धान के रोगों व कीटों की रोकथाम के लिए रामबन, बना के पत्ते और अंखरे की पत्तियों का प्रयोग प्राचीन समय से किया जाता है। गाय के मूत्र में खरीफ फसल के बीजों को भिगोकर बीजाई करने जैसी प्रथाओं का प्रचलन है। लेंटाना, काली बसुट्टी और सफेदा के पौधों का उपयोग, आलू के भंडारण में आलू कंद को कीट से बचाने के लिए करते हैं। बंगरु (जंगली पुदीना), काली बसुट्टी के सूखे पत्तों का सफेदा और अखरोट के पत्तों के साथ उपयोग, चीड़ की लकड़ी के टुकड़े (जुगनू) आदि का प्रयोग गेहूं और दूसरे अनाज भंडारण में कीटों से बचाव के लिए करते हैं। स्वदेसी तकनीकी ज्ञान (आईटीके) को किसानों के साथ उत्तर-पश्चिम हिमालय में हिमाचल प्रदेश के आठ पहाड़ी जिलों के किसानों से सत्यापित किया गया है। आईटीके का प्रयोग महंगे रसायन/कीटनाशकों की तुलना में उत्कृष्ट विकल्प है और यह एकीकृत कीट प्रबंधन का एक मुखय घटक माना जाता है। अध्ययन से निष्कर्ष निकलता है कि पहाड़ों के किसानों को आईटीके और जलवायु संबंधी प्रथाओं के बारे में जानकारी है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने एवं जागरूकता पफैलाने के लिए कृषि गतिविधियों में आईटीके का उपयोग करना आज के समय की मांग है। पारंपरिक कृषि में रासायनिक उर्वरकों, कृषि रसायनों और सिंचाई के आधुनिक तरीकों के उपयोग के साथ आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकियों की शुरूआत ने जलवायु प्रदूषण और भूमि क्षरण को जन्म दिया है। भारत सहित कई देशों में कीट नियंत्रण और फसल संरक्षण के लिए प्राकृतिक तरीकों को महत्व किया जाता है। इस प्रकार का परंपरागत ज्ञान परीक्षणों, त्रुटियों और विभिन्न क्षेत्रों के स्वदेसी ज्ञान के अनुभवों और सदियों से अनौपचारिक प्रयोग के माध्यम से निरंतर सुधार और स्थानीय संस्कृति एवं पर्यावरण के अनुकूल होने के माध्यम से विकसित हुआ है। आधुनिक कृषि में रसायन नियंत्रण विधियां शीघ्र समाधान प्रदान करने के लिए अधिक लोकप्रिय हो गई हैं। सच्चाई यह है कि ये न तो टिकाऊ हैं और न ही पर्यावरण के अनुकूल हैं। स्वदेसी तकनीकी ज्ञान (आईटीके), पूर्व-ऐतिहासिक, ऐतिहासिक और वैदिक काल से प्राचीन प्रथाओं में विद्यमान अद्वितीय परंपरागत स्थानीय ज्ञान को संदर्भित करता है। स्वदेसी टेक्नोलॉजी ज्ञान (आईटीके) में व्यापक विषयों की सूची है। इस सूची में फसल उत्पादन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, खाद्य तैयारी, स्वास्थ्य देखभाल, कीट प्रबंधन और कई अन्य संबंधित विषय शामिल हैं। कृषि में अनाज का सुरक्षित भंडारण चिंता का विषय है। किसानों को कई प्रकार के कीटों से अपने अनाज की रक्षा के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय किसानों ने स्वदेसी भंडारण तकनीकों का खूब प्रयोग किया है। इसमें उत्कृष्ट भंडारण संरचनाएं, कृषि प्रबंधन, फसल संरक्षण और में जलवायु प्रतिरोधी प्रथाओं का इस्तेमाल किया गया है। अनाज भंडारण के स्थानीय तरीके अनाज का बांस से बने