प्रभाव से नियंत्रित नहीं हो पाते वहां एक या दो निराई करना अनिवार्य होता है। इससे खरपतवारों का बीज बनने से रोका जा सकता है। मशीन से चलने वाले कोनोवीडर जैसे यंत्र काफी मात्रा में उपलब्ध हैं। ये यंत्र समन्वित खरपतवार प्रबंधन श्रमिकों की समस्या हेतु काफी प्रभावक साबित हो सकते हैं। सतह पर अवशिष्ट को बनाये रखना बिना जुताई की प्रणालियों में मिट्टी की सतह पर फसल के अवशेष बनाये रखना चाहिए। जिससे खरपतवार को दबाने में भी सहायता मिलती है। कीट और बीमारियां धान के सूत्रकृमि धान के सूत्रकृमि (सीरियल सिस्ट नेमाटोडस मतमंस बलेज दमउंजवकमेद्ध ज्यादातर हल्की व सूखी मिट्टी में पाये जाते हैं।शुरुआत में खेत के छोटे-छोटे भागों में सूत्रकृमि के प्रकोप के कारण पौधों का विकास थम जाता है तथा वे पीले पड़ जाते हैं। और कल्लों की संख्या कम हो जाती है। लगातार एक ही खेत में धान की सीधी बुआई करने से सूत्रकृमि की समस्या के बढ़ने की सम्भावना रहती है। अतः ऐसी जमीन पर जहां सूत्रकृमि की समस्या दिखना शुरू हो गया हो वहां धान की सीधी बुआई को नहीं करना चाहिए। कीड़े मकोड़े और कीट प्रबंधन धान के खेत में लगने वाले कीटों और उनको नियंत्रित करने के लिए रसायनों को तालिका 5 में क्रमबद्ध किया गया है। तालिका 1. पूर्वी गंगा के क्षेत्रों में धान की सीधी बुआई के लिए उपयुक्त विशिष्ट प्रजातियां। प्रजातियां अवधि (दिन) उपज संभावित (ट/हे.) नाइट्रोजन की जरूरत (कि.ग्रा./हे.) बाली निकालने में लगा दिन क्षेत्र/स्थिति प्रजातियां पूर्वी उत्तर प्रदेश सहभागी धान 110-115 4.0-5.0 80 85-90 वर्षा पर निर्भर तराई और उपरिवार भूमि एन.डी.आर -359 125-130 6.0-6.5 80 90-95 वर्षा पर निर्भर उपरिवार भूमि और तराई सांभा महसूरी (बी. पी.टी. 5204) 140-145 5.0–6.0 100 100-110 सिंचित और अनुकूल तराई मोती 145 5.0 100 110 सिंचित तराई स्वर्णा (एम.टी.यू. 7029) 155–160 6.5-7.0 120 115-120 सिंचित और अनुकूल तराई स्वर्णा-सब-1 155-160 6.0-6.5 100 115-120 बाढ़ संभावित नेपाल के समीपवर्ती जिले बिहार प्रभात 90.95 4.0-4.5 100 60-65 वर्षा पर निर्भर तराई के अनेक फसल पैदा करने वाले क्षेत्र सहभागी धान 110-115 4.0-4.5 80 85-90 वर्षा पर निर्भर तराई और ऊपरी भूमि (औरंगाबाद,जमुई,नवादा और गया) राजेन्द्र भगवती एवं सत्यम 125-130 4.0-4.5 100 90-95 सिंचित मिडलैंड और तराई सिंचित मिडलैंड एम.टी.यू. 1001 130-135 4.5-5.0 100 95-100 सिंचित मिडलैंड राजश्री 115-120 5.0-5.5 140-145 90 सिंचित और वर्षा पर निर्भर तराई स्वर्णा (एम.टी.यू. 