परिचय भेड़ एवं बकरी चेचक, भेड़ और बकरियों का विषाणु जनित अत्यधिक संसर्गजनक रोग है। पूर्व में भेड़ चेचक और बकरी चेचक को भिन्न – भिन्न रोग मन जाता था किन्तु अब इसे एक ही रोग माना जाता है। यह रोग विश्व में छोटे जुगाली पशुओं भेड़ और बकरियों की सबसे गंभीर संक्रामक बिमारियों में से एक है। यद्यपि यह रोग सभी नस्ल के भेड़ और बकरियों को प्रभावित करता है। यद्यपि यह रोग सभी नस्ल के भेड़ और बकरियों को प्रभावित करता है पर मोरीनो आयर अन्य विदेशी नस्ल के भेड़ और बकरियां देशी वयस्क पशुओं की तुलना में मेमनों में अधिक गंभीर रूप मर देखा गया है। कारक यह रोग भेड़ और बकरी चेचक विषाणु के संक्रमण के कारण होता है। रोग के विषाणु को केप्रीपॉक्स जीनस में वर्गीकृत किया गया है। भेड़ चेचक विषाणु और बकरी चेचक विषाणु में सामान्य प्रयोगशाला तकनीक से विभेद कर पाना मुश्किल है, इन्हें केवल जीन अनुक्रमण विधि द्वारा विभेदित किया जा सकता है। विषाणु के स्ट्रेन भेड़ और बकरी दोनों को ही संक्रामित कर सकते हैं। इन विषाणुओं में जीनोम डीएनए प्रकार का होता है तथा संरचना में विषाणु में काम्प्लेक्स सेमेट्री पाई जाती है यह विषाणु काफी प्रतिरोधी होता है तथा संक्रमित ऊन और त्वचा के घाव – पपड़ी में तथा बिना विसंक्रमित बाड़े की मिट्टी में कई महीनों तक जीवित रह सकता है। विषाणु को सूर्य के प्रकाश के प्रति संवेदनशील पाया गया है तथा अधिक तापमान जैसे 560 से. पर 2 घंटे तथा 650 से. पर 3 घंटे में यह निष्क्रिय हो जाता है। इसके अलावा विषाणु सामान्य विसंक्रामक जैसे फिनोल, ईथर, क्लोरोफार्म, आयोडीन और सोडियम हाइपोक्लोराइड की मानक सांद्रता पर निष्क्रिय हो जाते हैं। जानपदिक विज्ञान यह रोग भारत में स्थानिक है, विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु. महाराष्ट्र तथा राजस्थान में इसका प्रकोप अधिक देखने को मिलता है। विश्व में मध्य और उत्तरी अफ्रीका, मध्य पूर्व देशों, चीन और वियतनाम में भी यह रोग स्थानिक है। हालाँकि रोग प्रकोप वर्ष के किसी भी महीने में हो सकता है लेकिन ज्यादातर रोग – प्रकोप वर्ष के किसी भी महीने में हो सकता है लेकिन ज्यादातर रोग – प्रकोप मुख्यतः अप्रैल से जून में देखने को मिलता है। रोग संचरण रोग का संचरण स्वस्थ पशुओं में मुख्यतः संक्रमित पशुओं के लार, नाक और संयोजी स्राव, दूध मूत्र और मल तथा तथा त्वचा के घावों (चेचक दाना) और उनकी पपड़ी में यह विषाणु पाया जाता है। घावों (चेचक दाना), पपड़ी में यह विषाणु संदूषित वस्तुओं और पर्यवारण के प्रत्यक्ष संपर्क में आने से या वायूसोल के माध्यम से विषाणु प्रेषित संपर्क में आने से या वायुसोल के माध्यम से विषाणुप्रेषित होता है। ज्यादातर मामलों में यह देखा गया है कि स्थानिक देशों में रात में पशुओं को कम जगह जगह वाले बाड़े में रखा जाता है जो रोग के प्रकोप और प्रसार को जोखिम प्रदान करता है। विषाणु कटी या फटी हुई त्वचा के माध्यम से भी शरीर के अंदर प्रवेश कर सकते हैं। इसके अलावा मक्खी द्वारा भी यांत्रिक संचरण देखने को मिलता हैं। एक बार पूर्ण रूप से स्वस्थ होने के बाद पशु – स्राव से का संचरण नहीं होता है। संक्रमण संक्रमित पशुओं के ऊन, त्वचा और बालों से संक्रमित पशुओं के नाक स्राव लार या उनके एयरोसौल्ज से संक्रमित कपड़ों और उपकरणों से मक्खियाँ यांत्रिक वैक्टर के रूप से प्रसार कर सकती है। रोग से आर्थिक नुकसान भेड़ और