ड्रम आकार के बर्तन, जिसे गाय के गोबर से लेपकर रखा जाता है, में भंडारण करते हैं। यहां पर अनाज अधिक समय तक सुरक्षित रहता है। ऐसी प्रथाएं हिमाचल के किसानों में देखने को मिलती हैं तथा ऐसा अनाज भंडारण आंध्रप्रदेश के किसान भी करते हैं। वहां पर वे धान भूसे से ऐसी संरचना बनाते हैं, जिसमें धान बीज भंडारण का संग्रहण भी किया जा सके और बिना किसी दवाई से यह सुरक्षित भंडारण होता है। आलू के भंडारण के लिए किसान गांवा में लैंटाना के पत्ते व टहनियों, वसुंटी और सफेदे के वृक्षों की छाल का इस्तेमाल करते हैं। इसमें पौधे की टहनियां, पत्तों सहित फैलाई जाती हैं और जिसके ऊपर आलू का भंडारण किया जाता है। इन पौधों में जीवाणुरोधी फंगसरोधी एंटी फंगल और जीवाणुरोधी एंटी बैक्टीरियल गुण होता है, जो कि आलू के क्यूबर कीट के लिए उपयुक्त तरीका है। कुछ किसान अनाज भंडारण में माचिस की तीलियों में उपस्थित फॉस्फोरस, जिससें फॉस्फीन निकलती है का प्रयोग कीटों आदि से निजात पाने के लिए करते हैं। गेहूं के भंडारण में जंगली पुदीने के पत्ते, काली वंसुटी के सूखे पत्ते और सफेद पत्ते डालने की भी प्रक्रिया प्रचलित है। कई उत्तरी-पूर्वी क्षेत्रों में नीम और आम के सूखे पत्तों को भंडारण के बरतन में डालने से कीट व चूहों से बचाव किया जाता है। इसी तरह दाल के सही भंडारण के लिए दालों को सुखाते समय हल्का सरसों का तेल छिड़ककर और धूप में सुखाकर भंडारण करने से कीट नहीं लगते हैं। कुछ पहाड़ी क्षेत्राों जैसे कुल्लू आदि में किसान अखरोट के पत्तों और जूगनू की लकड़ी के टुकड़ों को बर्तन के बीच रखते हैं, जिससे बीज संरक्षण सही होता है। अखरोट के पत्तों में माइक्रोबियलरोधी और फंगल प्रतिरोधी गुण होते हैं। इससे बीज संरक्षण सही होता है। हिमाचल प्रदेश के आठ जिलों (कांगड़ा, लाहौल एवं स्पीति, ऊना, हमीरपुर, चंबा, मंडी और किन्नौर) में आईटीके का उपयोग करने वाले किसानों पर आधारित भिन्न-भिन्न क्षेत्र में सर्वेक्षण किया है। आंकड़ों का संग्रहण विभिन्न अवधियों और कृषि-जलवायु क्षेत्रों में वर्ष 2010-2015 में किया गया। इन आठ जिलों के किसानों के परिवारों को जलवायु परिवर्तन के बारे में कृषि गतिविधियों में आईटीके और जलवायु अनुकूल प्रथाओं से अवगत करवाया और फिर किसानों का समूह बनाकर सर्वेक्षण किया गया। यह अध्ययन कृषि रोगों/कीटों के नियंत्रण, अनाज भंडारण, कीटनाशक प्रबंधन से संबंधित किसानों पर किया गया। कृषि प्रबंधन में किसानों द्वारा आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली जलवायु अनुकूल पद्धतियों का उल्लेख इस प्रकार हैः कीट और कीट रोग नियंत्रण धान में हिस्पा, ब्लास्ट, पत्ता छेदक आदि कीटों के बचाव के लिए किसान, रामबाण (एक थूहर का पौधा) के पत्तों से प्राप्त दूध जैसे पदार्थ को पीसकर खेत में प्रयोग कर उपचार करते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया है कि इस पौधे में कीटनाशक गुण होते हैं। यह तकनीक हिस्पा आने से पहले ही