महिलाओें की खाद्य प्रसंस्करण में पारंगता कृषक महिलाओं को खेती के अतिरिक्त अन्य व्यवसाय भी करने होंगे, ताकि वे अधिक आय का सृजन कर आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें। कृषि के अतिरिक्त यदि व्यावसायिक कार्यों की बात करें तो अधिकतर महिलाएं खाद्य प्रसंस्करण में पारंगत होती हैं और घर पर ही विभिन्न उत्पादों को बना लेती हैं। इन परंपरागत खाद्य उत्पादों की बाजार में मांग अधिक होने के कारण इन्हें वृहद व व्यावासायिक रूप दिया जा सकता है। विभिन्न खाद्य प्रसंस्करण उत्पादों को तैयार करने वाली कम्पनियां तमाम तरह के प्रसंस्करित खाद उत्पादों को व्यावासायिक रूप से तैयार कर बाजार की मांग के अनुसार अच्छे-खासे मुनाफे में बेचती हैं। खाद्य प्रसंस्करण और रोजगार की संभावनाएं खाद्य प्रसंस्करण के माध्यम से बड़ी संख्या में रोजगार अवसरों का सृजन किया जा रहा है। देश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में होटल और रेस्त्रां आदि के व्यवसाय का फैलाव हो रहा है। इनसे रोजगार के अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। कृषक महिलाएं, चाहें तो समूह के माध्यम से एवं स्वयं ही खाद्य प्रसंस्करण का कार्य कर सकती हैं। खाद्य प्रसंस्करण का कार्य कुछ घरेलू उत्पादों जैसे-अचार, पापड़, बड़ी, शुष्कित सब्जियों, चिप्स, कैचप आदि के रूप में तैयार कर पैकिंग करके आसानी से किया जा सकता है। वर्तमान परिदृश्य वर्तमान परिवेश में बढ़ती हुई महंगाई के कारण कृषक महिलाओं को विभिन्न परिस्थतियों का सामना करना पड़ता है। ये महिलाएं खेती से संबंधित विभिन्न गतिविधियों जैसे-खेतों में मजदूरी, निराई-गुड़ाई, सपफाई, पौधशाला की तैयारी, खेतों में रोपाई, अनाजों की सफाई, खाद एवं उर्वरक मिलाना आदि कार्य करती हैं। ये समस्त कार्य या तो अपने खेतों में या दूसरों के खेतों में मजदूरी के रूप में करती है। अपने खेतों में कार्य करने पर यदि कृषि की वैज्ञानिक व नवीन तकनीकों का प्रयोग न किया जाये तो उत्पादन में लगातार कमी होती है। इसके कारण कृषक महिलाएं आर्थिक रूप से लाभान्वित नहीं हो पा रही हैं। क्या है खाद्य प्रसंस्करण ग्रामीण परिवेश में खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, फल एवं सब्जियों का उत्पादन बड़े पैमाने पर हो रहा है। उत्पादन में कृषक एवं कृषक महिलाओं दोनों का ही महत्वपूर्ण योगदान है। कृषक परिवारों के पास भंडारण की तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण सम्पूर्ण उत्पादों को सीधे ही बाजारों में बेच दिया जाता है। इस प्रकार यह बहुत ही कम दामों में बाजार में बिकता है। कभी-कभी तो किसानों को मूल पूंजी भी प्राप्त नहीं हो पाती है, जिसके कारण कई बार किसानों को घाटा उठाना पड़ता है। कुछ फसल उत्पाद ऐसे भी होते हैं, जिनकी भंडारण व संग्रहण क्षमता कम होती है। उत्पाद की प्रकृति शीघ्र खराब होने वाली होती है। ऐसे पदार्थों को यदि प्रसंस्करित किया जाए तो भंडारण क्षमता व मूल्य वृद्धि के साथ कृषक महिलाओं को प्रसंस्करित उत्पाद से रोजगार के साथ अतिरिक्त आय की प्राप्ति भी होती है। कृषक को उत्पाद के अच्छे मूल्य के साथ स्वरोजगार उद्योगों को भी बढ़ावा मिलता है। प्रसंस्करित उत्पादों से महिलाओं को रोजगार प्रसंस्करित उत्पादों से महिलाओं के रोजगार की संभावनाओं में सतत् वृद्धि हो रही है। कृषक महिलाएं कृषि कार्य के साथ कुछ समय निकाल कर महिला समूह के माध्यम से प्रसंस्करित उत्पादों को तैयार करने का कार्य कर