परिचय भारतीय डेरी व्यवसाय में घी का महत्वपूर्ण स्थान है। देश में उत्पादित दूध की सर्वाधिक मात्रा घी में परिवर्तित की जाती है। हमारे देश में भैसों की लगभग 23 नस्लें जिसमें से 12 नस्लों को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद व नस्ल पंजीकरण समिति द्वारा मान्यता प्रदान की गई है। भदावरी उनमें से महत्वपूर्ण नस्ल है, जो दूध में अत्याधिक वसा प्रतिशत के लिए प्रसिद्ध है। भदावरी भैंस के दूध में औसतन 8.0 प्रतिशत वसा पाई जाती है, जो देश में पाई जाने वाली भैंस की किसी भी नस्ल से अधिक है। भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झांसी में भदावसी भैंस संरक्षण एवं संर्वधन परियोजना के तहत रखे गए भैंसों के समूह में भदावरी भैंस के दूध में अधिकतम 13-14 प्रतिशत तक वसा पाई गई है। भदावरी भैंस के दूध का औसत संगठन तालिका 1 में दिया गया है। तालिका 1. भदावरी भैंस के दूध का औसत संगठन वसा 8.20 प्रतिशत (6 से 14 प्रतिशत) कुल ठोस तत्व 19.00 प्रतिशत प्रोटीन 4.11 प्रतिशत कैल्सियम 205.72 मिग्रा./100 मिली. फास्फोरस 140.90 मिग्रा./100 मिली. जिंक 3.82 माइक्रो ग्रा./मिली. कॉपर 0.24 माइक्रो ग्रा./मिली. मैग्नीज 0.117 माइक्रो ग्रा./मिली. पहचान एवं विशेषताएं इस नस्ल की भैंस का शारीरिक आकार मध्यम, रंग ताबिया तथा शरीर पर बाल कम होते है। टांगे छोटी तथा मजबूत होती है। घुटने से नीचे का हिस्सा हल्के चीले सफेद रंग का होता है। सिर के अगले हिस्से पर आँखों के ऊपर वाला भाग सफेदी लिए हुए होता है। गर्दन के निचले भाग पर दो सफेद धारियां होती है जिन्हें कंठ माला या जनेऊ कहते है। अयन का रंग गुलाबी होता है। सींग तलवार के आकार का होता है। इस नस्ल के वयस्क पशुओं का औसतन भार 300-400 किग्रा. होता है। छोटे आकार तथा कम भार की वजह से इनकी आहार आवश्यकता भैंसों की अन्य नस्लों (मुख्यतया मुर्रा, नीली रावी, जाफरावादी, मेहसाना आदि) की तुलना के काफी कम है जिससे इसे कम संसाधनों में गरीब किसानों पशुपालकों भूमिहीन कृषकों द्वारा आसानी से पाला जा सकता है। इस नस्ल के पशु कठिन परिस्थितियों में रहने की क्षमता रखते है तथा अति गर्म और आर्द्र जलवायु में आराम से रह सकते है। दूध में अत्यधिक वसा, मध्यम आकार और जो भी मिल जाए उसको खाकर अपना गुजारा कर लेने के कारण इसकी खाद्य परिवर्तन क्षमता अधिक है। इस नस्ल के पशु कई बीमारियों के प्रतिरोधी पाए गए है, बच्चों के मृत्यु दर भैसों के अन्य नस्लों की तुलना में अत्यंत कम है (5 प्रतिशत से कम) । प्राप्ति स्थल स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व इटावा, आगरा, भिण्ड, मुरैना तथा ग्वालियर जनपद में कुछ हिस्सों को मिलाकर एक छोटा सा राज्य था जिसे भदावर कहते थे। भैस की यह नस्ल चूँकि भदावर क्षेत्र में विकसित हुई इसलिए इसका नाम भदावरी पड़ा। वर्तमान में इस नस्ल की भैसें आगरा की बाह तहसील, भिण्ड के भिण्ड तथा अटेर तहसील, इटावा (बढ़पुरा, चकरनगर), ओरैय्या तथा जालौन जिलों में यमुना तथा चम्बल नदी के आस-पास के क्षेत्रों में पाई जाती है। ललितपुर तथा झांसी जनपदों में भी इस नस्ल के जानवर पाए गए है हालांकि उनकी संख्या काफी कम है। भदावरी भैंस संरक्षण एवं सर्वधन परियोजना के तहत भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान झांसी में इस नस्ल के पशुओं में शोध कार्य हेतु पाला जा रहा है। इस परियोजना के अंतर्गत भदावरी नस्ल के संरक्षण एवं सुधार हेतु उत्तम सांडों का विकास किया जा रहा है तथा उनका वीर्य हिमीकरण करके उसको भविष्य में इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रखा जा रहा है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य प्रजनन हेतु उच्च कोटि के सांड तथा उनका वीर्य किसानों को उपलब्ध कराना है जिससे ग्राम स्तर पर भदावरी नस्ल का संरक्षण एवं उनके उत्पादन स्तर में सुधार किया जा सके। उत्पादन स्तर भदावरी मुर्रा भैसों की तुलना में दूध तो थोड़ा कम देती है लेकिन दूध से वसा का अधिक प्रतिशत, विषम परिस्थितियों में रहने की क्षमता, बच्चों से कम मृत्यु दर तुलनात्मक रूप से कम आहार आवश्यकता आदि गुणों के कारण यह नस्ल किसानों में काफी लोकप्रिय है भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान झांसी में चलित परियोजना के अंतर्गत भदावरी भैसों की उत्पादकता को जानने के विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है। भदावरी भैंस औसतन 5 से 6 किग्रा. दूध प्रतिदिन देती, लेकिन अच्छे पशु प्रबंधन द्वारा 8 से 10 किग्रा. प्रतिदिन तक दूध प्राप्त किया जा सकता है। भदावरी भैसें एक ब्यांत (लगभग 300 दिन) में 1200 से 1800 किग्रा. दूध देती है। उत्पादन संबंधित आकड़े तालिका में दिए गए। तालिका 2. भदावरी भैंस का औसत उत्पादन स्तर प्रतिदिन दुग्ध उत्पादन 4-5 किग्रा. प्रति ब्यांत दुग्ध उत्पादन 1430 ली. ब्यांत की औसत अवधि 290 दिन दो ब्यांत का अंतर 475 दिन पहले ब्यांत के समय औसत उम्र 47 महीने उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि घी एवं दुग्ध उत्पादन हेतु भदावरी एक बहुत ही उम्दा नस्ल है इस नस्ल की भैंसों को दुरुस्त क्षेत्रों में जहां आवागमन के साधन कम है दूध को बेचने या संरक्षित करने की सुविधाएं नहीं है आराम से पाला जा सकता है। गाँवों में दूध बेचने की सुविधा न होने पर, दूध से घी निकालकर महीने में एक या दो बार शहर में बेचा जा सकता है। घी एक उत्पाद है जिसको बिना खराब हुए वर्षों तक रखा जा सकता है। आज जब शुद्ध देसी घी के दाम असमान छू रहे है तब किसान भाई घी बेचकर अच्छा लाभ प्राप्त कर सकते है। स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार