<p style="text-align: justify;">भेड़ और बकरीपालन का प्राथमिक उद्देश्य रेवड़ में पशुओं की संख्या और वजन में बढ़ोतरी है, ताकि यह व्यवसाय सफल और लाभदायक हो। यह देखा गया है कि समुचित चारा प्रबंधन के बावजूद कई कारणों से, भेड़ों और बकरियों का वजन धीरे-धीरे कम होता रहता है और पशु कमजोर हो जाता है। रेवड़ में पशुओं का वजन बढ़ना लाभदायक भेड़ और बकरीपालन का एक महत्वपूर्ण संकेत है। यह वजन बढ़ना तभी संभव होता है, जब पशु के स्वास्थ्य पर समुचित ध्यान दिया जाए। स्वस्थ पशुओं में पोषक तत्वों का सेवन और अवशोषण अधिक होता है। रेवड़ में कम वजन वाले पशु प्रत्येक प्रकार से उत्पादकता एवं प्रजनन क्षमता का कम प्रदर्शन करने वाले होते हैं। यह भी आशंका हो सकती है कि कोई रोग सुषुप्तावस्था में पनप रहा हो। यह आहार में लिए गए चारे के पाचन में बाधा पैदा कर रहा हो तथा मल और मूत्रा के माध्यम से पोषक तत्वों की हानि को बढ़ा रहा हो। इस लेख द्वारा रेवड़ में पशुओं का वजन कम होने की स्थिति में, भेड़ और बकरीपालकों को कुछ अपेक्षित कारणों/रोगों के बारे में जागरूक करने का प्रयास किया गया है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC3.jpg" width="150" height="131" /></p> <p style="text-align: justify;">मुख्यतः ऋटिपूर्ण आहार के कारण पशुओं में ऊर्जा-प्रोटीन की अत्यधिक कमी हो जाती है। खराब गुणवत्ता वाली आहार सामग्री, व्यापक रूप में सूखा या अकाल जैसी स्थिति, पोषणरोधी कारकों की अधिकता, इत्यादि का इस क्रम में उल्लेख किया जा सकता है। ये पोषक तत्वों के पर्याप्त ग्रहण, पाचन, अवशोषण तथा आत्मसात होने में बाधा डालते हैं। यह साबित हो चुका है कि यह समस्या ज्यादातर पशु पोषण प्रबंधन में खामियों के कारण होती है। पशुओं की शारीरिक दशा की जांच व स्कोरिंग का समय-समय पर आंकलन करने से ऊर्जा-प्रोटीन की कमी को आसानी से पहचाना जा सकता है। आहार सामग्री का विश्लेषण नियमित रूप से करने से इस तरह की समस्या को समय रहते रोका जा सकता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">पशुओं में खाने के लिए प्रतिस्पर्धा</h3> <p style="text-align: justify;">रेवड़ के पशुओं में दाना और चारे के लिए आपसी प्रतिस्पर्धा भी शरीर के वजन को कम कर सकती है। आमतौर पर पशुओं के समूह में समान प्रबंधन ऋटियों के परिणामस्वरूप कमजोर और दब्बू पशुओं में शरीर का वजन प्रायः कम होता जाता है। ताकतवर और बड़े पशु, कमजोर पशुओं के आहार व स्थान पर भी अपना अधिकार जताते हैं। इससे आहार तक पहुंच से वंचित होने के कारण, कमजोर पशु और अधिक कमजोर होते जाते हैं। इसलिए पशुओं उम्र, नस्ल, लिंग, शारीरिक स्थिति आदि के अनुसार समूह बनाना हमेशा उचित होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">दांतों की समस्या</h3> <p style="text-align: justify;">दांतों में समस्या के कारण भी चारा चबाने या निगलने की सामान्य प्रक्रिया प्रभावित होती है। भेड़ों में इंसिजर दांत आहार निगलने में प्रयोग किये जाते हैं। निकले हुए दांत, मसूड़े की सूजन, पीरियडोंटल रोग जैसे मुंह के रोग, निगलने एवं चबाने की प्रक्रिया में परेशानी का कारण हो जाते हैं। इससे सामान्य चारे का सेवन प्रभावित होता है और पशु पर्याप्त आहार से वंचित रह जाता है। वजन कम होने की जांच में, दंत परीक्षण भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। बढ़े हुए या घिसे हुए दांत, खनिज की कमी या फ्लोरोसिस की अधिकता से भी हो सकते हैं। चिकित्सकीय रूप से वजन में कमी, इंसिजर दांतों के असामान्य आकार, कड-स्टेनिंग, कड-ड्रॉपिंग, जबड़े की सूजन के रूप में प्रकट होते हैं और ये वजन घटने के कारण हो सकते हैं। इस समस्या के निदान के लिए समय-समय पर पशु मुंह का परीक्षण करवाना चाहिए। कैल्शियम का उपयोग तथा असमान दांतों की सतह को खुरचना भी लाभप्रद होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">परायक्ष्मा (जोन्स रोग)</h3> <p style="text-align: justify;">यह भेड़ और बकरियों में होने वाला पुराना रोग है। यह वजन घटने की समस्या के लिए सीधे तौर से जिम्मेदार