रही हैं। इस प्रकार रोजगार के नए साधन सृजित हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिला समूह अनाजों, मसालों, पफल एवं सब्जियों के प्रसंस्करण के क्षेत्र में रोजगार स्थापित कर रहे हैं। वर्तमान में प्रसंस्करित उत्पादों का उपभोग शहरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक बढ़ रहा है। खाने की वस्तु हो या पहनने के वस्त्र हों, सभी क्षेत्रों में प्रसंस्करण की महत्वपूर्ण भूमिका है। सभी वर्ग के लोग प्रसंस्करित वस्तुओं को पसंद करते हैं। प्रसंस्करण से होने वाले लाभ का आर्थिक विश्लेषण सारणीः प्रसंस्करण से होने वाले लाभ का आर्थिक विश्लेषण क्र.सं खाद्यान्न कच्चे उत्पाद का मूल्य प्रसंस्करित उत्पाद शुद्ध लाभ प्रतिशत में 1. अनाज 15 रुपये कि.ग्रा. आटा, बिस्कुट, अन्य उत्पाद 20-25 2. दलहन 40-50 रुपये कि.ग्रा. प्रसंस्करित दाल, बेसन, पापड़, बड़ी अन्य उत्पाद 30-40 3. फल एवं सब्जियां समयानुसार निर्जलीकृत सब्जियां, पाउडर, कैचप, अचार, पल्प, चटनी, रेडी टू सर्व प्रोडक्ट, टॉफी 35-40 4. मसाले समयानुसार मिक्स मसाला, लिक्विड मसाले खड़े मसालों की पैकिंग 20-35 5. दूध 35-40 रुपये कि.ग्रा घी, लस्सी, दही, पनीर, मक्खन, क्रीम एवं अन्य उत्पाद 38-45 प्रसंस्करण क्षेत्र फल एवं सब्जियां अनाज एवं दालें मसाले दूध ग्रेडिंग एवं पैकिंग प्रसंस्करण उद्योग में महिला उद्यमियों की भूमिका खेती से प्राप्त उत्पादों में फल एवं सब्जियों का अग्रणी स्थान है। ये दोनों ही ऐसे उत्पाद हैं जिनका मूल्य बाजार में बढ़ता-घटता रहता है। इसके साथ ही इनकी शेल्फ लाइफ कम होती है अर्थात् इनमें होने वाले एंजाइम की प्रक्रिया के कारण ये शीघ्र ही खराब हो जाते हैं। खराब होने की प्रवृति के कारण इन्हें कम मूल्य पर भी बेचने की स्थिति किसानों के समक्ष आ जाती है। ऐसी स्थिति में कृषक महिलाओं को कई बार घाटे का सौदा करना पड़ता है। इस घाटे से बचने के लिए कृषक महिलाएं खाद्य प्रसंस्करण की खास तरह की तकनीकों को अपना सकती हैं। इससे फल एवं सब्जियों के टिकाऊ बने रहने के साथ उनके स्वाद एवं मूल्य में भी वृद्धि होती है। बाजार में प्रसंस्करित उत्पादों की बढ़ती मांग वर्तमान में सम्पूर्ण बाजार खाद्य प्रसंस्करित उत्पादों पर आधारित है। लोगों की बढ़ती हुई व्यस्तता के कारण सब प्रसंस्करित उत्पादों को खरीदने पर मजबूर हो रहे हैं। इसलिए बाजार में प्रसंस्करण से तैयार उत्पादों की अधिक मांग है। बाजार में यदि देखें तो खाद्य प्रसंस्करित उत्पाद बड़े स्तर पर उपलब्ध हैं। इसलिए पहले की तुलना में वर्तमान में अधिक प्रसंस्करित उत्पादों को तैयार करने वाली अधिक कम्पनियां स्थापित हो रही हैं। ये लोगों को रोजगार भी दे रही हैं। अनाज एवं दालों का प्रसंस्करण कृषक महिलाएं, अनाज एवं दालों के प्रसंस्करण के माध्यम से भी लघु व्यवसाय प्रारंभ कर सकती हैं। भारत में अनाज एवं दालों का उत्पादन अधिक है। किसानों द्वारा अनाज एवं दालों को बिना प्रसंस्करित किये ही बाजार में बेच दिया जाता है। इससे उन्हें उत्पाद का मूल्य कम प्राप्त होता है एवं कम्पनियां प्रसंस्करित करके अधिक लाभ का अर्जन करती हैं। ऐसी स्थिति में यदि महिलाएं अनाज एवं दालों का प्रसंस्करण करके विभिन्न उत्पादों को तैयार करके बेचें तो आर्थिक रूप से सशक्त होने का बेहतर उपाय सुनिश्चित कर सकती हैं। आज बाजार में दालों की सफाई एवं बिनाई करके पैकेटों में पैक करके मूल्य वृद्धि करके बेचा जा रहा है। यह रोजगार को नए आयाम प्रदान कर रहा है। फल