7029) 155–160 6.0–6.5 120 115-120 सिंचित तराई और अनुकूल तराई स्वर्णा- सब. 1 155–160 6.0-6.5 100 115-120 नेपाल के सीमावर्ती जिले (मधुबनी, सीतामढ़ी, पूर्वी चम्पारण) राजेन्द्र महसूरी-1 155–160 5.0 100 115-120 तिरहुत क्षेत्र संकर प्रजाति (पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार) अराइज़ 6129 115-120 5.6-6.0 120 90-95 सिंचित और वर्षा पर निर्भर तराई अराइज़ 6444 135-140 6.5-7.0 120 105-110 सिंचित और वर्षा पर निर्भर तराई अराइज 6444 गोल्ड 135-140 6.0-6.5 120 105-110 सिंचित और वर्षा पर निर्भर तराई अराइज़ प्राइमा (एच.आर.आई. 157) 140-145 6.0-6.5 120 110-115 सिंचित और वर्षा पर निर्भर तराई पी.एच.बी. - 71 130-135 6.5-7.0 120 105-110 सिंचित और वर्षा पर निर्भर तराई अराइज़ धानी 140-145 5.5-6.0 120 110-115 सिंचित और वर्षा पर निर्भर तराई तालिका 2. पूर्वी गंगा के क्षेत्रों में धान के आम खरपतवार घास चौड़ी पत्ती नरकट वानस्पतिक नाम स्थानीय नाम वानस्पतिक नाम स्थानीय नाम वानस्पतिक नाम स्थानीय नाम बारकियारिया रेप्टेन्स पारा घास, भूसी आलटेनान्थेरा सेसैलिस डाभी साइप्रस डिफमिस मोथा साइनोडोन डेक्टैलोन दूब केसूलिया आक्सीलारिज - साइप्रस इरिया मोथा डक्टाईलोक्टिनियम अनिप्सियम मकरा सीलोसिया आरजेन्टिया सुमरी साइप्रस रोटन्डस मोथा इकाईनोक्लोआ कोलोना सांवक, सांवा कोमेलीना बेघालेन्सिस कंकवा, कन्ना फिनब्रिस्टाइलिस मिलाएसी झिरुआ इकाईनोक्ला क्रस–गल्ली बराता मस्ता कुकुमिस एसपीपी घुमरी फिनब्रिस्टाइलिस क्विंक्वांगुलारिस छोटी डीली इल्युसिन इन्डिका बलराजा डाईजीरिया आरवेन्सिस जुखुना इराग्रोस्टिस टेनेला चीना घास, सिहुल एक्लिप्टा प्रोस्टेटा जलभंगरा, भंग्रेया आईस्केमम रुगोसम कांकी फाइसालिस मिनिमा भटकुइयां स्टेलेरिया मिडिया बुचबुचा ऑक्सालिस कोर्निक्युलटा तालिका 3. पूर्वी गंगा के क्षेत्रों में धान की सीधी बुआई में खरपतवार के नियंत्रण के लिए उद्गमन के बाद के प्रमुख नाशक एवं आर्दमन पूर्व के शाकनाशी शाकनाशी (सक्रिय संघटक, ए. आई) उत्पाद(व्यापारिक) नाम संक्रेन्द्रण (जी.ए आई./हे.) उत्पाद मात्रा((जी./हे यामिली/हे) उपयोग समय (डी.ए. एस.) लाभ हानि नाशक/गैर चयनित ग्लाइफोसेट राउण्ड़ अप 1,000 2,500 मिली - अधिकांश घासों, कुछ बड़ी पत्तियों और सालाना नरकुट पर अच्छा नियंत्रण आइपोमिया टिलोबा और कोमेलिना कम प्रभावी पेराक्वेट ग्रामोक्सोन 500 2,000 मिली - अधिकांश घासों, कुछ बड़ी पत्तियों और सालाना नरकुट पर अच्छा नियंत्रण - उद्गमन पूर्व पेंडीमैथालिन स्टॉम्प/स्टॉम्प एकस्ट्रा 1,000 3,330 मिली 2,580 मिली 1-3 अधिकांश घासों, कुछ बड़ी पत्तियों और सालाना नरकुट पर अच्छा नियंत्रण।