कारगर सिद्ध होती है। कई क्षेत्रों में अंखरे, जो कि एक थूहर (कैक्ट्स) परिवार का पौधा है, का प्रयोग धान में कीटों से बचाव के लिए किया जाता है। वैज्ञानिक शोध से पता चला है। फ्लेवोनोइड, सपोनिंस और फेनोलिक यौगिकों की मात्रा होने से ये पौधे उपयोगी हैं। गुजरात में किसान आक के पौधे के पत्तों और टहनियों को धान, सरसों और अदरक में कीटों से बचाव जैसे एफिड, दीमक, कैटरपिलर और ब्राउन हॉपर को नियंत्रित करने के लिए करते हैं। पौधे में क्षारीय गुण होने की वजह से यह विकर्षण का काम करता है। इसी तरह गोभी में कीटनाशक के लिए लकड़ी की राख और गाय का गोबर उपयोगी होता है। धन में कीटों का हमला पहले से होने पर उपरोक्त विधियां उपयोगी हैं। इसके अलावा कद्दू,प्याज,बैंगन, टमाटर और लहसुन में अधिकतर किसान, कीटों जैसे कि लाल कद्बंना नामक पौधा, जिसे स्थानीय भाषा में बणाया निर्गुंडी भी कहा जाता है, का प्रयोग पौधों के फफूंदीय, जीवाणु संबंधी फंगल बैक्टीरिया और माइक्रोब्रियल रोगों के लिए के बचाव में किया जाता है। इन पौधों का उपयोग मनुष्य और जानवरों के रोगों के इलाज में भी किया जाता है। धान के स्वस्थ और अच्छे अंकुरण के लिए धान के खेतों के किनारे बाणे की शाखाएं लगाई जाती हैं। बाणे की शाखाओं के झाड़ू से धान के खेतों को साफ किया जाता है। यह एक कीटनाशक के रूप में कार्य करता है। इसमें पॉली-फेनोल, टॉपोनॉइड, ग्लाइकोराइड, इरोइडड, स्टेरॉयड और क्षाराभ एल्केलॉइड होते हैं। इसी तरह का स्वदेसी तकनीकी का कीटों के नियंत्रण के लिए असोम के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में भी गाय के गोबर को पानी में मिलाकर धान के खेतों में छिड़काव जाता है। धान में पीले तनाछेदक की रोकथाम के लिए नीम के बीज और पत्तियों के काढ़े का छिड़काव किया जाता है। तथा खट्टे के छिलके खेतों में डाले जाते हैं। रस्सी को मिट्टी के तेल में डुबोकर धान के खेतों में रुके पानी में हिलाते रहने या डुबोने से गाय के गोबर को खेतों में छिड़कने से कम कीट आते हैं। असोम के कुछ क्षेत्रों में धान पत्ता लपेटक कीट एवं पीला तनाछेदक के नियंत्रण के लिए बरास या फुटुका के कटे पत्ते और सेजन की छाल और फर्न की शाखाओं का प्रयोग किया किया जाता है, क्योंकि इसमें कीटनाशक तत्व होते हैं। बीज से उत्पन्न रोगों की सुरक्षा आमतौर पर ग्रामीण इलाकों में इस पद्धति का प्रयोग किया जाता है। हिमाचल में बरसात की फसलों की बुआई अगर देरी से होती है, तब शुष्क मिट्टी में बीजाई करने से पहले बीजों का उपचार गौमूत्र से करते हैं, ताकि शुष्क मिट्टी में कीटों से बचाया जा सके। यह क्रिया तब काम में लाई जाती है, जब पूर्व मानसून वर्षा की बौछारें कम होती हैं। गौमूत्र में एंटीबायोटिक दवाओं के गुण होने से यह बीज की सतह पर जम जाते हैं। इससे बीजों को कीट नहीं खाते हैं। इसलिए जब बारिश होती है। तब अंकुरण अधिक होता है। शिमला क्षेत्र के किसान धान और गेहूं की फसल में कीटों के नियंत्रण के