होता है। संक्रमित पशु का सही मात्रा में चारा खाते हुए भी वजन कम होना, मांसपेशियों का कम होना, जबड़ों के नीचे पानी इकट्ठा होना, खून की कमी, ऊन का झड़ना, गंदी पूंछ और पेरिनियम, बार-बार दस्त लगना आदि इसके लक्षण हो सकते हैं। इस रोग में संक्रमित पशु चरागाह को भी मल त्याग से दूषित करते हैं। नियंत्राण के लिए पशुओं की समय-समय पर जांच, स्वस्थ पशुओं को पालना, खेत में प्रवेश करने से पहले प्रतिस्थापन पशुओं की जांच करना इत्यादि प्रभावी होते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">परजीवी संक्रमण</p> <p style="text-align: justify;">आंतरिक व बाहरी परजीवी का संक्रमण शरीर के वजन के नुकसान का कारण बन सकता है। प्रत्येक परजीवी का भेड़ और बकरी को बीमार करने का अपना अलग तरीका होता है। फीताकृमि, भेड़ और बकरियों की आंत में पोषक तत्वों को अवशोषित करने में सक्षम होती है। इससे शारीरिक वजन बढ़ना बंद हो जाता है। कोकसीडियन परजीवी आंतों की दीवार को नुकसान पहुंचाते हैं और आंतों से पोषक तत्वों के अवशोषण में बाधा डालते हैं। परजीवी ग्रसित आंत्राशोथ, एक अन्य गोलकृमि, हैमोनकस कंटोर्टस के कारण होता है। यह दुनियाभर के चरागाहों पर चरने वाले मेमनों में सबसे महत्वपूर्ण और गंभीर समस्या है। ज्यादा संख्या में हैमोनकस कंटोर्टस कृमियों से गंभीर संक्रमण होता है और खून व प्रोटीन की कमी हो जाती है।</p> <p style="text-align: justify;">दरअसल, वजन कम होने के कारणों के निदान के लिए प्रयोगशाला जांच की आवश्यकता होती है। जोन्स रोग, कैसियस लिम्फैडेनाइटिस इत्यादि संक्रमण रेवड़ में तेजी से पफैलते हुए कहर ढा सकते हैं। अतः इनके प्रसार को रोकने के लिए संक्रमणों में जैव सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन करना चाहिए ताकि आर्थिक नुकसान से बचा जा सके।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>खनिज लवण की कमी</h3> <p style="text-align: justify;">कोबाल्ट, कॉपर व सेलिनियम अतिआवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व हैं। इनकी कमी अथवा असंतुलन के कारण पशुओं में विभिन्न प्रकार से वजन कम होता है। कोबाल्ट की कमी से शारीरिक वजन में वृद्धि रुक जाती है। उच्च वर्षा, लीचिंग, उच्च पी-एच, मैंगनीज की अधिकता, शुष्क मिट्टी, रेतीले तटीय मिट्टी आदि में कोबाल्ट स्वाभाविक रूप से कम पाया जाता है। इसी प्रकार कॉपर की कमी से मेमने का विकास कम हो जाता है या मृत्यु भी हो जाती है, जिससे पशुपालकों को बहुत नुकसान होता है। भेड़पालन एवं बकरीपालन में सेलिनियम भी एक अत्यधिक महत्वपूर्ण तत्व है। इसकी कमी से मादा पशुओं में गर्भपात और प्रजनन संबंधी समस्या बहुत अधिक हो जाती है। इससे पैदा होने वाले मेमने कमजोर अथवा मृत पैदा होते हैं। उनका विकास भी बाधित होता है, जो मेमने जीवित होते हैं, उनमें अचानक मृत्यु की समस्या अत्यधिक देखी जाती है। इसको व्हाइट मसल रोग कहा जाता है। इन समस्याओं के निदान के लिए पशुओं को खनिज मिश्रण पाउडर उचित मात्रा में खिलाना चाहिए।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">लंगड़ी रोग (फीटरॉट)/लंगड़ापन/खुरगलन</h3> <p style="text-align: justify;">भेड़ एवं बकरियों के पैरों में सड़न या गलन (लंगड़ापन) एक बहुत ही गंभीर समस्या है। यह रोग एक पशु से दूसरे पशु में पफैलता है और वजन कम होने का कारण बनता है। खुरों का नरम होना या अधिक गीलापन होना भी इस रोग के मुख्य कारण हो सकते हैं। लंगड़ेपन की वजह से विकास दर कम रह जाती है और पशु अन्य पशुओं से कमजोर होता चला जाता है। इस रोग के निवारण के लिए पशुपालकों को जागरूकता के साथ-साथ पुफटबाथ का इस्तेमाल करना चाहिए तथा गीली जगह से हटाकर समय पर उपचार करवाना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : भा.कृ.अनु.प.(आईसीएआर),एस.जे. पांडियन, डी.के. शर्मा, एफ.ए. खान, चंदन प्रकाश, सी.पी. स्वर्णकार, जी.जी. सोनावणे और एस.आर. शर्मा पशु स्वास्थ्य विभाग, भाकृअनुप-केंद्रीय भेड़ और ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर-304501 (राजस्थान)</p>