बकरी चेचक उन सभी क्षेत्रों में छोटे जुगाली पशुओं की महत्वपूर्ण संक्रामक बीमारी है जहाँ उनकी जनसंख्या अधिक है। भारत में छोटे और भूमिहीन किसानों के पशुधन अर्थशास्त्र में भेड़ और बकरियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। रोग के कारण हुई पशु मृत्यु ऊन की मात्रा और गुणवत्ता का ख़राब होना तथा वजन न बढ़ने से मांस में कमी के कारण पशुपालकों को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसके अलावा रोग नियंत्रण के लिए पशु चिकित्सक, दवा तथा विसंक्रमण पर किये गये अतिरिक्त खर्च के कारण भी आर्थिक बोझ पड़ता है। लक्षण संक्रमित भेड़ और बकरियों में रोग के लक्षण विभिन्न कारकों पर निर्भर करते हैं, जैसे विषाणु के विभेद- प्रकार और उसकी मारक क्षमता, पशु की नस्ल, आयु और प्रतिरोधी क्षमता। समान्यत: विषाणु संक्रमण के बाद रोग का उद्भव 4 – 12 दिन में होता है। सामान्यत: रोग के निम्न लक्षण दिखाई देते हैं। संक्रमित भेड़ की त्वचा पर बने पॉक्स घाव (चेचक दाना) अचानक तेज बुखार नाक और आँखों से स्राव क्षुधा का कम होना चलने में अनिच्छा चेचक दाने (पॉक्स घाव) त्वचा पर 1 – 2 दिनों में दिखाई देते हैं जो मुख्यत: बिना ऊन वाले भागों जैसे चेहरा, पलकें, कान मूलाधार और पूंछ पर अधिक होते हैं। सर्वप्रथम इनकी शुरूआत लाल प्रदाह के रूप में होती है जो ठोस दानों के रूप में परिवर्तित हो सकती है। घाव के ठीक होने की दशा में वहां पर पपड़ियाँ बन जाती है। चेचक दानों को नाक, मुंह और योनि पर देखा जा सकता है। मुंह के घावों के कारणपशु चारा ग्रहण नहीं कर पाता। श्लेष्मा झिल्ली के अधिकांश फफोले, अल्सर में परिवर्तित हो जाते हैं। श्वसन में तीव्र तकलीफ तथा कुछ पशुओं में न्यूमोनिया के भी लक्षण दिखाई देते हैं। त्वचा के घाव बहुत ही धीरे – धीरे भरते हैं तथा मक्खियों के कारण द्वितीय संक्रमण भी हो सकता है। थन तथा निप्पलों पर बने घाव के कारण थनैला भी हो सकता है। मृत पशु के शव परिक्षण में प्राप्तियां त्वचा विक्षति रक्तस्राव एडिमा, वास्कूलिटिस (कोशिकाशोथ) और नेक्रोसिस (गलन) । लिम्फ नोड्स (लसिका ग्रंथि) विक्षति: सामान्य आकार से बड़ा होना और लिम्फोइशोथ। श्लेष्मा विक्षति: मूत्राशय के श्लेष्मा झिल्ली पर मुंह, नाक, ग्रसनी, एपिगोल्टिस, श्वास नलिका, रूमेन म्यूकोस, थूथन, योनी और निप्पल पर पॉक्स के घाव का पाया जाना\ फेफड़ों में विक्षति: फेफड़ों के ऊतक में नोडूल्स और व्यापक पॉक्स घावों का होना। मनुष्यों में होने की संभावना इस रोग की मनुष्यों में होने की संभावना नगण्य है। एक या दो मामलों को छोड़कर अब तक कोई मामला प्रकाश में नहीं आया है। विभेदी निदान हालाँकि गंभीर रूप से ग्रसित पशु में भी भेड़ और बकरी चेचक के नैदानिक लक्षण विशिष्ट और स्पस्ट होते हैं फिर भी कम गंभीर रूप के लक्षण अन्य बीमारियों के साथ भ्रमित हो सकते हैं। अत: निदान के समय इन बीमारियों के होने की आशंका का ध्यान रखना चाहिए। संक्रामक एक्थिमा (ओ आरएफ) ब्लूटंग पेस्ट डेस पेटिट्स रूमिनेंट्स (बकरी प्लेग) डर्मेटोफिलोसिस परजीवी न्यूमोनिया कीट के काटने से बने घाव/दाने प्रयोगशाला निदान रोग का निदान रोग के लक्षण और पोस्टमार्टम घावों के आधार पर किया जा सकता है फिर भी रोग की सटीक जाँच भेड़ चेचक और बकरी चेचक तथा अन्य रोगों के बीच विभेद करने के इए प्रयोगशाला की पुष्टि भी आवश्यक है। आवश्यक नमूने विषाणु अलगाव तथा विषाणु प्रतिजन