लिए गौमूत्र और हींग का मिश्रण भी प्रयोग में लाते हैं। इसी प्रकार की जानकारी उत्तराखंड के हिमालय क्षेत्रों के स्थानीय किसानों से भी प्राप्त हुई है, जो कि बीज संरक्षण के लिए राख, गाय का गोबर और गौमूत्र का प्रयोग करते हैं। इसी तरह के अध्ययन से संकेत मिलता है कि ठेओग, शिमला, हिमाचल प्रदेश के किसान, धान और गेहूँ के रोगों और कीटों के लिए गौमूत्र, निरगुंडी और हींग का मिश्रण का उपयोग करते हैं। यह कीट को नियंत्रित करने में आसान होने के साथ फसल उत्पादकता में वृद्धि और सभी मौसम में उपयोग के लिए लाभदायक है।दू थ्रिप्स और एफिड से बचाव के लिए चूल्हे की राख का पौधों के ऊपर प्रयोग करते हैं। इस विधि का प्रयोग छोटे पैमाने पर विशेष रूप से रसोई बागवानी में सब्जी की खेती में ही उपयोगी है। यह किसानों के लिए पर्यावरण अनुकूल ही नहीं बल्कि सस्ती, बहुत प्रभावी और आसानी से उपलब्ध है। राख का प्रयोग सुबह-सुबह किया जाता है। मूल रूप से राख कैटरपिलर, चेंपा या एफिड और भृंग आदि की सतह से पानी अवशोषित करती है और फिर शुष्क कर मार देती है। सांस या श्वसन नाकाबंदी के कारण इन कीटों की मृत्यु हो जाती है। राख छाटे-छोटे कीटों में प्रजनन निवारक के रूप में ये कार्य करती है। चबाने और चूसने वाले कीटों को राख की वजह से पौधों को चबाना कठिन हो जाता है। किसानों के बीच किए गए सर्वेक्षण से संकेत मिलता है कि चूल्हे की राख का इस्तेमाल प्रदेश मे अधिकतर किया जाता है। इस प्रथा से किसानों के अनुसार पौधों के प्रकाश संरक्षण क्षेत्र में कमी आती है। हालांकि राख पत्तों से चिपक जाती है और पैदावार कम होने की आशंका जताई जाती है। आलू भंडारण में लैंटाना, ईपेटोरियम और युकेलिप्टस का उपयोग किसानों में आलूकंद के संक्रमण के नियंत्रण के लिए आलू के ढेर में लैंटाना, ईपेटोरियम और सफेदा की पत्तियों और टहनियां को फैलाने की प्रथा है। यह इस तथ्य के कारण है, क्योंकि इन पौधों में जीवाणुरोधी, फंगसरोधी और जीवाणुरोधी, एंटीबायोटिक गुण होते हैं। यह अभ्यास आलून की कटाई के तुरंत बाद किया जाता है। आलूकंद के ऊपर 2-5 से.मी. पतली रेत की सतह लगाने से भंडारित आलू पर कंद पतंग का नियंत्रण होता है। कांगड़ा के किसान गेहूँ और चावल में कीट जैसे बीटल, वेइविल और लेपिडोपरस कैटरपिलर को नियंत्रित करने के लिए माचिस की तीलियों को भंडारण संयंत्र में रखते हैं। फॉस्फोरस में उपस्थिति, गैस (फोसिन) संभवतया कीटों को मार देती है। बंग्रू या जंगली पुदीना, काली बसुती के सूखे पत्ते और सफेदा के पत्तों को अनाज के बर्तन में रखने से भी कीटों की रोकथाम होती है। इसमें रोगाणुरोधी, जीवाणुरोधी, एंटीफंगल और कीटनाशक गुण होते हैं। इससे भंडारित गेहूं की रक्षा होती है। इसी प्रकार, रोगों और कीटों से बीजों की रक्षा के लिए आर्टेमिसिया, नीम और भांग की ताजा/सूखी पत्तियों और शाखाआओं का प्रयोग होता है। झाड़ी की असहनीय गंध के कारण कीट और चूहे दूर रहते हैं। बंना नामक पौधा, जिसे स्थानीय भाषा