प्रस्तावना भारत में धान-गेहूँ फसल चक्र की टिकाऊ सघनता और उन्नत सस्य प्रबन्धन क्रियाओं को अपनाने जैसे कि समय से बुआई आदि में जीरो टिलेज तकनीकी की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। लगभग दो दशक पूर्व किसानों की लागत कम करने और रबी फसलों की बुआई में शीघ्रता लाने के लिए जीरो टिलेज तकनीकी को अपनाया गया था। समय के साथ-साथ धान-गेहूँ फसल चक्र में संरक्षित खेती की अवधारणा का प्रचलन हुआ। सिन्धु-गंगा के पूर्वी मैदानों में जीरो टिलेज तकनीकी फसल प्रणाली में उत्पादकता बढ़ाने के सार्थक अवसर प्रदान करने में सहायक हुई है। धान-गेहूँ फसल चक्र में अभी भी गेहूं की बुआई के लिए अधिकतर किसान धान के अवशेषों (पुराल) को खेत से जल्दी हटाने के लिए जलाते हैं। जबकि वर्तमान में जीरो टिलेज मशीन में सुधार किये गये हैं। जिससे कि ज्यादा फसल अवशेषों में भी गेहूं की बुआई की जा सके, इसके लिए हैप्पी सीडर मशीन है जिससे कि गेहूं की बुआई फसल अवशेष 8-10 टन/हे० होने पर भी आसानी से की जा सकती है और खेत में ये फसल अवशेष खरपतवारों को उगने से रोकने में भी सहायक होते हैं। अधिकतम संख्या में सेवा प्रदाता बनाकर छोटे और मध्यम किसान, जिनके पास संसाधनों की कमी है तथा जो महंगी मशीनें खरीदने में असमर्थ हैं वह भी किराये की मशीन से बुआई कराकर इस तकनीकी को अपना सकते हैं। परम्परागत जुताई खेती की परम्परागत विधि में विभिन्न तरीकों से जुताई करके खेत को बुआई के लिए तैयार किया जाता है जिससे कि बीज उचित गहराई पर सही नमी में बोया जा सके। जुताई के बाद फसलों की बुआई छिड़कवाँ विधि से भी की जाती है। खेत की तैयारी के बाद बैलों से चलने वाले हल, सीड ड्रिल या हाथ से चलाये जाने वाले यंत्रों से बीज को बोया जाता है। जिसके परिणामस्वरूप बीज का समान रूप से जमाव होता है। प्रायः इस विधि में गहन जुताई की आवश्यकता होती है। साथ ही पिछली फसल के अवशेषों को उर्वरकों के साथ मिट्टी में मिला दिया जाता है। खेत में पिछली फसल के अवशेष होने की स्थिति में बुआई की मशीन चलाने में फसल अवशेष बाधा उत्पन्न करते हैं। जुताई से इस समस्या का कुछ हद तक अस्थाई समाधान तो हो जाता है तथा इस समस्या के कारण किसान वर्तमान में जुताई करने के लिए रोटावेटर का प्रयोग करने लगे हैं परन्तु इसके प्रयोग से मिट्टी की अधोसतह में सख्त तह बनने से खेत में पानी रुकने लगता है और गेहूं में पहली सिंचाई के बाद पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं। रोटावेटर के बढ़ते प्रचलन से बुआई के लिए किसान छिड़कवाँ विधि का प्रयोग करते हैं जो उस समय बोई जाने वाली फसल की अन्य क्रियाओं के लिए हानिकारक है क्योंकि यह उचित फसल ज्यामिती के अनुकूल नहीं है। पारम्परिक जुताई से मशीनों की घिसावट के साथ-साथ ईंधन की खपत के बढ़ने से कृषि लागत में बढ़ोत्तरी, फसल की बुआई में देरी, पैदावार में कमी तथा ग्रीन हाउस गैसों (CO,) का भी उत्सर्जन बढ़ता है। साथ ही मृदा में जीवाष्म पदार्थों की भी कमी होती है। फसल अवशेषों की अनुपस्थिति में भूमि को खुला छोड़ने से मृदा कटाव में बढ़ोत्तरी होती है। जीरो टिलेज जीरो टिलेज (बिना जुताई के सीधी बुआई) विधि का अर्थ फसल को बिना जुताई किये एक बार में ही जीरो टिलेज मशीन द्वारा फसल की बुआई करने से है। इस विधि को जीरो ट्लि, नो ट्रिल या सीधी बुआई के नाम से भी जाना जाता है। सामान्य भाषा में इस विधि के अन्तर्गत पिछली फसल के 30 से 40 प्रतिशत अवशेष खेत में रहने चाहिए। जीरो टिलेज उत्पादन में सुधार करती है तथा साथ ही मजदूरी, पूंजी, रासायनिक खाद एवं पानी की बचत करती है। जीरो टिलेज मशीन ट्रैक्टर से चलने वाली मशीन है जो कि बीज एवं उर्वरकों को बिना खेत तैयार किये एक साथ बुआई करती है। इसका प्रयोग दूसरी फसलों जैसे कि धान, मसूर, चना, मक्का इत्यादि की बुआई में भी कर सकते हैं। जीरो टिलेज मशीन का प्रयोग छोटी खेती में भी दो पहिया ट्रैक्टर की सहायता से सफलतापूर्वक किया जा सकता है। आज के परिवेश में संसाधन संरक्षण तकनीकी पर आधारित जीरो टिलेज तकनीकी सिन्धु-गंगा के पूर्वी मैदानी क्षेत्रों में फैली हुई है। जीरो टिलेज तकनीकी एक स्थाई फसल सघनता पर आधारित सफल फसल प्रबन्धन प्रणाली है जो विशेष रूप से दक्षिण एशिया में छोटे किसानों के लिए लाभदायी है। यह किसानों को स्थाई उत्पादन प्राप्त करने में सहायक हुई है। दक्षिण एशिया के किसानों को कम जमीन (सीमित संसाधन) में अपने प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग एवं पर्यावरण को कम प्रभावित करने वाली तकनीकियाँ अपनाकर और अधिक उत्पादन लेना पड़ेगा। ज़ीरो टिलेज क्यों अपनाएँ आने वाले समय में दक्षिण एशिया के किसानों को अपने प्राकृतिक संसाधनों का अधिक एवं कुशल उपयोग कर पर्यावरण को संरक्षित करते हुए अधिक उत्पादन लेना होगा। परम्परागत तरीकों को छोड़कर जीरो टिलेज से कम खर्चे में ज्यादा पैदावार ले सकते हैं। जीरो टिलेज का इतिहास अवधि विकास के चरण 18000 बी.सी. लकड़ी से भूमि में छेद बनाकर बुआई, जीरो टिलेज की एक पुरानी विधि 6000 बी.सी. जुताई के लिए पशुओं का प्रयोग 3000 बी.सी. लोहे से बने यंत्रों का प्रयोग 1100 ए.डी. मिट्टी पलटने वाले हल 1800 के मध्य लोहे के मिट्टी पलटने वाले हल 1900 के प्रारम्भ में ट्रैक्टर का उपयोग 1940-50 न्यूनतम जुताई, खरपतवार नियंत्रण के लिए जैसे-2,4-डी और एट्राजिन का प्रयोग 1960 बिना जुताई बीज बोने की मशीन का विकास (प्रथम जीरो टिल किसानः हैरी यंग, कैन्टिकी) 1970 ICI कम्पनी द्वारा पैराक्वाट का जीरो टिलेज के साथ प्रयोग 1970 के अंत तक भारत में जीरो टिलेज के 1990 के प्रारम्भ तक असफल प्रयास एवं परिक्षण। 1990 के मध्य और 2000 के प्रारम्भ भारत में जीरो टिलेज का विकास और अंगीकरण खेती जीरो टिलेज तकनीकी संरक्षित खेती की दिशा में एक प्रारम्भिक शुरुआत थी। संरक्षित खेती का उद्देश्य संसाधनों के संरक्षण व समुचित उपयोग से है। इस पद्धति से प्राकृतिक संसाधनों जैसे मिट्टी, पानी, जैविक पदार्थों के साथ उपादानों का समन्वित उपयोग करने से है जैसे कि बीज, उर्वरक, ईंधन, पानी आदि का एकीकृत व समुचित उपयोग करना है। इस प्रणाली के माध्यम से पर्यावरण के संरक्षण के साथ-साथ टिकाऊ खेती सम्भव है। संरक्षित खेती के तीन मुख्य सिद्धान्त हैं – न्यूनतम 30 प्रतिशत फसल अवशेषों को भूमि की सतह पर छोड़ना। भूमि की कम से कम जुताई। फसल विविधीकरण व उपयुक्त फसल चक्र अपनाना। हैप्पी सीडर-जीरो टिलेज आधारित दक्षिण एशिया में कम्बाइन से धान की कटाई के बाद इनवर्टिड-टी वाली जीरो टिलेज मशीन से गेहूं की बुआई करते समय फसल के अवशेषों के फसने की समस्या आती थी। इसलिए जीरो टिलेज मशीन में क्रमबद्ध तकनीकी सुधार कर हैप्पी सीडर का निर्माण किया गया है। इसके प्रयोग से धान की कटाई के बाद सम्पूर्ण फसल अवशेष (पुराल) में गेहूं की सीधी बुआई आसानी से की जा सकती है। फसल के बीज को अच्छी तरह से बुआई तथा उर्वरकों का सही स्थापन करने के लिए हैप्पी सीडर का प्रयोग करना उपयुक्त है। फसल अवशेष प्रबन्धन के विभिन्न विकल्प इस प्रकार हैं। फसल अवशेषों को आंशिक रूप से जलाया जा सकता है जो कि वर्तमान में परम्परागत खेती में हो रहा है। हैप्पी सीडर से धान की फसल की कटाई के बाद 100 प्रतिशत फसल अवशेषों में रबी फसलों की बुआई कर सकते हैं। कम्बाइन हार्वेस्टर में फसल अवशेष फैलाने वाला उपकरण (Residue spreader) लगा लेने से धान के पुराल को समान रूप से फैलाने की व्यवस्था कर लेने से हैप्पी सीडर चलाने में आसानी होती है। स्ट्रिप टिलेज स्ट्रिप टिलेज विधि में गेहूं की बुआई में केवल बोने वाली पंक्ति को ही तैयार किया जाता है तथा इसके प्रयोग से बुआई के लिए 1/3 भाग भूमि की जुताई की जाती है। बुआई के लिए प्रयोग होने वाले उपकरणों को कोल्टर, रोटो ट्लिर्स और विशेष रूप से स्ट्रिप ट्लिर और रोटिल के नाम से भी जाना जाता है। इसमें बुआई होने वाली दो पंक्तियों के बीच की भूमि बिना जुताई के रहती है। सतही बुआई सतह पर बुआई जीरो टिलेज की सबसे साधारण विधि है। इसमें बिना जुताई किये बीज का सतह पर छिड़काव कर दिया जाता है। पूर्वी भारत, बंग्लादेश और नेपाल के किसान दाल, तिलहन और कभी-कभी गेहूं की फसल को इस विधि द्वारा लगाते हैं। गेहूँ का बीज धान की फसल पकने से पहले खड़ी फसल में छिड़क दिया जाता है। जिसको रिले क्रोपिंग, उटेरा, पैरा क्रोपिंग इत्यादि नाम से जाना जाता है। रिड्यूस्ड ट्रिलेज यह दो पहियों वाले ट्रैक्टर के पीछे चलने वाली मशीन है जिसमे कम गहराई तक जुताई करने वाला रोटावेटर लगा होता है तथा पिछली तरफ बीज की बुआई के लिए 6 फार लगे होते हैं और बुआई के बाद खेत को समतल करने के लिए एक रोलर भी लगा होता है। इस मशीन से भारी मिट्टी और खड़े फसल अवशेषों में भी बुआई की जा सकती है। रिड्यूस्ड टिलेज में खेत को एक बार हल्की जुताई के बाद गेहूं की बुआई करते हैं। इसके लिए ट्रैक्टर से खेत को तैयार करके एक ही बार में बुआई कर देते हैं। जीरो ट्रिलेज और रिड्यूस्ड टिलेज में यह अन्तर है कि रिड्यूस्ड ट्रिलेज में जमीन की हल्की जुताई होती है। यद्यपि इस विधि में परम्परागत जुताई की अपेक्षा खेत को एक बार हल्की जुताई कर सीड ड्रिल से बुआई कर दी जाती है। संरक्षित जुताई संरक्षित जुताई का अभिप्राय सामूहिक रूप से जीरो टिलेज, नो-टिलेज, डायरेक्ट ड्रिलिंग, मिनिमम टिलेज को ही एक दूसरे के पर्याय के रूप में प्रयोग करते हैं। पिछली फसल के न्यूनतम 30 प्रतिशत अवशेषों के साथ जीरो टिलेज का प्रयोग जमीन की न्यूनतम या बिना जुताई के साथ बीज की बुआई को संरक्षित जुताई कहते हैं। यद्यपि इस प्रशिक्षण मॉड्यूल का उद्देश्य पूरी फसल प्रणाली में जुताई नहीं करते हुए वर्ष में उगायी जाने वाली सभी फसलों की बिना जुताई के बुआई करने से है न कि किसी एक फसल से। फसल अवशेष प्रबन्धन फसल अवशेष प्रबन्धन का तात्पर्य प्रत्येक वर्ष होने वाली फसल प्रणाली में सभी फसलों के अवशेषों का उचित प्रबन्धन करने से है। जिसकी शुरुआत उन फसलों के चुनाव से है जो कि तुलनात्मक ज्यादा मात्रा में फसल अवशेष पैदा करती हैं। फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन के लिए कम फसल अवशेष वाली फसलों के बाद आच्छादित फसलें जैसे कि मूंग आदि को शामिल किया जा सकता है। फसल अवशेष प्रबन्धन में खेती सम्बन्धी वे सभी क्रियाएं शामिल हैं जिनसे अवशेषों की मात्रा, उसका अभिविन्यास और वितरण से पूरे वर्ष का फसल चक्र प्रभावित होता है। उनके सड़ने-गलने से जमीन के कार्बनिक पदार्थ, जलधारण क्षमता, मृदा सघनता और विद्युत-चालकता में सुधार होता है। फसल अवशेष प्रबन्धन मृदा तापमान, नमी संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण तथा कीट प्रबन्धन को प्रभावित करता है। फसल