अवशिष्ट पर नियंत्रण रखता है। इसकी गतिविधि के पर्याप्त नमी आवश्यक आग्जाडायर्जील टॉपस्टार 90 112.5 ग्राम 1-3 घासों, बड़ी घासों और सालाना नरकुट के विस्तृत श्रेणी का खरपतवार का नियंत्रण। अवशिष्ट पर नियंत्रण रखता है। इसकी गतिविधि के पर्याप्त नमी आवश्यक तालिका 4. पूर्वी गंगा के क्षेत्रों में धान की सीधी बुआई में खरपतवार नियंत्रण के लिए उद्गमन के बाद के प्रमुख खरपतवारनाशी। खरपतवारनाशी (सक्रिय संघटक, ए. आई) उत्पाद(व्यापारिक) नाम संक्रेन्द्रण (जी.ए आई./हे.) उत्पाद मात्रा((जी./हे यामिली/हे) उपयोग समय (डी.ए.एस.) लाभ हानि उद्गमन के पश्चात् बिस्पाइरीबैक सोडियम नामिनी गोल्ड/ एडोरा 25 250मिली 15-25 घासों, बड़ी पत्तियों और बारहमाशी नरकुट के विस्तृत श्रेणी का खरपतवार कानियंत्रण। एचिनोक्लोआ का अच्छा नियंत्रण। लेप्टोक्लोआचाइनेसस, डेक्टीलोक्टेनिमएजिप्टिम, एलेयुसिनइंडिका,एराग्नोस्टिसप्रजातियों सहितएचिनोक्लोआ के अलावा अन्य घासोंपरकमजोर।कोईअवशिष्टनियंत्रणनहीं। पेनोक्सुलम ग्रेनाइट 22.5 93.75 मिली 15-20 घासों, बड़ी पत्तियों और बारहमाशी नरकुट के विस्तृत श्रेणी का खरपतवार का नियंत्रण एल. चिनेंसिस, ई इंडिका एराग्रोस्टिस प्रजातियों सहित एचीनोक्लोवप्रजातियों के अलावाअन्य घासों पर कमजोर फिनोक्साप्रोप- इथायल + सेफेनर राइस स्टार 60-90 870-1,300 मिली 15-20 बरहमासी घासदार खरपतवार का अच्छानियंत्रण,धानकीप्राम्भिकअवस्था में सुरक्षित बड़ी पत्तियों और नरकुट पर नियंत्रण नहीं एजिमसलफ्यूरोन सेग्मेंट 17.5-35 35.70 ग्राम 15-20 घास,बड़ी पत्तियों और नरकट की विस्तृत श्रेणी का नियंत्रण। साइपेरस रोटुंडस सहित नरकुट का अच्छा नियंत्रण। एचीनोक्लोआ प्रजातियों परकमजोर इथोक्सीसल्फ्यूरॉन सनराइज 18 120 ग्राम 15-20 बड़ी पत्तियों और सालाना नरकुट पर प्रभावी घास पर नियंत्रण नहीं करता है तथा बारहमासी नरकुट पर कमजोर 2,4-डी इथायल ईस्टर वीडमार 500 1,250 मिली 15-25 बड़ी पत्तियों और सालाना नरकट पर प्रभावी।अवशिष्ट का कोई नियंत्रण नहीं। घास पर नियंत्रण नहीं करता है। काफ्रेन्ट्राजोन एफिनिटी 20 50 ग्राम 15-20 बड़ी पत्तियों के खरपतवार पर प्रभावी।अवशिष्ट पर कोई नियंत्रण नहीं। घास पर नियंत्रण नहीं करता है। क्लोरीमर्न + मेटसल्फ्यूरॉन एल्मिक्स 4 (2 + 2) 20 ग्राम 15-25 बड़ी पत्तियों और सालाना नरकुट पर प्रभावी घासदार खरपतवार पर नियंत्रण तथा सी. रोटुंडस पर कमजोर बिस्पाइरीबैक सोडियम + एजीमसल्फ्यूरॉन 25 + 17.5 250 मिली + 35 ग्रा 15-25 घास, चौडी पत्तियोंऔर साइपेरस रोटुंडस सहित नरकट की विस्तृत श्रेणी के खरपतवार का नियंत्रण एचिनोक्लोआ प्रजातियों के अलावा अन्य घासों पर कमजोर बिइस्पाइरीबैक सोडियम +पायराजोसल्फ्यूरॉन - 25 + 25 250 मिली + 250 ग्राम 15-20 घास, चौड़ी पत्तियों औरसाइपेरस रोटुंडस सहित नरकट की विस्तृत श्रेणी के खरपतवार का नियंत्रण एचिनोक्लोआ प्रजातियों के अलावा अन्य घासों पर कमजोर फिनोक्साप्रोप +एथाक्सीसल्फ्यूरॉन - 60 + 18 645 मिली+ 120 ग्राम 15-25 घास, चौड़ी पत्तियों और साइपेरस रोटुंडस सहित नरकट की विस्तृत श्रेणी के खरपतवार का नियंत्रण।