दूध उत्पादकता और प्रजनन क्षमता भारत, दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी है। लेकिन भारतीय पशुओं की औसत दूध उत्पादकता विश्व की तुलना में लगभग आधी है। इन पशुओं की कम दूध उत्पादकता मुख्य रूप से उनकी निम्न आनुवंशिक क्षमता, अनुचित प्रजनन प्रबंधन, रोगों, परजीवियों के संक्रमण और असंतुलित आहार के कारण है। डेरी उद्यम की गुणवत्ता, पशु की प्रजनन क्षमता पर टिकी होती है। प्रतिवर्ष एक बछड़ा प्राप्त करना एक डेरी फार्म का लक्ष्य होना चाहिए, ताकि पशुओं से अधिकतम लाभ हो सके। यह लक्ष्य विशेष रूप से मादा पशुओं में प्रजनन संबंधी समस्याओं के कारण बाधित हो जाता है। इसलिए पशुपालकों को प्रजनन संबंधी समस्याओं के प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित करना अति आवश्यक है। प्रजनन संबंधी समस्यायें आज के समय में पशुपालन व्यवसाय के सामने कई चुनौतियां हैं। इनमें मादा पशुओं में प्रजनन संबंधी समस्याओं की व्यापकता चिंता का प्रमुख विषय है। क्षेत्रीय स्थिति में अमदकाल और पुनरावृत्ति प्रजनन दो सबसे बड़ी गंभीर प्रजनन समस्याएं हैं, जिससे कुल 30-40 प्रतिशत गाय और भैंसों की संख्या प्रभावित है। इससे सालाना 20-30 लाख टन दुग्ध उत्पादन में कमी आती है और लगभग 50,000 करोड़ रुपये की आर्थिक हानि होती है। क्षेत्रीय परिस्थिति में निम्नलिखित आठ प्रजनन संबंधी समस्याएं होती हैं जिनका पशुओं की प्रजनन क्षमता पर सीधा प्रभाव पड़ता हैः पशुओं की यौन परिपक्वता में देरी होना भारतीय पशुओं में यौन परिपक्वता और शारीरिक विकास विदेशी पशुओं की तुलना में देरी से होता है। ग्रामीण परिवेश में देखा गया है कि देसी गाय व भैंस 3-4 साल की आयु के बाद भी गाभिन नहीं हो पाती है, जिससे पशुपालक को आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। अमदकाल इसमें पशु गर्मी में नहीं आता, या फिर मूकमद, जिसमें पशु मदचक्र में तो होता है, पर गर्मी में होने के लक्षण नहीं दिखाता है या फिर पशुपालक उन लक्षणों को पहचान नहीं पाते। पुनरावृत्ति प्रजनन इसमें किसी पशु में सामान्य रूप से प्रजनन चक्र चल रहा हो, कोई क्लीनीकल असामान्यता न हो, फिर भी जो तीन या तीन से अधिक बार लगातार गर्भाधान कराने के बाद भी गर्भधारण करने में असमर्थ हो, तो ऐसे पशु को रिपीट ब्रीडर (पुनरावृत्ति प्रजनक) कहते हैं। गर्भपात प्रसव के सामान्य समय से पूर्व गर्भस्थ शिशु की मृत्यु हो जाती है और शिशु गर्भावस्था के 45 से 265 दिनों के अंदर पशु के शरीर से मृत अवस्था में बाहर आ जाता है। कठिन प्रसव/डिस्टोकिया मादा पशु अपने बच्चे को स्वयं के प्रयासों से प्रसव नहीं करा पाती और प्रसव कराने के लिए कृत्रिम प्रयास की आवश्यकता होती है। रीटेंड प्लेसेंटा या जेर न गिरना सामान्य प्रसव के 12 घंटे के बाद भी जेर नहीं गिरता और इसे पशु चिकित्सक की मदद से निकलवाना पड़ता है। गर्भाशय संक्रमण प्रसव के दौरान या उसके बाद पशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, जिससे अनेक सूक्ष्मजीवों का संक्रमण हो सकता है। यह गर्भाशय संक्रमण नामक रोग पैदा करता है। गर्भाशय संक्रमणों के परिणामस्वरूप मैट्रिटिस, एंडोमेट्रैटिस और पयोमेट्रा जैसे रोग होते हैं। गर्भाशय प्रोलेप्स इसे आम भाषा में फूल दिखाना, पाक्षा दिखाना या बेल निकलना भी कहते हैं। इसमें गर्भाशय अपने सामान्य स्थान से निकलकर योनि मार्ग से बाहर निकल आता है, या दिखाई देने लगता है। यह प्रसव के तुरंत या कुछ घंटों के अंदर होता है। इन सभी समस्याओं के कारण पशुपालक को आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। इन समस्याओं का मुख्य कारण पशुपालकों के बीच पशुओं के रखरखाव, प्रजनन एवं खानपान की जानकारी का अभाव होना