में बणाया निर्गुंडी भी कहा जाता है, का प्रयोग पौधों के फूंदीय, जीवाणु संबंधी फंगल बैक्टीरिया और माइक्रोब्रियल रोगों के लिए के बचाव में किया जाता है। इन पौधों का उपयोग मनुष्य और जानवरों के रोगों के इलाज में भी किया जाता है। धान के स्वस्थ और अच्छे अंकुरण के लिए धान के खेतों के किनारे बाणे की शाखाएं लगाई जाती हैं। बाणे की शाखाओं के झाड़ू से धान के खेतों को साफ किया जाता है। यह एक कीटनाशक के रूप में कार्य करता है। इसमें पॉली-फेनोल, टॉपोनॉइड, ग्लाइकोराइड, इरोइडड, स्टेरॉयड और क्षाराभ एल्केलॉइड होते हैं। इसी तरह का स्वदेसी तकनीकी का कीटों के नियंत्रण के लिए असोम के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में भी गाय के गोबर को पानी में मिलाकर धान के खेतों में छिड़काव जाता है। धान में पीले तनाछेदक की रोकथाम के लिए नीम के बीज और पत्तियों के काढ़े का छिड़काव किया जाता है। तथा खट्टे के छिलके खेतों में डाले जाते हैं। रस्सी को मिट्टी के तेल में डुबोकर धान के खेतों में रुके पानी में हिलाते रहने या डुबोने से गाय के गोबर को खेतों में छिड़कने से कम कीट आते हैं। असोम के कुछ क्षेत्रों में धान पत्ता लपेटक कीट एवं पीला तनाछेदक के नियंत्रण के लिए बरास या फुटुका के कटे पत्ते और सेजन की छाल और फर्न की शाखाओं का प्रयोग किया किया जाता है, क्योंकि इसमें कीटनाशक तत्व होते हैं। अनाज और बीज का संग्रहण कुल्लू जिले के उच्च पहाड़ों के किसान अखरोट के पत्तों और रालयुक्त लकड़ी (जुगनू) के टुकड़ों और लकड़ी की राख को उस बर्तन में रखते हैं जिसमें बीज भंडारण किया जाता है। इन पौधों का उपयोग घुन के हमले को भी कम कर देते हैं। अखरोट के पत्तों में रोगाणुरोधी और फंगसरोधी गुण होते हैं। इसी प्रकार उत्तराखंड के किसान बीज संरक्षण और भंडारण के लिए गाय का गोबर या लकड़ी की राख को बाख, आडू, नीम, तीमूर, अखरोट, हल्दी, नीबू के पत्तों, केरोसिन तेल और चूने के पाउडर के साथ करते हैं। दालों के बीज संरक्षण और बीज भंडारण के लिए लकड़ी राख, गाय गोबर की राख, साबुन, अखरोट, नीम के पत्तों, पोंगम की पत्तियों को भंडारण पात्र में रखते हैं। यह मिश्रण कीट से बचाव में काम करता है। सुरक्षित भंडारण के लिए बीज की नमी को कम करने के लिए अनाज को सुखाने की जरूरत होती है। करी पत्तियों और बेर की शाखा को अनाज भंडारण में पैफलाए जाने से कीटों से बचाव होता है। इन पत्तियों की गंध अनाज के कीटों को हटा देती है। इसी प्रकार पंजाब में गेहूं के भंडारण के लिए आक और नीम की पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है। स्त्रोत: खेती पत्रिका,भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), लेखक: रणबीर सिंह राणा, मुनीश, रानू पठानिया, शिवानी ठाकुर और उषा राणा भौगोलिक सूचना अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केन्द्र, चौ.स.कु. हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर (हिमाचल प्रदेश)।