अवशेषों का महत्व तब और भी अधिक बढ़ जाता है जब कटाई के तुरन्त बाद अगली फसल की बुआई करते हैं। यद्यपि सिन्धु-गंगा के मैदानों में अभी तक सीधे प्रमाण उपलब्ध नही हैं कि धान की पुराल को सड़ने से पैदा होने वाले फाइटोटॉक्सीन से गेहूं व अन्य फसलों की पैदावार पर बुरा प्रभाव पड़ता है। धान-गेहूँ फसल प्रणाली में उपज वृद्धि पर फसल अवशेषों के प्रभाव से सम्बन्धित और अधिक अनुसंधान की आवश्यकता है। जीरो टिलेज विधि का और अधिक लाभ लेने के लिए पुराल को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर जमीन पर समान रूप से फैलाना चाहिए। पुराल के छोटे-छोटे टुकड़ों का मशीन के फरो ओपनर (फार) में फसने का डर नहीं होता, साथ ही इनसे भूमि की सतह अच्छे से ढक जाती है। जीरो टिलेज के लिए आवश्यक सामग्री : जीरो टिलेज मशीन उर्वरक समतल खेत खरपतवारनाशी प्रशिक्षित मशीनरी चालक परम्परागत जुताई, जीरो ट्रिलेज और संरक्षित खेती का मृदा के विभिन्न कारकों पर प्रभाव कारक परम्परागत जुताई शून्य जुताई संरक्षित खेती मृदा का भौतिक स्वास्थ्य सबसे कम सुधार काफी सुधार सर्वोत्तम तरीका मृदा कठोरता कठोरता कम करने का प्रयास परन्तु जुताई से जैविक रंध्रों के बंद होने से कठोरता बढ़ती है। कठोरता को कम करता है। सही फसलों के चुनाव तथा उनके अवशेषों से मृदा कठोरता में कमी आती है। मृदा जैविक स्वास्थ्य सबसे कम सुधार उत्तम मृदा जैविक स्वास्थ्य स्वस्थ तथा विविध जैविक गुण जमीन में पानी का रिसना कमी, मिट्टी का कम रन्ध्रमय होना पानी का अच्छा अवशोषण पानी का सर्वोत्तम अवशोषण मृदा तापमान मिट्टी की सतह के तापमान में अधिक परिवर्तन मृदा तापमान में सुधार मृदा तापमान में सुधार के लिए सर्वोत्तम सामयिकता यंत्र के संचालन में देरी होना तथा समय कम मिलना संचालन के लिए उपयुक्त होना बेहतरीन सस्य प्रबंधन क्रियाएँ बुआई का समय अच्छी उपज के लिए, गेहूँ की बुआई 1-15 नवम्बर के बीच हो जानी चाहिए। यदि बुआई 15 नवम्बर तक सम्भव नहीं है तो 25 नवम्बर तक हो जानी चाहिए। ऐसा नहीं होने से गेहूँ की पैदावार 25-30 किलोग्राम प्रति एकड़ कम हो जायेगी। बुआई की गेहूं की बुआई जीरो टिलेज मशीन से करने पर समय और संसाधन दोनों की बचत होती है। जुताई करके खेत की बुआई करने से खर्च वृद्धि एवं पैदावार में कमी होती है। गेहूं की प्रजाति HD-2733, HD-2824, HD-2967, PBW-550 और कृषि विश्वविद्यालय के संस्तुति के अनुसार अन्य उन्नत प्रजातियाँ। बीज दर यदि गेहूं की बुआई जीरो टिलेज मशीन से करते हैं तो बीज दर 40-45 किग्रा/एकड़ होनी चाहिए। बुआई से पूर्व खरपतवार प्रबंधन यदि बुआई के पहले खरपतवार हों तो इन खरपतवारों को नष्ट करने के लिए ग्लाइफोसेट @ 1.0 Kg ai/ha राउण्डअप या ग्लाइसेल का प्रयोग 100-150 लीटर पानी में मिलाकर या 1.0-1.5 प्रतिशत घोल के अनुसार 10-15 मि.ली. राउण्डअप या ग्लाइसेल (41%) प्रति लीटर पानी या 6-10 ग्रा० मेरा-71 (71% ग्लाइफोसेट) का अमोनियम साल्ट प्रति लीटर पानी के साथ बुआई के 2-3 दिन पहले छिड़काव कर देना चाहिए। निम्न बिन्दुओं पर ध्यान दें: खेत में जहाँ पर खरपतवार हों उन्हीं स्थानों पर ऊपर लिखित खरपतवारनाशी का प्रयोग करना चाहिए जिससे समय व लागत बचेगी। छिड़काव के लिए 3 फ्लैट - फैन बूम नोजल का प्रयोग करें। यदि 3 फ्लैट - फैन बूम नोजल उपलब्ध नहीं है तो कट नॉजिल का प्रयोग करना चाहिए। खरपतवारनाशी के छिड़काव के लिए कभी भी शंकु आकार नॉजिल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इस खरपतवारनाशी का प्रयोग गेहूं की बुआई के बाद कभी भी नहीं करना चाहिए। उर्वरकों की मात्रा-(प्रति एकड़): बुआई के समय 50 किग्रा डी.ए.पी. (जीरो टिलेज मशीन में प्रयोग के लिए) 32 किग्रा एम.ओ.पी. एवं 8-10 किग्रा जिंक सल्फेट (हाथ से छिड़काव हेतु) पहली सिंचाई के समय 42 किग्रा यूरिया (हाथ से छिड़काव हेतु) दूसरी सिंचाई के समय 42 किग्रा यूरिया (हाथ से छिड़काव हेतु) यदि गेहूं की बुआई दलहनी फसल के बाद हुई है तो नत्रजन का प्रयोग 25 प्रतिशत कम किया जा सकता है। यदि गेहूं की बुआई 30 नवम्बर के बाद हुई है तो नत्रजन का प्रयोग 25 प्रतिशत कम किया जा सकता है। मुख्य खरपतवार खरपतवारनाशी सक्रिय तत्व (ग्रा/एकड़) उत्पाद (ग्रा/एकड़) मिश्रित खरपतवार टोटल (सल्फोसल्फ्यूरॉन + मेट्सल्फ्यूरॉन) 32 16 वेस्टा क्लोडिनोफॉप + मेट्सल्फ्यूरॉन) 64 160 ब्रॉडवे (सल्फोसल्फ्यूरॉन + काफेन्ट्राजॉन) 25 + 20 13.3 + 20 संकरी पत्ती वाले खरपतवार लीडर/सफल/फतेह (सल्फोसल्फ्यूरॉन) 25 13-3 टॉपिक (क्लोडिनोफॉप) 60 160 चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार 2, 4-डी सोडियम साल्ट 400 200 एफिनिटी (कान्ट्राजॉन) 20 20 एल्ग्रिप (मेट्सल्फ्यूरॉन) 4 8 (नोट- खरपतवारनाशी का छिड़काव बुआई के 30-35 दिन बाद 120-150 लीटर पानी में फ्लैट - फैन नॉजिल के द्वारा करना चाहिए।) यदि खेत में मिश्रित खरपतवारों के साथ मकोय भी हों तो सल्फोसल्फ्यूरॉन + कान्ट्राजॉन (ब्रॉडवे) का प्रयोग करें। सिंचाई अनुभवों के आधार पर जीरो टिलेज विधि से बुआई करने से पहली सिंचाई के समय पानी की बचत होती है। पानी खेत में तेज़ बहाव से चलता है जिससे पानी की बचत होती है। पहली सिंचाई बुआई के 20-21 दिन पर (ताज-मूल अवस्था पर) दूसरी सिंचाई बुआई के 40-45 दिन बाद (कल्ले निकलते समय)। तीसरी सिंचाई बुआई के 60-65 दिन बाद (गांठ बनते समय) चौथी सिंचाई बुआई के 80-85 दिन बाद (पुष्पावस्था के समय) पांचवीं सिंचाई बुआई के 100-105 दिन बाद (दुग्धावस्था के समय) नोट- मार्च में गेहूं की फसल को पकाव पर दाना भरते समय गर्मा (पछुआ) हवा से बचाने के लिए अतिरिक्त सिंचाई करने से दानें पुष्ट भरते हैं। ध्यान देने योग्य बातें जीरो टिलेज तकनीकी के लिए परम्परागत विधि की अपेक्षा बुआई के समय 3-4 प्रतिशत नमी अधिक होनी चाहिए। यदि जमीन सूखी या अधिक नमी युक्त है तो गेहूं का जमाव प्रभावित होता है। लम्बी अवधि की प्रजातियाँ (जैसे कि HD-2967) प्रारम्भिक वृद्धि अवस्था में अधिक कल्ले निकलने से जमीन को जल्दी आच्छादित कर लेते हैं तथा इनका यह गुण इनको खरपतवारों के साथ अधिक प्रतियोगी बनाता है। याद रहे, जीरो टिलेज बुआई में किसी भी प्रकार का पाटा लगाने की आवश्यकता नहीं होती है। गेहूं की बुआई के तुरन्त बाद सिंचाई की सिफ़ारिश नहीं है। आवश्यक हो तो बुआई के एक सप्ताह पूर्व पलेवा कर सकते हैं। बीज का मिट्टी से सही स्पर्श से अच्छा जमाव होने से गेहूं की जड़ों की भूमि से पकड़ मजबूत हो जाती है और इसके कारण फसल गिरती नहीं है। गेहूँ की बुआई के समय खरपतवारों की अधिक संख्या खेत में न हों तो खेत की जुताई या गेहूँ की क्रॉस बुआई करने की कोई आवश्यकता नहीं है। बल्कि इन विधियों से फसल का जमाव कम होने से उपज भी घटती है और मंडूसी/गेहूँ का मामा का जमाव अधिक होता है जिससे फसल की लागत बढ़ जाती है। जीरो टिलेज में बुआई करने से गेहूं का उगना वर्षा होने पर प्रभावित नहीं होता है क्योंकि जीरो टिलेज में पपड़ी नहीं बनती है। इसके विपरीत जुताई किये हुए खेत में बुआई करने पर पपड़ी बनने से फसल का जमाव प्रभावित हो सकता है। जीरो टिलेज बीज सह उर्वरक ड्रिल से उर्वरक व बीज दोनों की बुआई खेत | में विधिवत रूप से होती है। गैर चयनात्मक खरपतवारनाशी का प्रयोग बुआई से पूर्व उगे खरपतवारों को नष्ट करने के लिए करना चाहिए। जमाव के बाद खरपतवारनाशी का प्रयोग 2-3 पत्ती की अवस्था पर करना चाहिए। जीरो टिलेज के अपनाने से चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की संख्या बढ़ने का अंदेशा रहता है। अगर चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार बढ़ते हैं तो उनका नियंत्रण आसान है। इन चौड़ी पत्ती के खरपतवारों को उपयुक्त खरपतवारनाशियों जैसे कि 2, 4-डी, मेटसल्फ्यूरॉन और कार्फेन्टाजॉन से आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन हरियाणा में 1997-98 से गेहूं की फसल में लगाये गये स्थाई परीक्षणों में यह पाया गया है कि चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की संख्या अभी तक नहीं बढ़ी है। जीरो टिलेज के अपनाने से लवणीय तथा क्षारीय भूमि में उत्साहवर्धक परिणाम मिले हैं। जीरो टिलेज मशीन से गेहूं की बुआई धान के खड़े दूंठ में आसानी से कर सकते हैं। यदि खेत की सतह पर पुराल फैली हो तो इसको बुआई से पहले इकट्ठा कर लेने से बुआई में बाधा उत्पन्न नहीं होती है तथा बुआई के बाद इस पुराल को फिर से फैला देना चाहिए। जीरो टिलेज में नत्रजन और फास्फोरस उर्वरकों की मात्रा बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है। उर्वरकों की सिफ़ारिश की गयी मात्रा का प्रयोग करना चाहिए। जीरो टिलेज मशीन : पुर्जे और उनके कार्य सभी पुर्जा का संक्षिप्त विवरण ढांचा/फ्रेम जीरो ट्रिल ड्रिल का फ्रेम लगभग 200 सेमी. X 60 सेमी. आकार का होता है जिसको बनाने के लिए L आकार की दो इस्पात की पत्तियों (6.5 सेमी. X 6.5 सेमी. X 0.5 सेमी.) को वेल्डिंग करके मजबूती से जोड़ा जाता है। 11 फारों वाली मशीन में फ्रेम की लम्बाई 220 सेमी. तक होती है। पुरानी मशीनों में फार को फ्रेम में 20 सेमी. पर बने छेदों में लगाये जाने से फ्रेम कमजोर पड़ जाता था। अतः नये मॉडलों में इस कमी का सुधार करते हुए फारों को फ्रेम पर सही से बैठाने के लिए हीरानुमा/बॉक्सनुमा क्लंप लगाये गये हैं और मशीन के फ्रेम की मजबूती बढ़ाने के लिए इसको आयताकार रूप दिया गया है। इस मशीन को किसी भी 35 हार्सपावर ट्रैक्टर से आसानी से चलाया जा सकता है। विभिन्न माडलों में मशीन की ऊँचाई लगभग 110-145 सेमी तथा वजन 200-260 किग्रा तक हो सकता है और कुछ माडलों का वजन 350 किग्रा तक भी हो सकता है। फार जीरो टिल बीज एवं खाद ड्रिल में विभिन्न ब्रांड की मशीनों में उल्टी टी आकार की 9 से 13 फार होती है इनके बीच की दूरी को विभिन्न फसलों बुआई के लिए आवश्यकतानुसार समायोजित किया जा सकता है। ये उल्टी-टी आकार की फार बुआई के लिए 3 से 5 सेमी. चौड़ी नाली/कँड़ बनाते हैं। बुआई के लिए खेत में कैंड/नाली बनाने के लिए फारों में जमीन को काटने वाले सामने के भाग को 8 मिमी. मोटे उत्तम कार्बन इस्पात के टुकड़े को नरम इस्पात से बनी प्लेट के साथ जोड़कर (वेल्ड) बनाया जाता है। फारों में कटाई करने वाले भाग के सामने और नीचे वाले भाग पर कार्बन इस्पात (कठोरता 65 आर.एच.