है। इसलिए पशुपालकों को विभिन्न पहलुओं के प्रति जागरुक करना अति आवश्यक है, ताकि वे अपने स्तर पर उक्त समस्याओं का प्रबंधन कर सकें। दुधारू पशुओं में प्रजनन संबंधी समस्याओं का प्रबंधन दुधारू पशुओं में प्रजनन संबंधी समस्याओं का प्रबंधन पशुपालक अपने स्तर पर निम्नलिखित उपायों को अपनाकर प्रजनन संबंधी समस्याओं का प्रबंधन कर सकते हैं: उपयुक्त तकनीक और सही समय का चनुाव प्रथम प्रजनन के समय पशु का शारीरिक वजन उनके वयस्क शारीरिक वजन का 60-70 प्रतिशत होना चाहिए। सामान्यतः दुधारू पशु प्रत्येक 21वें दिन गर्मी में आते हैं और यह गर्मी 12-24 घंटे तक रहती है। इसलिए पशु को गर्भित करने के लिए उपयुक्त समय गर्मी की मध्य अवस्था है यानी 8-12 घंटे में गर्भाधान करायें। गर्भाधान कराने के लिए पूर्वान्ह-अपरान्ह नियम का इस्तेमाल करें। यदि गाय सुबह गर्मी में आई हो तो उसे शाम और अगर शाम/रात को गर्मी में आई है तो दूसरे दिन सुबह गर्भाधान कराना चाहिए। अधिकांश तौर पर देखा गया है कि गाय के गर्मी में शुरू होने का वक्त और पशुपालक का उसे पहचानने का वक्त अलग-अलग होता है। ऐसे मे पशुपालक को चाहिए कि वे तुरंत अपनी गाय का गर्भाधान करा दें। अगर फिर भी गाय गर्मी के लक्षण दिखा रही है तो 12 घंटे के बाद फिर से गर्भाधान करायें। अगर पशुपालक अपने पशु में प्राकृतिक गर्भाधान करवाते हों तो उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि प्रजनक सांड किसी भी संक्रामक रोग से ग्रसित न हो। वह श्रेष्ठ वंशावली का हो और मादा और नर के शारीरिक अनुपात में बहुत ज्यादा भिन्नता न हो। अक्सर देखा गया है कि पशुपालक अपनी अवर्णित नस्ल की गाय को गाभिन कराने के लिए विदेशी नस्ल के सांड का वीर्य इस्तेमाल करते हैं, जिससे गर्भस्थ शिशु आकार में बड़ा हो जाता है और प्रसव के दौरान फंस जाता है। इससे कठिन प्रसव और योनि प्रोलेप्स जैसी समस्याएं पैदा होती हैं, इसलिए नस्ल सुधार के लिए अपनी देसी गाय जैसे गिर, साहीवाल और थारपारकर का इस्तेमाल करें। अगर गाय को कहीं बाहर ले जाकर गर्भाधान कराया जा रहा हो तो उसे 10-20 मिनट आराम देने के बाद ही गर्भाधान की प्रक्रिया शुरू करानी चाहिए। प्रसव के तुरंत बाद गर्भाधान नहीं कराना चाहिए। गर्भाधान के बाद 12 मिनट की ग्रीवा मालिश देने से गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है। गर्भाधान के 45-60 दिनों के बाद किसी योग्य पशु चिकित्सक से जांच करानी चाहिए। प्रत्येक पशु का प्रजनन रिकॉर्ड ठीक तरह से बनाना चाहिए। जैसे गर्भाधान दिनांक, प्रथम ब्यांत का दिनांक, दो ब्यांत के बीच का अंतराल इत्यादि। इस रिकॉर्ड को समय-समय पर अपडटे भी करें। पशुओं में सही समय पर गर्मी का पता लगाना पशुपालक को पशुओं में परिपक्वता की आयु का ध्यान रखना चाहिए। संकर गाय 18-24 महीने की उम्र में परिपक्व हो जाती है। देसी गाय और भैंस लगभग 18-30 और 24-36 महीने में क्रमशः परिपक्व होती है। इस उम्र के बाद वह गर्मी में आना शुरू हो जाती है। पशुपालक को अपने पशुओं के गर्मी में होने के स्पष्ट लक्षणों की पूरी जानकारी होनी चाहिए ताकि वे सही समय पर गर्मी का पता लगा सकें। पशुओं में गर्मी के लक्षण इस प्रकार हैंः मादा पशु का अन्य किसी पशु पर चढ़ना या दूसरे पशु विशेषकर सांड को अपने ऊपर चढ़ने देना, बार-बार रंभाना, बैचेनी, आहार कम खाना, दूध उत्पादन में कमी, योनि मार्ग से पारदर्शी, चिपचिपा और गाढ़ा श्लेष्म रिसाव का लटका होना, योनि मार्ग का गुलाबी रंग का या गीला होना, नर पशु या सांड के प्रति आकर्षित होना, दूसरे पशुओं के जननांगों को सूंघना और बार-बार, थोड़ा-थोड़ा मूत्र विसर्जित करना आदि। शोध से पता चला है कि अधिकांश पशु (60-70प्रतिशत) मद में सायं 6 बजे