एवं सब्जियों के प्रसंस्करित उत्पाद महिलाएं फल एवं सब्जियों के प्रसंस्करित उत्पादों जैसे अचार, जैम, कैचप, सूखी एवं निर्जलीकृत सब्जियां, हिमीकृत सब्जियां और सब्जियों के पाउडर के रूप में तैयार करके बाजार में विक्रय कर सकती हैं। महिलाओं को खाद्य प्रसंस्करण से रोजगार उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार प्रधानमंत्राी कौशल विकास एवं कौशल्या योजना के तहत कृषिरत एवं गैर कृषिरत महिलाओं को प्रशिक्षण प्रदान करके उनके कौशल के द्वार को खोलने में प्रयासरत है। इसके साथ ही लघु उद्यम स्थापित करने के लिए आर्थिक रूप से अनुदान भी प्रदान किया जाता है। वर्तमान समय में बाजार ऐसे उत्पाद प्रसंस्करित उत्पादों पर ही निर्भर है। समय की कमी एवं बढ़ती हुई खाद्य उत्पादों की मांग के आधार पर बाजार में खाद्य प्रसंस्करण से तैयार उत्पादों की मांग अधिक है। बाजार की मांग के अनुसार महिलाएं अनाज एवं दालों के प्रसंस्करित उत्पाद जैसे दाल, बेसन, मल्टीग्रेन आटा, बिस्कुट, सोया आटा एवं अनाजों जैसे-ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी से तैयार आटा एवं पैकेज दालें, केक, कुकीज आदि तैयार करके आसानी से बाजार में बेच सकती हैं। कौशल विकास योजना महिलाओं को स्वरोजगार के क्षेत्र में प्रशिक्षित करने के लिए सरकार द्वारा कौशल विकास योजनाओं का संचालन किया जा रहा है।महिलाओं को उनकी रुचि के अनुसार प्रिशक्षित करके रोजगार स्थापित करने के लिए प्रेरित किया जाता है। दूध प्रसंस्करण वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्रों में दूध की कमी नहीं है। प्रत्येक घर में मवेशी उपलब्ध हैं, जिनकी उत्पादन क्षमता उपयोग से अधिक है। दूध की प्रकृति शीघ्र खराब होने के कारण संग्रहण करना थोड़ा कठिन कार्य है। गांव में दूध के संग्रहण की व्यवस्था पर्याप्त न होने के कारण एवं उपलब्धता अधिक होने के कारण क्षेत्रीय स्तर पर ब्रिकी न हो पाना एक गंभीर समस्या है। दूध व गेहूं ऐसे उत्पाद हैं, जिनके प्रत्येक हिस्से से प्रसंस्करित उत्पाद तैयार किये जा सकते हैं। इसके लिए गांव के स्तर पर दूध का प्रसंस्करण होना अति आवश्यक है। दूध के प्रसंस्करित उत्पादों का मूल्य अधिक होने के कारण मुनाफा ज्यादा होता है। महिलाएं ग्रामीण स्तर पर दूध से घी, पनीर, दही, लस्सी, मक्खन आदि बनाकर बाजार में आसानी से बेच सकती हैं। दूध की ब्रिकी भले ही क्षेत्रीय स्तर पर अधिक न हो, परन्तु इनसे तैयार प्रसंस्करित उत्पादों की बिक्री अधिक होती है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए वित्तीय सहायता योजनाएं(राज्यानुसार परिवर्तित) मध्यप्रदेश शासन द्वारा भी स्वरोजगार आधारित योजनाएं संचालित हैं, जिनके तहत महिला उद्यमियों व बेरोजगारों को स्वरोजगार स्थापित करने के लिए अनुदान प्रदान किया जाता है, ताकि महिलाएं अपना रोजगार स्थापित कर सकें। इनमें प्रमुख हैं: मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना प्रधानमंत्राी रोजगार सृजन कार्यक्रम मुख्यमंत्री आर्थिक कल्याण योजना मुख्यमंत्री कृषक उद्यमी योजना प्रसंस्करण से महिला उद्यमियों को लाभ प्रसंस्करण के माध्यम से महिलाओं को स्वरोजगार की प्राप्ति होती है, जिससे उनका आर्थिक सशक्तिकरण होता है। बाजार में उत्पाद को कम दाम में बेचने से मुक्ति मिलती है। उत्पाद की मूल्यवर्ध्दन क्षमता में वृद्धि होने से उत्पाद का बाजार में मूल्य अधिक प्राप्त होता है। समूह के माध्यम से कार्य करने में सहायता प्राप्त होती है।