एन.) का टुकड़ा इसकी कम घिसावट व टूट-फूट रोकने के लिए वेल्ड किया जाता है। कुछ मशीन निर्माताओं द्वारा छेनी किस्म के फार भी लगाये जाते हैं। राहत/निकासी कोंण को आम तौर पर 20° के लगभग रखा जाता है ताकि इससे भूमि को बिना उलट-पलट किये एक संकरी नाली/कूड़/चीरा बनाया जा सके। फारों के नीचे के राहत कोंण को साधारणतया 5° पर रखा जाता है। राहत कोंण को बुआई की इच्छित गहराई एवं मशीन के स्तर समायोजन के लिए ट्रैक्टर से जुड़ी टॉप लिंक का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। कूड़ खोलने वाली नोक का हिस्सा एक नरम लोहे की मजबूत फटूठी से वेल्डिंग या नट बोल्ट से उल्टा टी आकार में जुड़ा होता है लेकिन वेल्डिंग होने से इसको बदलने या मरम्मत करने के लिए वर्कशॉप ले जाना पड़ता है जबकि नट बोल्ट होने से किसान अपने घर पर भी आसानी से बदल सकता है। फारों को बनाते समय प्रयोग में लायी गयी धातु की उच्च कार्बन स्टील की गुणवत्ता पर ही ड्रिल की रुकावट रहित कार्य प्रणाली व टिकाऊपन को निर्धारित होती है। प्रत्येक फारों के पीछे प्लास्टिक नलिकाओं को जोड़ने के लिए अलग-अलग कोण पर मुड़ी हुई दो नालियां/बूट लगी होती हैं। बुआई की गहराई को मशीन की दोनों तरफ लगे (बगल के) पहियों को ऊपर-नीचे करके समायोजित किया जा सकता है। कुछ मॉडल की मशीनों में बुआई की गहराई को (बगल के पहियों को बिना हिलाये ही) फारों को पिंडली के साथ ऊपर या नीचे करके भी क्रमशः कम या ज्यादा किया जा सकता है। बगल के पहियों के अतिरिक्त टॉप लिंक को लम्बा या छोटा करके नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन इसमें ध्यान रखना चाहिए कि आगे तथा पीछे की लाइनों की गहराई एक समान रहे। किसानों के ट्रैक्टरों में आम तौर पर द्रवचलित मशीन जोड़ने की फट्ठियां ऊपर नीचे करने का स्क्रू अटक जाने से काम नहीं करने की स्थिति में मशीन के दोनों ओर गहराई नियंत्रक पहियों की मदद से बुआई की एक समान गहराई का समायोजन कर लेना चाहिए। बीज एवं उर्वरक बॉक्स नरम इस्पात (2 मिमी. मोटाई) की चादर से लगभग चतुर्भुज आकार में आगे (उर्वरक)-पीछे (बीज) बने बॉक्स होते हैं जो कि मशीन के फ्रेम के सबसे ऊपर इसके चारों कोनों पर चार मजबूत लोहे की पत्तियां लगी रहती हैं। इनकी लम्बाई लगभग 145 सेमी. (9 फारों वाली मशीन में) व गहराई 28 सेमी. होती है। इनमें 50 किग्रा. डी.ए.पी. व 50 किग्रा गेहूँ का बीज निर्धारित बॉक्स में एक बार में आसानी से भरा जा सकता है। मशीन में लगे बॉक्स की लम्बाई मशीन के फ्रेम की चौड़ाई पर निर्भर करती है। उदाहरणतयाः 11 फारों वाली मशीन में बीज व उर्वरक बॉक्स की लम्बाई 178 सेमी. के लगभग होती है। बीज मापक उपकरण बीज मापक उपकरण के निम्नलिखित भाग हैं: बीज की मात्रा समायोजित करने वाला लीवर गढ्ढेदार घिरनियाँ (फ्लूटिड रोलर) प्लास्टिक से बनी नलियाँ एल्यूमिनियम कप बीज का स्वतः निकास नियंत्रक पत्ती बीज बूट एल्यूमिनियम के बने गढ्ढेदार/खाँचेदार घिरनियाँ (फ्लटेड रोलर) होती हैं तथा उन फसलों (गेहूँ, धान, सरसों इत्यादि) के बीज को उनके आकार के अनुसार लगातार बुआई के लिए गिरने देती हैं। घिरनियों में बने गड्ढ़ों (फ्लूट्स) की संख्या व इनकी खाँचों की गहराई बीज के आकार व दर पर निर्भर करती हैं। अधिक सुनिश्चितता के लिए खाँचों का आकार फसलों के बीज के आकार के अनुसार बदलने की व्यवस्था होनी चाहिए। ये घिरनियाँ (रोलर) एक शाफ्ट पर क्रमवार लगी होती है। ये घिरनियाँ निर्धारित मात्रा में बीज डालने के लिए एल्यूमिनियम के कप के बीच में लगी होती हैं। फ्लूटेड रोलर के नीचे जहाँ से बीज की निकासी होती है एल्यूमिनियम या प्लास्टिक की जीभ के समान पत्ती लगी होती है, जो बीज के स्वतः निकास को नियंत्रित करती है। घिरनियों के घूमने के कारण बीज दर मापक यंत्र की तली में लगे एल्यूमिनियम के कपों के मुख पर गिरते हैं तथा प्लास्टिक की नलियों तथा बीज बूट के माध्यम से कूड़/नाली में चला जाता है। कीपाकार बूट में खाद बीज विभाजन प्लेट लगी होती है। एल्यूमिनियम की पत्तियों को बीज के आकार के अनुसार (जैसे धान में) ऊपर-नीचे कर लेना चाहिए। खाँचेदार घिरनियों को अन्दर व बाहर खिसकाकर इच्छित बीज की मात्रा को नियंत्रित किया जाता है। इन घिरनियों का एल्यूमिनियम कपों के अन्दर रहने से बीज की मात्रा ज्यादा गिरती है। तिरछी प्लेट वाले बीज मापन इकाई में सटीक बीज की स्थापना होती है। जीरो टिलेज मशीन का परिक्षेत्र से बाहर सीड कैलीब्रेशन सर्वप्रथम चालन पहिये (ड्राइव व्हील) का व्यास मापते हैं तथा इसकी परिधि-P निकालते हैं। 2. फारों की संख्या को दो फारों के बीच की दूरी से गुणा करके मशीन द्वारा बोयी जाने वाली वास्तविक चौड़ाई (W मीटर में) निकालते हैं। तदुपरान्त एक हैक्टेयर क्षेत्रफल को बोने के लिए मशीन के द्वारा तय की जाने वाली दूरी (L) निकालने के लिए मशीन की वास्तविक चौ० (W) से 10,000 को भाग देते हैं। उपरोक्त दूरी के 100 वें हिस्से के बराबर लम्बाई (1) निकालने के लिए उपरोक्त लम्बाई (L) को 100 से भाग देते हैं। अब इस लम्बाई () को तय करने के लिए चालक पहिया (ड्राइव व्हील) को कितने चक्कर (N) लगाने पड़ेंगे, का पता लगाने के लिए लम्बाई () को परिधि (P) से भाग देते हैं। के n= (I)/ ED चक्कर लगायेंगे। मान लें कि अगर चालक पहिया खेत में 10 प्रतिशत फिसलता है, तो चालक पहिया (ड्राइव व्हील) के चक्कर (N) जैसे कि (n-0.1n) चक्कर लगेंगे। अब बुआई की मशीन को इतना ऊपर उठाइये ताकि चालन पहिया आसानी से घूम सके। पहिए की परिधि में एक बिन्दु पर चाक से निशान लगायें तथा बीज बॉक्स में बीज भरें और बीज की मात्रा को लीवर से समायोजित करें तथा पहिए के N चक्कर लगायें। बुआई की मशीन के नीचे पाइपों में लगे सभी थैलियों में गिरे सारे बीज को इकट्ठा करके इसका वजन करते हैं। इस मात्रा को 100 से गुणा करके प्रति हैक्टेयर बीज की मात्रा का पता लगा सकते हैं। अभी भी बीज दर सिफ़ारिश से कम या ज्यादा है तो उसी प्रकार बीज की मात्रा हैंडल की सहायता से कम या ज्यादा करने के उपरान्त फिर उपरोक्त तरीका पुनः दोहरायें। ऐसा तब तक करें जब तक कि वांछित दर उपलब्ध न हो जाए। इस दौरान सभी थैलियों का एक बार अलग-अलग वजन कर लेने से सभी फारों में बीज एक समान गिर रहा है या नहीं का पता लगा लेते हैं। अगर नहीं तो बीज और खाद निकासी को नये सिरे से चेक कर लेना चाहिए। उदाहरणः इस उदाहरण में चालक पहिये का व्यास (D) 0.127 मी है तो पहिए की परिधि (P) = 0.127X3.14 चालन पहिए की परिधि = 0.4 मी. मशीन की चौड़ाई =1.85 मी. जैसा हम जानते हैं एक हैक्टेयर का क्षेत्रफल =10,000 वर्ग मीटर (L) की बुआई करने के लिए मशीन के चलने की दूरी =10,000/1.85=5405 मी. दूरी (L), का 100 वाँ भाग (1)=54.0 मी. इस दूरी (1) को पार करने के लिए चालन पहिए के चक्कर में लगेंगे =54.5/0.4 = 136.25 अगर चालन पहिए की फिसलन 10% (5.4 m) मान लें तो कुल दूरी (1) को पार करने के लिए चक्कर (n) लगेंगे (54.0-5.4) 70.4 =124 लगभग यदि हम 100 किग्रा बीज प्रति हैक्टेयर की दर से डालना चाहते हैं तो 124 चक्कर में 1 किग्रा बीज की मात्रा प्राप्त होनी चाहिए। मशीन के दोनों निर्धारित बक्सों में बीज और खाद भरें। निर्माताओं द्वारा दिए गये विवरण के अनुसार खाद और बीज की मात्रा को लीवर से समायोजित करें। इसके बाद उपरोक्त 7 से लेकर 9 बताये गये बिन्दुओं के अनुसार बीज व उवर्रकों का समायोजन करें। जीरो टिलेज मशीन में बीज व उर्वरक नापने की कार्य प्रणाली प्रथम चरणः मशीन की चौड़ाई नापने के लिए फीते को मशीन की टाइनों के बीच में रखते हैं तथा एक से दूसरे किनारे तक सभी टाइनों की आपस में दूरी एक पुस्तिका पर लिखते रहते हैं। और प्रत्येक दो टाइन के बीच की चौड़ाई (२० सेमी.) को पुस्तिका पर लिखते हैं। इससे मशीन की काम करने की प्रभावी चौड़ाई (२० सेमी. x कुल टाइन की संख्या) निकलती है। द्वितीय चरणः बीज प्रणाली सूचक को मशीन के वांछित चिन्ह पर समायोजित करते हैं। बीज दर में अधिक मात्रा में परिवर्तन के लिए गियर बदलना वांछित होता है। तृतीय चरणः इसमें प्लास्टिक के पाइपों को लोहे की नलियों में से निकालकर इनमें पॉलीथीन बैग बांध देते हैं। बैग बांधने से पहले एक या दो बार चालन पहिये को घुमाकर यह पक्का कर लेना चाहिए कि बीज सभी पाइपों में आना शुरू हो जाये। यह प्रक्रिया चालन पहिए। को ऊपर उठाकर हाथ से भी किया जा सकता है। चतुर्थ चरणः फ्लोटेड रोलर प्रणाली में बीज को बॉक्स में पूरी तरह से भर दिया जाता है तथा इन्क्लाईंड प्लेट में बीज को बक्से में 1/3 या आधी 1/2 ऊँचाई तक भरते हैं नहीं तो मशीन के खदकने की वजह से इन इन्क्लाईंड प्लेट बीज मापक प्रणाली में बीज दर में अन्तर आ सकता है। इस प्रणाली में बीज दर को निर्धारित करने के लिए बीज बॉक्स को कम या ज्यादा तिरछा करने वाली लोहे की 6 से 8 छिद्र युक्त पट्टी (बीज के बक्से का कोंण निर्धारित करने के लिए) से आगे-पीछे कर समायोजित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि बॉक्स तीसरे और चौथे छेद में समायोजित है तो धान की फसल के लिए बीज दर 10 और 8 किग्रा/एकड़ रहेगी। पंचम् चरणः इसमें मशीन के चलने से पहले 20 मीटर की दूरी पर इसके अगले या पिछले फारों से नापकर वहाँ पर एक निशान लगा देते हैं। षष्टम् चरणः अब ट्रैक्टर को २० मीटर दूरी पर लगे निशान तक सीधा धीरे-धीरे (3 से 5 किमी/घंटा की गति से) चलाते हैं। सप्तम् चरणः पाइप में बांधे गये थैलियों में बीज के गिरने को सही से जाँचते हैं कि सभी थैलियों में बीज एकसमान गिर रहा है। अष्टम् चरणः बैग में इकट्ठे हुए बीजों का अलग-अलग वजन करके सभी का कुल वजन पता कर लेना चाहिए। यदि नहीं तो बीज के गिरने की दुबारा से जाँच करते हैं, विशेष रूप से फ्लोटर रोलर के नीचे लगी पत्ती, इन्क्लाईंड प्लेट एवं इन पर लगे ब्रुश तथा प्लास्टिक पाइप। नवम् चरणः बीज दर (किग्रा/एकड़) = 4000 x बीज का कुल वजन (ग्राम) / मशीन की प्रभावी चौड़ाई (मी) x 20 मी x 1000 दशम् चरणः यदि वांछित मात्रा में बीज दर निर्धारित नहीं होती है तो फिर पुनः चरण 2 के अनुसार बीज दर को समायोजित करने की पूरी प्रक्रिया को अपनायें व वांछित बीज दर निर्धारित करें। उर्वरक मापक इकाई के उपभाग: हीरानुमा छिद्रयुक्त उर्वरक बॉक्स की तली स्केल/पैमाना उर्वरक नियमित करने वाला हैंडल एल्यूमिनियम कप घुमावदार चक्रियाँ/आन्दोलक लगी शाफ्ट खाँचेदार घिरनियाँ (फ्लूटिड रोलर) हीरे के आकार के छिद्र उर्वरक नियमित करने में सहायक प्लास्टिक चढ़ी हुई शाफ्ट ज्यादातर मशीनों में जालीनुमा छेद युक्त गुरुत्वाकर्षण व भार भरित उर्वरक नियंत्रक यंत्र लगे होते हैं जिसमें कि खाँचेनुमा घिरनियाँ एक शाफ्ट पर लगी होती हैं। कभी-कभी इसे मिश्रित/ करने वाली प्रणाली के नाम से जाना जाता है। उर्वरक बॉक्स की तली में हीरे के आकार के सुराख/छिद्र होते हैं। इन सुराखों/छेदों को छोटा या बड़ा करके उर्वरक की मात्रा को निर्धारित किया जाता है। उर्वरक बॉक्स में शाफ्ट पर घिरनियों के बीच में सितारों की तरह गोलाकार दोनों तरफ चूड़ीदार चक्रियाँ (एजीटेटर) लगी होती हैं, जो उर्वरक को फसने नहीं देतीं तथा इसे नीचे छिद्रों की तरफ दोनों तरफ से घिरनियों के