से प्रातः 6 बजे के बीच आते हैं। यह अवधि 12-24 घंटे तक रहती है। इसलिए पशुपालक को अपने फार्म में पशुओं को गर्मी में देखने के लिए समय निर्धारित कर लेना चाहिए, जो पशु गर्मी में आने वाला हो उसकी खास निगरानी करनी चाहिए। कम से कम 24 घंटों में 3 से 4 बार जांच जरूर करनी चाहिए। पशु की गर्मी की अनियमितता होने पर पशु चिकित्सक को अवश्य दिखाना चाहिए। पशुओं को उचित मात्र में आहार और पोषण देना बछड़ी/कटड़ी को संतुलित आहार देना चाहिए, जिसमें ऊर्जा, प्रोटीन, विटामिन एवं खनिज लवण भरपूर मात्र में हों। बछड़ी जिसका वजन 250-300 कि.ग्रा. हो उसे 2-3 कि.ग्रा. दाना, 10 कि.ग्रा. हरा चारा, 2-2.5 कि.ग्रा. सूखा चारा, 50 ग्राम खनिज मिश्रण और 30-50 ग्राम आयोडीनयुक्त नमक प्रतिदिन देना चाहिए। ये सब देने से बछड़ी में यौन परिपक्वता जल्दी आ जाती है और गर्भाधान के लिए जल्दी तैयार हो जाती है। शुष्क गाय प्रबंधन भी प्रजनन समस्याओं जैसे जेर न गिरना, कठिन प्रसव और गर्भाशय संक्रमण आदि समस्याओं का रोकने आरै इसके प्रभावों को कम करने का सबसे अच्छा तरीका है। शुष्क गाय या भैंस जिसका वजन 400 से 500 कि.ग्रा. हो, उसे 2-3 कि.ग्रा. दाना मिश्रण, 25-30 कि.ग्रा. हरा चारा, और 3-4 कि.ग्रा. सूखा चारा प्रतिदिन खिलाना चाहिए। प्रसव के 1 से 2 महीने पहले से पशुओं को दाने के साथ 150-200 ग्राम सरसों या मूंगफली का तेल मिलाकर देने से जेर आसानी से बाहर आ जायेगी। गर्भावस्था के दौरान पशु को 1-1.5 कि.ग्रा. अतिरिक्त दाना देना चाहिए। प्रसव की अनुमानित तिथि से ठीक 2-3 महीने पूर्व सुखा कर देना चाहिए। इससे पशु के अगले ब्यांत के लिए तैयार होने में मदद मिलती है और शिशु का विकास भी अच्छी तरीके से होता है। आहार में सेलेनियम, फॉस्पफोरस, कैल्शियम और विटामिन ए, सी, ई का पूरक देना चाहिए। प्रसव के 1 माह पूर्व से अतिरिक्त कैल्शियम देना बंद कर देना चाहिए। ऐसा करने से उच्च दूध उत्पादन वाले पशुओं में दुग्ध ज्वर होने की आशंका कम हो जाती है। पशुओं के लिए उचित स्वास्थ्य और आवास का महत्व पशुशाला की सफाई रोजाना करनी चाहिए। पशु के रहने की जगह हवादार होनी चाहिए और पर्याप्त छाया भी होनी चाहिए। ट्रांजिशन अवधि यानी प्रसव से 3 सप्ताह पहले और प्रसव के 3 सप्ताह बाद के दौरान गाभिन पशुओं को झुंड से अलग रखना चाहिए। प्रसव के दौरान गर्भाशय विभिन्न संक्रमण के प्रति अति संवेदनशील होता है, इसलिए प्रसव हमेशा स्वच्छ स्थान पर ही कराना चाहिए। पशुओं को समय-समय पर विभिन्न रोगों के टीके लगवाएं लेकिन गर्भपात से बचने के लिए आखिरी तिमाही में टीकाकरण नहीं करवाना चाहिए। पशुपालक को चाहिए कि वे पशुओं में हर 6 महीने में बाह्य परजीवी और अंतःपरजीवी के नियंत्रण के लिए पशु चिकित्सक द्वारा सुझाये गए कृमिनाशक जैसे अल्बंडाजोल या इवरमक्टिन का इस्तेमाल करें। पशुओं को कुछ समय के लिए स्वच्छंद विचरण के लिए छोड़ देना चाहिए, उन्हें हमेशा बांधकर नहीं रखना चाहिए। इससे कठिन प्रसव और गर्भाशय प्रोलेप्स जैसी समस्या को कम किया जा सकता है। पशुओं को स्वच्छ और ताजा पानी दिन में कम से कम 2-3 बार पिलाना चाहिए। ऊपर दिए गए उपायों को अपनाकर पशुपालक अपने दुधारू पशुओं की प्रजनन संबंधी समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं और पशपुालन व्यवसाय को और भी लाभकारी बना सकते हैं। स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), लेखक: दीक्षा पटेल-वैज्ञानिक, कृषि प्रसार, कृषि विज्ञान केंद्र, बांदा, बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा (उत्तर प्रदेश),के. पोंनुसामी-प्रधान वैज्ञानिक, डेरी विस्तार विभाग, राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान, करनाल (हरियाणा)