भारत में नाशपाती कैक्टस को पहली बार वर्ष 1970 के दशक में भाकृअनुप-केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर (राजस्थान) द्वारा चारे के रूप में वैज्ञानिक खेती के लिए पेश किया गया था, जहां 700 मि.मी. तक वर्षा होती है। विभिन्न कृषि अनुसंधान संस्थानों जैसे, भाकृअनुप-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल (हरियाणा), भाकृअनुप-केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर (राजस्थान), भाकृअनुप-भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झांसी और अन्य संस्थान शूलरहित इस कैक्टस के उत्पादन को बढ़ावा दे रहे हैं। अपने वैश्विक महत्व के कारण अंतर्राष्ट्रीय नाशपाती कैक्टस नेटवर्क (कैक्टसनेट) को वर्ष 1992 में सैंटियागो में खाद्य और कृषि महत्व के लिए समर्पित समर्थन के लिए स्थापित किया गया था। कैक्टस का महत्व यह अपेक्षाकृत सूखा प्रतिरोधी मरूस्थलीय पौधा है और लंबे समय तक सूखे मौसम में भी अपना अस्तित्व बरकरार रखता है। बड़ी मात्रा में चारे का उत्पादन कम से कम कृषि लागत में प्रदान करता है। यह सूखे के दौरान रसीले चारे की आपूर्ति करता है, जिसमें जल की भरपूर मात्रा होती है। पशुओं को अतिरिक्त जल आपूर्ति में पर्याप्त बचत होती है। यह पौधा मृदा और जलवायु की एक विस्तृत श्रृंखला को सहन करता है और इससे मृदा में विभिन्न प्रकार के लाभकारी सूक्ष्मजीवियों की संख्या तथा जलधारण क्षमता में बढ़ोतरी होती है। कैक्टस अपने विशेष प्रकाश संश्लेषण तंत्र के कारण शुष्क पदार्थ को जल में परिवर्तित करने के लिए घास तथा अन्य फलियों की तुलना में अधिक कारगर है। इससे जल संरक्षण में भी फायदा मिलता है। यह समान पर्यावरणीय परिस्थितियों में सी-4 पौधों (गन्ना, मक्का) की तुलना में 3 गुना अधिक और सी-3 पौधों (धान, गेहूं) से 5 गुना बेहतर है। 19वीं पशुगणना के अनुसार देश में लगभग 51.2 करोड़ पशुधन के लिए चारे की कमी दर्ज की गई है। शूलरहित कैक्टस (ओपंटिया फिकस इंडिकस), जिसे आमतौर पर चारा कैक्टस या नाशपाती कैक्टस के रूप में जाना जाता है, चारे की फसल के रूप में दुनियाभर में लोकप्रियता हासिल कर रहा है। इसकी विशिष्ट प्रकृति इसे सूखी भूमि पर विकसित करने में सक्षम बनाती है, जहां आमतौर पर कोई अन्य फसल जीवित नहीं रह पाती है। मानव उपयोग फल और नवजात नाशपाती कैक्टस (क्लैडोड) का खाने योग्य हिस्सा मानव द्वारा एपेटाइजर, सूप, सलाद, पेय, कैंडी, ब्रेड के साथ जैली और कैक्टस पेय के विभिन्न स्वादों के रूप में सेवन किया जाता है। इसके नवोदित तने को नोपेल्स कहते हैं। इनका उपयोग एक स्वादिष्ट एवं पौष्टिक वनस्पति के रूप में किया जाता है। नाशपाती कैक्टस की खेती मैक्सिको, मोरक्को, इथोपिया, केन्या, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान और भारत के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में चारे के रूप में लोकप्रिय है। अर्ध्द शुष्क जलवायु परिस्थितियों के कारण किसानों को इसकी खेती के लिए भारी मात्राा में पानी की आवश्यकता नहीं होती है। इसके साथ ही इसकी खेती की लागत अत्यंत कम है। किसी भी चारे की फसल की तुलना में इसमें उच्च जल उपयोग दक्षता के साथ-साथ वर्षा जल प्रयोग करने की भी क्षमता है। यह एक क्रासलूासिन एसिड चयापचयी (सीएएम) पौधा है, जो रात के समय जीवधारियों के पेट में शुद्ध कार्बनडाइऑक्साइड से बचाव तेज और कम पानी की कमी के कारण भी प्राकृतिक शीतलता प्रदान करता है। दिन और रात के घंटों का चक्र, उच्च जल उपयोग दक्षता के लिए अग्रणी है, जो इस जेरोफाइटिक पौधे की सबसे आम विशेषता है। यह 5-7 मीटर की ऊंचाई तक गंभीर पानी की कमी की स्थिति में वृद्धि करने की क्षमता रखता है। कैक्टस मुकुट (क्रॉउन) 3 मीटर चौड़ाई में और व्यास 1 मीटर से अधिक तक फैले होते हैं। भारत में बरसात के मौसम (जून से जुलाई से नवंबर) में क्लैडोड के उपयोग से वानस्पतिक बुआई के प्रसार द्वारा कैक्टस की सफलतापवूर्क