नीचे लगातार धकेलती रहती हैं। आवश्यकतानुसार उर्वरक की मात्रा निर्धारित करने हेतु पैमाना/सूचक होता है जो हैंडल या लीवर की सहायता से समायोजित किया जाता है। उर्वरक इस तरह छिद्रों से नीचे निकलते हुए कीपों के माध्यम से नलियों में होते हुए बूट के द्वारा कुंड तक पहुँचाया जाता है। घूमने वाली सेल/खाँचे युक्त उर्वरक मापक उपकरण कुछ अन्य मशीनों में बॉक्स से उर्वरक सीधे घूमने वाली घिरनियों के खाँचों द्वारा प्लास्टिक नलियों में पहुँचता है। इस प्रणाली का लाभ यह है कि इससे छोटे या बड़े दानेदार उर्वरक को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है जैसे यूरिया, सुपरग्रेन्यूल्स आदि। धान में इन सुपरग्रेन्यूल्स को गहराई पर डालने से इनकी उपलब्धता 20 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इसके साथ-साथ खेत के कोनों पर ट्रैक्टर के मुड़ते समय उर्वरक स्वतः नहीं गिरता है। इस प्रणाली में घूमने वाली घिरनियाँ उर्वरक बक्से के नीचे अलग-अलग बने खानों में लगी होती हैं जो उर्वरक की आवश्यक मात्रा को प्रत्येक पंक्ति में या अगर चाहें तो कुछ चुनी हुई पंक्तियों में आवश्यकतानुसार डाल सकते हैं। उर्वरक लगातार क्रम की मात्रा इसके बॉक्स को ऊपर-नीचे करके घटाई या बढ़ाई जाती हैं, या गियर का आकार बदलकर भी उर्वरक की ज्यादा पैमाने पर अधिक या कम मात्रा समायोजित की जाती है। उर्वरक अनवर्त तरीके से क्रम में लगे खाँचों द्वारा गिरता रहता है। प्रयोगशाला और खेत में उर्वरक की वांछित मात्रा निर्धारण हेतु उन्हीं तरीकों को क्रमशः अपनायें जो जीरो टिलेज मशीन से प्रयोगशाला व खेत में बीज नापने के लिए उपर्युक्त दर्शाया गया है। शक्ति हस्तांतरण इकाई बीज एवं खाद मापक यंत्रों को चलाने के लिए आगे की तरफ इस्पात से निर्मित (ऊपर-नीचे होने वाले) दाँतेदार ग्राउंड व्हील या मुख्य ड्राइव पहिया जिसका व्यास 40 सेमी. व चौड़ाई 10.5 सेमी. के लगभग होती है तथा यह चैन व गरारियों के माध्यम से जोड़ा गया है। हालांकि विभिन्न माडलों में चालन पहिए का आकार भिन्न हो सकता है। इस चालन पहिए की ऊपरी शिखा पर 14 दाँते प्रत्येक लगभग 3 सेमी ऊँचाई के होते हैं व 90° के कोण पर लगे होते हैं जिनसे पहिए व जमीन का ठीक सम्पर्क बना रहता है तथा फिसलन रुकती है। वांछित खिंचाव समायोजित करने हेतु खाँचों और स्प्रिंग का सहारा लिया जा सकता है। ड्राइव व्हील/ग्राउंड व्हील फ्रेम के आगे के तरफ मध्य में होता है तथा खाँचों में खिसकाकर या स्प्रिंग द्वारा इसे ऊपर-नीचे करने का प्रावधान भी होता है। कुछ ट्रैक्टरों में हुक के नजदीक होने या मिट्टी व पुराल इकट्ठा होने पर फ्रेम के आगे लगे चालन पहिए के स्वछंद चलने में रुकावट जैसी समस्या आती है। अतः इसे दूर करने हेतु नवीन माडलों में फ्रेम के पीछे लगा दिया जाता है। मोटरसाइकिल की एक रोलर चैन (12.50 मिमी. पिच) एवं नरम इस्पात का स्प्रोकेट 14 व 37 दाँतों के साथ संलग्न होता है जिसकी सहायता से चालन पहिए से उत्सर्जित शक्ति बीज एवं खाद मापक यंत्र को स्थान्तरित होती है। चालन पहिए से शक्ति एक शाफ्ट (1:1) को स्थान्तरित होती है जो फ्रेम के सामने की ओर लगी होती है। इस शाफ्ट से शक्ति बीज व खाद मापक यंत्र में लगी शाफ्ट (2.5:1) तक चैन-स्प्रोकेट के माध्यम से स्थान्तरित होती है। यद्यपि रोलर चैन व स्प्रोकेट का आकार विभिन्न माडलों में आवश्यकतानुसार भिन्न हो सकते हैं। चैन को घटाने-बढ़ाने तथा इसकी सामान्य कार्यविधि के लिए चैन-स्प्रोकेट के नीचे एक आइडलर भी लगा होता है। शक्ति हस्तांतरण इकाई के मुख्य भागः चालन पहिया (ड्राइव व्हील) शाफ्ट आइडलर गरारी (स्प्रोकेट) रोलर चेन मशीन के दोनों तरफ लगे गहराई निर्धारण पहिए: मशीन की गहराई को नियंत्रित करने के लिए दोनों तरफ 40 सेमी. व्यास के पहिए लगे होते हैं। ये पहिए इस्पात या रबड़ के बने हो सकते हैं। विभिन्न माडलों में इन पहियों का आकार भिन्न हो सकता है। इन पहियों को चूड़ीदार छड़ की सहायता से ऊपर या नीचे करके बुआई की गहराई को क्रमशः कम या ज्यादा किया जा सकता है। कभी-कभी खेत में पुराल या पूर्व फसल के अधिक अवशेष होते हैं जिसके कारण पहियों के घूमने में रुकावट आ सकती है। अगर ऐसा होता है तो इन पहियों को हटाकर मशीन की गहराई को सीधे ट्रैक्टर के हाइड्रोलिक सिस्टम के द्वारा समायोजित करना चाहिए। योजक बिन्दु: मशीन में सामने की तरफ इसको ट्रैक्टर में जोड़ने के लिए दो अलग-अलग छड़नुमा किल्ली लगी होती है, तथा ऊपर की तरफ एक बड़ा छेद बना होता है जिसमें एक पिन के द्वारा जोड़ा जाता है। टॉपलिंक से मशीन के तल को समतल किया जाता है जिससे मशीन कम झटके खाने के साथ-साथ सभी आगे व पीछे की फारों की गहराई एक समान रहती है। लोहे या लकड़ी का बना स्टैंड/प्लेटफार्मः लोहे अथवा लकड़ी का बना एक स्टैंड भी ड्रिल की फ्रेम के पीछे की ओर लगा होता है। मशीन के चलते समय इस प्लेटफार्म/स्टैंड पर खड़े होकर या बैठकर कोई भी यह देख सकता है कि बीज व उर्वरक बिना रुकावट के ठीक प्रकार से कूड़ों में गिर रहे हैं। मशीन का प्रयोग एवं रखरखावः सुनिश्चित करें कि सभी नट और बोल्ट सही तरीके से खिचें हों तथा सभी घूमने वाले भागों को सही से चिकनाया गया हो। उर्वरक एवं बीज के बक्सों को सही से साफ करें। उर्वरक एवं बीज के लिए लगी प्लास्टिक की नलियों में कोई मोड़/जकड़न न हों। बुआई के बाद उर्वरक एवं बीजों को बक्सों से निकाल कर मशीन को खड़ा करें। उर्वरक के बक्से में यूरिया का प्रयोग न करें और कोशिश रहे कि नमीयुक्त उर्वरकों का प्रयोग न करें। बगल वाले पहियों को उचित गहराई पर सही से एक समान समायोजित करें। जीरो टिलेज मल्टी-क्रॉप प्लान्टर: आजकल जीरो टिलेज मल्टी-क्रॉप प्लान्टर भी उपलब्ध हैं जिसकी सहायता से गेहूँ, धान, मक्का, चना, मसूर, मटर, सरसों, जौ इत्यादि की बुआई एक ही मशीन से बिना जुते खेत में की जा सकती है। मल्टी-क्रॉप प्लान्टर में दो तरह (फ्लोड रोलर और इन्क्लाईंड प्लेट) की बीज मापक प्रणाली होती है। इस मशीन में उर्वरक व बीज मापन के अलावा अन्य सभी भाग जीरो टिलेज मशीन की तरह ही होती है। इसमें दोनों बक्सों की चौड़ाई मशीन की कुल चौड़ाई पर निर्भर करती है। मशीन में फारों की संख्या कम या ज्यादा होने से बॉक्स का आकार भी छोटा या बड़ा होगा। उदाहरण के लिए 9 फार वाले प्लान्टर में बॉक्स की लम्बाई 160 सेमी. होती है जबकि 11 फार वाली मशीन में 210 सेमी. तक होती है। मल्टी-क्रॉप प्लान्टर के उपभागः बीज के बॉक्स: इस मशीन में भी साधारण जीरो ट्रिल मशीन की तरह बक्से के पीछे एक और तिरछी मापक प्लेट वाला बक्सा लगा दिया जाता है। यह प्लान्टर में बुआई के लिए बीज भरने के काम आता है। तिरछी मापक प्लेट: ये घूमने वाली प्लेट होती है जिसके बाहरी किनारों पर बीज को उठाने के लिए U आकार के कटाव बने होते हैं। जिसकी सहायता से यह प्लेट बीज की इच्छित मात्रा को उठाकर कप में डालती है। बीज की मात्रा को समायोजित करने वाली पत्ती: यह इस्पात की बनी छिद्र युक्त पत्ती होती है। इसमें बने छेद बदलने से बीज की दर भी बदल जाती है। पत्तियों का कोंण बढ़ायेंगे तो बीज की मात्रा घटेगी और घटायेंगे तो बढ़ेगी। पत्ती पर छेद के हिसाब से बीज दर लिखी भी होती है। सीड कप: तिरछी मापक प्लेटों को बाहरी किनारों पर U आकार छेदों से बीज बीज कपों में पहुँचाया जाता है और ये कप प्लास्टिक की नलियों के ऊपर लगे होते हैं। बीज डालने वाले पाइप: इनके द्वारा बीज बूट तक पहुँचता है। सीड बूट: सीड बूट से अन्ततः बीज फार द्वारा बनायी गयी हूँड़ों में गिरता है। खेत में मशीन चलाने के लिए दिशा निर्देश उर्वरक के साथ बीज को समान मात्रा में इच्छित गहराई पर बोया जाना चाहिए और इसके अच्छे जमाव के लिए मिट्टी में उचित नमी का होना आवश्यक है। इसके लिए निम्नलिखित परिचालन विधि अपनानी चाहिए: सबसे पहले मशीन को जोड़ने के लिए ट्रैक्टर को पीछे कर मशीन के दोनों निचले हिच प्वाइंट को ट्रैक्टर की समायोजित लिंक में जोड़ना चाहिए। तथा टॉप लिंक के पिन को ऊपर वाले तीसरे जुड़ाव बिन्दु से जोड़ने के बाद टॉप लिंक का अच्छे से समायोजन करना चाहिए। मशीन को प्रतिदिन बुआई शुरू करने से पहले उसकी जाँच करनी चाहिए और ऑयलिंग करनी चाहिए। ट्रैक्टर में सही से समायोजन अवश्य करना चाहिए। इसके बाद बॉक्स के 3/4 भाग में बीज व उर्वरक भरें। मशीन को बीज व उर्वरक की प्रति एकड़ दर से आवश्यकतानुसार समायोजित करें। बीज व उर्वरक में ढेले न हों तथा खेत में चलाने से पहले मशीन को उठाकर चालन पहिए को घुमाते हुए बीज व उर्वरक का प्रति फार एक समान डलना सुनिश्चित करें। जहाँ से बुआई शुरू करनी है वहाँ ट्रैक्टर को खेत में प्रवेश करायें और मशीन को खेत में रखकर उसका समतलीकरण जाँचने के लिए टॉप लिंक का अच्छे से समायोजन करें। इस बात का ध्यान रखें कि मशीन चलाने के समय चालन पहिया इसमें लगे स्प्रिंग के खिंचाव से जमीन को भली भांति रगड़ खाना चाहिए। इसका समायोजन कुछ हद तक टॉप लिंक की सहायता से किया जा सकता है अन्यथा पहिए के दोनों तरफ लगी लोहे की पट्टियों पर समायोजित छिद्र व्यवस्था से इसकी लम्बाई बढ़ाई या घटाई जा सकती है। खेत में कुछ दूरी तक मशीन को चलाकर गहराई की जाँच करें तथा इच्छित गहराई करने के लिए मशीन के दोनों तरफ लगे पहियों को एक समान ऊँचाई पर समायोजित करें। अवधारणा की प्रस्तुति: स्थिर व परिवर्तनीय लागत के अवयव तथा उनकी गणना (बुनियादी व्यावसायिक अवधारणा) बुनियादी व्यावसायिक अवधारणा किसी भी व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है। लाभ का अर्थ आय व लागत के बीच के अन्तर से है। इस व्यवसाय में, लाभ किराये से प्राप्त आय व परिचालन में आयी लागत का अन्तर है। व्यापार में लागते दो प्रकार की होती हैं- स्थिर लागत और परिवर्तनीय लागत। कुल प्राप्त आय व्यवसाय करने में लगे समय और वसूले गये मशीन के किराये पर निर्भर करती है। स्थिर और परिवर्तनीय लागत: मशीनों को किराये पर चलाने में दो तरह की मुख्य लागतें होती हैं। स्थिर लागत और परिवर्तनीय लागत। स्थिर लागत: यह लागत परिवर्तनशील नहीं होती है और इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि एक मशीन से कितने एकड़ की बुआई की गयी है। इसलिए स्थिर लागत हमेंशा निश्चित होती है। परिवर्तनीय लागत: परिवर्तनीय लागत में मशीन के किराये के अनुसार, जैसे कि-ईंधन की खपत, मशीन परिचालन में लगे श्रम और मशीन की समय-समय पर होने वाली मरम्मत पर खर्च के अनुसार परिवर्तन होता है। यदि मशीन किराये पर अधिक क्षेत्र में चलायी गयी है। तो परिवर्तनीय लागत बढ़ती है और कम करने पर घटती है। परिचालन लागत की गणना के लिए निम्न कारकों को गणना में शामिल करना चाहिए। मूल्यह्यस: जब तक मशीन उपयोग में लायी जाती है। तो उसके प्रति वर्ष मूल्य में होने