भारत में अंडे और मांस का करोबार तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में बटेर पालन एक बहुत ही अच्छा व्यवसाय हो सकता है। इसके लिये कम स्थान एवं कम खर्च की जरूरत होती है तथा किसान अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। व्यावसायिक मुर्गीपालन में चिकन फार्मिंग के बाद बत्तख पालन और तीसरे स्थान पर जापानी बटेर पालन का व्यवसाय आता है। जापानी बटेर के अंडे का वजन उसके शरीर के वजन का आठ प्रतिशत होता है, जबकि मुर्गी का तीन प्रतिशत ही होता है। जापानी बटेर को 70 के दशक में अमेरिका से भारत लाया गया था जो कि अब भारत में भी व्यावसायिक रूप ले चुका है। भाकृअनुप-केंद्रीय पक्षी अनुसंधान केंद्र इज्जतनगर बरेली एवं नमक्कल वेटनरी कालेज एवं रिसर्च इंस्टिट्यूट नमक्कल (तमिलनाडु) में किसानों को इसके पालन का प्रशिक्षण दिया जाता है। जापानी बटेर के अंडे तथा चूजे किसान उपरोक्त दोनों संस्थाओं से प्राप्त कर सकते हैं। बटेर पालन के लिए स्थान का चुनाव महत्वपूर्ण है। इसके लिए आवास हवादार और रोशनीयुक्त होना चाहिए उसमें प्रकाश और पानी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। एक वयस्क बटेर को 200 वर्ग सें.मी. जगह में रखना चाहिए। इसको सूर्य की सीधी रोशनी और सीधी हवा में बचाना चाहिए। मुर्गी की अपेक्षा बटेर अधिक गर्म वातावरण में रह सकती है। ब्रूडिंग आवास में खिड़कियां और रोशनदान का होना जरूरी है जिससे एक समान रोशनी और हवा बटेर को मिल सके। इसके चूजों को पहले दो सप्ताह तक 24 घंटे प्रकाश की आवश्यकता होती है और गर्मी पहुंचाने के लिए बिजली या अन्य स्त्रोत की व्यवस्था होनी चाहिए। बटेर के लिए ब्रूडर गृह का तापमान पहले सप्ताह में 95 डिग्री फॉरेनहाइट होना चाहिए। इसके बाद क्रमशः 5 डिग्री फॉरेनहाइट धीरे-धीरे प्रति सप्ताह कम करते रहना चाहिए। बटेर पालन दो प्रकार की आवास प्रणाली में किया जा सकता है। सारणीः बटेर के लिए आहार बनाने की विधि आहार के विभिन्न अवयव (प्रतिशत) चिक मैश ग्रोवर मैश 0-3 सप्ताह 4-6 सप्ताह मक्का 27 31 ज्वार 15 14 डी ऑयल्ड राइस ब्राॅन 8 8 मूंगपफली केक 17 17 सन फ्लावर केक 12.5 12.5 सोया मील 8 - फिश मील 10 10 मिनरल मिक्स्चर 2.5 2.5 शैल ग्रिट – 5 गहरी बिछावन प्रणाली इस पद्धति में बटेर को फर्श पर पाला जाता है इसमें फर्श पर लकड़ी का बुरादा या धान का छिलका लगभग 2 से 2.5 इंच मोटा बिछाया जाता है फिर बटेर को इस बुरादे पर पाला जाता है। इस पद्धति से बटेर को पहले दिन से बाजार में बेचने तक पाला जा सकता है। 6 बटेर के लिए 1 वर्ग फीट जगह की जरूरत होती है। इससे बटेर का शारीरिक वजन अच्छा मिलता है। क्योंकि पक्षी अनावश्यक रूप से नहीं घूम पाता है। पिंजड़ा प्रणाली इस पद्धति में बटेर को विशेष प्रकार से बनाये गए पिंजड़े में पाला जाता है। यह प्रणाली कई प्रकार से फायदेमंद रहती है जैसे कि कम जगह में ज्यादा बटेर पाले जा सकते हैं। इसमें बटेर की बीट पिंजड़े से नीचे गिर जाती हैं, जिसके कारण कई प्रकार के रोगों के होने की आशंका कम रहती है। एक पिंजड़ा 6 फीट लंबा एवं 1 फीट चौड़ा होना चाहिये जो कि 6 यूनिट में विभाजित होना चाहिये। प्रथम दो सप्ताह तक इसका आकार 3×2.5×1.5 फीट होना चहिये जिसमें 100 बटेर पाली जा सकती हैं। 3 से 6 सप्ताह तक पिंजड़े का आकार 4×2.5×1.5 फीट होना चहिये जिसमें 50 बटेर पालन संभव है। आहार प्रबंधन बटेर पक्षी के शरीर का आकार बहुत छोटा होने के कारण इसके आहार की मात्रा भी कम देनी पड़ती है। आहार देने के पहले उसको बारीक पीस लेना चाहिये। बटेर के चूजों को अच्छी शारीरिक वृद्धि के लिए संतुलित आहार के साथ ही 6 से 8 प्रतिशत शीरे का घोल 3-4 दिनों तक देना चाहिए और आहार में 0-3 सप्ताह तक 25 प्रतिशत और 4 से 5 सप्ताह में 20 प्रतिशत प्रोटीनयुक्त आहार देना चाहिए। 