खेती की जाती है। परंपरागत रूप से इस क्लैडोड को काटने के उपरांत टुकड़ों की खेत में बुआई की जाती है। यह खारी मृदा के लिए भी उपयुक्त है। इसके साथ ही वनों की कटाई, मिट्टी के कटाव और अन्य कृषि प्रणाली में खेती करने के लिए भी यह उपयुक्त है। बड़े क्षेत्रों में रोपण के लिए इसके पौधे ऊतक संवर्धन तकनीक के माध्यम से रोपे (स्थापित) जाते हैं। अच्छी तरह से सूखी, भारी रेतीली, रेतीली-दोमट मृदा, गंभीर रूप से और पथरीली भूमि विशेषकर पहाड़ी ढलानों पर खेती के लिए उपयुक्त है। पहली कटाई तब की जाती है, जब पौधा एक मीटर ऊंचाई 5 से 6 महीने के अंतराल में पूरा कर लेता है और नियमित कटाई के बाद प्राप्त इसे चारे के उपयोग में लिया जाता है। प्रत्येक फसल वर्ष में इसके हरे चारे की उपज 40 से 50 मीट्रिक टन प्रति हैक्टर तक हो सकती है। कैक्टस को पशुओं द्वारा सीधे चरने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि इससे फसल की उम्र घटने लगती है। कटाई के लिए 'कट एंड कैरी विधि' सर्वश्रेष्ठ है। छोटे कैक्टस के टुकड़ों को कुछ सूखे चारे जैसे-गेहूं और धान के पुआल के साथ 1:3 के अनुपात में (72 प्रतिशत प्रोटीन, 62 प्रतिशत सूखे पदार्थ, 43 प्रतिशत कच्चे पफाइबर के लिए और 67 प्रतिशत कार्बनिक पदार्थों के साथ) मिलाया जाना चाहिए। प्रति इकाई भूमि क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाने के लिए कांटारहित कैक्टस मौजूदा फसल प्रणाली में चारा फसलों के एकीकृत कृषि प्रणाली के साथ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सटीक खेती जैसी आधुनिक तकनीक के उपयोग के अंतर्गत कैक्टस सहफसली प्रणाली और कृषि वानिकी के तहत अन्य फसलों के साथ बढ़ते हैं। फसल कटाई प्रसंस्करण के उपयोग की बड़ी गुंजाइश है। ग्रामीण उद्यमिता क्षमता के लिए मूल्यवर्धन कम से कम चार से पांच बार कटाई करने के लिए किया जाना चाहिए। सामान्यतः चारा फसलों में उपलब्ध प्रोटीन की मात्राा, पाचनशीलता से पशुओं के अच्छे स्वास्थ्य तथा अधिक पशु उत्पादन के लिए जिम्मेदार होते हैं। मृदा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटाश तत्वों के असंतुलन, सिंचाई में कमी तथा समयानुकूल फसल कटाई जैसे अनेक कारक महत्वपूर्ण हैं। कैक्टस की खेती किसानों के लिए बेहद पफायदेमंद है। इसकी मौजूदा आय किसान की समृद्धि कर सकती है। इस संबंध में क्षेत्र रोपण के लिए बड़े पैमाने पर प्रसार, स्थान विशिष्ट प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए प्रणालीगत क्षेत्र मूल्यांकन आवश्यक है। जुगाली करने वाले पशुधन की चारा जरूरत के लिए शूलरहित कैक्टस की खेती अपरंपरागत आरै मूल्यवान चारा संसाधन के लिए महत्वपूर्ण है। पोषक चारा भारतीय परिवेश में बिना कांटे का कैक्टस पौधा सूखा प्रभावित क्षेत्राों के लिए एक अच्छी चारा फसल है। भैंस (दुधारू पशुओं), भेड़, घोड़ों आदि जैसे मवेशियों के लिए यह एक पोषक चारे के रूप में कार्य करता है, जबकि किसान सिंचाई की अनुपस्थिति के कारण भारी मात्रा में फलियां और नैपियर घास, गेहूं, धान और मक्का जैसे पारंपरिक चारा नहीं उगा सकते हैं। यह क्रूड प्रोटीन, फाइबर, विभिन्न प्रकार के खनिजों (कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, पोटेशियम, सोडियम, जिंक, मैंगनीज, तांबा, लोहा और अन्य) के साथ-साथ पानी में घुलनशील काबार्हेाइड्रेट के अलावा कैरोटीनॉयड (विटामिन 'ए') से समृद्ध है। यह श्लेष्म की उच्च सामग्री के कारण 70 प्रतिशत शुष्क पदार्थ की पाचनशक्ति के साथ अत्यधिक सुपाच्य है, जिससे क्लैडोड के सेवन से जुगाली करने वाले पशुओं में एसिडोसिस (पाचन तंत्र में अधिक मात्रा में अम्ल बनने की समस्या) नहीं होती है। स्त्राेत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), राघवेन्द्र कुमार,रिष्ठ तकनीकी अधिकारी और संगीता श्रीवास्तव, प्रधान वैज्ञानिक, फसल सुधार विभाग, भाकृअनुप-भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)