वाली गिरावट को मूल्यह्मस कहते हैं। यह मूल्यह्मस तब तक लगता है। जब तक मशीन काम करने योग्य न रहे या बेच न दी जाये। ब्याजः मशीन की कीमत पर लगने वाला वार्षिक ब्याज विविध शुल्क: जैसे कि मशीन का बीमा और उसको शेड में रखने का खर्च। परिचालन लागत: जैसे कि ईंधन, आयलिंग और ग्रीसिंग इत्यादि। मशीन के कल पुर्षों की मरम्मत। श्रमिक जैसे पहले ही कहा गया है कि इन लागतों को दो भागों में बाँटा जा सकता है। स्थिर लागत: जब मशीन खरीदते हैं तो उसमें एक निश्चित पूंजी की लागत होती है। प्रायः सेवा प्रदाता मशीन खरीदने के लिए ऋण लेते हैं तो इस ऋण पर उन्हें ब्याज देना पड़ता है। अगर कोई मशीन क्रेता अपनी स्वयं की बचत से मशीन खरीदता है तब भी लाभप्रदता की गणना करते समय ब्याज की राशि को शामिल करना आवश्यक है। मशीन का बीमा तथा छाया में रखने के लिए शेड पर लगी लागत को इस श्रेणी में रखेंगे। क्योंकि इन लागतों को छोड़ा नहीं जा सकता और इन सब पर मशीन के कम या अधिक उपयोग करने का कोई अन्तर नहीं पड़ता। इस कारण इन्हें स्थिर लागत में रखते हैं। इन सभी मुख्य बिन्दुओं के विषय में नीचे विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। मूल्यह्मस: किसी भी मशीन से किराया करने पर उसको खरीदने में जो पूंजी लगती है वह उसकी उपयोगी आयु के बाद उस मशीन के मूल्य या कबाड़ मूल्य में जो राशि घटती है उसे उस मशीन के प्रतिवर्ष होने वाली मूल्य में कमी को मूल्यह्मस कहते हैं। इस मूल्य का निर्धारण वार्षिक मूल्य के आधार पर होता है। मशीन के मूल्यह्मस की गणना इसके खरीदने के मूल्य में से इसके कबाड़ मूल्य को घटाकर इसके उपयोगी आयु के वर्षों से भाग देने पर जो राशि आती है वह इसका वार्षिक मूल्यह्मस होता है। वार्षिक मूल्यह्मस (रू) = खरीद मूल्य (रू) - कबाड़ मूल्य (रू) / मशीन की उपयोगी आयु (वर्षो में) ब्याज: पूंजी पर ब्याज भी एक स्थिर लागत है। जब सेवा प्रदाता मशीन खरीदने के लिए ऋण लेता है तो उस ऋण के ऊपर वार्षिक ब्याज लगता है। यदि व्यवसायी अपनी पूंजी से ही मशीन खरीदता है तो उस स्थिति में ब्याज देने की आवश्यकता नहीं होती लेकिन यदि वह इसी पूंजी को दूसरी तरफ निवेश करता है तो उस पर ब्याज कमा सकता था। उदाहरण के तौर पर- अगर वह उस पैसे को बैंक में जमा करता तो उस पर व्याज कमा सकता था। सामान्यतः मशीन पर ब्याज दर की गणना मशीन की वार्षिक लागत पर दिये गये ऋण पर करते हैं। यह दर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग होती है। यद्यपि कुछ व्यवसायी सामान्य ब्याज दर से भी कम दर पर ऋण ले लेते हैं। लेकिन ब्याज दर के आकलन के लिए बाजार के भाव को मुख्य बिंदु माना जाता है। ऐसी स्थिति में हम उनके पूंजी निवेश पर वार्षिक ब्याज की गणना उसकी मशीन के खरीद मूल्य व कबाड़ मूल्य को जोड़कर उसको 2 से भाग देने पर बाजार ब्याज दर (i) से गुणा करके करते हैं। वार्षिक ब्याज (रू) = खरीद मूल्य (रू) + कबाड़ मूल्य (रू) / xi (%) / 2 इसको इस उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है कि यदि एक मशीन रू. 50,000 में खरीदी गयी है और उस मशीन की उपयोगी आयु के बाद उसका कबाड़ मूल्य रू. 10,000 है तो मशीन खरीदने के लिए औसत निवेश रू. 30,000 होगा। इसका अर्थ यह है कि यदि ये रू. 30,000 बैंक में जमा किये जाते तो इन पर ब्याज मिलता। लेकिन जबसे ये पैसा मशीन खरीदने में निवेश हुआ है तो इसकी गणना को एक अवसर लागत के रूप में जानी जाती है। यह महत्वपूर्ण है कि ब्याज दर को प्रतिशत में निकालने के लिए 100 से विभाजित करते हैं। अर्थात इसको दशमलव अंश में लिखते हैं। उदाहरण के लिए 10%=10/100=0.10 । इस उदाहरण में अवसर लागत की गणना मशीन के खरीद में लगी पूंजी के आधार पर रूपये 3,0000 X 0.10 =3,000 है। अन्य स्थिर लागतें: मशीन से सम्बन्धित कुछ अन्य स्थिर लागतों को भी शामिल करना पड़ेगा और विशेष परिस्थिति में इन लागतों की मात्रा का भी विश्लेषण करना पड़ेगा जैसे कि चोरी या खो जाने की स्थिति से बचने के लिए बीमा कराना तथा जब मशीन प्रयोग नहीं होती। उसको छाया में रखने के लिए शेड का निर्माण करवाना इत्यादि शामिल करते हैं। परिवर्तनीय लागत: परिवर्तनीय लागत वह लागत होती है जो मशीन के कम या अधिक प्रयोग करने से परिवर्तित हो जाती है। परिवर्तनीय लागत अधिक ग्राहकों, अधिक काम के घंटे और अधिक एकड़ में किराया करने पर बढ़ जाती है। परिवर्तनीय लागत में ईंधन, ऑयलिंग व ग्रीसिंग, मशीन चलाने में लगा श्रम, खराब हुए पुर्जा के बदलने और मशीन की रखरखाव व सही से देखभाल को शामिल किया जाता है। ईंधन: ईधन की गणना सीधी है जिसमें कि ट्रैक्टर में विभिन्न गतिविधियों में तेल की कितनी मात्रा खपत होती है। सामान्यतः जीरो टिलेज मशीन चलाने के लिए 35 से 40 एच.पी. का ट्रैक्टर प्रयोग करने पर तेल की अनुमानित खपत 4 लीटर प्रति एकड़ आती है। इस खर्च की गणना के लिए तेल की प्रति लीटर कीमत की गुणा प्रति एकड़ खर्च हुए तेल की मात्रा से करने से प्रति एकड़ ईंधन की लागत का मूल्य प्राप्त होता है। मरम्मत एवं रखरखाव: कृषि यंत्रों के मरम्मत एवं रखरखाव की लागत विभिन्न मशीनों में घटती-बढ़ती रहती है क्योंकि यह काम करने की दशा, चालक की कुशलता, मशीन की देखभाल और गुणवत्ता तथा मशीन के मॉडल पर निर्भर करती है। मशीन के रखरखाव व मरम्मत की लागत मशीन की उपयोगी आयु के अनुसार बढ़ती है। सेवा प्रदाता मशीन को जितना अधिक उपयोग करेगा उसके रखरखाव का खर्च उतना ही अधिक होगा। रखरखाव की लागत का सम्बन्ध नियमित मरम्मत, इंजन का तेल बदलना और मशीन में काम करने वाले सभी पुर्जे, फिल्टर तथा टायरों के बदलने से है। मशीन के वार्षिक रखरखाव की लागत का मूल्यांकन करने के लिए मशीन की प्राथमिक लागत के एक हिस्से को मशीन की उपयोगी आयु से भाग देकर प्राप्त करते हैं। उदाहरण के लिए मशीन की वार्षिक मरम्मत के खर्च को इस तरह अनुमानित कर सकते हैं। मशीन की वार्षिक मरम्मत खर्च (रू.) = खरीद मूल्य (रू.) x अनुमानित मरम्मत की लागत का हिस्सा (%में) / उपयोगी आयु (वर्ष में) x 100 जीरो टिलेज के मरम्मत के साथ साथ ट्रैक्टर के मरम्मत के खर्च की भी गणना करनी चाहिए। मशीन और ट्रैक्टर के औसतन प्रयोग की स्थिति में मशीन के रखरखाव के लिए उसकी प्राथमिक कीमत का 25 प्रतिशत उसके पूरे उपयोगी जीवन काल में खर्च करना पड़ेगा। यद्यपि ट्रैक्टर का प्रयोग खेती की विभिन्न गतिविधियों में होता है न केवल जीरो टिलेज में ही। इस संदर्भ में मरम्मत की लागत को अनुमानित करने के लिए ट्रैक्टर को जीरो टिलेज चलाने के लिए लगे समय को वार्षिक मरम्मत के खर्च में लगे हिस्से के अनुसार करते हैं। जीरो टिलेज सम्बंधित ट्रैक्टर की वार्षिक मरम्मत पर खर्च (रू.) = खरीद मूल्य (रू.) x अनुमानित मरम्मत की लागत का हिस्सा (%) / उपयोगी आयु (वर्ष में) x 100 जीरो टिलेज चलाने में ट्रैक्टर का लगा समय (%) / 100 उदाहरण के लिए यदि ट्रैक्टर प्रतिवर्ष 1000 घंटे सभी गतिविधियों में प्रयोग होता है तथा जीरो टिलेज से प्रति वर्ष 80 एकड़ बुआई की जाती है तथा एक एकड़ में बुआई में औसत 75 मिनट (=1.25 घंटे) लगते हैं। तब जीरो टिलेज मशीन चलाने में ट्रैक्टर का समय 100 घंटे (80x1.25/एकड़) होगा। जो कि ट्रैक्टर द्वारा वर्ष में कुल किये गये कार्य का केवल 10 प्रतिशत समय ही है। तब इस अनुमानित मरम्मत लागत को जीरो टिलेज मशीन में लगे समय के अनुसार अनुमानित करते हैं। इसका तात्पर्य है कि ट्रैक्टर की मरम्मत में लगे कुल खर्च में जीरो टिलेज सेवा का कुल 10 प्रतिशत हिस्सा होगा, इसकी गणना इस प्रकार करनी होगी 0.10 (=10%/100)। इस गणना को इस सामान्य सूत्र के अनुसार लिख सकते हैं। जीरो ट्रिलेज चलाने में ट्रैक्टर का लगा समय (%) = प्रतिदिन बुआई का क्षेत्रफल (एकड़) x सेवा करने के दिन ४ बुआई में प्रति एकड़ लगा समय (घंटों में) / ट्रैक्टर का कुल काम में लगा वार्षिक समय (घंटों में) X100 श्रमिक: मशीन को चलाने के लिए मजदूरों की आवश्यकता होती है। इसका मूल्य मांग और उसकी चलाने की कुशलता पर निर्भर करता है। श्रम की लागत को भी कुल लागत में शामिल करना पड़ेगा चाहे आप स्वयं ही अपना ट्रैक्टर क्यों न चलाते हों। इसका कारण अवसर लागत है क्योंकि आप उसी समय में दूसरा काम नहीं कर सकते जिससे कि आप कुछ आय अर्जित कर सकते थे। मशीन चलाने के लिए किराये का निर्धारणः किराये की दर का निर्धारण एक निश्चित पैमाने पर आधारित होना चाहिए। यदि किराया ज्यादा है तो लोग किराये पर काम कम करायेंगे और यदि कोई सेवा प्रदाता कम दर वसूलता है तो वह व्यापार में लगी लागत को कमाने में असमर्थ होगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि सेवा प्रदाता के द्वारा किये गये सभी खर्च निकल जायें और उस दर पर दूसरे किसान भी ज्यादा से ज्यादा काम करवा सकें। आपको जो लागत (स्थिर और परिवर्तनीय) पड़ रही है उसको जांचने की जरूरत है कि उसमे कहीं पर आप खर्च कम कर सकते हो कि नहीं। लेकिन ये भी ध्यान रखना कि खर्च कम करने की कोशिश में सेवा खराब न हो जाए। नहीं तो दूसरे किसान अगले सीजन में अन्य सेवा प्रदाता से काम करवायेंगे। काम शुरू करने से पहले किराये का निर्धारण सही तरीके से स्थानीय दशाओं के अनुसार ही अनुमानित करना चाहिए। व्यवसाय शरू करते समय आय की उम्मीद वास्तविकता से ज्यादा हो जाती है। जिसके लिए वास्तविकता महत्वपूर्ण है। जैसे-जैसे व्यापार शुरू होता है वैसे-वैसे काम भी बढ़ता रहता है इस क्षेत्र में काम कर रहे दूसरे सेवा प्रदाताओं के बराबर किराये का निर्धारण। व्यवसाय के शरू में ज्यादा किराया वसूलना कई बार ठीक नहीं होता। किराये में कुछ लचीलापन किस तरह से लाया जा सकता है, नीचे तालिका में दिया गया है। तालिका 1: मशीनों के किराये पर चलाने में किराये की दर को प्रभावित करने वाले कारकः कम किराया लेने के कारण और सम्भावनायें अधिक किराया क्यों होना चाहिए परिवार के सदस्यों और दोस्तों के बीच अनौपचारिक व्यवस्था। मशीन चलाने में लगने वाले अधिक जोर लगने वाला काम। ग्राहकों का व्यवसाय स्थान के करीब या पास होना। खेत की खराब परिस्थितियाँ जैसे चट्टान, पेड़, ढ़लान एवं अनियमित आकार का होना। सेवा प्रदाता के द्वारा मशीन को चालू हालत में रखने के लिए तथा अपनी स्थिर और परिवर्तनीय लागत को निकालने के लिए कुछ किराया कमाने की इच्छा। खेत की स्थिति ठीक न होने के कारण समय का ज्यादा लगना। पुरानी और घिसी मशीनों का प्रयोग। अच्छी मशीनों के प्रयोग से बेहतर परिणाम। अधिक क्षेत्र में काम पाने के लिए ग्राहकों को छूट। कुशल प्रशिक्षित चालक से ग्राहकों की अधिक संतुष्टि। कुल आय, कुल लाभ एवं शुद्ध लाभ प्रति एकड़ लिये गये किराये व बोये गये कुल एकड़ के गुणनफल को कुल आय/राजस्व कहते हैं तथा सभी परिवर्तनीय लागतों (स्थिर लागत को छोड़कर) को