6 माह की बटेर को प्रतिदिन 30-35 ग्राम आहार की जरूरत होती है। एक बटेर को 12 अंडे के उत्पादन के लिए 400 ग्राम आहार की आवश्यकता होती है। लिंग पहचान बटेरों में लिंग की पहचान मुर्गी चूजों की तरह एक दिन की आयु पर की जाती है। परंतु तीन सप्ताह की आयु पर पंखों के रंग के आधार पर, जिसमें नर की गर्दन के नीचे के पंखों का रंग लाल, भूरा, धूसर और मादा की गर्दन के नीचे के पंखों का रंग हल्का लाल और काले रंग के धब्बेदार होता है। मादा बटेर के शरीर का भार नर से 15 से 20 प्रतिशत अधिक होता है। प्रकाश व्यवस्था वयस्क बटेर या अंडा देने वाली बटेर के लिए 16 घंटे प्रकाश और 8 घंटे का अंधेरा जरूरी है। बटेर के मांस उत्पादन में वृद्धि करने के लिए और बाजार भेजने से पहले 7-10 दिनों तक 8 घंटे प्रकाश और 16 घंटे अंधेरा रखना जरूरी है। अंडा उत्पादन मुर्गी की अपेक्षा बटेर अपने दैनिक अंडा उत्पादन का 70 प्रतिशत दोपहर 3 बजे से 6 बजे के बीच करती है। शेष अंधेरे में देती है, जिसको दिन में 3-4 बार में इकट्ठा करना चाहिए। बेहतर उत्पादन के लिए और अंडे से चूजा निकलने के लिए नर और मादा (ब्रीडर बटेर पैरेंट) की आयु 10 से 28 सप्ताह के बीच की होनी चाहिए। एक नर बटेर के साथ 2 से 3 मादा बटेरों को रखना चाहिए। बटेरों के चोंच,पैर के नाखून थोड़े काट देने चाहिए, ताकि एक दूसरे को घायल न कर सकें। टीकाकरण बटेरों में किसी प्रकार का टीकाकरण नहीं करना पड़ता है, क्योंकि इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। बटेर के आहार में 5 प्रतिशत सूखा केजीन( फटे दूध का सफेद भाग) मिलाने से कम मृत्युदर और अच्छी शारीरिक वृद्धि होती है। बटेर को औषधि के रूप में मिनरल और विटामिन सप्लीमेंट दिए जाते हैं। बटेर चूजे का बढ़िया प्रबंधन करके बटेर फार्म एरिया का कीटाणु शोधन पीने के लिये साफ पानी और उच्च गुणवत्ता वाला कंसन्ट्रेट दाना खिलाकर रोगों को रोका जा सकता है। बटेर पालन की मुख्य विशेषताएं बटेर पक्षी का छोटा आकार (150 से 200 ग्राम शरीर भार) होने के कारण इस व्यवसाय को करने के लिए कम जगह की आवश्यकता होती है। इसका रखरखाव काफी आसान होता है। यह 5 सप्ताह में ही मांस के लिए तैयार हो जाती है। बटेर के अंडे और मांस में अमीनो अम्ल, विटामिन, वसा और खनिज लवण की प्रचुर मात्रा होती है। बटेर में रोग प्रतिरोधक क्षमता होने के कारण इनको किसी भी प्रकार का टीका लगाने की आवश्यकता नहीं होती है। इनमें रोग न के बराबर होते हैं। मादा बटेर 6 सप्ताह (42 दिन) में अंडा उत्पादन शुरू कर देती है, जबकि कुक्कुटपालन (अंडा उत्पादन करने वाली मुर्गी) में 18 सप्ताह (120 दिनों) के बाद अंडा उत्पादन शुरू होता है। बटेर को खुले में नहीं पाला जा सकता है। इसका पालन बंद जगह पर किया जाता है क्योंकि यह बहुत तेजी से उड़ने वाला पक्षी है। यह तीन सप्ताह में बाजार में बेचने के योग्य हो जाती है। अंडा उत्पादन करने वाली एक बटेर एक दिन में 18 से 20 ग्राम दाना खाती है, जबकि मांस उत्पादन करने वाली एक बटेर एक दिन में 25 से 28 ग्राम दाना खाती है। पहले दो सप्ताह में बटेर पालन में बहुत ध्यान देना होता है जैसे कि 24 घंटे रोशनी, उचित तापमान, बंद कमरा तथा दाना-पानी इत्यादि। स्त्रोत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), अनिल कुमार गिरि एवं राजू पानसे सहायक प्राध्यापक कृषि महाविद्यालय बालाघाट मध्यप्रदेश, श्रेमंकर श्रमण-सहायक प्राध्यापक, पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशु पालन महाविद्यालय, जबलपरु मध्य प्रदेश, बृज किशोर प्रजापति वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र, बालाघाट,मध्यप्रदेश