एल. चिनेसिस और डी. एजिप्टिम सहित सभी प्रमुखघासों का प्रमुख नियंत्रण बारहमासी नरकट जैसे सी. रोटुंडस पर कमजोर। प्रोपेनिल +पेंडीमेथालीन - 4,500 + 1,000 12,850 मिली +3,333 मिली 10-12 अवशिष्ट प्रभावों के खरपतवार का नियंत्रण बारहमासी नरकट जैसे सी. रोटुंड्स पर कमजोर। *उत्पाद के अनुमोदन का संकेत नहीं करता है। तालिका 5. धान के आम कीड़े-मकोड़े और रासायनिक उपचार रोग का नाम आक्रमण का समय रासायनिक नाम और प्रोडक्ट की खुराक (कि.ग्रा./हे. ग्राम/हे. या मिली/हे.) कीट पीला स्टेम बोरर जुलाई से अक्टूबर कार्टेप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी (18.75कि.ग्रा.), फिप्रोनिल 0.3 जी (18.75कि.ग्रा.), मोनोक्रोटोफास 36 जीएल (1,250 मिली), ट्रियाजोफॉस 40 ईसी (875 मिली). क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी (18.2,500 मिली) लीफ फोल्डर अगस्त से अक्टूबर मोनोक्रोटोफास 36 एसएल (500 मिली), टियाजोफॉस 40 ईसी (875 मिली) क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी (1,000 मिली) पत्ती और प्लांट हूपर जुलाई से अक्टूबर बूप्रोफेजीन 25 ईसी (825 मिली), इमिडाक्लोप्रिड 17.8एसएल (125 मिली),डाइक्लोर्वोस 76 ईसी (1,000 मिली), थियमेथोक्सम 25 डब्ल्यूजी (100 ग्राम), क्विनलफॉस 25 ईसी. (2,000 मिली) आर्मी कट वॉम - मेथाइल पेराथियान (25कि.ग्रा.), क्विनलफॉस 25 ईसी (1,000 मिली) जड़ धुन जुलाई से सितम्बर फोरेट 10 जी (10कि.ग्रा.) बीमारियां पत्तियों पर सूखे धब्बे जुताई से फूल निकलने तक प्रोमिकोनाजोल 25 ईसी (500 मिली), जिनेब (1-1.25कि.ग्रा.) शीथ ब्लाइट - हेक्साकोनाजोल 5 ईसी (1,000 मिली), काबेंडाजिम 50 डब्ल्यूपी (500 ग्राम), प्रोपिकोनाजोल 25 ईसी (500 मिली) फाल्स स्मट - कॉपर आक्सीक्लोराइड 50 डब्ल्यूपी (1,250 जी), प्रोपिकोनाजोल 25 ईसी (500 मिली), टेबुकोनाजोल 25 ईसी (600 मिली) बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट रोपाई के ठीक बाद प्रतिरोधक किस्में उपयोग करें तथा अधिक मात्रा में पानी और नाइट्रोजन वाले उर्वरकया कॉपर ऑक्सीक्लोराइड + स्ट्रेप्टोसाइक्लीन (1250 + 15 जी) इकट्ठा न करें। प्रकोप अधिकतम जुताई काबेंडाजिम 50 डब्ल्यूपी (500 ग्राम), ट्रिसाइक्लाजोल 75 डब्ल्यूपी (300 ग्राम) इसे 5 लीटर पानी में घोलें फिर इसे 50कि.ग्रा. बालू के साथ मिलाएं तथा कम नमी से अधिक पानी वाली जगहों में एक समान फैलाएं। स्त्रोत: दक्षिण एशिया के लिए खाद्यान प्रणाली की पहल