घटाने पर कुल लाभ की प्राप्ति होती है। कुल लाभ में से अगर स्थिर लागत को घटाया जाये तो शुद्ध लाभ की प्राप्ति होती है। अगर कुल लाभ से सिर्फ स्थिर लागत ही निकलती है और शुद्ध लाभ शून्य है तो व्यवसाय लाभ-अलाभ स्थिति होती है। इसकी गणना निम्नलिखित प्रकार से होती है: बुआई का किराया प्रति एकड़xकुल एकड़ बुआई का क्षेत्रफल= कुल राजस्व घटायें (-) परिवर्तनीय लागत = कुल लाभ घटायें (-) स्थिर लागत = शुद्ध लाभ यदि कुल लाभ नकारात्मक (हानि) है तो इसका मतलब है कि आय से परिवर्तनीय लागत नहीं निकल रही है और व्यवसाय में प्रति एकड़ घाटा हो रहा है। इस दशा में व्यवसाय को बन्द कर देना चाहिए। यदि कुल लाभ सकारात्मक है लेकिन शुद्ध लाभ नकारात्मक (Negative) है तो इसका मतलब है कि आपका व्यवसाय मशीन की खरीदी हुई कीमत की कुछ भरपायी कर रहा है लेकिन फिर भी लाभदायी नहीं है। यह व्यवसाय आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं है। जबकि एक किसान जीरो टिलेज मशीन (या अन्य दूसरी मशीनों को) अपने कार्य करने के लि, खरीदता है और मशीन के प्रयोग से उसकी स्वयं की लागत में कमी होगी और उपज बढ़ेगी जिससे मशीन खरीदने में उन्होंने जो मूलधन लगाया है उसकी भरपाई धीरे-धीरे हो जायेगी। इस लागत की भरपाई करने के लिए जीरो टिलेज मशीन को छोटे पैमाने पर किराये पर चलाकर (उदाहरण के लिए केवल कुछ मित्रों और रिश्तेदारों के यहां किराये पर चलाने से) उसके मूलधन की भरपाई और भी जल्दी होगी। जब तक मशीन की सेवा से होने वाला कुल लाभ सकारात्मक है तब तक उनकी मूलधन की कुछ भरपाई किराये से भी होती रहेगी। अगर सिर्फ जीरो टिलेज सेवा से शुद्ध लाभ नहीं हो रहा तब भी जीरो टिलेज मशीन खरीदना आर्थिक रूप से लाभदायक हो सकता है, यदि किसान इसको अपने स्वयं के खेत में भी प्रयोग कर रहा है तो। लाभ की गणना – परिद्वेष्य विश्लेषण उदाहरणार्थ गणना: एक उदाहरण में प्रयोग करते हुए तालिका 2 में दी गयी सूचनाओं के आधार पर लाभ की गणना करेंगे। इस तालिका के आधार पर कई अन्य तालिकाओं में शुद्ध लाभ व आय का आकलन विस्तार से दर्शया गया है। विशेष रूप से हम इसका अन्वेषण करेंगे कि किराया करने वालों का क्षेत्र बढ़ने से तथा जीरो टिलेज मशीन पर मिलने वाले अनुदान का इस व्यवसाय पर क्या असर होता है। तालिका 2: लाभ की गणना करने के लिए उदाहरणः बुनियादी परिदृष्य जीरो टिलेज की सेवा के मूलभूत आंकड़ेः 1. एक दिन में बुआई किये गये खेत का क्षेत्रफल (एकड़) 3 2. एक वर्ष में लगे कार्य में कुल दिनों की संख्या 25 3. प्रति एकड़ औसत किराया (रूपये) 800 4. खेत तक पहुँचने व प्रति एकड़ बुआई में लगा औसत समय (घंटे) 1.5 ईंधन खपत और श्रम के आकड़ेः 5. प्रति एकड़ ईंधन की खपत (लीटर) 4 6. प्रति लीटर ईंधन की कीमत (रूपये) 58 7. प्रतिदिन मजदूरी (रूपये) 300 ट्रैक्टर के आंकड़ेः 8. ट्रैक्टर का मूल्य (रूपये) 550,000 9. ट्रैक्टर का कबाड़ या पुनः बिक्रय मूल्य (रूपये) 150,000 10. ट्रैक्टर मरम्मत एवं रखरखाव खर्च (%)* 40 11. ट्रैक्टर की उपयोगी आयु (वर्ष) 10 12. प्रतिवर्ष ट्रैक्टर उपयोग (घंटे) 1,000 जीरो ट्रिलेज मशीन के आंकड़ेः 13. जीरो टिलेज मशीन का मूल्य (रूपये) 55,000 14. जीरो टिलेज मशीन का कबाड़ मूल्य (रूपये) 4,000 15. जीरो टिलेज मशीन की मरम्मत एवं रखरखाव (%)* 25 16. जीरो टिलेज मशीन की उपयोगी आयु (वर्ष) 5 17. जीरो टिलेज मशीन पर अनुदान 0 ब्याज दरः 18. कुल पूंजी पर ब्याज (%) 10 जीरो टिलेज मशीन के उपयोगी आयु पर खरीद मूल्य का प्रतिशत सहायक गणना: लाभ की गणना को सीधी और सरल करने के लिए पहले हम सीधे दो मूल्यों की गणना करते हैं जो कि बाद में लाभ की गणना करते समय शामिल करेंगे। प्रति वर्ष मशीन से बोया गया क्षेत्रफल = 3 एकड़ प्रतिदिन x 25 दिन = 75 एकड़ ट्रैक्टर का जीरो टिलेज व्यवसाय में किया गया अनुपातिक उपयोग = (75 एकड़ प्रतिवर्ष x 1.5 घंटा प्रति एकड़) /1000 घंटा प्रतिवर्ष = 0.1125 (= 11.25%) लाभ की गणना (वार्षिक आधार पर) कुल आय (रू.) 60,000 = 75 एकड़ x 800 रू. प्रति एकड़ परिवर्तनीय लागत की गणना (रू.) ईंधन 17,400 = 75 एकड़ x 4 ली. प्रति एकड़ x 58 रू. प्रति ली० व्यवसाय में लगे श्रमिक 7,500 = 25 दिन x 300 रू. प्रति दिन जीरो टिलेज मशीन की मरम्मत व रखरखाव 2,750 = 55,000 रू. x 0.25 /5 वर्ष ट्रैक्टर की मरम्मत व रखरखाव 2,475 = (550,000 रू. x 0.40/10 वर्ष) x 0.1125 कुल परिवर्तनीय लागत (रू.) 30,125 कुल लाभ (रू./एकड़) 398 = (60,000रू. - 30,125रू) / 75 एकड़ स्थिर लागत की गणना (रू.): जीरो टिलेज मशीन के मूल्यह्मस 10,200 = (55,000रू. - 4,000रू.) / 5 वर्ष जीरो टिलेज मशीन में लगी पूंजी पर ब्याज 2,950 = (55,000 रू. + 4,000 रू.)/) x 0.10 ट्रैक्टर का अनुपातिक मूल्यह्मस 4,500 = (550,000 रू. - 150,000 रू.) / 10 वर्ष) x 0.1125 ट्रैक्टर पर लगी पूंजी का अनुपातिक ब्याज 3,938 = (550,000 रू. + 150,000 रू.)/2) x0.10x0.1125 कुल स्थिर लागत (रू.) 21,588 शुद्ध लाभ (रू.) 8,288 = 60,000रू. - 30,125रू. - 21,588 रू. शुद्ध लाभ रू. प्रति एकड़ 111 = 8,288रू./75 एकड़ शुद्ध लाभ रू. प्रति दिन 332 = 8,288रू./25 दिन इस परिदृश्य में स्थिर लागत को पूरा करने के लिए बुआई के लिए आवश्यक क्षेत्र (एकड़) 54 = 21,588 रू. / 398 रू. प्रति एकड़ जब ट्रैक्टर का मूल्यह्मस और उससे सम्बंधित पूंजी पर ब्याज का हिस्सा जीरो टिलेज व्यवसाय में अनुपातिक रुप से शामिल किया जाता है। व्याख्या: उपरोक्त गणना में पहली महत्वपूर्ण बात ये है कि कुल लाभ जो कि प्रायः प्रति एकड़ या हैक्टेयर होता है। हम इसमेंदेखते हैं कि यह सकारात्मक (रु. 398 प्रति एकड़) है। जिसका अर्थ है कि सभी परिवर्तनीय लागतें एवं कुछ हिस्सा स्थिर लागत का भी निकलता है। इस परिदृश्य में यह इंगित होता है कि जीरो टिलेज को किराये पर चलाने से रू. 8,288 का शुद्ध लाभ हुआ है (इसमें सेवा प्रदाता के द्वारा उसकी मशीन को उसके अपने खेत पर प्रयोग शामिल नहीं है)। इस तरह स्थिर और परिवर्तनीय लागतें निकलने के साथ ही कुछ लाभ भी होता है। शुद्ध लाभ को कुल बोये गये क्षेत्र से विभाजित करने पर हम देखते हैं कि प्रति एकड़ शुद्ध लाभ रू. 111 है। इसी तरह हम यह जानना चाहते हैं कि सेवा प्रदाता 1 दिन में जीरो टिलेज से किराये के रूप में कैसे रू. 332 का शुद्ध लाभ कमाता है। यद्यपि इस परिदृश्य में जीरो टिलेज एक आकर्षक व्यवसाय है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि सेवा प्रदाता इसी अवधि में वैकल्पिक रूप से कितना लाभ कमा सकता है। प्रतिदिन होने वाला शुद्ध लाभ वैकल्पिक कार्यों से होने वाले लाभ की तुलना करने के लिए उचित पैमाना हो सकता है। अन्ततः इस परिदृश्य में शुद्ध लाभ-हानि की स्थिति इंगित करती है कि स्थिर लागत को पूरी तरह से निकालने के लिए 54 एकड़ खेत की बुआई करना आवश्यक है। अर्थात 55 एकड़ या इससे अधिक क्षेत्र की बुआई करने पर यह व्यवसाय लाभप्रद है। संस्करण 1: विवरणः- बुनियादी परिदृश्य के अनुसार ही, लेकिन इसमें किसान रू 30,000 का अनुदान जीरो टिलेज मशीन की खरीद पर प्राप्त करता है, जो कि तालिका 2 की मद संख्या 17 से सम्बन्धित है। जीरो टिलेज ड्रिल पर अनुदान (रू.) 30,000 इसके परिणामस्वरूप इस सेवा प्रदाता की लाभप्रदता की गणना निम्न प्रकार है; (परिवर्तनीय लागत पूर्वानुसार ही रहेगी जो कि यहाँ दुबारा दिखाना जरूरी नहीं है) स्थिर लागत की गणना (रू.): कुल लाभ (रू./एकड़) 398 जीरो टिलेज का मूल्यह्मस 4,200 जीरो टिलेज मशीन में लगी पूंजी पर ब्याज 1,450 ट्रैक्टर का अनुपातिक मूल्यह्मस 4,500 ट्रैक्टर पर लगी पूंजी का अनुपातिक ब्याज 3,938 स्थिर लागत (रू.) 14,088 शुद्ध लाभ (रू.) 15,788 शुद्ध लाभ प्रति एकड़ (रू. प्रति एकड़) 211 शुद्ध लाभ प्रति दिन (रू. प्रति दिन) 632 इस परिदृश्य में स्थिर लागत को पूरा करने के लिए बुआई के लिए आवश्यक क्षेत्र (एकड़ में) 35 व्याख्या - अनुदान से जीरो टिलेज मशीन की मूल्य में कमी आती है जिससे शुद्ध लाभ में रू. 15,788 की बढ़ोत्तरी होने से प्रति दिन का शुद्ध लाभ रू. 632 हो जाता है। संस्करण 2: विवरणः- यदि कोई सेवा प्रदाता 3 एकड़ के बजाय 4 एकड़ प्रतिदिन की बुआई करता है (तालिका 2 में मद संख्या 1)। नीचे दिए गए विवरण में अनुदान को शून्य रखा गया है। जिसका उदाहरण निम्नलिखित है। एक दिन में बुआई किये गये खेत का क्षेत्रफल 4 लाभप्रदता के परिणाम निम्न प्रकार बदल जाते हैं: कुल आय (रू.) 80,000 परिवर्तनीय लागत की गणना (रू.): ईंधन 23,200 काम में लगे श्रमिक 7,500 जीरो टिलेज मशीन की मरम्मत व रखरखाव 2,750 ट्रैक्टर की मरम्मत व रखरखाव 3,300 कुल परिवर्तनीय लागत (रू.) 36,750 कुल लाभ (रू./एकड़) 433 स्थिर लागत की गणना (रू.): जीरो टिलेज मूल्यह्मस 10,200 जीरो टिलेज मशीन में लगी पूंजी पर ब्याज 2,950 ट्रैक्टर का अनुपातिक मूल्यह्मस 6,000 ट्रैक्टर पर लगी पूंजी का अनुपातिक ब्याज 5,250 स्थिर लागत (रू.) 24,400 शुद्ध लाभ (रू.) 18,850 शुद्ध लाभ रू. प्रति एकड़ 189 शुद्ध लाभ रू. प्रति दिन 754 इस परिदृश्य में स्थिर लागत को पूरा करने के लिए बुआई के लिए आवश्यक क्षेत्र (एकड़ में)। 56 व्याख्या: एक दिन में 3 एकड़ के स्थान पर 4 एकड़ की बुआई करने पर (75 के बजाय 100 एकड़ की बुआई होगी) तथा यह स्थिर व परिवर्तनीय लागत को प्रभावित कर देगी। जीरो टिलेज मशीन को किराये पर चलाने से स्थिर लागत में बढ़ोत्तरी होगी क्योंकि इस कार्य में ट्रैक्टर का काम करने का समय 11.25% से बढ़कर 15% हो जायेगा। स्थिर लागत में पूर्णतः वृद्धि के बावजूद बोया गया क्षेत्र ज्यादा होने के कारण स्थिर लागत प्रति एकड़ घट जाती है। जिससे शुद्ध लाभ में प्रति एकड़ 70% (रु. 111 से 189) और प्रतिदिन 127% (रु. 332 से 754) वृद्धि होगी जो इस परिदृश्य में शुद्ध लाभ रू. 8,288 की तुलना में रू० 18,850 होगा। ध्यान दें कि प्रतिदिन 3 की अपेक्षा 4 एकड़ क्षेत्र की बुआई की जाये तो शुद्ध लाभ में प्रतिदिन 127% और प्रति एकड़ 70% की वृद्धि होगी। इस उदाहरण में यह दर्शाया गया है की अनुदान न मिलने पर भी शुद्ध लाभ रू. 18,850 हुआ है। शुद्ध लाभ में बढ़ोत्तरी बुआई का क्षेत्रफल प्रतिदिन 3 से बढ़कर 4 करने से हुआ है। संस्करण 3: विवरणः इस परिदृष्य में, यदि किसान 3 एकड़ के बजाय 5 एकड़ की बुआई करता है तो कार्य अवधि बढ़ने के कारण ट्रैक्टर चालक की मजदूरी रू. 300 प्रतिदिन से रू. 350 प्रतिदिन बढ़ा दी जाती है। क्योंकि इस परिदृश्य में बुआई का क्षेत्र 75 एकड़ से बढ़कर 125 एकड़ हो जाता है, जीरो टिलेज मशीन की मरम्मत का खर्च (मशीन की कुल कीमत व इसकी उपयोगी आयु के आधार पर) 25% से बढ़ाकर 35% कर देते हैं। एक दिन में बुआई किये गये खेत का क्षेत्रफल 5 मजदूरी प्रतिदिन (रू.) 