और जीनोम का पता लगाने के के लिए चेचक दाने की सूखी पपड़ियाँ और ऊतकों की आवश्यकता होती है जबकि विषाणु विशिष्ट प्रतिरक्षा की जाँच के लिए रक्त से सीरम नमूनों को एकत्र किया जाता है। नमूनों को अधिमानत: 4 डिग्री सेल्सियस बर्फ पर, या 20 डिग्री सेल्सियस पर रखा जाना चाहिए। यदि प्रशीतन के बिना लंबी दूरी पर नमूनों का परिवहन आवश्यक हैं, तो माध्यम में 10 प्रतिशत ग्लिसरौल का प्रयोग का प्रयोग करना चाहिए। निम्नलिखित प्रयोगशालीय परिक्षण का उपयोग किया जा सकता है:- विषाणु पृथक्करण या अलगाव संक्रमण की सटीक जाँच और विषाणु की पहचान के लिए एक एक मानक टेस्ट है। यह प्रक्रिया केवल शोध संस्थानों में ही अपनाई जाती है जहाँ इनकी सुविधा उपलब्ध होती है। विषाणु संवर्धन के लिए प्राथमिक लैम्ब वृषण या वृक्क कोशिका या कोशिका लाइनें जैसे कोशिका का उफ्योग किया जाता है। इन कोशिकाओं में विषाणु की संवृद्धि से उत्पन्न साईंटोंपैथिक प्रभाव के कारण इनकी पहचान की जाती है जो सामान्यत: 4 – 6 दिनों के भीतर आ जाती है। एलाईजा संक्रमित पशु से प्राप्त सीरम नमूनों में चेचक विषाणु के विरूद्ध प्रतिरक्षा की जाँच की जाती है। यह विषाणु के p32 प्रतिजन पर आधारित हो सकती है। पीसीआर इस परख द्वारा नमूनों में विषाणु विशिष्ट जीन को प्रवर्धन करके उनकी पहचान की जाती है। इस प्रक्रिया द्वारा कम समय में सटीक निदान की जा सकती है। विषाणु उदासीनता यह एक जटिल परख है जो विषाणु के सीरम में मौजूद प्रतिरक्षी द्वारा उदासीनता पर आधारित है। टीकाकरण रोग नियंत्रण के लिए रोग स्थानिक क्षेत्रों में व्यवस्थित टीकाकरण कार्यक्रम किया जाता है। भारत में भेड़ और बकरी चेचक के टीकों के लिए रोमेनियन स्ट्रेन और रानीपेट स्ट्रेन का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा श्रीनगर स्ट्रेन से भी टीके को विकसित किया गया है। ये टीके जीवित क्षीणकृत रूप में उपलब्ध हैं। तीन माह के ऊपर के सभी पशुओं में टीका लगवाना चाहिए तथा टीकों का इस्तेमाल पशु चिकित्सक की सलाह के उपरांत ही करना चाहिए। बचाव एवं रोकथाम रोकथाम के प्रकोप की स्थिति में रोग ग्रस्त भेड़ या बकरी को अन्य पशुओं से अलग कर देना चाहिए तथा ऐसे पशुओं को कम से कम 40 दिनों तक संगरोध पर रखना चाहिए। ग्रसित पशुओं को बाहर चरने के लिए नहीं भेजना चाहिए। ग्रसित पशुओं का अन्य स्थानों पर परिवहन नहीं करना चाहिए। नये ख़रीदे हुए पशुओं को कम से कम 2 – 3 सप्ताह तक संगरोध पर रखने के उपरांत ही रेवड़ में शामिल करना चाहिए। संक्रमित जगहों, उपकरण और कपड़ों को अच्छी तरह विसंक्रमित करना चाहिए। मृत पशुओं को जला देना चाहिए या मिट्टी में अंदर तक गाड़ देना चाहिए। रेवड़ में आये नये पशुओं के स्वास्थय और स्रोत की जानकारी रखनी चाहिए। किसी भी बीमारी या लक्षण के लिए पशुओं की की समय – समय पर जाँच करानी चाहिए। बीमारी पशुओं को अलग रखा चाहिए और पशु चिकित्सक से तुरंत कर्मचारियों से तुरंत संपर्क करना चाहिए। पृथक किये हुए पशु के लिए अलग से साजो – सामान और कर्मचारियों का उपयोग करना चाहिए। स्वयं को और अपने कर्मचारियों को इस रोग के बारे में शिक्षित करना चाहिए। जंगली जानवरों को अपने पशुओं या पशु बाड़े के संपर्क में नहीं आने देना चाहिए। लेखन: जी. बी. मंजुनाथ रेड्डी, अवधेश प्रजापति, अपशाना आर, योगीश आराध्य आर, परिमल राय स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग,भारत सरकार