350 जीरो टिलेज मशीन की मरम्मत एवं रखरखाव (%) 35 लाभप्रदता के परिणाम निम्न प्रकार हैं: कुल आय (रू.) 1,00,000 परिवर्तनीय लागत की गणना (रू.): ईंधन 29,000 श्रम 8,750 जीरो टिलेज मशीन की मरम्मत व रखरखाव 3,850 ट्रैक्टर की मरम्मत व रखरखाव 4,125 कुल परिवर्तनीय लागत (रू.) 45,725 कुल लाभ (रू./एकड़) 434 स्थिर लागत की गणना (रू.): जीरो टिलेज मशीन का मूल्यह्रास 10,200 जीरो टिलेज मशीन में लगी पूंजी का ब्याज 2,950 ट्रैक्टर का अनुपातिक मूल्यह्मस 7,500 ट्रैक्टर पर लगी पूंजी का अनुपातिक ब्याज 6,563 स्थिर लागत (रू.) 27,213 शुद्ध लाभ (रू.) 27,063 शुद्ध लाभ (रू. प्रति एकड़) 217 शुद्ध लाभ (रू. प्रति दिन) 1,083 इस परिदृश्य में स्थिर लागत को पूरा करने के लिए बुआई के लिए आवश्यक क्षेत्र (एकड़) 63 व्याख्याः इस परिदृष्य में संस्करण 2 की तुलना में शुद्ध लाभ प्रति एकड़ 15% (रू. 189 से रू. 217) एवं प्रति दिन 44% (रू. 754 से रू. 1,083) की वृद्धि होती है। इससे मजदूरी व जीरो टिलेज मशीन की मरम्मत एवं रखरखाव अधिक होने के बाद भी शुद्ध लाभ अधिक मिलता है। संस्करण 4: विवरणः संस्करण 4 में किसान संस्करण 3 की तरह ही सभी काम करता है लेकिन यहाँ वह 5 दिन प्रतिवर्ष अतिरिक्त बुआई करता है। एक वर्ष में कुल किये गये कार्य के दिनों की संख्या 30 लाभप्रदता की गणना निम्नलिखित हैं: कुल आय (रू.) 120,000 परिवर्तित लागत की गणना (रू.): ईंधन 34,800 श्रम 10,500 जीरो टिलेज मशीन की मरम्मत व रखरखाव 3,850 ट्रैक्टर की मरम्मत व रखरखाव 4,950 कुल परिवर्तनीय लागत (रू.) 54,100 कुल लाभ (रू./एकड़) 439 स्थिर लागत की गणना (रू.): जीरो टिलेज का मूल्यह्मस 10,200 जीरो टिलेज मशीन में लगी पूंजी पर ब्याज 2,950 ट्रैक्टर का अनुपातिक मूल्यह्मस 9,000 ट्रैक्टर पर लगी पूंजी का अनुपातिक ब्याज 7,875 स्थिर लागत (रू.) 30,025 शुद्ध लाभ (रू.) 35,875 शुद्ध लाभ रू. प्रति एकड़ 239 शुद्ध लाभ रू. प्रति दिन 1,196 इस परिदृश्य में स्थिर लागत को पूरा करने के लिए बुआई के लिए आवश्यक क्षेत्र (एकड़) 68 व्याख्याः संस्करण तीन की तुलना में अतिरिक्त किराया करने से प्रति एकड़ स्थिर लागत दर में कमी आयी है। इससे शुद्ध लाभ प्रति एकड़ पर 217 के स्थान पर 239 और प्रतिदिन 1,083 की अपेक्षा 1,196 रूपये की वृद्धि हुई है। संस्करण 5 (Variant): विवरणः आज के समय की वास्तविकता को देखते हुए इस विवरण में रू. 30,000 के अनुदान को मद्देनजर रखते हुए गणना की गयी है। और सब चीजें संस्करण 4 के जैसे ही हैं। जीरो टिलेज ड्रिल पर अनुदान (रू.) 30,000 लाभप्रदता के परिणाम निम्न प्रकार हो सकते हैं जिसमें कि परिवर्तनीय लागत को नहीं दिखाया गया है वे संस्करण 4 के समान ही हैं। कुल लाभ (रू./एकड़) 439 स्थिर लागत की गणना (रू.): जीरो टिलेज का मूल्यह्मस 4,200 जीरो टिलेज मशीन में लगी पूंजी पर ब्याज 1,450 ट्रैक्टर का अनुपातिक मूल्यह्मस 9,000 ट्रैक्टर पर लगी पूंजी का अनुपातिक ब्याज 7,875 स्थिर लागत (रू.) 22,525 शुद्ध लाभ (रू.) 43,375 शुद्ध लाभ रू. प्रति एकड़ 289 शुद्ध लाभ रू. प्रति दिन 1,446 इस परिदृश्य में स्थिर लागत को पूरा करने के लिए बुआई के लिए आवश्यक क्षेत्र (एकड़)। 51 व्याख्याः संस्करण 4 की तुलना में मशीन पर प्राप्त अनुदान से स्थिर लागत (Fixed cost) में कमी आने से लाभ में रू. 289 प्रति एकड़ एवं रु. 1,446 प्रति दिन की बढ़ोत्तरी हुई। संस्करण 6: विवरणः यहाँ संस्करण 5 की तरह इसमें सेवा प्रदाता प्रति दिन 6 एकड़ की बुआई करता है तथा यह सामान्य स्थिति में अधिकतम है। इस उदहारण में ट्रैक्टर चालक को ज्यादा काम करने पर रू. 50 प्रतिदिन का अतिरिक्त मजदूरी देने का प्रावधान है। जिससे ट्रैक्टर चालक की मजदूरी बढ़कर रू. 400 प्रतिदिन हो जाती है। कार्य अवधि बढ़ने से जीरो टिलेज मशीन की उपयोगी आयु 5 वर्ष से घटकर 4 वर्ष हो जाती है। एक दिन में बुआई किये गये खेत (एकड़) 6 मजदूरी प्रतिदिन (रू.) 400 जीरो टिलेज मशीन की उपयोगी आयु (वर्ष) 4 लाभप्रदता के परिणाम निम्न प्रकार हैं: कुल आय (रू.) 1,44,000 परिवर्तनीय लागत की गणना (रू.): ईंधन 41,760 श्रम 12,000 जीरो टिलेज मशीन की मरम्मत व रखरखाव 4,813 ट्रैक्टर की मरम्मत व रखरखाव 5,940 कुल परिवर्तित लागत (रू.) 64,513 कुल लाभ (रू./एकड़) 442 स्थिर लागत की गणना (रू.): जीरो टिलेज का मूल्यह्मस 5,250 जीरो टिलेज मशीन में लगी पूंजी का ब्याज 1,450 ट्रैक्टर का अनुपातिक मूल्यह्मस 10,800 ट्रैक्टर पर लगी पूंजी का अनुपातिक ब्याज 9,450 स्थिर लागत (रू.) 26,950 शुद्ध लाभ (रू.) 52,538 शुद्ध लाभ रू. प्रति एकड़ 292 शुद्ध लाभ रू. प्रति दिन 1,751 इस परिदृश्य में स्थिर लागत को पूरा करने के लिए बुआई के लिए आवश्यक क्षेत्र (एकड़) 61 व्याख्याः इस परिदृश्य में मशीन से अधिकतम बुआई करने से शुद्ध लाभ प्रति एकड़ रू. 292 बढ़ा और शुद्ध लाभ लगभग रू. 52,500 है। उदाहरणों की गणना से सीखने योग्य बिन्दुः पहला महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि प्रति एकड़ कुल लाभ सभी परिदृश्यों में मूलतः एक समान ही है जो कि संस्करण 1 से 6 तक रू. 398 से लेकर रू. 442 तक है। क्योंकि प्रति एकड़ होने वाले कुल लाभ में स्थिर लागत की गणना नहीं होती इसलिए कुल लाभ को प्रति एकड़ लाभ नहीं मानना चाहिए। केवल स्थिर लागत की गणना के बाद ही व्यवसाय की वास्तविकता का पता चलता है कि हमने इस व्यवसाय से कितना कमाया है जो कि विभिन्न संस्करणों में स्पष्ट तौर पर वर्णन किया गया है। बुआई का क्षेत्रफल बढ़ाने से जीरो टिलेज मशीन की सेवा का प्रावधान न सिर्फ समस्त बल्कि प्रति एकड़ होने वाला लाभ भी बढ़ता है। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे बड़े पैमाने की किफायतें कहते हैं। यदि बुआई का क्षेत्र अधिक हो तो इससे स्थिर लागत प्रति एकड़ घट जाती है। जैसे कि संस्करण में दर्शाया गया है, ट्रैक्टर चालक को अधिक मजदूरी देकर व मशीन के रखरखाव के खर्च में बढ़ोत्तरी तभी सार्थक होगी जब सेवा प्रदाता सेवा का क्षेत्र बढ़ाने में सक्षम होगा। यद्यपि जीरो टिलेज पर मिलने वाले अनुदान की राशि से कुल लाभप्रदता में वृद्धि होती है, लेकिन भविष्य में यदि अनुदान घटा या खत्म कर दिया जाये तब भी जीरो टिलेज मशीन किराये के लिए खरीदकर व्यवसाय के लिए चलाना एक आकर्षक निवेश है। मशीन निवेश में सेवा प्रदाता का आकर्षण उसके उसी समय में वैकल्पिक आय कमाने के अवसरों पर भी निर्भर करता है। अवधारणा – अवसर लागत, जोखिम और प्रतिस्पर्धा अवसर लागत: अवसर लागत दूसरी प्रकार की एक ऐसी लागत है जिसकी कई बार व्यवसाय में अनदेखी की जाती है परन्तु अर्थशास्त्र में अवसर लागत एक महत्वपूर्ण लागत है। क्योंकि संसाधन (भूमि, पूंजी, पानी, अन्य उपादान एवं श्रम) सीमित हैं। इन संसाधनों का एक समय में एक ही कार्य के लिए उपयोग किया जा सकता है। इसका सीधा उदाहरण यह है कि एक किसान रबी के मौसम में उस खेत पर अगर गेहूँ उगाने का निर्णय लेता है तो वह उस पर मक्का नहीं उगा सकता। इसका मतलब यह हुआ कि गेहूँ के लिए मक्का उगाने से होने वाला शुद्ध लाभ गेहूँ के लिए उसकी अवसर लागत है। इसके साथ ही साथ मक्का के लिए गेहूं उगाने से होने वाला शुद्ध लाभ मक्का के लिए उसकी अवसर लागत है। श्रमिकों की अवसर लागत: किसी भी श्रमिक की एक कार्य करने की कार्य कुशलता दूसरे कार्य करने की कार्य कुशलता से विशिष्ट हो सकती है। यह इसलिए है कि प्रत्येक श्रमिक के लिए अवसर उसकी दक्षता, कार्य कुशलता और योग्यता तथा कार्य करने के स्थान पर निर्भर है। किसानों के लिए भी वर्ष भर अवसर लागत बदलती रहती है जैसे कि फसल बोने से लेकर पकने तक विभिन्न अवस्थाओं पर निर्भर करता है। उदाहरण के तौर पर जब किसान को अपनी फसल में खरपतवार नियंत्रण करने की आवश्यकता है तब आप की अवसर लागत कुछ अन्य कार्य करने से (जैसे अपने मित्र के घर की मरम्मत) काफी अधिक होगी। क्योंकि यदि आप खरपतवारों का समय पर नियंत्रण नहीं करते हैं तो उस फसल की पैदावार में होने वाली कमी उसकी अवसर लागत होगी। (उपज में कमी लागत के बराबर होगी) यदि उसने खरपतवारों का समय पर नियंत्रण कर लिया तो उसके ऊपर कोई दूसरा काम करने का दबाव नहीं होने से उसके ऊपर मित्र की सहायता करने की अवसर लागत काफी कम होगी। यदि किसान जीरो टिलेज की सेवा रबी सीजन के शुरुआत में करने की सोचता है तो इस समय में उसके ट्रैक्टर का दूसरे कार्य में प्रयोग होने के लिए अवसर कम होंगे। अतः एक ही समय में ट्रैक्टर का वैकल्पिक प्रयोग करने के लिए इस बात को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि उस समय में प्रयोग होने वाली जीरो टिलेज मशीन का किराया करना एक आकर्षक विकल्प है या नहीं। इसके लिए जीरो टिलेज चलाने से होने वाले लाभ का मूल्यांकन उसी समय में अन्य कार्य के करने से होने वाले लाभ के सन्दर्भ में करना चाहिए जैसे कि ट्रैक्टर परिचालन, अपने तथा ट्रैक्टर चालक के समय की उपलब्धता, और जीरो टिलेज मशीन पर निवेश। किसान के पास अपने खेती के कार्यों के लिए ट्रैक्टर होता है और किसान जीरो टिलेज मशीन का प्रयोग प्रायः अपने खेतों पर ही करता है। इस स्थिति में मशीनों पर निवेश की गयी पूंजी निरपेक्ष हो जाती है जबकि वह उन्हें किराये पर चलायें या न चलायें। इस स्थिति में जीरो टिलेज से किराया करना किसानों की मशीनों का अधिकतम उपयोग होने के साथ ही यह निवेश की गयी पूंजी को वसूलने में भी सहायता करता है। इसके विपरीत यदि वह जीरो टिलेज को किराये पर नहीं चलाता तो मशीन उसकी अपनी बुआई करने के बाद खाली रहती है। इस तरह से रबी सीजन (अपने खेत में कार्य करने के अलावा) के शुरुआत में यदि किसान के पास ट्रैक्टर को अन्य आय अर्जित करने वाले कार्य को करने की सम्भावनायें सीमित हैं तब विशेषतः जीरो टिलेज से सेवा से अवसर लागत कम होती है। जोखिम: किसी भी व्यवसाय का जोखिम होने वाली आय और व्यय के अनुमानित स्तर को प्रभावित करता है। परिणामस्वरूप होने वाले लाभ में हमेशा कुछ सीमा तक अनिश्चितता रहती है। जीरो टिलेज से किराया करने के सम्बन्ध में जोखिम निम्न स्तर पर रहता है। क्योंकि किसान ट्रैक्टर के लिए निवेश अपने खेत पर अन्य सभी कार्य करने के लिए करता है और जीरो टिलेज मशीन पर मिलने वाला अनुदान जोखिम के स्तर को और भी कम कर देता है। यदि कोई किसान जीरो टिलेज को केवल किराये पर चलाने के लिए बिना अनुदान के भी खरीदता है और मांग घटने से किराया न मिलने के बावजूद भी अनुपातिक हानि सीमित रहती है। क्योंकि, प्रायः सेवा प्रदाता जीरो टिलेज मशीन का प्रयोग अपने खेत पर भी करता है जिससे उसकी जुताई की कुल लागत में कमी आने के साथ-साथ जीरो टिलेज पद्धति अपनाने से उसकी खेती में जोखिम कारकों की कमी आने के साथ ही उसकी गेहूँ की अगेती बुआई होने से उपज भी बढ़ती है। समय की बचत का तात्पर्य धान कटाई के बाद गेहूं की तुरन्त बुआई से है और अगेती बुआई होने से यह हीट स्ट्रेस के कारण गेहूं की फसल पर पड़ने वाले जोखिम को भी कम करता है। ऐसी परिस्थिति में यदि किसान जीरो टिलेज मशीन पर पैसा खर्च करता है तो जीरो टिलेज मशीन को किराये पर चलाने में कोई जोखिम नहीं है (जैसे कि ऊपर वर्णित कुल लाभ सकारात्मक होता है)। इसके विपरीत खेती एक स्वाभाविक जोखिम वाला व्यवसाय है एवं इसमें जीरो टिलेज से किराया करना जोखिम को कम करने में सहायक है। इस स्थिति में मशीन को किराये पर न चलाने से होने वाली हानि को वह अपने खेत की बुआई करते हुए कम कर सकता है। तथा जीरो टिलेज से किराया करना एक अतिरिक्त आय का श्रोत भी है। प्रतिस्पर्धा: जैसा कि ऊपर वर्णित है, व्यवसाय में (प्रतिस्पर्धा का मतलब सेवा प्रदाताओं के बीच में प्रतियोगिता से है जिसमे दूसरे सेवा प्रदाता कम दर पर अच्छी सेवा देकर आपके ग्राहकों को तोड़ सकते हैं) एक महत्वपूर्ण कारक है जो कि माँग को प्रभावित करता है। जीरो टिलेज से किराया करने में हानि होने की सम्भावना बहुत कम है। किराये पर मशीन चलाने से समय के साथ-साथ पूरी लागत निकल जाती है। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से आपकी सेवाओं की मांग घट जाएगी। यदि केवल अपने खेत पर ही मशीन का प्रयोग करते हैं तो प्रतिस्पर्धा का कोई महत्व नहीं है। जबकि एक व्यवसायी के रूप में सेवा प्रदाता इस अवसर का जीरो टिलेज को किराये पर चलाकर अधिकतम लाभ ले सकता है। वह अपने प्रतियोगियों से किराये में अन्तर रखते हुए समय के साथ-साथ एक मजबूत व्यावसायिक मॉडल बना सकता है। किसी भी व्यवसाय में टिकाऊपन के लिए लाभ होना अनिवार्य है। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में अग्रसित रहना उन सभी बिन्दुओं का जोड़ है जो ग्राहकों के बीच आपकी सेवा को ज्यादा आकर्षक बनाते हैं। सेवा प्रदाता को प्रतिस्पर्धा को समझना आवश्यक है और यह व्यवसाय की भावी रणनीति का हिस्सा होना चाहिए। अपने प्रतियोगियों के कार्य करने की क्षमता को समझकर ही आप अपने व्यवसाय में सुधार कर सकते हैं। उदाहरण के लिए वह अपने ग्राहकों को किस तरह की छूट देते हैं और कितना किराया प्रति एकड़ वसूलते हैं। इसके अतिरिक्त वह अपने ग्राहकों को क्या-क्या तथा कब-कब सेवाएं देते हैं। वर्तमान में उसके क्षेत्र में कौन-कौन सी सेवाएं किराया करने के लिए उपलब्ध हैं तथा उनमें आपस में क्या कमियाँ है। नये प्रतियोगी किसी भी समय व्यवसाय शुरू कर सकते हैं। इसे समझने के लिए कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैं। ग्राहक ही आपके कान और आंख हैं। ग्राहक से क्या पूछना है, यह जानना अनिवार्य है। अपनी सेवा के बारे में अच्छी तरह से पूछने के साथ-साथ अपने प्रतियोगियों के बारे में भी सही से जानें अपनी सेवाओं की गुणवत्ता, काम में लगने वाला समय और वसूले गये किराये के बारे में पूछे तथा अपनी सेवाओं के सुधार करने के लिए उनके क्या सुझाव हैं। अपने प्रतियोगियों के ग्राहकों से मिलें और उनके विचार तथा उनको मिलने वाली सेवाओं के गुणवत्ता के बारे में जानें। अपने कार्यक्षेत्र से बाहर के प्रतियोगी जो प्रतियोगिता में शामिल नहीं हैं, से विचार विमर्श कर उनके सुझाव लें। अपने मित्रों और पारिवारिक सदस्यों के साथ मिलकर नेटवर्क तैयार करें। पारिवारिक मित्र और पड़ोसी जब आपके कार्यों का एक बार परिणाम देख लेंगे तो वह आपके ग्राहक बन जायेंगे। बुआई से पूर्व इस बात को सुनिश्चित करें कि मशीन और ट्रैक्टर दोनों उपयुक्त तरीके से काम कर रहे हैं तथा चालक कुशलतापूर्वक प्रशिक्षित तथा काम के प्रति प्रतिबद्ध हों। जल्दी धान की कटाई करने वाले किसानों से सम्पर्क बनाकर रखें। इससे उनके खेतों में जल्दी बुआई का प्रदर्शन अन्य किसानों को बुआई के लिए आकर्षित करेगा। इसके लिए ऐसे खेत का चुनाव करें जहाँ से अधिकतर लोगों का आना-जाना हो। गेहूं की खेती के लिए सेवा प्रदाता को सभी उन्नत सस्य क्रियाओं की जानकारी होनी चाहिए जो कि आपको दूसरे सेवा प्रदाताओं की अपेक्षा अधिक काम के अवसर प्रदान करने में सहायक होगी। जीरो टिलेज पद्धति में अधिकतम सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए उसकी मूलधारणा के बारे में जानें, जैसे कि बुआई का उचित समय, उन्नत प्रजातियाँ, विभिन्न सिंचाई करने का समय और अन्य संस्तुतित सस्य क्रियाओं के बारे में वार्ता करते रहने से जीरो टिलेज से बुआई अधिक क्षेत्र में करने का अवसर प्रदान करेगी। ग्राहकों को जीरो टिलेज के अतिरिक्त खेती से सम्बन्धित अन्य बातें भी बतायें। व्यापार का बढ़ना एक बार सेवा प्रदाता जीरो टिलेज मशीन को किराये पर चलाने के साथ ही उन किसानों के यहाँ अन्य खेती से सम्बन्धित किराये के कार्य को करने के अवसरों का लाभ उठा सकते हैं। वर्ष भर चलने वाले अन्य कृषि सम्बन्धित किराये के कार्यों का विस्तार से तालिका 3 में वर्णन किया गया है। क्योंकि जब किसान को खेती से सम्बन्धित सभी कार्य एक ही सेवा प्रदाता द्वारा किये जाते हैं। तो इससे सेवा प्रदाता के समय में बचत होने के साथ ही लाभ में वृद्धि होती है। वर्ष भर में विभिन्न माह में खेती सम्बन्धित होने वाले कार्य फसलों की अवस्था पर निर्भर होता है। यह आय के जोखिम को कम करने में सहायक है, विशेष रूप से उस समय जब आपकी अवसर लागत कम हो। तालिका 3: सेवा प्रदाताओं के लिए वर्ष भर विभिन्न कार्यों को करने के अवसर माह सम्भावित कृषि सेवायें (कोष्ठक में मशीनरी का नाम) जनवरी धान की मड़ाई गेहूँ में खरपतवारनाशी का प्रयोग (ट्रैक्टर चलित स्प्रेयर), धान की कुटाई (ट्रैक्टर द्वारा चावल निकालने की मशीन) फरवरी धान की मड़ाई, मक्का की बुआई (मल्टीक्रॉप प्लान्टर), खेत का समतलीकरण (लेजर लैण्ड लेवलर मशीन), धान की कुटाई (ट्रैक्टर द्वारा चावल निकालने की मशीन) मार्च मूंग की बुआई (जीरो टिलेज मशीन), मक्के की बुआई (मल्टीक्रॉप प्लान्टर), धान की कुटाई (ट्रैक्टर द्वारा चावल निकालने की मशीन), खेत का समतलीकरण (लेजर लैण्ड लेवलर मशीन) । अप्रैल गेहूँ की कटाई (रिपर कम बाइंडर), एवं मड़ाई (Axial flow thresher), कटाई (कम्बाइन हार्वेस्टर द्वारा), भूसा बनाना (स्ट्रॉ रिपर) मई खेत का समतलीकरण (लेजर लैण्ड लेवलर मशीन), धान की बुआई (धान की सीधी बुआई-जीरो टिलेज द्वारा), नर्सरी/ मैट टाइप नर्सरी (बिक्री के लिए), धान की सीधी बुआई में खरपतवारनाशी का छिड़काव (ट्रैक्टर चलित स्प्रेयर) जून धान की बुआई (जीरो टिलेज), खेत का समतलीकरण (लेजर लैण्ड लेवलर मशीन), नर्सरी/मैट टाइप नर्सरी (बिक्री के लिए), धान की रोपाई, (ट्रान्सप्लान्टर मशीन), मक्का की बुआई (मल्टीक्रॉप प्लान्टर), धान की सीधी बुआई में खरपतवारनाशी का छिड़काव (ट्रैक्टर चलित स्प्रेयर) जुलाई धान की रोपाई (मशीन द्वारा), मक्का की बुआई (मल्टीक्रॉप प्लान्टर), धान और मक्का में खरपतवारनाशी का प्रयोग (ट्रैक्टर चलित स्प्रेयर)। अगस्त धान की रोपाई (मशीन द्वारा), धान और मक्का में खरपतवारनाशी का प्रयोग (ट्रैक्टर चलित स्प्रेयर) सितंबर धान और मक्का में कीटनाशक का छिड़काव (ट्रैक्टर चलित स्प्रेयर) अक्टूबर सरसों की बुआई (जीरो टिलेज मशीन), खेत का समतलीकरण (लेजर लैण्ड लेवलर मशीन), धान की मड़ाई नवंबर गेहूँ और सरसों की बुआई (जीरो टिलेज मशीन), मक्का की बुआई (मल्टीक्रॉप प्लान्टर), गेहूं में खरपतवारनाशी का छिड़काव (ट्रैक्टर चलित स्प्रेयर), धान की मड़ाई), धान की कुटाई (ट्रैक्टर द्वारा चावल निकालने की मशीन) दिसम्बर गेहूं की बुआई (जीरो टिलेज मशीन), मक्का में खरपतवारनाशी का छिड़काव (ट्रैक्टर चलित स्प्रेयर), धान की कुटाई (ट्रैक्टर द्वारा चावल निकालने की मशीन) अभिलेखों का रखरखाव किसी भी व्यवसाय की सफलता के लिए अभिलेखों के रखरखाव का बहुत महत्व है। बिना अभिलेखों के व्यवसायी अपने व्यवसाय का समय-समय पर मूल्यांकन, जाँच तथा भावी योजना नहीं बना सकता है। अभिलेखों को बहुत जटिल होना जरूरी नहीं है लेकिन कुछ महत्वपूर्ण तथ्य को चरणबद्ध तरीके से दर्ज करना जरूरी है। अभिलेखों से व्यवसाय उन्नत कैसे हो सकता है? अभिलेखों से पता चलता है कि आपका व्यवसाय कैसा चल रहा है। तथा इनसे समय-समय पर गलतियाँ समझने (जैसे कि खर्चा बहुत ज्यादा तो नहीं हो रहा है, या फिर ग्राहकों की संख्या कम तो नहीं हो रही है इत्यादि) में मदद मिलती है। अभिलेखों के माध्यम से भविष्य की योजनायें बनाने में सहायता मिलती है। पूर्व में व्यवसाय कैसा था और आगे क्या सुधार किये जा सकते हैं का पता लगाना सम्भव है। इसके आधार पर भविष्य के लिए सही तरह से योजना बना सकते हैं। अभिलेखों के आकलन से व्यवसाय की सामर्थ्य और खामियों का भी पता चलता है। तालिका 4 में खातों की सूचनायें भरने के काम आने वाली सूचनाओं का नमूना दिया गया है जो कि खातों की सही-सही सूचना भरने के काम आ सकती है। जिससे कुल आय की प्राप्ति, इसमें लगने वाली मजदूरी, खपत होने वाला ईंधन, और सभी तरह के खर्चा आदि की गणना प्रति दिन की जा सकती है। सभी सूचनाओं को जोड़कर पूरे साल का विवरण बनाया जा सकता है। इस व्यवसाय के मद संख्या 1 से 7 तक को तालिका 2 (सत्र 6) में दर्शाया गया है। दिये गये विवरण के अनुसार विभिन्न मदों की गणना खाता अ और ब (तालिका 4) के अनुसार कर सकते हैं। जीरो टिलेज सेवा से सम्बन्धित इन सूचनाओं को स्थिर लागत में जोड़ा जाता है जिसको कि तालिका 2 (मद संख्या 8 से 18 तक) सन्दर्भ पेज न. 46 में दर्शाया गया है। कोई भी सेवा प्रदाता उसके व्यवसाय की लाभप्रदता की गणना यहाँ दर्शाये गये सत्र 6 के उदाहरण के अनुसार कर सकता है। यहाँ सेवा देने का समय एक अवसर लागत के रूप में है। तालिका 4 में खाता का उद्देश्य यह है कि व्यवसायी जीरो टिलेज की सेवा में लगने वाले समय का अनुमान लगा सकता है। जबकि यह सीधे लाभप्रदता की गणना में शामिल नहीं किया जाता है। तालिका 4: जीरो टिलेज सेवा में प्रयोग होने वाली दैनिक पुस्तिका बुआई की तिथि : अ- ग्राहक का विवरण क्रम सं० ग्राहक का नाम (किसान) गाँव बोया गया क्षेत्र (एकड़) किराया प्रति एकड़ (रूपये) बुआई करने में लगा समय (मिनट) ब- जीरो टिलेज मशीन से किये गये कार्य का प्रति दिन का विवरण ग्राहक के खेत तक पहुँचने में लगा समय (मिनट) उस दिन जीरो टिलेज से ग्राहक के खेत तक आने-जाने व कार्य करने में कुल ईंधन की खपत (लीटर में) ईंधन का मूल्य (रू./लीटर) ट्रैक्टर चालक की मजदूरी (रूपये/दिन) स- अप्रत्यक्ष समय जिसकी कीमत लाभ गणना में नहीं ली गयी सेवा प्रदाता या उसके किसी अन्य परिवार के सदस्य द्वारा खेत में लगा समय जिसकी कोई | मजदूरी नहीं दी गयी (मिनट) उस दिन सेवा प्रदाता द्वारा ग्राहक के साथ बातचीत करने में लगा समय (मिनट) स्त्रोत: दक्षिण एशिया के लिए खाद्यान प्रणाली की पहल